अमेज़न नदी (Amazon River)

“पृथ्वी का फेफड़ा” (lungs of Earth) कहीं जाने वाली अमेज़न नदी (Amazon River) विश्व की सबसे चौड़ी तथा विशाल जलराशि की नदी है।

अमेज़न नदी

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नाम – अमेज़न नदी (Amazon River)

लंबाई – लगभग 6,575–7,000 किमी (विश्व की सबसे लंबी या दूसरी सबसे लंबी नदी – नील नदी से विवाद) |

उद्गम स्थल – पेरू के एंडीज पर्वत में मिसमी चोटी (Nevado Mismi) से

मुख्य सहायक नदियाँ – मेडेरा, नेग्रो, टापाजोस, जुरुआ, पुरुस, जावारी, यूपुरा |

सबसे बड़ी सहायक नदी- रियो नेग्रो (Rio Negro)

प्रवाह क्षेत्र – दक्षिण अमेरिका के 9 देश: पेरू, ब्राजील, कोलंबिया, वेनेजुएला, इक्वाडोर, बोलिविया, गुयाना, सूरीनाम, फ्रेंच गुयाना |

डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा नहीं (गंगा-ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ा)

जल प्रवाह – विश्व में सर्वाधिक (लगभग 2,09,000 घन मीटर/सेकंड) |

वर्षा – विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र (250–400 सेमी वार्षिक)

वन – अमेज़न वर्षावन (विश्व का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन) |

जैव-विविधता – विश्व का सबसे अधिक जैव-विविधता वाला क्षेत्र (लाखों प्रजातियाँ)

मछलियाँ – पिरान्हा, अरापाइमा (दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की मछली), इलेक्ट्रिक ईल

जनजातियाँ – यानोमामी, कायापो, तिकुना आदि

प्रमुख शहर – मानुस (ब्राजील), इकितोस (पेरू)

आर्थिक महत्व – जल परिवहन, मत्स्य पालन, जल विद्युत, पर्यटन

पर्यावरणीय समस्या – वनों की कटाई (Deforestation), जलवायु परिवर्तन, खनन प्रदूषण |

महत्वपूर्ण तथ्य
– विश्व की सबसे अधिक जल मात्रा वाली नदी (20% मीठा पानी अटलांटिक में छोड़ती है)
– अमेज़न वर्षावन को “पृथ्वी का फेफड़ा” (Earth’s Lungs) कहा जाता है
– विश्व की सबसे चौड़ी नदी भी (मानसून में 48 किमी तक चौड़ी हो जाती है)
– नदी में 3,000+ मछली प्रजातियाँ (गंगा में सिर्फ 200-250)
– पेरू में इसका नाम “सोलिमोन्स” (Solimões) है, ब्राजील में “अमेज़न”
मीठे पानी का डॉल्फिन (Pink River Dolphin) केवल यहीं पायी जाती है।

यह दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में बहती है।

इसका उद्गम  एण्डीज़ पर्वत (पेरू) से होता है।

यह अटलांटिक महासागर में मिलती है।

इसकी लंबाई लगभग 6400 किलोमीटर है।

अमेज़न नदी के आसपास का क्षेत्र अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट कहलाता है।

इस क्षेत्र में सबसे अधिक वर्षा होती है और यह वन्य जीवों की बहुत विविधता वाला क्षेत्र है।

अमेज़न नदी – प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: अमेज़न नदी किस महाद्वीप में बहती है?

उत्तर: दक्षिण अमेरिका

प्रश्न 2: अमेज़न नदी का उद्गम कहाँ होता है?

उत्तर: एण्डीज़ पर्वत, पेरू में

प्रश्न 3: अमेज़न नदी किस महासागर में मिलती है?

उत्तर: अटलांटिक महासागर

प्रश्न 4: अमेज़न नदी की लगभग लंबाई कितनी है?

उत्तर: लगभग 6400 किलोमीटर

प्रश्न 5: अमेज़न नदी के आसपास का घना जंगल क्या कहलाता है?

उत्तर: अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट

प्रश्न 6: अमेज़न नदी दुनिया की किस प्रकार की नदी मानी जाती है?

उत्तर: दुनिया की सबसे अधिक जल वाली नदी

प्रश्न 7: अमेज़न क्षेत्र में वर्षा कैसी होती है?

उत्तर: बहुत अधिक

प्रश्न 8: अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट में किसकी अधिक विविधता पाई जाती है?

उत्तर: वनस्पति और वन्य जीवों की

 

Haldighati Ka Yuddh|हल्दी घाटी का युद्ध कब हुआ|18 जून 1576

हल्दी घाटी का युद्ध (Haldighati Ka Yuddh) 18 जून 1576 ई० को महाराणा प्रताप व मुगल शासक अकबर द्वारा मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व मे भेजी गई सेना के मध्य हुआ। मेवाड़ की सेना का नेतृत्व सरदार राणा पुंजा कर रहे थे।

Haldighati Ka Yuddh|

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युद्ध का कारण :-

मेवाड़ के सिसोदिया – वंश ने मुगल सत्ता का हमेशा विरोध किया तथा यह लोग आमेर के कछवाह राजवंश को हेय दृष्टि से देखते थे।क्योंकि इन्होंने अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध बनाये थे।

मेवाड गुजरात और उत्तर भारत के मार्ग मे स्थित था। इसलिए गुजरात को जीतने के लिए मेवाड़ पर विजय आवश्यक थी।

मेवाड़ के शासक राणा उदयसिहं के समय 1567 में अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण किया । इसमें सरदारों के परामर्श से राणा उदयसिंह, जयमल को किले की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपकर जंगलों में चला गया।

जयमल ने मुगल सेना को किले मे लगभग 5 माह घुसने नही दिया। लेकिन किले की दीवार की मरम्मत कराते समय अकबर ने बंदूक से गोली मारकर उसे घायल कर दिया अंततः जयमल की मृत्यु हो गई ।

जयमल की मृत्यु के बाद रात को महिलाओ, ‘जौहर’ किया गया तथा प्रात: फतहसिंह (फत्ता) और उसकी माँ और पत्नी के नेतृत्व में मुगल सेना पर आक्रमण किया गया। सभी वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन युद्ध में यह सभी मारे गए।

अकबर ने चित्तौड़ के किले में घुसकर राजपूतो को मारने का आदेश दिया |जिससे हजारो राजपूतो का कत्ल कर दिया गया। जो कि अकबर के शासन पर एक काला धब्बा साबित हुआ।

अकबर द्वारा आगरा के किले के द्वार पर जयमल और फतहसिंह की बहादुरी को देखते हुए, इनकी हाथी पर बैठी मूर्तियो बनवाई। अकबर द्वारा ऑसफ खाँ को चित्तौड़ किले का किलेदार बनाकर स्वयं आगरा चला आया ।

मुगलों द्वारा 1568 तक मेवाड़ की राजधानी तथा चित्तौड़ के किले पर अधिकार कर लिया गया। लेकिन फिर भी राणा उदयसिंह ने मेवाड़ के अधिकांश भू-भाग पर अधिकार बनाये रखने में सफलता प्राप्त की।

