रिट|भारतीय संविधान की रिट|बन्दी प्रत्यक्षीकरण|परमादेश|प्रतिषेध

बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) रिट :-यह रिट एक आदेश है जो उस व्यक्ति के लिए होती है| जिसने किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा है। न्यायालय आदेश पारित करता है कि जिस व्यक्ति को अवैध रूप से बंदी बनाया गया है उसे सशरीर उपस्थित किया जाए। जिससे न्यायालय उसके कारावास के कारणों से अवगत हो सके । यदि हिरासत में लिए गए व्यक्ति का मामला अवैध है।तो उसे स्वतंत्र किया जा सकता है । यह रिट किसी व्यक्ति, चाहे अधिकारी हो या प्राइवेट व्यक्ति को  जारी की जा सकती है। इसकी अवमानना करने पर उसे दण्डित भी किया जाएगा। कुछ मामलो मे यह रिट जारी नही की जा सकती हैं जैसे :-

– हिरासत कानून के अनुसार है |

यदि कार्यवाही किसी विधान मंडल या न्यायालय की अवमानना के तहत हुई हो।

किसी न्यायालय ने हिरासत में रखने की सजा दी हो| हिरासत न्यायालय के न्याय क्षेत्र के बाहर हुई हो।

यह रिट अनु० 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवम  दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नही। इसी संदर्भ में यह रिट मानव स्वतंत्रता  का सर्वोत्तम अग्रदूत कहा गया है। यह रिट व्यक्तिगत आजादी के लिए जारी की जाती है।

रिट
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परमादेश(Mandamus) रिट:- यह रिट सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है। इसका शाब्दिक अर्थ “हम आदेश देते हैं” इसके तहत न्यायालय किसी सरकारी अधिकारी, सरकारी इकाई, सरकारी निगम, अधीनस्थ न्यायालय, प्राधिकरणों को यह आदेश जारी करता है। कि वह सार्वजनिक उत्तरदायित्व का निर्वहन ठीक प्रकार से करें। उनके द्वारा उनके कार्यों और उसे न करने के बारे में पूछा जा सके परमादेश रिट निम्नलिखित को जारी नहीं की जा सकती
1- निजी इकाई या निजी (प्राइवेट) व्यक्तियों के विरुद्ध।
2- भारत के राष्ट्रपति एवं राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध।
3- गैर संवैधानिक विभागों के विरुद्ध।

 प्रतिषेध(Prohibition) रिट:-यह रिट सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा निम्न/अवर न्यायालयों को आदेश जारी किया जाता है। कि वह अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर के मामलों में की जाने वाली कार्रवाई को रोक दें इस रिट का शाब्दिक अर्थ ही “रोकना है” यह रिट केवल न्यायिक व अर्ध न्यायिक प्राधिकरण के विरुद्ध ही जारी की जा सकती है
 

उत्प्रेषण(Certiorari) रिट:-उत्प्रेषण रिट का शाब्दिक अर्थ “प्रमाणित होना या सूचना देना है।” इस रिट को किसी विवाद को निम्न/अवर न्यायालय से उच्च न्यायालय में भेजने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है। रिट के न्यायिक व अर्ध न्यायिक प्राधिकरणों के खिलाफ ही जारी किया जाता था। लेकिन सन 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यह रिट व्यक्तियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक प्राधिकरणों के खिलाफ भी जारी की जा सकती है। हालांकि देखा जाए तो यह विधिक निकायों एवं निजी व्यक्तियों या इकाइयों के विरुद्ध जारी नहीं की जा सकती है।
 

अधिकार पृच्छा(Quo Warranto) रिट:-यह रिट किसी भी व्यक्ति द्वारा जारी की जा सकती है। न कि पीड़ित व्यक्ति द्वारा और पूछा जा सकता है। कि वह किस अधिकार से उस पद पर कार्य कर रहा है। अर्थात इस रिट का शाब्दिक अर्थ “किस अधिकार से, प्राधिकृत या वारंट द्वारा।”
इस रिट के द्वारा न्यायालय उस व्यक्ति के खिलाफ आज्ञा पत्र जारी करता है। जो व्यक्ति उस पद पर कार्यरत है जिसे करने के लिए वह अधिकार नहीं रखता है। अर्थात न्यायालय उस व्यक्ति से पूछता है कि वह किस आधार पर इस पद पर कार्यरत है। अतः जिस किसी व्यक्ति द्वारा लोक कार्यालय के अवैध अनाधिकार ग्रहण करने को रोकता है। इसे मंत्रित्व कार्यालय या निजी कार्यालय के लिए जारी नहीं किया जा सकता है। यदि पूरक सार्वजनिक कार्यालयों का निर्माण संवैधानिक हो तब इस रिट को जारी किया जा सकता है।

 इल्बर्ट बिल | विवाद क्या था | विरोध किसने किया |वायसराय कौन था

इल्बर्ट बिल भारतीय जजों के साथ होने वाले भेदभाव/अन्याय को दूर करने की भावना से एक विधेयक सर पी.सी. इलबर्ट द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसे “इल्बर्ट बिल” की संज्ञा दी जाती है।

इल्बर्ट बिल

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भारत में 1861 से समस्त क्षेत्र में एक समान फौजदारी कानून लागू कर दिया गया था। इसी तहत सभी प्रान्तों में उच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी।

सन 1861 से पूर्व देश में दो प्रकार के कानून थे। एक प्रेसीडेंसी नगरों के लिए अंग्रेजी कानून तथा दूसरा ग्रामीण क्षेत्रों में मुगल कानून लागू था। उस समय के नीति निर्धारकों का विचार रहा कि यूरोपीय लोगों को मुगल कानून के अंतर्गत लाना उचित नहीं। कालांतर में इसने एक प्रथा का रूप धारण किया। जिसमें प्रेसीडेंसी नगरों के भारतीय दंड नायक (मजिस्ट्रेट) तथा सेशन जज भारतीय तथा यूरोपीय दोनों व्यक्तियों के मुकदमों की सुनवाई कर सकते थे। कहने का आशय है, कि उस समय प्रेसीडेंसी नगरों के न्यायालय में कोई भी भारतीय जज नहीं होते थे। दूसरी तरफ ग्रामीण प्रदेशों के न्यायालयों में भारतीय तथा यूरोपीय दोनों प्रकार के जज होते थे। परंतु यूरोपीय अभियुक्तों का मुकदमा केवल यूरोपीय जज ही सुनता था। यह नियम केवल फौजदारी मामलों पर लागू था। परंतु दीवानी मामलों पर ऐसा भेदभाव नहीं था।

विवाद का मुख्य कारण था। 1972 में तीन भारतीय न्यायिक सेवा में चयनित हुए तथा 1882 में उनकी पदोन्नति की गई तब वह प्रेसीडेंसी नगर कोलकाता से बाहर भेज दिए गए, जहां यूरोपीय अभियुक्तों के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था। इसी कारण पदोन्नति हुई भारतीय जज श्री बिहारी लाल गुप्ता ने बंगाल के उप गवर्नर सर इशले ईंडन को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने अपने पदोन्नति होने पर अधिकारों में कमी होने को न्याय संगत नहीं होना बताया तथा भारतीय और यूरोपीय पदाधिकारी में तो इस भेदभाव से न्यायाधीशों की शक्तियां नष्ट होती है।
सर पी.सी. इल्बर्ट एक न्याय में विश्वास करने वाले व्यक्ति थे। अतः वह भारतीयों को न्याय दिलाने के पक्षधर थे। इस समय वायसराय की परिषद में एक विधि सदस्य थे। इसलिए उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से 2 फरवरी 1883 को विधान परिषद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। इसी विधेयक को उनके नाम पर “इल्बर्ट बिल” कहा गया।