चित्तौड़ में स्थित महामाता मंदिर से विशाल झाड़‌फानूस अकबर द्वारा चित्तौड़ विजय के प्रतीक के रूप आगरा लाया गया। और इसी विजय के फलस्वरूप अकबर द्वारा फतहनामा जारी किया गया।

1572 ई. में राणा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र राणा प्रताप गद्दी पर बैठा । राणा प्रताप द्वारा सिंहासन पर बैठते ही शपथ ली गई कि वह जब तक राजधानी को स्वतन्त्र नही करा लेगा तब तक वह थाली में खाना नही खायेगा और न तो विस्तर पर लेटेगा। प्रताप ने जीवन पर्यन्त अपनी शपथ का पालन किया ।

अकबर द्वारा मानसिंह की मध्यस्ता में प्रताप से समझौते के कई प्रयास किये गए। लेकिन सभी असफल रहे। समझौते हेतु एक बार राजा मानसिंह महाराणा प्रताप से उदय सागर झील के किनारे मिलना चाहता था। इस अवसर पर प्रताप द्वारा  विशाल भोज का आयोजन कराया गया लेकिन स्वयं अनुपस्थित
रहा।

राजा मानसिंह ने प्रताप के न आने के उपलक्ष्य में कहा कि यदि राणा मेरे साथ भोजन नही करेगा तो कौन करेगा । इस पर राणा द्वारा यह कहकर असमर्थता व्यक्त की गई कि जिस व्यक्ति ने अपनी बहन का विवाह मुसलमान से किया हो उसके साथ वह भोजन नही कर सकता।

राजा मानसिंह इस अपमान के विरोध में थाली छोड़कर चल दिया और कहा कि आपके सम्मान हेतु हमने अपनी बहन बेटियो का विवाह तुर्को के साथ किया लेकिन मैं अब तुम्हारा घमण्ड़ चूर- चूर कर के ही मानूंगा । प्रतिउत्तर में राणा द्वारा कहा गया कि मुझे हर समय आपसे लड़ने में बड़ी प्रसन्नता होगी।

महाराणा प्रताप द्वारा अपने वंश परम्परा की पवित्रता बनाये रखने के लिए उसने अपनी किसी भी कन्या का विवाह मुगलो से नही किया। भले ही उसका सर्वस्व दांव पर लग गया।
अकबर को महाराणा प्रताप द्वारा किये गए वर्ताव से क्रोध आया और उसने प्रताप का घमण्ड़ तोड़ने हेतु आक्रमण का आदेश दिया।

अकबर द्वारा राजा मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी गई। 18 जून 1576 ई. में महाराणा प्रताप और मुगल सेना का युद्ध हल्दीघाटी के स्थान पर हुआ। इस युद्ध में महाराणा की थोड़ी सेना ने मुगलो की विशाल सेना में उथल-पुथल मचा दी । राणा की सेना वीरता से लड़ी लेकिन घायल राणा प्रताप मुगल सेना से घिर गया।

राणा को घिरा देखकर सरदार झाला ने राणा प्रताप का मुकुट स्वयं उतार कर पहन लिया। अवसर पाकर राणा पहाडियों में भाग गया। हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार हुई। मुगल सेना’ थकान के कारण राणा का पीछा न कर सकी। युद्ध के अगले दिन मुगल सेना गोलकुंडा पहुंची। इस तरह मुगलों को पूर्ण विजय प्राप्त हुई ।
इस विजय के बाद अकबर ने मानसिंह को वापस बुला लिया। लेकिन अकबर द्वारा समय-समय पर सरदारों को भेजकर मेवाड़ से युद्ध करता रहा। महाराणा प्रताप परिवार के साथ भूखे जंगलों में छिपकर रहता रहा, लेकिन मुगलों की अधीनता नहीं स्वीकार की और अंत तक संघर्ष करता रहा।

1597 में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई। इस समय राणा द्वारा मेवाड़ के अधिकांश भूभाग पर अधिकार कर लिया गया था।

Sanyasi Vidroh| सन्यासी विद्रोह (1770-1820)

 ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 की महान क्रांति से पहले भी शासन के विरुद्ध, अनेक नागरिक विद्रोह  हुए।

Sanyasi Vidroh

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सन्यासी विद्रोह (Sanyasi Vidroh) जो सामान्यतः नवीन करो का भारी बोझ, जनजातियों की भूमि का अधिग्रहण, किसानों की भूमि हड़पना, ऋणदाताओं का अत्याधिक शोषण, ब्रिटिश वस्तुओं की भरमार, अत्यधिक करों में वृद्धि |

हथकरघा और दस्तकारी उद्योगो का विनाश, भारतीयों के साथ अपमान जनक व्यवहार, पुजारियों, पादरियों, पंडितो तथा धार्मिक कर्मकाण्डो में दखल देना।

इन्ही कारणों से भारतीय नागरिको में विद्रोह की भावना पनपी अंतत: जनविद्रोह के रूप में सन्यासी विद्रोह (1770-1820) की घटना घटित हुई  :-

– यह विद्रोह 1770 में प्रारंभ हुआ और 1820 तक चलता रहा।

– तीर्थ यात्रियों के तीर्थ स्थानों की यात्रा पर प्रतिबंध लगाना विद्रोह का प्रमुख कारण रहा।

– 1770 में बंगाल में भयंकर अकाल के कारण नागरिको में असंतोष तथा सशस्त्र विद्रोह के मार्ग पर चल पडे ।

– सन्यासी विद्रोह का वर्णन “वन्देमातरम” के रचयिता “बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय” ने अपने उपन्यास “आनन्द मठ” में किया।

– सन्यासी विद्रोह को फकीर विद्रोह भी कहा जाता है क्योंकि हिंदू और
मुसलमानो की समान भूमिका रही ।

– इस विद्रोह के प्रमुख नेता :- मजनूम शाह, चिराग अली, मूसा शाह, भवानी पाठक तथा देवी चौधरानी आदि थे।

जैन धर्म| Jain Dharm| 24 तीर्थंकर| संस्थापक| सिद्धांत| मान्यताये

जैन धर्म :-

जैन धर्म के अन्य नाम- कुरूचक, यापनीय, श्वेतपट, निर्ग्रन्थ

संस्थापक – महावीर स्वामी

जैन धर्म

जैन धर्म में जैन शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है विजेता (जितेन्द्रिय) । जैन महात्माओं को निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) तथा जैन संस्थापकों को तीर्थंकर कहा गया । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। ऋषभदेव और अरिष्टनेम का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए जिनमें प्रथम 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। जैन धर्म में शलाका पुरूष (महान पुरूष) की कल्पना की गई है।

ऋषभनाथ (आदिनाथ) :-

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं और उन्हें जैन धर्म का संस्थापक भी माना जाता है। वे इस युग (अवसर्पिणी काल) के पहले तीर्थंकर हैं, जिन्होंने मानवता को धर्म, नैतिकता, और सामाजिक व्यवस्था का मार्ग दिखाया।

– ऋषभनाथ (आदिनाथ के रूप में भी जाना जाता है, अर्थात् “प्रथम स्वामी”)
– प्रतीक- (लांछन) बैल
जन्म स्थान-अयोध्या (विनिता नगरी)
– माता-पिता– राजा नाभिराय और रानी मरुदेवी
– निर्वाण स्थान– कैलाश पर्वत (आज का अस्टापद)
– जीवनकाल-बहुत प्राचीन, लाखों वर्ष पहले (जैन कालगणना के अनुसार)

– ऋषभनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनके पिता नाभिराय और माता मरुदेवी थीं।
– जैन ग्रंथों के अनुसार, उस समय मानव समाज प्रारंभिक अवस्था में था, और लोग प्रकृति पर निर्भर थे।

– ऋषभनाथ ने एक राजा के रूप में शासन किया और समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

– उन्होंने कृषि, शिल्प, व्यापार, और लेखन जैसी कलाओं की शुरुआत की, जिसके कारण उन्हें “आदिनाथ” कहा गया।

– उन्होंने 72 कलाओं (जैसे खेती, शस्त्र विद्या, और कला) और 64 स्त्री कलाओं की शिक्षा दी।
– उन्होंने समाज को वर्ण व्यवस्था (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में संगठित किया, जो उस समय सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक थी।

– राजपाट और सांसारिक जीवन त्यागकर ऋषभनाथ ने कठोर तपस्या की।
– उन्होंने केवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त किया और तीर्थंकर बने।
– जैन परंपरा के अनुसार, उन्होंने एक वर्ष तक मौन तप किया और भोजन-जल ग्रहण नहीं किया। अंततः राजा श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस (इक्षुरस) अर्पित किया, जिससे उनका पारणा (उपवास तोड़ना) हुआ। यह घटना आखुर मिहिरा उत्सव के रूप में जैन धर्म में मनाई जाती है।

– ऋषभनाथ ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह जैसे जैन सिद्धांतों का प्रचार किया।
– उन्होंने लोगों को आत्म-शुद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

– उनके दो पुत्र थे: भरत (जिनके नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा) और बाहुबली (जिन्हें जैन धर्म में पहला सिद्ध माना जाता है)।
– उनकी दो पुत्रियाँ थीं: ब्रह्मी (जिन्होंने लिपि की रचना की) और सुंदरी (जिन्होंने गणित की शिक्षा दी)।

– ऋषभनाथ ने कैलाश पर्वत (अष्टापद) पर निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ उनकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में पहुँची।

– ऋषभनाथ को जैन धर्म में केवल एक तीर्थंकर ही नहीं, बल्कि सभ्यता के निर्माता के रूप में भी देखा जाता है।
– उनके जीवन और शिक्षाओं का उल्लेख जैन ग्रंथों जैसे आदिपुराण और भागवत पुराण (हिंदू ग्रंथ) में भी मिलता है।
– उनके प्रतीक “बैल” को शक्ति, स्थिरता, और धर्म का प्रतीक माना जाता है।
– जैन मंदिरों में उनकी मूर्तियाँ आमतौर पर ध्यानमुद्रा में होती हैं, जो शांति और आत्मसंयम को दर्शाती हैं।

पालीताना (गुजरात) यहाँ शत्रुंजय पर्वत पर ऋषभनाथ का प्रमुख मंदिर है।
आदिनाथ मंदिर, अयोध्या उनके जन्मस्थान से जुड़ा तीर्थ।
कैलाश पर्वत पर उनका निर्वाण स्थल।

– जैन परंपरा के अनुसार, ऋषभनाथ का जीवन लाखों वर्ष पहले हुआ था, जब मानव जीवन बहुत लंबा और प्रकृति-आधारित था।

– उनके पुत्र भरत और बाहुबली की कहानी (विशेष रूप से बाहुबली का तप और मोक्ष प्राप्ति) जैन धर्म में बहुत प्रसिद्ध है।

श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में बाहुबली की विशाल मूर्ति ऋषभनाथ के पुत्र से प्रेरित है।

क्रम संख्या तीर्थंकर का नाम प्रतीक चिन्ह जन्म स्थान
1ऋषभनाथ (आदिनाथ) वृषभ
2अजित नाथ गज अयोध्या
3संभव नाथघोड़ा (अश्व )श्रावस्ती
4अभिन्दन नाथबंदर (कपि )
5सुमित नाथबगुला या चकवा (क्रौच )
6पद्मनाभ प्रभुकमल (पदम् )
7सुपार्श्वनाथ साथिया (स्वास्तिक )
8चन्द्र प्रभुचन्द्रमाचन्द्र पुरी
9पुष्प दन्तमगरमच्छ (मकर )
10शीतल नाथकल्प वृक्ष (श्रीवत्स )
11श्रेयांस नाथगैंडा
12वाशुपुज्य (पूज्यनाथ )भैसा (महिष )
13विमल नाथसूअर (वाराह )
14अनत नाथ श्येन
15धर्म नाथवज्र
16शांति नाथहिरण (मृग )हस्तिनापुर
17कुंथुनाथबकरी (अज )
18अरनाथमछली (मीन )
19मल्लिनाथकलश
20मुनिसुव्रतकछुआ (कुर्म )राजगृह
21नमिनाथनीला कमल ( नीलोत्पल )
22नेमिनाथ (अरिष्टनेमि )शंखसौरिपुर
23पार्श्व नाथसर्प काशी (वाराणासी )
24महावीरसिंहकुंडग्राम (बिहार )

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अजितनाथ :-

जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर हैं। वे आध्यात्मिक मार्गदर्शक और जैन धर्म के सिद्धांतों के प्रचारक माने जाते हैं। इनका जीवन और शिक्षाएँ जैन धर्म में शांति, संयम, और अहिंसा के महत्व को दर्शाती हैं।

नाम- अजितनाथ (अजित अर्थात् “अजेय” या “विजेता”)
प्रतीक (लांछन)- हाथी
जन्म स्थान- अयोध्या (विनिता नगरी)
– पिता- राजा जितशत्रु
– माता- रानी विजया देवी
– निर्वाण स्थान- सम्मेद शिखर (झारखंड)

– अजितनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में अयोध्या में हुआ था। उनके पिता राजा जितशत्रु और माता विजया देवी थीं।

– जैन ग्रंथों के अनुसार, उनके जन्म के समय शुभ संकेतों और आध्यात्मिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जो उनके तीर्थंकर होने का संकेत देता है।

– अजितनाथ ने प्रारंभ में राजा के रूप में शासन किया और अपने राज्य में धर्म, न्याय, और शांति की स्थापना की।

– सांसारिक सुखों को त्यागकर उन्होंने वैराग्य का मार्ग अपनाया और कठोर तपस्या की।

– लंबी तपस्या के बाद अजितनाथ ने कैवल्य (ज्ञान) प्राप्त किया।

– इनके द्वारा जैन धर्म के पंच महाव्रत- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का प्रचार किया।
– इनके उपदेशों ने लोगों को आत्म-शुद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।

– अजितनाथ ने सम्मेत पर्वत (वर्तमान झारखंड) पर निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ उनकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में पहुँची।

– हाथी शक्ति, स्थिरता, और अजेयता का प्रतीक है, जो अजितनाथ के नाम और उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है।

– वे जैन धर्म में शांति और विजय के प्रतीक माने जाते हैं।

– अजितनाथ का जीवन लोगों को यह सिखाता है कि सच्ची विजय सांसारिक इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्म-संयम से प्राप्त होती है।