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इल्बर्ट बिल का प्रमुख उद्देश्य भारतीय न्यायधीशों को यूरोपीय में न्यायाधीशों के समान शक्तियां प्रदान करना था। और काले- गोरे जाति भेद पर आधारित सभी न्यायिक अयोग्यताएं समाप्त करके यूरोपीय न्यायधीशों की भांति भारतीय न्यायाधीशों को सामान शक्तियां प्रदान की जाए।
इस बिल का विरोध बड़े-बड़े उद्यानों वाले यूरोपीय मालिकों द्वारा प्रमुखता से किया गया। क्योंकि इन मालिकों द्वारा भारतीय मजदूर पर बर्बरता का व्यवहार किया जाता था ।और उनसे कठोर परिश्रम कराया जाता था। यदि मजदूर कार्य करने में असमर्थता व्यक्त करता तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। कभी-कभी तो पीटते-पीटते उनकी मृत्यु तक हो जाती थी। इस प्रकार की हत्या का मामला न्यायालय में जाता था। तो वहां यूरोपीय न्यायाधीश ही मामले की सुनवाई करते थे और उन्हें थोड़ा दंड देकर या कभी-कभी बिना दंड के ही छोड़ देते थे लेकिन जब भारतीय न्यायाधीशों के समक्ष ऐसा मामला पहुंचा तो शायद उन्हें कठोर सजा सुनाई जा सकती थी। इसलिए इन मालिकों ने इस बिल का विरोध किया।

यूरोपीय मालिकों ने इल्बर्ट बिल के विरोध हेतु एक प्रतिरक्षण संघ (Defence association) बनाया जिसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये चंदे के रूप में एकत्रित हुए। इस प्रकार उन्होंने प्रचार किया “कि क्यों हमारा निर्णय काले लोग करेंगे। क्या वे हमें जेल भेजेंगे क्या वह हम पर आज्ञा चलाएंगे यह मालिकों द्वारा मानना असंभव है” उन्होंने यहां तक कहा कि भारत में अंग्रेजी शासन समाप्त हो जाए लेकिन वह इस घृणित कानून को नहीं मानेंगे।

विरोध इतना प्रचंड था। कि कुछ यूरोपीय ने वायसराय को बंदी बनाकर इंग्लैंड भेजने की साजिश रची। गालियां दी गई तथा कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही वायसराय को वापस बुला लिया जाए इसकी मांग कर दी। विरोध का असर इंग्लैंड में भी दिखने लगा क्योंकि लंदन के प्रसिद्ध समाचार पत्र द टाइम्स ने भी वायसराय रिपन की नीतियों की आलोचना की। महारानी विक्टोरिया ने वायसराय के इस बिल के प्रति व्यवहार पर संदेह व्यक्त किया।

अंततः रिपन को झुकना पड़ा और 26 जनवरी 1884 को नया विधेयक पारित किया गया। जिसमें नियम बनाया गया कि यदि यूरोपीय व्यक्तियों का मुकदमा सेशन जजों के समक्ष आए तो वे लोग 12 सदस्यों की पीठ की मांग कर सकते हैं। जिसमें कम से कम सात यूरोपीय//अमेरिकी जज होना अनिवार्य होगा ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार जजों की पीठ गठित करना संभव नहीं था। इसलिए यह मुकदमे हस्तांतरित करना होता था।

 भारत में पर्यावरण आंदोलन|चिपको(1974)|विश्नोई(1730)|अप्पिको(1983)

भारत में चलाएं गए प्रमुख पर्यावरण आंदोलन:-
भारत में पर्यावरण आंदोलन देखा जाए तो आदिकाल से चलाया जा रहा है। पर्यावरण से संबंधित तत्वों जैसे धरती, जल, आग, वायु, आकाश, पर्वत, नदी, वनस्पतियों से भारतीयों की असीम श्रद्धा जुड़ी है। वह उनकी विभिन्न रूपों में पूजा अर्चना करके इसके संरक्षण में अपना योगदान देते रहे हैं। इसका उल्लेख वेदों, गीता, महाभारत, उपनिषद आदि में किया गया है।

लेकिन वर्तमान में विकास की अंधी दौड़ में हम अपने और अपनी आने वाली पीढ़ी के जीवन को संकट में डाल रहे हैं। और लगातार वन एवं जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए वनों को काटने से रोकने प्राकृतिक संसाधनों को भविष्य के लिए बनाए रखने हेतु भारतीय पुरुषों महिलाओं ने विभिन्न आंदोलन चलाए। जिससे पर्यावरण संरक्षण को काफी मदद मिली और सरकार द्वारा भी विभिन्न नियम बनाए गए।
पर्यावरण संरक्षण हेतु भारत में पर्यावरण आंदोलन चलाए गए। जिनमें प्रमुख आंदोलन निम्नलिखित हैं:-

भारत में पर्यावरण आंदोलन

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चिपको आंदोलन (Chipko Movement):-
चिपको आंदोलन 26 मार्च 1973 ई. को उत्तर प्रदेश के चमोली जिले (वर्तमान में उत्तराखंड) में वनों की कटाई को रोकने के लिए किया गया।
इस आंदोलन में प्रदर्शन कार्यों द्वारा पेड़ों को गले लगाया गया जिससे पेड़ों को काटा ना जा सके।
वर्ष 1964 में सामाजिक कार्यकर्ता चंडी प्रसाद भट्ट द्वारा दसोली ग्राम स्वराज संघ की स्थापना की गई। जो की कर्ण सिंह और ज्योति कुमारी आंदोलन से प्रेरित था।
उक्त संघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जंगली संसाधनों का उपयोग कर छोटे-छोटे उद्योगों की स्थापना कर सके।
 चिपको आंदोलन को प्रेरणा बिश्नोई आंदोलन से मिली। जो 1731 में राजस्थान के खेजड़ी गांव से प्रारंभ हुआ। यहां अमृता देवी बिश्नोई और उनकी तीन पुत्री ने पेड़ों से लिपटकर (चिपककर) अजीत सिंह द्वारा कटवायें जा रहे खेजड़ी के वृक्षों को काटने से रोका लेकिन अजीत सिंह के लोगों द्वारा उनके समेत गांव के 363 लोगों को पेड़ों के साथ काट दिया गया।
आधुनिक चिपको आंदोलन की शुरुआत 26 मार्च 1974 में उत्तर प्रदेश के रैणी गांव (वर्तमान में उत्तराखंड) में ₹2500 पेड़ों की नीलामी काटने के लिए की गई। लेकिन इन पेड़ों की कटाई का विरोध गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं द्वारा पेड़ों से चिपककर किया गया। इस विरोध से वन्य जीव अधिकारियों को गौरा देवी की बात माननी पड़ी और पेड़ों की कटाई रोक दी गई।
चिपको आंदोलन के जनक सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट तथा अन्य कार्यकर्ताओं के साथ ग्रामीण महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।
चिपको आंदोलन पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से किया गया शांति एवं अहिंसक आंदोलन था।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा सन् 1980 में हिमालयी वृक्षों को काटने पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी गई। यह इस आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता थी।
भारत में पर्यावरण आंदोलन साइलैंट वैली आंदोलन (silent valley movement):-
साइलेंट वैली आंदोलन 1973 में केरल के पलक्कड़ जिले में चलाया गया था।
यह आंदोलन कुंतीपूझा(Kunthi puzha) नदी पर बनाए जा रहे जल विद्युत प्रोजेक्ट के विरोध में चलाया गया था।
जिस स्थान पर यह जल विद्युत प्रोजेक्ट बनाया जा रहा था। वहां सदाबहार उष्णकटिबंधीय वन है। यह वन अत्यधिक घने होने के कारण बहुत ही शांत रहता है। इसलिए इसे शांत घाटी (silent valley)कहा जाता है।
यहां के वनों में पेड़ पौधों एवं जंतुओं की दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। जिसमें मुख्यतः राष्ट्रीय पशु बाघ, नीलगिरी लंगूर, विशिष्ट जीव लाॅयन टेल्ड मकाक आदि यहां की स्थानीय प्रजातियां पाई जाती हैं।