– जैन ग्रंथ- जैन पुराण और त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र मे इनकी शिक्षा और उपदेशों का वर्णन किया गया है।

दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदाय अजितनाथ को समान रूप से पूजते हैं, और उनके जीवन या प्रतीक को लेकर कोई प्रमुख मतभेद नहीं है।
– इनकी मूर्तियाँ आमतौर पर ध्यानमुद्रा में होती हैं, जो शांति और आत्म-चिंतन को दर्शाती हैं।

भारत की झीलें | 8 प्रकार की झीलें| विवर्तनिक| क्रेटर| हिमनदीय

भारत की झीलें: प्रकृति की विविधता और सौंदर्य, भारत अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता के साथ, विभिन्न प्रकार की झीलों का घर है, जो प्रकृति की अनुपम देन हैं। ये झीलें न केवल पर्यावरणीय और पारिस्थितिक महत्व रखती हैं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं।

भारत में झीलें विवर्तनिक, हिमनदीय, ज्वालामुखीय, तटीय, गोखुर, कृत्रिम, क्रेटर और भूस्खलन झीलों के रूप में वर्गीकृत की जा सकती हैं। यह ब्लॉग इन आठ प्रकार की झीलों, उनके निर्माण, विशेषताओं और प्रमुख उदाहरणों पर प्रकाश डालता है, जो भारत की प्राकृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

भारत की झीलें

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1. विवर्तनिक झीलें (Tectonic Lakes) :-

विवर्तनिक झीलें भूपर्पटी की गतियों, जैसे भ्रंश (faulting) या रिफ्टिंग, के कारण बनती हैं।                                                                            इस प्रकार की  झीलें गहरी और लंबी होती हैं, जो रिफ्ट घाटियों में पाई जाती हैं।                                                                                          भारत में वूलर झील (जम्मू-कश्मीर) इसका प्रमुख उदाहरण है, जो झेलम नदी पर बनी देश की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है।                        राजस्थान की नक्की झील (माउंट आबू) भी भ्रंशों से बनी है। कुमाऊं हिमालय की भीमताल और नैनीताल जैसी झीलें भी विवर्तनिक गतिविधियों का परिणाम हैं। भारत की झीलें जैव विविधता और पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

2. हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes):-

हिमनदीय झीलें हिमनदों के पीछे हटने से बने गड्ढों में पानी भरने से बनती हैं। ये उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आम हैं। सिक्किम की त्सोमगो (छांगु) झील और उत्तराखंड की रूपकुंड झील इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

हिमनदीय झीलें ठंडे, साफ पानी और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण इन झीलों में हिमनदीय बाढ़ (GLOF) का खतरा बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है।

भारत की झीलें ट्रेकिंग और धार्मिक पर्यटन को आकर्षित करती हैं।

3. ज्वालामुखीय झीलें (Volcanic Lakes)/क्रेटर झीलें (Crater Lakes) :-

ज्वालामुखीय गतिविधियों से बनी झीलें ज्वालामुखीय क्रेटरों या गड्ढों में बनती हैं।

भारत में ऐसी झीलें दुर्लभ हैं, लेकिन महाराष्ट्र की लोनार झील एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक उल्कापात (meteorite impact) से बनी क्रेटर झील है, जो अपने खारे पानी और अद्वितीय जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसका पानी क्षारीय (alkaline) है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

यह झील स्थानीय और वैश्विक शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का केंद्र है। क्रेटर झीलें दुर्लभ होती हैं, लेकिन इनका सौंदर्य और वैज्ञानिक महत्व भारत की भूवैज्ञानिक विविधता को रेखांकित करता है।

लोनार झील UNESCO विश्व धरोहर स्थल के लिए नामांकित है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

4. तटीय झीलें (Coastal/Lagoon Lakes):-

तटीय झीलें समुद्र तटों के पास रेत के अवरोधों (sandbars) या लैगून के कारण बनती हैं। ओडिशा की चिल्का झील, जो भारत की सबसे बड़ी खारी झील है, इसका प्रमुख उदाहरण है। यह प्रवासी पक्षियों, जैसे फ्लेमिंगो, के लिए महत्वपूर्ण है और रामसर साइट के रूप में मान्यता प्राप्त है।

केरल की वेम्बनाड झील, जो कयाल प्रणाली का हिस्सा है, भी तटीय झील का उदाहरण है। ये झीलें मछली पालन, पर्यटन और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समुद्र स्तर वृद्धि से खतरे में हैं।

5. गोखुर झीलें (Oxbow Lakes):-

गोखुर झीलें नदियों के घुमावदार मार्ग (meanders) के कटने से बनती हैं, जब नदी अपने पुराने मार्ग को छोड़ देती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के मैदानों में ऐसी कई झीलें पाई जाती हैं।

जैसे बिहार की कावर झील एक गोखुर झील है, जो प्रवासी पक्षियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। ये झीलें मीठे पानी की आपूर्ति और मछली पालन के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अवसादन (siltation) के कारण इनका क्षेत्रफल घट रहा है।

6. कृत्रिम झीलें (Man-made Lakes):-

कृत्रिम झीलें मानव द्वारा बनाए गए जलाशय हैं, जो सिंचाई, जलापूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए बनाए जाते हैं। तमिलनाडु की भवानीसागर झील, राजस्थान की फतेहसागर झील और मध्य प्रदेश की गांधी सागर झील इसके उदाहरण हैं।

यह झीलें स्थानीय अर्थव्यवस्था और कृषि को समर्थन देती हैं। तेलंगाना की हुसैन सागर झील, जो हैदराबाद में है, सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व रखती है। हालांकि, प्रदूषण और अतिक्रमण इन झीलों के लिए चुनौती हैं।

7. लैगून झीले (Lagoon Lakes):-

लैगून झीलों का निर्माण समुद्र-तट के किनारे बालू जमा होने के कारण होता है। उड़ीसा की चिल्का झील, पुलीकट (आंध्र प्रदेश), वेम्बनाद तथा अष्टामुदी-केरल के कयाल लैगून के कुछ उदाहरण हैं।

8. भूस्खलन झीलें (Landslide Lakes) :-

भूस्खलन झीलें तब बनती हैं, जब भूस्खलन या मलबा नदी के प्रवाह को अवरुद्ध करता है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में ऐसी झीलें आम हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड की गोविंद सागर झील भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्र में बनी है। ये झीलें अस्थायी हो सकती हैं और बाढ़ का खतरा पैदा करती हैं। इनका प्रबंधन और निगरानी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय गतिविधियां इन्हें अस्थिर बना सकती हैं।

द्रवण झीलें (Dissolution Lakes ):-

इन झीलों निर्माण सतह में एक गर्त के कारण होता है, जो चूना पत्थर तथा जिप्सम जैसे घुलनशील शैल के भूमिगत विलयन के कारण बनता है। ऐसे झीलें चेरापूंजी में तथा उसके आस-पास, शिलाँग (मेघालय), भीमताल, कुमाऊं तथा गढ़वाल (उत्तराखण्ड) में पायी जाती हैं।