 यहां निर्माणाधीन जल विद्युत प्रोजेक्ट से यहां पाई जाने वाली विभिन्न पेड़- पौधों जंतुओं की दुर्लभ प्रजातियों के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो सकता था ।
यह आंदोलन एक सामाजिक आंदोलन बन गया था। क्योंकि इस आंदोलन के समर्थन में विशिष्ट लोगों ने जनता से संपर्क हेतु विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया। जिससे जनता को जागरूक किया जा सके।
यह आंदोलन कामयाब रहा और 1985 को इस स्थान को साइलेंट वैली राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया।

भारत में पर्यावरण आंदोलन 

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बिश्नोई आंदोलन:-
बिश्नोई आंदोलन 15वीं शताब्दी में संत ज़ाभोजी (भगवान जंभेश्वर) के नेतृत्व में राजस्थान से शुरु हुआ।
इस आंदोलन को पर्यावरण आंदोलन, बिश्नोई आंदोलन, बिश्नोई चिपको आंदोलन या खेजड़ली आंदोलन आदि नामो से भी जाना जाता है।
संत जांभोजी के द्वारा पर्यावरण के प्रति इतनी सेवा भावना से प्रेरित होकर बिश्नोई समुदाय द्वारा वृक्षों और जीवों की पूजा और संरक्षण किया जाता है।
सन 1730 में राजस्थान के राजा अभय सिंह द्वारा मेहरानगढ़ के किले में फूल महल के निर्माण हेतु लकड़ी की आपूर्ति के लिए सिपाहियों द्वारा रामू खोड के खेत में खडे़ खेजड़ी के वृक्षों को काटना प्रारंभ किया गया।
खेजड़ी के वृक्षों को काटने से रोकने हेतु रामू खोड की पत्नी अमृता बिश्नोई वह तीन पुत्रियों रत्नी, आंसू और भागू पेड़ों से लिपट गई। लेकिन राजा के सिपाहियों द्वारा इन सभी को पेड़ों के साथ काट दिया गया। पेड़ों की रक्षा के लिए मां बेटियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
अमृता देवी वह उनकी पुत्रियों से प्रेरित होकर जोधपुर के खेजरली गांव के 363 स्त्री पुरुष शहीद हो गए। इस घटना के राजा के संज्ञान में आने पर उन्होंने अपना आदेश वापस ले लिया और पेड़ों की कटाई बंद करवाई और बिश्नोई समुदाय से माफी मांगी।
अमृता देवी के बलिदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार व राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। जैसे अमृता देवी बिश्नोई स्मृति पर्यावरण पुरस्कार (राजस्थान व मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिया जाता है) अमृता देवी बिश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार (भारत सरकार द्वारा)
भारत में पर्यावरण आंदोलन

नर्मदा बचाओ आंदोलन:-
यह आंदोलन नर्मदा नदी पर बनाई जाने वाली बहुउद्देशीय बांध परियोजना के विरोध में था। इस योजना के तहत बनाए जाने वाले नर्मदा नदी पर निर्माणाधीन सरदार सरोवर बांध जो की एक बेहद बड़ा बांध था। जिसका सर्वाधिक विरोध किया गया। इस परियोजना का निर्माण गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र राज्य द्वारा सम्मिलित रूप से कराया जा रहा था। इस परियोजना से लगभग 37000 हेक्टेयर भूमि के जलमग्न होने का खतरा था। तथा लाखों परिवारों की कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया गया। जिसमें 58% भूमि आदिवासी लोगों की थी। बांध के निर्माण से लाखों परिवारों के विस्थापित होने का खतरा उत्पन्न हो जाता क्योंकि पानी को रोकने से आसपास की भूमि जलमग्न हो रही थी ।
इस आंदोलन में आदिवासी, किसान, पर्यावरण कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया जिसमें प्रमुख नेतृत्व कर्ता मेधा पाटकर, बाबा आमटे एवं अरुंधति राय थे। इन लोगों के प्रयास से उच्चतम न्यायालय द्वारा विस्थापित लोगों के लिए उचित पुनर्वास हेतु स्पष्ट नीति निर्माण करने का आदेश दिया गया।

भारत में पर्यावरण आंदोलन

एप्पिको आंदोलन:-
एप्पिको आंदोलन दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में 1983 में चलाया गया। यह आंदोलन उत्तर प्रदेश (वर्तमान में उत्तराखंड) के चिपको आंदोलन से प्रेरित था। एप्पिको शब्द कन्नड़ भाषा का है जिसका अर्थ “गले लगाना” होता है। यह आंदोलन पूर्णता अहिंसक था। 38 दिनों तक चलने वाले इस आंदोलन में युवाओं की सहभागिता सराहनीय थी। उनके अनुसार वनों की कटाई अधिक होने के बावजूद कागजों पर प्रति एकड़ दो पेड़ ही काटना प्रदर्शित किया जाता था। इससे गांव के आसपास के जंगल धीरे-धीरे गायब होने लगे जंगलों की कटाई के विरोध में सितंबर 1983 में अनेक महिलाओं, पुरुषों एवं बच्चों ने पांडुरंग हेगड़े के नेतृत्व में सलकानी से 5 किलोमीटर चलकर कालासे (kalase) में काटे जा रहे पेड़ों को गले लगाया।

कुतुब मीनार(1199)|उद्देश्य|निर्माणकर्ता|स्थान|सीढ़िया

कुतुब मीनार:-

कुतुब मीनार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा कुतुब मीनार का निर्माण कराने का मकसद मुसलमानों को प्रार्थना हेतु इकट्ठा किया जा सके। लेकिन कालांतर में इसे चित्तौड़ और मांडू में बनी मीनारों के परिपेक्ष में देखा जाने लगा तथा इसे विजय की मीनार माना जाने लगा। कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ईस्वी में कुव्वत-उल- इस्लाम मस्जिद के प्रांगण में इसका निर्माण कार्य प्रारंभ कराया। प्रारंभ में इसके निर्माण हेतु जो खाका तैयार किया गया था उसमें इसकी ऊंचाई 225 फीट तथा चार मंजिल होना तय किया गया था।

कुतुब मीनार

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कुतुबुद्दीन कुतुबमीनार की केवल एक मंजिल का निर्माण कर सका शेष कार्य इल्तुतमिश द्वारा किया गया। कुतुबमीनार का निर्माण सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में कराया गया था। फिरोज तुगलक के समय में कुतुब मीनार पर आकाशीय बिजली गिरने के कारण इसकी चौथी मंजिल क्षतिग्रस्त हो गयी |जिससे इस चौथी मंजिल को तोड़कर इसके स्थान पर दो मंजिलो का निर्माण कराया गया | जिससे कुतुबमीनार की उचाई 234 फिट हो गयी थी | समय समय पर कुतुबमीनार की मरम्मत का कार्य फिरोजशाह तुगलक ,सिकंदर लोदी व् मेजर आर. स्मिथ द्वारा कराया गया |   

कुतुब मीनार के आंतरिक भाग में कुछ छोटे-छोटे देवनागरी अभिलेख खुदे हैं। इन्हीं अभिलेखों के आधार पर इसे शुरू में हिंदू मीनार होने से जोड़ा जाने का प्रयास किया गया और कहा गया कि मुसलमानों ने इसकी बाहरी दीवारों पर कटाई करके मीनार का स्वरूप प्रदान किया।

उक्त विचारधारा का सिरे से खण्डन जान मार्शल जैसे इतिहासकारों ने किया है। और कुतुब मीनार को इस्लामी मीनार ही माना जाना सर्व उचित है। इस मीनार के निकले छज्जों को छत्तेदार डिजाइन से अलंकृत पत्थरों के ब्रैकेट द्वारा सहारा दिया गया है।

प्रश्न:- कुतुब मीनार कहां है।
उत्तर:- कुतुब मीनार दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के परिसर में स्थित है।

प्रश्न :- कुतुब मीनार क्यों बनाया गया था।
उत्तर:- कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा मुसलमानों को एक जगह एकत्रित करके प्रार्थना सभाओं का आयोजन करना था।

प्रश्न:- कुतुबमीनार का निर्माण कब हुआ।
उत्तर:- कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ईस्वी में दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के परिसर में कराया गया।

प्रश्न:- कुतुब मीनार में कितनी सीढ़ियां हैं।
उत्तर:- कुतुब मीनार में 379 सीढ़ियां हैं।

अलीगढ़ आंदोलन (1876)|सर सैयद अहमद खां|अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय|तहजीब-उल-अखलाक

सर सैयद अहमद ख़ां:-

अलीगढ़ आंदोलन (1876), सर सैयद अहमद खां, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, तहजीब-उल-अखलाक

सर सैयद अहमद के नेतृत्व में अलीगढ़ आंदोलन 1876 में प्रारंभ हुआ। सर सैयद अहमद का जन्म 1817 ईस्वी में दिल्ली में हुआ। यह अंग्रेजी शिक्षा एवं ब्रिटिश सत्ता के सहयोग के पक्षधर थे। क्योंकि सर सैयद अहमद ख़ां का मानना था कि मुसलमानों में शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है इसलिए वह शिक्षा का प्रचार-प्रसार करके उनके बौद्धिक स्तर में वृद्धि तथा रोजगार प्राप्त करने में सक्षम हो सके। जिससे मुस्लिम समाज की दशा में सुधार हो सके।

अलीगढ़ आंदोलन

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अलीगढ़ आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था, कि मुस्लिम समुदाय का उत्थान कैसे किया जाए भारत में ज्यो-ज्यो पुनर्जागरण बड़ा और शिक्षा का विकास हुआ तो मुस्लिम समाज का एक प्रबुद्ध वर्ग शिक्षा की महत्ता को समझने लगा। इसी वर्ग का नेतृत्व सर सैयद अहमद ने अपने हाथों में संभाला और मुसलमानों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना तथा मुस्लिम समाज का उत्थान सुनिश्चित करना। लेकिन उनके इस कार्य का उलेमाओं तथा कट्टरपंथी मुसलमानों ने खुला विरोध किया। लेकिन सर सैयद अहमद अपने इस कार्य में निडरता से करने में डटे रहे।

1857 की महान क्रांति के पश्चात अंग्रेजी सत्ता को लगने लगा कि इस क्रांति में मुख्य षड्यंत्र करता मुसलमान थे। इसकी पुष्टि कुछ समय पश्चात हुए बहावी आंदोलन ने कर दी। अंग्रेजी सरकार को यह एहसास हो गया था कि बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण हिंदू मुस्लिम एकता के कारण कालांतर में और अधिक विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए अंग्रेजी सरकार ने बड़ी चालाकी से मुसलमानों को अपने सहयोगी के रूप में इस्तेमाल करने का निश्चय किया।

अलीगढ़ आंदोलन के प्रणेता सर सैयद अहमद का मत था। कि मुस्लिम समुदाय अभी पिछड़ा है और यदि हिंदू मुस्लिम एकता बनी रहे तो इसमें मुसलमानों कोई लाभ न होकर नुकसान ही होगा। किसी समय सर सैयद अहमद हिंदू मुस्लिम एकता के समर्थक थे। कालांतर में हिंदू तथा कांग्रेस विरोधी होते गए। फल स्वरुप अलीगढ़ आंदोलन विरोधी होता चला गया। इसी का अवसर पाकर अंग्रेजी सरकार ने मुसलमानों को अपने को अपने पक्ष में करने में सफलता प्राप्त की। और अलीगढ़ आंदोलन अंग्रेजों की विश्वसनीयता हासिल करने में सफल रहा।

सर सैयद अहमद ने अपने जीवन के दो मुख्य लक्ष्य बनाए। पहला अंग्रेजी सरकार और मुसलमानों के संबंधों को ठीक करना तथा दूसरा मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना। सर सैयद अहमद खान मुस्लिम मदरसो में पढ़ाई जाने वाली पुरानी पद्धति की शिक्षा से खुश नहीं थे। और इन्होंने यह तर्क दिया कि कुरान में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो मुस्लिम समाज को पश्चिमी संस्कृति के संपर्क में आने वाला अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने से रोकता है। इनके द्वारा सन 1864 में साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना तथा गाजीपुर में इसी वर्ष एक अंग्रेजी शिक्षा का स्कूल खोला गया। 1870 में फारसी भाषा में एक पत्रिका तहजीब-उल-अखलाक निकाली। यह सदैव अंग्रेजी सरकार के प्रति राजभक्त बने रहे। इसी क्रम में उनके द्वारा 1875 में अलीगढ़ में मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल की स्थापना की गई। जो 1878 में कॉलेज बना तथा 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया।
अलीगढ़ आंदोलन में सर सैयद अहमद खान के समर्थकों में चिराग अली, नजीर अहमद, अल्ताफ हुसैन अली, मौलाना शिबली नोमाली आदि प्रमुख थे। 1887 कांग्रेस के अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयब जी बने तो इन्होंने इसका विरोध किया।

भारत का क्षेत्रफल|अन्य नाम|विस्तार|अंतरराष्ट्रीय सीमा|दर्रे|अपवाह तंत्र

दोस्तों आज हम लोग इस लेख में भारत के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्यो का अवलोकन करेंगे। जिसमें भारत का क्षेत्रफल, विस्तार, स्थित, अन्य नाम, अंतरराष्ट्रीय सीमाएं, प्रमुख पर्वत, नदियां, झीलें, भारतीय सीमा से गुजरने वाली विभिन्न रेखाओं आदि के बारे में भी चर्चा करेंगे।

भारत का क्षेत्रफल:-

भारत रूस, कनाडा, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील व ऑस्ट्रेलिया के बाद सातवां सबसे विशाल देश है। इसका क्षेत्रफल 3287263 वर्ग किलोमीटर है, जो की संपूर्ण विश्व का 2.43 प्रतिशत है। भारत में विश्व की कुल आबादी का 17.5% निवास करती है। यह जनसंख्या की दृष्टि से चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। निकट भविष्य में लगातार जनसंख्या वृद्धि के कारण जल्द ही भारत चीन को पीछे छोड़कर प्रथम स्थान पर पहुंच जाएगा।

भारत का क्षेत्रफल

नामकरण:-

भारत एक विशाल देश है। इसी कारण से उपमहाद्वीप की संज्ञा दी गई है। समय-समय पर इसको विभिन्न नाम से पुकारा गया प्राचीन काल में इसका नाम आर्यावर्त था, जो की बाद में राजा भारत के नाम पर भारत वर्ष नाम से संबोधित किया जाने लगा।

पर्शिया (आधुनिक ईरान) से भारत आए लोगों में सर्वप्रथम भारत के सिंधु घाटी में प्रवेश किया। यह स्थान वैदिक आर्यों का निवास स्थान था। पर्शियन सिंधु नदी को हिंदू नदी कहते थे। क्योंकि यह लोग “स” अक्षर का उच्चारण “ह” अक्षर के समान करते थे। इस प्रकार यह लोग हिंदुस्तान कहने लगे इसी कारण यह लोग यहां के निवासियों को हिंदू कहने लगे। यहां जामुन के पेड़ों की अधिकता के कारण जैन पौराणिक कथाओं के अनुसार हिंदू और बौद्ध ग्रंथों में इसके लिए जम्बूद्वीप शब्द का प्रयोग किया गया है। यूनानियों द्वारा इसे इंडिया कहा गया भारत के संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा जिसे हाल ही में संविधान संशोधन के द्वारा इंडिया शब्द को हटा दिया गया।

भारत की स्थिति और विस्तार:-

भारत-दक्षिण एशिया में स्थित एक चतुष्कोणीय आकृति वाला देश है प्रायद्वीपीय भारत त्रिभुजाकार होने के कारण हिंद महासागर को अरब सागर वह बंगाल की खाड़ी नामक दो शाखाओं में विभाजित करता है। भारत के पूर्व में इंडो-चीन प्रायद्वीप तथा पश्चिम की ओर अरब प्रायद्वीप स्थित है। इसकी स्थिति अक्षीय दृष्टि से उत्तरी गोलार्द्ध में तथा देशांतरीय दृष्टि से पूर्वी गोलार्द्ध में है।
भारत की स्थिति पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में 8°4′ से 37° 6′ उत्तरी अक्षांश तथा 68°7′ से 97°25′ पूर्वी देशांतर के बीच में स्थित है।