भारत की झीलें प्रकृति और मानव गतिविधियों की विविधता का प्रतीक हैं। विवर्तनिक और हिमनदीय झीलें हिमालय के सौंदर्य को दर्शाती हैं, तो तटीय और गोखुर झीलें मैदानी और तटीय क्षेत्रों की जैव विविधता को समृद्ध करती हैं। कृत्रिम और क्रेटर झीलें मानव और भूवैज्ञानिक इतिहास को दर्शाती हैं। 

प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण इन झीलों के लिए खतरा हैं। इनके संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयास, नीतिगत हस्तक्षेप और जागरूकता आवश्यक है। ये झीलें भारत की प्राकृतिक धरोहर हैं, जिन्हें सहेजना हमारा कर्तव्य है।

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ| गोदावरी| कृष्णा| कावेरी|महानदी

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ मुख्य रूप से दक्कन के पठार और प्रायद्वीपीय क्षेत्र से निकलती हैं और अपनी उत्पत्ति, प्रवाह और विशेषताओं के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटी जा सकती हैं:-

1- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ
2- पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ।
ये नदियाँ प्रायद्वीपीय भारत के भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नीचे प्रमुख नदियों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है :-

1- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ :-

ये नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। ये सामान्यतः लंबी होती हैं और बड़े डेल्टा का निर्माण करती हैं। प्रमुख नदियाँ हैं:-

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* गोदावरी नदी :-

उत्पत्ति – त्र्यंबकेश्वर, महाराष्ट्र (पश्चिमी घाट)।
लंबाई लगभग 1,465 किमी (भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी)।
प्रवाह– महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– यह दक्कन की सबसे बड़ी नदी है और इसका विशाल डेल्टा आंध्र प्रदेश में कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख सहायक नदियाँ – प्राणहिता, मंजीरा, इंद्रावती, सबरी।

* कृष्णा नदी :-

उत्पत्ति– महाबलेश्वर, महाराष्ट्र (पश्चिमी घाट)।
लंबाई– लगभग 1,400 किमी।
प्रवाह– महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– इसका डेल्टा उपजाऊ है और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– तुंगभद्रा, भीमा, कोयना, घाटप्रभा।

* कावेरी:-

उत्पत्ति– तलकावेरी, कर्नाटक (पश्चिमी घाट)।
लंबाई– लगभग 805 किमी।
प्रवाह– कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– इसे “दक्षिण की गंगा” कहा जाता है। इसका डेल्टा तमिलनाडु में धान की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– हेमावती, कबिनी, अर्कावती, भवानी।

•महानदी :-

उत्पत्ति– सिहावा, छत्तीसगढ़।
लंबाई– लगभग 858 किमी।
प्रवाह– छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता:- इसका डेल्टा ओडिशा में कृषि और बाढ़ नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– शिवनाथ, तेल, हसदेव।

•पेन्नार नदी:-

उत्पत्ति– नंदी पहाड़ियाँ, कर्नाटक।
लंबाई– लगभग 597 किमी।
प्रवाह– कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– यह छोटी नदी है, लेकिन इसका डेल्टा कृषि के लिए उपयोगी है।

स्वर्णरेखा नदी :-

उत्पत्ति– रानीचुआ पहाड़ी (छोटा नागपुर पठार) नागड़ी गांव के पास जिला रांची (झारखंड)
लंबाई– 400 किलोमीटर
प्रवाह– झारखंड (रांची, सरायकेला, खरसावां, पूर्वी सिंह भूमि)
ओडीशा (मयूरभंज, बालासोर) पश्चिम बंगाल- मेदिनीपुर
विशेषता– औद्योगिक नगर जमशेदपुर इसी नदी के किनारे स्थित है।
इसके किनारे तांबा और यूरेनियम का खनन होता है।
प्रमुख सहायक नदियां– खरकई, रारू, कांची, अंजी, करकरी

2. पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ :-

ये नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में गिरती हैं। ये सामान्यतः छोटी, तेज बहाव वाली और खड़ी ढलानों पर बहने वाली होती हैं। प्रमुख नदियाँ हैं:

नर्मदा नदी :-

उत्पत्ति– अमरकंटक, मध्य प्रदेश।
लंबाई– लगभग 1,312 किमी।
प्रवाह– मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी पश्चिमी बहाव वाली नदी है। यह रिफ्ट घाटी में बहती है और इसका मुहाना (एस्चुरी) गुजरात में है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– होशंगाबाद, तवा, बरना।

•ताप्ती नदी :-

उत्पत्ति– मुलताई, मध्य प्रदेश।
लंबाई– लगभग 724 किमी।
प्रवाह– मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– यह नर्मदा के समानांतर बहती है और इसका मुहाना भी गुजरात में है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– पूर्णा, गिरना, पांझरा।

माही नदी :-

उत्पत्ति– मध्य प्रदेश (विंध्याचल पर्वत)।
लंबाई– लगभग 583 किमी।
प्रवाह– मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– यह गुजरात में कृषि और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण है।

•साबरमती :-

उत्पत्ति– अरावली पर्वतमाला, राजस्थान।
लंबाई– लगभग 371 किमी।
प्रवाह– राजस्थान और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– अहमदाबाद शहर इसके किनारे बसा है।

लूनी नदी :-

उत्पत्ति– राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित नाग पहाड़ (अरावली श्रेणी) से।
लंबाई– 495 किलोमीटर
प्रवाह– अजमेर, नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर और जालौर कच्छ के रण (गुजरात)।
विशेषता– इस नदी को “आधी मीठी, आधी खारी” नदी भी कहते हैं, क्योंकि उद्गम स्थल से बालोतरा (बाड़मेर) तक इसका पानी मीठा होता है, तथा इससे आगे रेगिस्तान में इसका पानी खारा हो जाता है। यह मौसमी नदी है, तथा कच्छ के रण (गुजरात) में विलीन हो जाती है। प्रमुख सहायक नदियां- लीलड़ी, बाड़ी, सुकड़ी, मीठड़ी, जवाई, खारी और जोजरी, सागाई और गुहिया।
इस नदी को लवण्वती, मरू गंगा, रेगिस्तान की गंगा आदि नाम से भी जाना जाता है।

 बनास नदी :-

उत्पत्ति– खमनोर पहाड़ (Khamnor Hills)अरावली पर्वत श्रेणी, जिला राजसमंद (राजस्थान)।
लंबाई– 512 किलोमीटर
प्रवाह– राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर तथा टोंक जिलों से बहती है। विशेषता- इसका उद्गम स्थल वन क्षेत्र होने के कारण इसे “वन की नदी” कहा जाता है। यह नदी मुख्यतः राजस्थान में बहती है। यह चंबल नदी में मिल जाती है, जो यमुना की सहायक नदी है। प्रमुख सहायक नदियां- बेड़च, कोठारी, मोरेर, मेन्ल,खारी,दई, गंभीरी आदि।

शरावती नदी :-

उत्पत्ति– कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिले की अंबुथीर्था (Ambutirtha) पहाड़ी जो पश्चिमी घाट में स्थित है।
लंबाई– 128 किलोमीटर
प्रवाह– शिमोगा जिले से चलकर उत्तर कन्नड़ जिले के होनावर के समीप अरब सागर में गिरती है। विशेषता- यह एक बारहमासी नदी है।
यह नदी अपनी प्राकृतिक सुंदरता तथा विश्व प्रसिद्ध जोग जलप्रपात (Jog Falls) के लिए प्रसिद्ध है।