भारत के मानक समय का निर्धारण:-

भारत का मानक समय 82.5 पूर्वी देशांतर से निर्धारित किया गया है। जो कि भारत के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। तथा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) के निकट नैनी से होकर निकलती है। इसी स्थान से भारत के मानक समय का निर्धारण किया गया है। 82.5 पूर्वी देशांतर भारत के पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश से होकर गुजरती है।

भारत का अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार:-

भारत का अक्षांशीय विस्तार पूर्व से पश्चिम तक 2933 किलोमीटर है। जो की सुदूरस्त पश्चिमी बिंदु गौर मोता अथवा गुहार मोती (गुजरात) से सुदूरस्त पूर्वी बिंदु किबिथू (अरुणाचल प्रदेश) तक है।
भारत का देशांतरीय विस्तार उत्तर से दक्षिण 3214 किलोमीटर है। जो कि सुदूरस्त उत्तर बिंदु सियाचिन ग्लेशियर के निकट इंदिरा कॉल लद्दाख व सुदूरस्त दक्षिणी बिंदु इंदिरा पॉइंट, ग्रेट निकोबार (कन्याकुमारी, तमिलनाडु) में स्थित है।

कर्क रेखा:-

कर्क रेखा भारत के 8 राज्यों से गुजरती है। जो निम्नवत हैं:-
गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम।

भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा की लंबाई और संबद्ध राज्य:-

भारत की कुल अंतर्राष्ट्रीय सीमा 22716.5 किलोमीटर है। जिसमें 15200 किलोमीटर स्थलीय सीमा और 7516.5 किलोमीटर तटीय सीमा है।

भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा से संबद्ध देश:-

बांग्लादेश:-

4096.7 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा वाला देश है। जो भारत के साथ सबसे लंबी सीमा रेखा बनाता है। इससे भारत के राज्यों में पश्चिम बंगाल, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, असम की सीमाएं मिलती हैं।

चीन:-

भारत की चीन के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा की लंबाई 3488 किलोमीटर है ।जो भारत के लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश राज्यों से संबंध है। भारत चीन की सीमा रेखा को मैकमोहन रेखा कहते हैं।

पाकिस्तान:-

भारत के साथ पाकिस्तान की सीमा रेखा की लंबाई 3323 किलोमीटर है। जो गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख से संबंध है। इसकी सीमा रेडक्लिफ रेखा के नाम से जानी जाती है।

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विश्व की जनजातियां|बुशमैन|पिग्मी|मसाई|बोरो|सकाई|सेमांग|बद्दू|

 

विश्व की जनजातियां :-

प्यारे दोस्तों आज हम लोग इस लेख में विश्व की जनजातियों (विश्व की जनजातियां) के बारे में जानेंगे | जनजातियों से आशय है। कि लोगों का ऐसा समूह जो रूढ़िवादी परंपराओं के साथ और उत्पत्ति के समय से ही अपने आदिम स्वरूप में ही जीवन निर्वाह कर रहे रहा है। ऐसे लोगों के समूह को जनजातीय कहा जाता है। विश्व की प्रमुख जनजातियां निम्नलिखित हैं:-

01- बुशमैन (Bushman):-

इस जनजाति के लोगों की आंखें चौड़ी व त्वचा काली होती है। यह प्रायः नग्न अवस्था में रहते हैं। इनका निवास स्थान दक्षिण अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल व लेसोथो, नैटाल, वासूतोलैंड, दक्षिण रोडेशिया तक विस्तृत है। यह लोग हब्सी प्रजाति के हैं। यह बड़े ही परिश्रमी व उत्साही प्रवृत्ति के होते हैं। इन लोगों का मुख्य व्यवसाय आखेट करना एवं जंगली वनस्पतियों को इकट्ठा करना। यह धूप ठंड एवं वर्षा से बचने के लिए लकड़ियों व पत्तों से निर्मित गुंबदाकर झोपड़ियों का निर्माण करते हैं। यह लोग सर्वभक्षी प्रवृत्ति के होते हैं। उत्सवों आदि में दीमक से बने भोजन को यह बड़े चाव से खाते हैं। इसलिए दीमक को “बुशमैन का चावल”(Bushman’s rise) की संज्ञा दी जाती है।

विश्व की जनजातियां

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02- पिग्मी (Pigmy):-

पिग्मी जनजाति के लोगों के चेहरे की बनावट में नाक चपटी, ओठ मोटे बाहर की ओर उभरे तथा छल्लेदार गुच्छो के समान सिर पर बाल पाए जाते हैं। यह काले निग्रोटो प्रजाति के लोग हैं। इनका कद 01 से 15 मीटर तक होता है। जो कि विश्व की सभी जनजातियों में सबसे कम है। यह लोग गले में बांस की बनी सीटी लटकाए रहते हैं। जिससे पक्षियों की बोली की नकल करके उनका शिकार करते हैं। तथा साथियों से संपर्क बनाए रखने में इसका प्रयोग करते हैं।
पिग्मी जनजाति की कई उपजातियां हैं। जिन्हें सम्मिलित रूप से “आचुआ” नाम से जाना जाता है। इसकी म्बूती तथा बिंगा गोसेरा उपजातियां कांगो बेसिन के गैबोन, युगांडा, दक्षिण पूर्व एशिया व फिलिपींस के वनो, आमेटा और न्यूगिनी के वनों में पाई जाती हैं। निवास के लिए यह कोई स्थाई घर नहीं बनाते यह रहने के लिए मधुमक्खी के छत्ते की तरह इनकी झोपड़ियां होती हैं। जो 2 मीटर व्यास वह डेढ़ मीटर ऊंची होती हैं। इसका दरवाजा लगभग 50 सेंटीमीटर ऊंचा होता है। जिसमें यह घुटनों के बाल खिसक कर घुसते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय आखेट है। इस जनजाति के पुरुष जानवरों की खाल वह महिलाएं पत्तों से अपने कमर के निचले भाग को ढके रखती हैं। इस जनजाति के लोगों को “केला” खाना बहुत पसंद है।

विश्व की जनजातियां

03- मसाई (Masai):-

इस जनजाति के लोगों का बदन छरहरा, कद लंबा तथा त्वचा का रंग भूरा और गहरा कत्थई होता है। यह मुख्यतः चमड़े से बने हल्के वस्त्रो का प्रयोग करते हैं इनमें मेडिटरेनियन (भूमध्य सागरीय) और निग्रोइड जाति के मिश्रण की झलक दिखाई पड़ती है। यह टंगानिका, केन्या व पूर्वी युगांडा के पठारी क्षेत्र में घुमक्कड़ी पशु चारक के रूप में जीवन निर्वाह करते हैं। लेकिन कभी-कभी अस्थाई झोपड़ियों का निर्माण रहने के लिए करते हैं। जिसे “क्राॅल” कहा जाता है। यह लोग गाय को पवित्र मानते हैं,एवं कुत्तों को रखवाली के लिए पालते हैं मसाई लोगों का मुख्य भोजन रक्त है। यह गाय और बैल की गर्दन को रस्सी से बांधकर सुई द्वारा नसों से खून निकलते हैं। इसे ताजे दूध में मिलाकर पीते हैं। मसाई जनजाति के पुजारी/धार्मिक नेता को “लैबान” कहते हैं। जिसका सभी सम्मान करते हैं। यह जनजाति यूरोपीयों के संपर्क में आने से इसके रहन-सहन में काफी बदलाव देखा गया है।

विश्व की जनजातियां

04- बोरो (Boro):-

पश्चिमी अमेजन बेसिन, ब्राज़ील, पेरू और कोलंबिया के सीमांत क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह जनजाति बहुत ही लड़ाकू निर्दय, क्रूर प्रवृत्ति की होती है। इस जनजाति के लोगों की त्वचा का रंग भूरा बाल सीधे तथा कद मध्यम होता है। इनका शारीरिक बनगठाव बोरो अमेरिका के रेड इंडियन के समान है। यह लोग अभी भी आदिम कृषक के रूप में जीवन यापन करते हैं। इन लोगों की निर्दयता की पराकाष्ठा इनके द्वारा मनाए जाने वाले उत्सवों में प्रतीत होती है, इनमें यह अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए मानव हत्या करना, मांस लक्षण करना तथा विजय चिन्ह के रूप में मानव खोपड़ियों को अपने झोंपड़ियो में सजा कर रखते हैं।

विश्व की जनजातियां

05- सकाई(Sakai):-

सकाई जनजाति के लोगों का रंग साफ कद लंबा, सिर लंबा पतला, घुंघराले बाल और अधिकतर निर्वस्त्र रहते हैं। अपने शरीर के नीचे के भाग को घास व पत्तों से ढके रहते हैं। इनका निवास स्थान मलाया प्रायद्वीप, मलेशिया के वन घटिया हैं। यह प्रायः निर्दयी प्रवृत्ति के होते हैं। इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि, बागानी कृषि, आखेट आदि होता है। आखेट हेतु यह बांस की नली निर्मित फूक नली का प्रयोग करते हैं। इस जनजाति की महिलाएं पूर्णता स्वतंत्र होती है। उन पर पारिवारिक शासक जैसा कोई दवाब नहीं होता है। बालक बालिकाओं स्वेच्छाचारी होते हैं। अर्थात उनमें संबंधों जैसा कोई प्रावधान नहीं होता है।

विश्व की जनजातियां

06- सेमांग(Semang):-

मुख्यत: मलाया प्रायद्वीप, मलेशिया के वन और कुछ मात्रा में अंडमान, फिलिपींस, मध्य अफ्रीका में सेमांग जनजाति निवास करती है। नीग्रिटो प्रजाति के,नाटा कद, ओठ चपटे मोटे, बाल घुंघराले काले होते हैं।यह अपने गुप्तांगों को ढकने के लिए पेड़ों की छाल को कूटकर उनसे प्राप्त रेशों से पतली- पतली पत्तियों से बुनकर कपड़ों का प्रयोग करते हैं। इनका जीवन वनों की उपज और आखेट पर निर्भर करता है। यह प्रायः पेड़ों पर झोपड़ियां बनाकर निवास करते हैं। इनका मुख्य भोजन रतालु (yam) है।

विश्व की जनजातियां

07- बद्दू (Badawins):-

अरब के उत्तरी भाग के हमद और नेफद मरुस्थल में पाई जाने वाली बद्दू जनजाति कबीले के रूप में चलवासी जीवन व्यतीत करती है। इनका संबंध नीग्रोटो प्रजाति से है। पशुपालन में यह ऊंट भेड़ बकरी घोड़े को पालते हैं। जो बद्दू ऊंटो का पालन करते हैं। उन्हें “रुवाला” कहा जाता है। यह लोग तंबू बनाकर रहते हैं। बद्दू लोगों का रंग हल्का कत्थई और गेहुआ, बाल घुंघराले और काले होते हैं। यह सिर पर स्कार्फ बांधते हैं। महिलाएं लंबे चोंगे व पाजामे के साथ-साथ सिर पर बुर्का पहनती हैं।

विश्व की जनजातियां

08- खिरगीज(Khirghiz):-

मंगोल प्रजाति की यह जनजाति मध्य एशिया में किर्गिस्तान गणराज्य में पामीर के पठार और थ्यानशान पर्वत माला में निवास करती है। इनका कद नाटा, पीला रंग, सुगठित शरीर, आंखें तिरछी व छोटी, बालों का रंग काला होता है। यह अपने पशुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ऋतु परिवर्तन के हिसाब से ले जाते हैं। अतः चलवासी प्रवृत्ति के होते हैं। खिरगीज त्योहारों पर घोड़े के मांस को खाना पसंद करते हैं। यह लोग दूध को सड़ाकर कर खट्टी शराब बनाते हैं। जिसे “कुसिम” कहते हैं। यह निवास के लिए अस्थाई गोलाकार तंबू का प्रयोग करते हैं। जिसे युर्त(Yurt) कहते हैं।यह लोग ऊन व खाल से निर्मित वस्त्रो का प्रयोग करते हैं। पुरुष लंबे कोट तथा पजामा तथा महिलाएं कोट के साथ ऊनी दोडू पहनती हैं।

विश्व की जनजातियां

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09- एस्किमो(Eskimo):-

मंगोलांयड प्रजाति के एस्किमो अमेरिका के उत्तर पूर्व में ध्रुव से सटे ग्रीनलैंड से पश्चिम में अलास्का तथा टुंड्रा प्रदेश में रहने वाली जनजाति है। एस्किमो का शाब्दिक अर्थ “कच्चा मांस खाने वाला” होता है। इन लोगों का रंग भूरा एवं पीला, चेहरा सपाट और चौड़ा तथा आंखें गहरी कत्थई होती है। गालों की हड्डियां ऊंची और सिर लंबा होता है।
एस्किमो लोगों का पालतू पशु रेंडियर है। यह रेडिंयर तथा कैरिबों की खाल से बने वस्त्रो का प्रयोग करते हैं। पांव में लंबे जूते सिर पर फर की टोपी हाथों में दस्ताने तथा दो कोट पहनते हैं। एस्किमो का मुख्य व्यवसाय शिकार करना है। यह वालरस, सील मछली, रेंडियर, श्वेत भालू, कैरीबो, आर्कटिक लोमड़ी आदि का शिकार करते हैं। यह “हारपून”(Harpoon) नामक हथियार तथा “उमियाक” नाव की सहायता से व्हेल का शिकार कर लेते हैं। सील मछली का शिकार करने के लिए प्रयोग की जाने वाली एक छिद्र वाली शैली को “माउपोक”(Maupok) तथा दो छिद्र वाली शैली को “इतुआरपोक”(Ituarpok) को कहते हैं। शिकार के लिए प्रयोग की जाने वाली नाव को कायक(Kayak) कहते हैं। यह लोग बर्फ पर बिना पहियों वाली गाड़ी “स्लेज” जो कि कुत्तों द्वारा खींची जाती है। परिवहन के लिए प्रयोग करते हैं यह लोग बर्फ के टुकड़ों से निर्मित घर जिन्हें “इग्लू”(igloo) कहते हैं, में निवास करते हैं।

विश्व की जनजातियां

धरासना|बेबमिलर|दांडी|नौजवान सभा| विलियम हॉकिंस, राल्फ फिच, सर थॉमस रो,

उस विदेशी पत्रकार का नाम बताइए जिसने धरासना साल्ट वर्क्स पर सत्याग्रह के बारे में समाचार दिए।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत गांधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ा गया इसी परिपेक्ष में मुंबई में इस आंदोलन का केंद्र बिंदु धरासना था जहां सरोजिनी नायडू, इमाम साहब, गांधी जी के पुत्र मणिलाल लगभग 2000 कार्यकर्ताओं के साथ धरासना नमक कारखाने की ओर बढ़े मुंबई के पास वडाला के नमक कारखाने पर लोगों ने धावा बोला और नमक लूट लिया 1930 में मुंबई के समुद्र पर अमेरिकी पत्रकार बेबमिलर ने सत्याग्रहियो पर अत्याचार का सजीव वर्णन किया।

धरासना

दांडी मार्च 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 ईस्वी तक

महात्मा गांधी 12 मार्च 1930 को 78 चुने अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम अहमदाबाद से दांडी नौसारी जिला गुजरात के लिए यात्रा प्रारंभ की।

गांधीजी 5 अप्रैल 1930 ईस्वी को 241 मील लंबी पैदल यात्रा के बाद दांडी पहुंचे उसके अगले दिन 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ा।

सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी की दांडी मार्च की तुलना नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की।

पश्चिमोत्तर प्रांत पेशावर में नमक आंदोलन का नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खान ने किया इनका यह आंदोलन लाल कुर्ती आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अब्दुल गफ्फार खान को सीमांत गांधी फख्र-ए- अफगान, बादशाह खान आदि नामों से जाना जाता है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र मणिपुर में सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व यदुनाथ के जिया रंग आंदोलन के नाम से जाना गया।