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ  की विशेषताएँ और महत्व :-

भौगोलिक प्रभाव- प्रायद्वीपीय नदियाँ कठोर चट्टानी भूभाग से होकर बहती हैं, जिसके कारण इनमें जलप्रपात और घाटियाँ आम हैं। उदाहरण: कावेरी का होगेनक्कल जलप्रपात।
कृषि और अर्थव्यवस्था- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ अपने डेल्टा क्षेत्रों में धान, गन्ना और अन्य फसलों के लिए उपजाऊ भूमि प्रदान करती हैं। पश्चिमी नदियाँ जलविद्युत और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सांस्कृतिक महत्व- कावेरी, गोदावरी और नर्मदा जैसी नदियाँ धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पवित्र मानी जाती हैं।

– प्रायद्वीपीय नदियाँ हिमालयी नदियों (जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र) की तुलना में छोटी और मौसमी होती हैं, क्योंकि ये मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर हैं।
– इन नदियों पर कई बाँध और जलाशय बनाए गए हैं, जैसे गोदावरी पर जायकवाड़ी बाँध और कृष्णा पर नागार्जुन सागर बाँध, जो सिंचाई और बिजली उत्पादन में सहायक हैं।

 

सैयद वंश (1414-1450 ई.)|Saiyed Vansh| संस्थापक |शासक

सैयद वंश के शासको द्वारा प्रजा को प्रभावित करने वाला कोई कार्य नहीं किया गया। उस समय के शासको की भांति साम्राज्य विस्तार की कोशिश नहीं की गई और न ही प्रशासनिक सुधारो का प्रयत्न  किया गया। इसलिए सैयद शासको द्वारा ऐसा कोई कार्य नहीं किया गया जिसे प्रजा आदर्श मानती फलस्वरुप विभाजन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला। सैयद वंश का शासन काल केवल 37 वर्ष तक रहा, जो की राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के 200 मील के घेरे तक सिमट कर रह गया।

सैयद वंश के शासक :-

खिज्र खां (1414-1421 ई.):-

* खिज्र खां सैयद वंश का संस्थापक था। इसके पिता का नाम मलिक सुलेमान था। जिसे मुल्तान का सूबेदार मलिक मर्दान दौलत अपना पुत्र मानता था।
•खिज्र खां को सुल्तान फिरोज ने मुल्तान का सूबेदार नियुक्त किया था। लेकिन सारंग खां द्वारा उसे 1395 में मुल्तान से भगाने के लिए मजबूर कर दिया। फलस्वरुप खिज्र खां मेवात चला गया।
•कालांतर में खिज्र खां द्वारा तैमूर का साथ दिया गया। जब तैमूर भारत से गया उसने खिज्र खां को मुल्तान, लाहौर और दीपालपुर की सूबेदारी प्रदान की।
•सन 1414 ई. में खिज्र खां द्वारा दौलत ख़ां लोधी को पराजित कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया गया। इस प्रकार खिज्र खां दिल्ली का पहला सैयद सुल्तान बना।

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•खिज्र खां दिल्ली का सुल्तान बना, लेकिन उसने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की इसके स्थान पर उसने ” रैयत-ए-आला” की उपाधि धारण की।
•खिज्र खां एक स्वतंत्र शासक था, लेकिन वह तैमूर के पुत्र शाहरुख को निरंतर भेंटे और राजस्व पहुंचाता था। इस कारण वह अपने को शाहरुख के अधीन मानता था उसने शाहरुख के नाम से ही खुत्बा भी पढ़ाया हालांकि व्यावहारिक दृष्टि से अधीनता ऐसी कोई बात नहीं थी।
•खिज्र खां द्वारा दिल्ली पर अधिकार होने से पंजाब, मुल्तान और सिंध दिल्ली सल्तनत का हिस्सा हो गए थे।
* खिज्र खां द्वारा सीमा विस्तार पर कोई प्रयास नहीं किया गया, बल्कि उसने अपने साम्राज्य को इक्ताओं (सुबो) तथा शिको (जिलों की भांति) बांट दिया। इससे वह स्थानीय लोगों की वफादारी हासिल करने में सफल रहा।
* खिज्र खां द्वारा दिल्ली के आसपास के उपजाऊ क्षेत्र को हासिल करना तथा वहां के जागीरदारों से राजस्व वसूलने के लिए सैनिक बल का प्रयोग करना पड़ा। हालांकि इसने तुर्की अमीरों को संतुष्ट करने के लिए उनको अपनी जगीरो से वंचित नहीं किया फिर भी इनके द्वारा समय-समय पर विद्रोह किया जाता था।

 *विद्रोह को दबाने हेतु सैनिक अभियान किया जाता, कुछ जमीदार स्वेच्छा से राजस्व देते लेकिन कुछ अपने किलो में बंद हो जाते जो कि पराजित होने पर ही राजस्व देते थे। इस प्रकार खिज्र खां का उद्देश्य बन गया था, कि सैनिक अभियान कर राजस्व वसूलना इतने सैनिक अभियान करने के बाद भी यह विद्रोही जागीरदारों को स्थाई रूप से समाप्त करने में असफल रहा।

* खिज्र खां के द्वारा राजस्व वसूलने के लिए कटेहर, इटावा, खोर, जलेसर, ग्वालियर, बयाना, मेवात, बदायूं आदि पर सैनिक अभियान करने पड़े।
* सैनिक अभियानों में खिज्र खां के मंत्री ताज-उल-मुल्क ने इसकी बहुत सहायता की।
* खिज्र खां का अंतिम सैनिक अभियान था। मेवात पर आक्रमण जिसमें कोटा के किले को नष्ट कर दिया गया। बाद में ग्वालियर के कुछ क्षेत्रों को लूटने तथा इटावा के राजा द्वारा आधिपत्य स्वीकार करना। तत्पश्चात दिल्ली वापस आते समय रास्ते में बीमार हो गया। जिसके कारण 20 मई 1421 को दिल्ली में खिज्र खां की मौत हो गई।
* खिज्र खां बुद्धिमान, उदार एवं न्यायप्रिय शासक होने के साथ-साथ उसका व्यक्तिगत चरित्र भी अच्छा रहा। प्रजा उससे प्रेम करती थी, इसी कारण उसकी मृत्यु पर प्रजा द्वारा काले कपड़े पहनकर शोक प्रकट किया गया।

मुबारक शाह (1421-1434 ई.) :-

•सैयद वंश के संस्थापक खिज्र खां अपने पुत्र मुबारक खां को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जो मुबारक शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा।