यदुनाथ पर हत्या का अभियोग लगाकर फांसी की सजा दी गई इसके बाद इनकी बहन गैडिनल्यू ने विद्रोह का संचालन किया इन्हें बाद में आजीवन कारावास की सजा हुई नेहरू जी ने इन्हें रानी की उपाधि प्रदान की।

मुंबई में इस आंदोलन का केंद्र बिंदु धारासना रहा 31 मार्च 1930 को सरोजनी नायडू इमाम साहब तथा गांधी जी के पुत्र मणिलाल लगभग 2000 कार्यकर्ताओं के साथ धारासना कारखाने की ओर बढ़े वहां पर लाठी चार्ज हुआ इस नृशंस अत्याचार का सजीव वर्णन अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने किया।

दक्षिण भारत में इस आंदोलन का नेतृत्व राजगोपालाचारी ने त्रिचनापल्ली से बदओख्यम तक की यात्रा की। सैनिक कट्टा नामक कारखाने पर धावा बोला।

1926 में गठित नौजवान सभा के प्रारंभिक सदस्य कौन कौन थे।

1926 ईस्वी में पंजाब में गठित नौजवान सभा के प्रारंभिक/संस्थापक सदस्य भगत सिंह, छबीलदास और यशपाल थे।

साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 ईस्वी को जब लाहौर स्टेशन पर पहुंचा तो नौजवान सभा के सदस्यों ने इस कमीशन का बहिष्कार करने के लिए जुलूस का गठन किया जिसमें लाला लाजपत राय पर लाठियों की बौछार की गई कुछ दिनों बाद लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और जयपाल ने स्कॉट को मारने का दृढ़ निश्चय किया मगर गलती से दिसंबर 1928 ईस्वी को सांडर्स और उनके रीडर चरण सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

 विलियम हॉकिंस, राल्फ फिच, सर थॉमस रो, निकोलस डाउंटन विदेशी यात्रियों को उनके भारत आने के कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।

राल्फ फिच भारत आने वाला पहला इंग्लिश यात्री था जो 1583 ई. में आगरा पहुंचा।

विलियम हॉकिंस इंग्लैंड का यात्री जो अगस्त 1608 में सूरत पहुंचता और अप्रैल 1609 में मुगल शासक जहांगीर के दरबार आगरा पहुंचा।

सर थॉमस रो एक ब्रिटिश यात्री था जो सितंबर 1615 ई. में जहांगीर के दरबार में पहुंचा।

निकोलस डाउंटन 1615 ई. में भारत आया।

तहकीक-ए-हिंद(Tahqiq-I-Hind)|ताज उल मासिर(Taj Ul Maasir)

 

तहकीक-ए-हिंद अलबरूनी द्वारा रचित यह अरबी भाषा का ग्रंथ, जिसका सबसे पहले 1888 में एडवर्ड सांची ने अंग्रेजी अनुवाद किया। बाद में इस अंग्रेजी भाषा के अनुवाद को हिंदी में रजनीकांत शर्मा द्वारा परिवर्तित किया गया और इस पुस्तक को “आदर्श हिंदी पुस्तकालय” इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया।

तहकीक-ए-हिंद

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मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोतों की जानकारी के लिए यह पुस्तक बहुत ही प्रमाणित मानी गई है अलबरूनी ने महमूद गजनवी के समय के भारत की आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक स्थिति, सामाजिक स्थिति के बारे में विस्तृत रूप से लिखा है। यह ग्रंथ जिसमें 80 अध्याय हैं जो की एक बहुत ही विस्तृत ग्रंथ माना जाता है।
अलबरूनी ने अपने इस ग्रंथ में भारत की प्राकृतिक दशाएं, जलवायु, रीति रिवाज, धार्मिक परंपराएं, कर्म सिद्धांत, जीव के आवागमन के सिद्धांत, मोक्ष प्राप्त करने का सिद्धांत, भोजन, वेशभूषा, मनोरंजन, धार्मिक उत्सवों आदि के बारे में विस्तृत वर्णन किया है। उसने अपने इस ग्रंथ में भगवद् गीता, वेद, उपनिषदों, पतंजलि के योग शास्त्र आदि के बारे में भी लिखा है।

राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो अलबरूनी ने इस ग्रंथ में उत्तरी भारत, गुजरात, मालवा, पाटलिपुत्र, कन्नौज, मुंगेर आदि के बारे में वर्णन किया है। लेकिन इस ग्रंथ में दक्षिण भारत के किसी भी राज्य के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है, और इसने भारतीय शासको के आपसी एकता के अभाव को दर्शाया है। जिसके कारण विदेशी आक्रमण कर्ताओं के द्वारा भारत को समय-समय पर क्षति पहुंचाई गई, यहां की जातिगत व्यवस्था की कठोरता और उसके दुष्परिणाम और निम्न जाति के लोगों अर्थात अछूतों की स्थिति के बारे में लिखा है। वह यह स्पष्ट करते हैं कि यहां जाति प्रथा इतनी कठोर थी कि अगर किसी व्यक्ति को जाति ने वहिष्कृत कर दिया तो वह पुनः सम्मिलित नहीं हो पता था। सामाजिक कुरीतियां भी व्याप्त थी जिसमें मुख्यत अलबरूनी ने सती प्रथा के बारे में लिखा है 1 यहां के लोग अपनी भाषा संस्कृत देश आदि को सर्वश्रेष्ठ मानते थे इसके अलावा अलबरूनी ने हिंदू मंदिरों  मूर्तियां और बिहारों का विवरण किया है1 यहां का वैष्णो संप्रदाय सबसे लोकप्रिय संप्रदाय माना जाता था 1 भारतीय लोग प्राय मूर्ति पूजा फ्रेम यह देश आर्थिक दृश्य संपन्न देश था 1 मुद्रा व्यवस्था नापतोल आज के बारे में भी वर्णन किया गया है 1 अलबरूनी ने भारतीय राजाओं द्वारा अपनी प्रजा से कर लेने के अधिकार रूप में कृषकों के उत्पादन का 1/6 भाग लगान के रूप में लिया जाता था 1 उसके अनुसार भारत एक धनवान देश था 1 यह दीप यहां महमूद ने इसकी समृद्धि को लूटकर नष्ट किया

ताज उल मासिर :-

सदरूद्दीन मुहम्मद हसन निजामी द्वारा फारसी भाषा में लिखित यह ग्रंथ दिल्ली सल्तनत का प्रथम राजकीय इतिहास का वर्णन करता है। इस ग्रंथ में मुख्यतः कुतुबुद्दीन ऐबक के शासनकाल की घटनाओं और कहीं-कहीं पर मुहम्मद गौरी, सुल्तान इल्तुतमिश के समय में हुई घटनाओं को भी दर्शाया गया है।

ताज उल मासिर

इस ग्रंथ में हसन निजामी द्वारा युद्धों तथा उनके कारणों, परिणामों पर प्रकाश डाला है, तथा भारतीय शासन प्रणाली और सामाजिक स्थिति का भी विवरण दिया है। यहां होने वाले मेलो, उत्सवों और भारतीयों के मनोरंजन के साधनों को भी इस ग्रंथ में समाहित किया गया।यह एक छोटा ग्रंथ है। कुछ तत्वों के आधार पर इस ग्रंथ की प्रामाणिकता को प्रश्न चिन्ह लगता है। जैसे इसके अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिरहम और दीनार नामक सिक्के चलवाए लेकिन अन्य इतिहासकारों के आधार पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने कोई सिक्का नहीं चलाया। लेकिन फिर भी इस ग्रंथ का ऐतिहासिक स्रोत होना उपयोगी माना गया है।

असहयोग आंदोलन (1920) कब | कहाँ | क्यों | किसके द्वारा | उद्देश्य |समापन

असहयोग आंदोलन

असहयोग आंदोलन का प्रारंभ कोई एक दिन की घटना का परिणाम न होकर, अंग्रेजी शासन द्वारा भारतीयों के प्रति उठाए गए कदमों का परिणाम था। असहयोग आंदोलन की मुख्यतः नींव वर्ष 1919 में पड़ी। क्योंकि इस वर्ष अंग्रेजी सत्ता द्वारा बनाई गई सरकारी नीतियां एवं गतिविधियों के कारण भारत के लगभग सभी सामाजिक वर्ग असंतुष्ट हो गए थे।

असहयोग आंदोलन

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असहयोग आंदोलन का मुख्य कारण :-

असहयोग आंदोलन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:-

 

प्रथम विश्व युद्ध के कारण जनता आर्थिक रूप से त्रस्त हो गई थी। महंगाई अपने चरम पर जिससे कस्बो, नगरों में रहने वाले मध्यम वर्गीय एवं निम्न वर्गीय लोग परेशान थे। खाद्यान्न की कमी, मुद्रास्फीति बढ़ने लगी औद्योगिक इकाइयों का उत्पादन कम हो गया। लोगों पर कर्ज बड़ा इसके साथ-साथ सुखे महामारी और फ्लैग जैसी आपदाओं ने तो आम जनमानस की कमर तोड़ के रख दी।

असहयोग आंदोलन के प्रारंभ होने का सबसे बड़ा कारण रोलेट एक्ट (संदेश मात्र से ही लोगों पर मुकदमा चला कर वर्षों की सजा सुनाया जाना) पंजाब में मार्शल लॉ लागू करना, जलियांवाला बाग हत्याकांड आदि घटनाओं ने अंग्रेजी सरकार के क्रूर और असभ्य रवैए को उजागर किया। हंटर कमीशन की सिफारिश से हाउस आफ लॉर्ड्स में जनरल डायर के कृत्यों को उचित ठहराया गया तथा मॉर्निंग पोस्ट ने डायर के लिए 30000 पौंड की धनराशि एकत्रित करना।
1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार जिसका मुख्य उद्देश्य द्वैध शासन प्रणाली लागू करना था।

असहयोग आंदोलन कहां से शुरू हुआ:-

गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन 1 अगस्त 1920 से प्रारंभ किया गया। इसे पश्चिमी भारत, बंगाल, उत्तरी भारत में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। इस दौरान मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू तथा राजेंद्र प्रसाद ने वकालत छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। गांधी जी ने एक वर्ष के भीतर स्वराज का नारा दिया।

सितंबर 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकाता के विशेष अधिवेशन में असहयोग आंदोलन को स्वीकारा गया। इसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय द्वारा की गई। इसका सी.आर. दास द्वारा विरोध किया गया। दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन प्रस्ताव को सी.आर. दास ने ही प्रस्तावित किया। जो की अंतिम रूप से पारित होने में सफल रहा।
असहयोग आंदोलन का विरोध सी.आर. दास, जिन्ना, एनीबेंसेंट और विपिन चंद्र पाल ने किया था।

असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम (प्रस्तावित प्रावधान):-

असहयोग आंदोलन के प्रस्तावित प्रावधान संबंधी प्रमुख बातें निम्नलिखित थी :-
– सरकारी उपाधि एवं अवैतनिक सरकारी पदों एवं अन्य पहलुओं का बहिष्कार।
-मद्य निषेध (ताड़ी, शराब जैसी अन्य नशीली चीज)|
-सरकार द्वारा आयोजित सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी उत्सवों का बहिष्कार किया जाए। सरकारी शिक्षण संस्थानों तथा अस्पतालों, अदालतों का बहिष्कार।
-विदेशी सामानों, विदेशी नौकरियों का त्याग किया जाए।
-विभिन्न करो को देना बंद किया जाए।
-स्थानीय स्वशासन हेतु पंचायत का गठन किया जाए।
-हिंदू मुस्लिम एकता तथा छुआछूत को मिटाकर भाईचारे की भावना का विकास करना।
-राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना तथा कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।

असहयोग आंदोलन के समर्थन में किए गए कार्य:-

ब्रिटिश सरकार द्वारा महात्मा गांधी को प्रदान की गई, कैसर-ए-हिंद की उपाधि गांधी जी द्वारा वापस साथ ही साथ जुलू-युद्ध- पदक बोअर युद्ध पदक भी लौटा दिए गए।

-सीआर दास, जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल,सी राज गोपालाचारी आदि नेताओं ने उपाधियों और नौकरियों को छोड़ दिया।

लोगों द्वारा स्कूल नौकरियों से बायकाट तथा विभिन्न स्थानों पर जनसभाओं को संबोधित किया गया।

1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स भारत भ्रमण पर आए उन्हें यहां की जनता ने काले झंडे दिखाकर उनका स्वागत किया।

इस आंदोलन में सर्वप्रथम गिरफ्तार होने वाले नेता मोहम्मद अली थे |इसी क्रम में सरकार की दमनकारी नीतियों के द्वारा सी. आर. दास तथा उनकी पत्नी बासंती देवी को गिरफ्तार कर लिया गया।

असहयोग आंदोलन में लगभग 30000 लोगों की गिरफ्तारी हुई लेकिन गांधी जी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।

असहयोग आंदोलन चलाने के लिए 1921 ईस्वी में तिलक स्वराज फंड की स्थापना की गई इसमें 6 माह के अंदर एक करोड रुपए एकत्रित हो गया।

पंजाब में अकाली आंदोलन जो कि अहिंसक आंदोलन था प्रारंभ हुआ।
असम के चाय बागानों के मजदूरों द्वारा हड़ताल करना।

-मिदनापुर के किसानों द्वारा यूनियन बोर्ड को कर देने से मना कर दिया गया।
उपरोक्त सभी कार्यक्रमों के साथ-साथ गांधी जी ने अंग्रेजी सरकार को चेतावनी दी। कि अगर 7 दिनों के अंदर राजनीतिक बंदी रिहा नहीं हुए और प्रेस पर सरकार का नियंत्रण समाप्त नहीं किया गया। तो वह करो की अदायगी समेत सामूहिक रूप से बारदोली में एक सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करेंगे लेकिन इसी दौरान गोरखपुर में चौरी-चोरा कांड हो जाता है। जिससे क्षुब्ध होकर गांधी जी असहयोग आंदोलन वापस ले लेते हैं।

 

प्रश्न :-असहयोग आंदोलन कब हुआ ?

असहयोग आंदोलन 1 अगस्त 1920 को गांधी जी द्वारा प्रारंभ किया गया।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन कहां से शुरू हुआ ?

असहयोग आंदोलन सितंबर 1920 में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कोलकाता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी के सहयोग से या प्रस्ताव पारित किया गया।

प्रश्न:- सहयोग आंदोलन का मुख्य कारण था।

असहयोग आंदोलन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे रॉलेट एक्ट प्रथम विश्व युद्ध के कारण महंगाई, मुद्रा स्फीति ,औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, लोगों पर कर्ज, सूखा, महामारी, फ्लैग पंजाब में मार्शल लॉ आदि।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन कब समाप्त हुआ।

4 फरवरी 1922 को गोरखपुर में चौरी- चोरा कांड के कारण क्षुब्ध होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया है। तथा 12 फरवरी 1922 को बारदोली में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन क्या है।

अंग्रेजी सरकार द्वारा मानवीय कृत्यों एवं नए-नए समाज विरोधी नियमों को पारित करने पर भारतीय नेताओं एवं जनता द्वारा अंग्रेजी सरकार के सभी कार्यों में सहयोग न करके असहयोग करने का निर्णय लिया गया।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन कब और क्यों वापस लिया गया।

12 फरवरी 1922 को महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की। क्योंकि गांधीजी 4 फरवरी 1922 को हुए चौरी- चौरा (गोरखपुर) कांड से बहुत आहत हुए थे।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव कांग्रेस के किस अधिवेशन में पारित हुआ।

सितंबर 1920 के कोलकाता अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन के उद्देश्य।

जिन कार्यों से खिलाफत आंदोलन प्रारंभ किया गया। उनका उचित समाधान तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रतिकार एवं स्वराज स्थापित।