* यह स्वतंत्र शासक की तरह रहा, इसने खुत्बा पढ़वाया, सिक्के चलवाए, शाह की उपाधि धारण की इससे स्पष्ट होता है, कि इसने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की।
•मुबारक शाह के तीन मुख्य शत्रु थे। उत्तर पश्चिम में खोक्खर नेता जसरथ, दक्षिण में मालवा का शासक, पूर्व में जौनपुर का शासक।
* मुबारक शाह ने “मुइज्जुद्दीन मुबारक शाह” के नाम से सिक्के चलवाए।
* इसके द्वारा अपने वंश पर तैमूर वंशीय प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया गया।
* मुबारक शाह द्वारा अपने प्रशासनिक पदों पर हिंदू अमीरों को नियुक्त किया जाना ऐतिहासिक कार्य था ।
* मुबारक शाह द्वारा यमुना नदी के किनारे मुबारकाबाद नामक एक नगर की स्थापना की गई जो वर्तमान में हरियाणा राज्य में अवस्थित है।
* मुबारक शाह के शासनकाल में “याहिया सर हिंदी” द्वारा तारीख के मुबारक शाही ग्रंथ लिखा गया, जिसके द्वारा सैयद वंश के इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।
19 फरवरी 1434 को उसके वजीर “सरवर-उल-मुल्क” ने धोखे से मुबारक शाह की हत्या कर दी।
* वजीर सरवर-उल-मुल्क पहले मलिक स्वरूप नामक हिंदू था। परंतु बाद में धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गया।
•खिज्र खां के समय सरवर-उल-मुल्क दिल्ली का कोतवाल नियुक्त हुआ। सन् 1422 में वजीर बना।
• मुबारक शाह सरवर-उल-मुल्क को पसंद नहीं करता था, इसी कारण उसने राजस्व के अधिकार छीनकर नायाब सेनापति कमाल-उल-मुल्क को प्रदान किये ।इसी बात से असंतुष्ट होकर इसने नवीन नगर मुबारकबाद का निरीक्षण करते समय मुबारक शाह की धोखे से हत्या कर दी।
* मुबारक शाह के कार्यकाल को देखा जाए तो यह सैयद वंश के सभी शासको में योग्यतम् शासक सिद्ध हुआ।

मुहम्मद शाह (मुहम्मद-बिन- फरीद खां) :-

* मुहम्मद-बिन-फरीद खां जो कि मुबारक शाह के भाई का पुत्र (भतीजा) था। मुहम्मद शाह के नाम से गद्दी पर बैठा।
* मुहम्मद शाह एक विलासी तथा अयोग्य शासक सिद्ध हुआ, जिससे सैयद वंश के पतन की नींव पड़ी।

* वजीर सरवर-उल-मुल्क का मुहम्मद शाह के प्रारंभिक शासनकाल में पूर्ण प्रभाव रहा। इसके द्वारा मुबारक शाह की हत्या में शामिल होने वाले हिंदू सामंतों को उच्च पद प्रदान किये गए। कमाल-उल-मुल्क मुहम्मद शाह का नायब सेनापति था। यह हमेशा सैयद वंश का वफादार रहा।
* कमाल-उल-मुल्क ने एक षड्यंत्र के द्वारा वजीर सरवर-उल-मुल्क की हत्या करवा दी। इस षड्यंत्र में मुहम्मद शाह भी शामिल था।
तलपट का युद्ध (दिल्ली से 10 मील दूर )मालवा के शासक महमूद और मुहम्मद शाह के मध्य हुआ। इस युद्ध में मुल्तान के सूबेदार बहलोल ने मुहम्मद शाह का सहयोग किया। युद्ध अनिर्णित रहा।
* मुहम्मद शाह ने बहलोल को अपना पुत्र कहा तथा सम्मान में “खान एक खाना” की उपाधि प्रदान की।
* बहलोल ने पंजाब के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया, जिसे सुल्तान द्वारा स्वीकृत प्रदान की गई। जिससे बहलोल का मनोबल बढ़ा और उसने 1443 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण कर दिया, लेकिन यह असफल रहा।
मुहम्मद शाह एक असफल शासक सिद्ध हुआ। क्योंकि राज्य की सीमाओं की सुरक्षा न कर सका तथा आंतरिक विद्रोह दबा न सका। इसी के समय से सैयद वंश का पतन प्रारंभ हो गया। सुल्तान की मृत्यु 1445 में हो गई।

अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) :-

मुहम्मद शाह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अलाउद्दीन “अलाउद्दीन आलम शाह” के नाम से गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन आलम शाह एक विलासी शासक था, वह अपने वजीर हमीद खां से झगड़ा कर बदायूं भाग गया, और वही बस गया। सैयद वंश के शासको में यह सबसे अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।

* 1447 ईस्वी में बहलोल लोदी ने पुनः दिल्ली पर आक्रमण किया, परंतु वह असफल रहा।

• 1450 तक संपूर्ण शासन बहलोल ने अपने हाथों में ले लिया, लेकिन इसने बदायूं में रह रहे अलाउद्दीन को अपदस्थ करने की कोशिश नहीं की।
1476 में अलाउद्दीन के पश्चात उसके दामाद जौनपुर के शासक हुसैन शाह शर्की ने बदायूं को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया।
* इसी प्रकार सैयद वंश अपने 37 साल के अल्प शासनकाल में समाप्त हो गया।

सैयद वंश का अंतिम शासक ?

-सैयद वंश का अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) था।

सैयद वंश का संस्थापक कौन था ?

सैयद वंश का संस्थापक खिज्र खां था।

सैयद वंश का शासन काल ?

सैयद वंश का शासन काल 1414-1450 ई. तक रहा ।

सैयद वंश के शासको के नाम ?

खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)

सैयद वंश के शासको का क्रम ?

खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)

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 वायुमंडल |Atmosphere किसे कहते हैं परते|संघटन| संरचना

वायुमंडल हवा के रूप में पृथ्वी के चारों ओर उपस्थित कई किलोमीटर बनी चादर जो हमारी पृथ्वी का सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है।

वायुमंडल द्वारा सूर्य से आने वाले विकिरण को पृथ्वी तक आने दिया जाता है। लेकिन पृथ्वी से निकलने वाले विकिरण को वायुमंडल द्वारा रोक लिया जाता है। फल स्वरुप पृथ्वी से उत्सर्जित होने वाली ऊष्मा को एक “ग्लास हाउस” की भांति कार्य करते हुए रोक लिया जाता है। जिससे पृथ्वी का तापमान औसतन 15 डिग्री सेंटीग्रेड बना रहता है।

इसी तापमान के द्वारा पृथ्वी पर जीव मंडल (जीव जंतुओं की उत्पत्ति) का उद्भव संभव हो सका है। यदि वायुमंडल रूपी वायु की घनी चादर हमारी पृथ्वी के चारों तरफ नहीं होती। तो हम दिन के समय सूर्य के तापमान से जल सकते थे। और रात के समय ठंड से जम सकते थे।

वायुमंडल का संघटन :-

वायुमंडल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है। जिसमें धूल के कण ठोस अवस्था में तथा जलवाष्प तरल अवस्था में उपस्थित होती है। वायुमंडल में मौजूद गैसे, जलवाष्प, धूल के कण असमान मात्रा में तैरते रहते हैं। यह समय और स्थान के अनुसार बदलते रहते हैं।

वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस सर्वाधिक मात्रा में उपस्थित है। उसके बाद क्रमशः ऑक्सीजन, आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, नेयाॅन, हीलियम, ओजोन व हाइड्रोजन गैस उपस्थित होती है। वायुमंडल में अशुद्धियों के रूप में जलवाष्प व धूल के कारण असमान रूप से वायुमंडल में उपस्थित रहते हैं। जिसके कारण संसार की मौसमी दशाओं में परिवर्तन में अहम भूमिका होती है।

वायुमंडल में उपस्थित विभिन्न गैसों की मौजूदगी मात्र 32 किलोमीटर की ऊंचाई तक होती है। तथा जलवाष्प व धूल के कण अधिकतम 10 किलोमीटर ऊंचाई तक पाए जाते हैं।                                    वायुमंडल

और पढ़े :-पृथ्वी की आंतरिक संरचना|सियाल(SiAl)|सीमा(SiMa)|निफे(NiFe)|      

वायुमंडल के गैसीय मिश्रण में पाई जाने वाली विभिन्न गैसे निम्नलिखित हैं :-

नाइट्रोजन (N₂):-

नाइट्रोजन वायुमंडलीय गैसों का एक प्रमुख अवयव है। जो हमारे वायुमंडल में लगभग 78% भाग में उपस्थित है। जो की आयतन की दृष्टि से वायुमंडलीय गैसों में सबसे अधिक है। वायुमंडलीय नाइट्रोजन पोषक तत्वों की पूर्ति लेग्यूमेनस पौधों द्वारा की जाती है। पेड़ पौधे मिट्टी से नाइट्रोजन नाइट्रेट के रूप में प्राप्त करते हैं। वायुमंडल और पृथ्वी पर नाइट्रोजन की उपस्थिति विभिन्न इसके अवयवों का बाहुल्य भार 0.01% है।

ऑक्सीजन (O₂):-

वायुमंडल में ऑक्सीजन कुल गैसों का लगभग 21% आयतन होता है। यह गैस मनुष्यों जीव जंतुओं के लिए प्राण दायिनी गैस है। अतः इसे “प्राण वायु” भी कहा जाता है। इसका उत्पादन हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा करते हैं। यदि पृथ्वी की सारी वनस्पतियां नष्ट हो जाए तो ऐसी स्थिति में जीव जंतु ऑक्सीजन के अभाव में मर जाएंगे। ऑक्सीजन जल में संयुक्त रूप से पाई जाती है। इस प्रकार यह भार की दृष्टि से लगभग 88.9% होती है।

आर्गन (Ar):-

आर्गन एक अक्रिय गैस है। जो वायुमंडल में उपस्थित अन्य अक्रिय गैसों (हीलियम, नेयाॅन, क्रेप्टांन, जे़नांन) में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसका उपयोग कुछ तापीय धातु कर्मिक प्रक्रियाओं धातु अथवा मिश्रधातुओं की आर्क वेल्डिंग में निष्क्रीय वातावरण बनाने में तथा विद्युत बल्ब में भरने में किया जाता है।

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2):-

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड एक महत्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है, जो वायुमंडल में लगभग 0.0407 प्रतिशत (लगभग 407 पार्ट्स पर मिलियन या PPM )उपस्थित है। यह गैस जीवाश्म ईंधन जैसे प्राकृतिक गैस, तेल, कोयला आदि के दहन तथा कल कारखानों से उत्पन्न होती है।
CO2 गैस पौधों में होने वाली प्रकाश संश्लेषण क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसके उपयोग से पौधे ग्लूकोज और ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं जो की जीवन के लिए अति आवश्यक होते है।
कार्बन डाइऑक्साइड गैस (CO2) एक ग्रीनहाउस गैस होने के कारण हमारी पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में भूमिका रखती है।
जब इस गैस की मात्रा बढ़ती है, तो यह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का कारण बनती है।

 

नियॉन (Ne):-

नियाॅन एक अक्रिय गैस है, जो लगभग 0.0018% वायुमंडल में उपस्थित है। मात्रा के हिसाब से यह पांचवीं नंबर की गैस है। यह हीलियम के बाद दूसरी सबसे हल्की नोबल गैस है।
– इस गैस का उपयोग चमकीले साइन बोर्ड तथा विज्ञापन लाइट्स में किया जाता है।
– इस गैस का गलनांक व क्वथनांक बहुत कम होने के कारण इसका प्रयोग क्रायोजेनिक रेफ्रिजरेंट के रूप मे किया जाता है।
– नियाॅन गैस एक अक्रिय गैस होने के कारण जलवायु परिवर्तन या ग्रीन हाउस प्रभाव में इसका कोई योगदान नहीं रहता है।

हीलियम (He) :-

– यह गैस के अक्रिय गैस है। जो रासायनिक क्रियाओं में भाग नहीं लेती है। वायुमंडल में इसकी उपस्थिति लगभग 0.0005 प्रतिशत है, जो की एक अल्प मात्रा है, हाइड्रोजन के बाद यह दूसरी सबसे हल्की गैस है।
– इस गैस का क्वथनांक (-268.9 सेंटीग्रेड) सभी तत्वों से कम है। इसी कारण यह अत्यंत निम्न तापमान पर द्रव अवस्था में बनी रहती है।
– हीलियम गैस का उपयोग एमआरआई मशीन, सुपरकंडक्टिव मैग्नेट, परमाणु रिएक्टर, अंतरिक्ष अनुसंधान, गोताखोरी आदि में किया जाता है।

मेथेन (CH4):-

– मेथेन गैस वायुमंडल में लगभग 0.00018 प्रतिशत उपस्थित है। इसकी मात्रा कार्बन डाइऑक्साइड CO2 से बहुत कम है, फिर भी यह ग्रीन हाउस प्रभाव में CO2 से लगभग 25 से 30 गुना अधिक प्रभाव डालती है। मेथेन को मार्श गैस/स्वैम्प गैस भी कहते हैं।
– यह गैस ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प का निर्माण करती है।
– मिथेन अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण इसका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।
– यह गैस धान के खेतों, बायोगैस संयंत्रों, जुगाली करने वाले जानवरों (जैसे गाय, भैंस आदि) कचरे के अपघटन आदि से इसका प्राकृतिक उत्पादन होता है।

क्रिप्टन (Kr):-

क्रिप्टन गैस वायुमंडल में लगभग 0.0001% उपस्थित है। यह एक निष्क्रिय गैस है, इसका क्वथनांक -153.4 डिग्री सेंटीग्रेड है, इसका उपयोग फ्लैश लैंप तथा कुछ फ्लोरोसेंट बल्ब में किया जाता है।

 जेनाॅन (Xe):-

जेनाॅन गैस वायुमंडल में लगभग 0.000009 प्रतिशत उपलब्ध है। यह एक निष्क्रिय गैस है।इसे अजनबी गैस (Stranger Gas) भी कहते हैं

हाइड्रोजन (H2):-

यह वायुमंडल में लगभग 0.00005 प्रतिशत मौजूद है। यह एक अत्यधिक हल्की गैस है, जो अक्सर पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से बचकर अंतरिक्ष में चली जाती है इसका क्वथनांक – 252.9 डिग्री सेंटीग्रेड होता है यह एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस होती है।

 हाइड्रोजन विश्व में पाया जाने वाला सबसे अधिक मात्रा वाला तत्व है। इसकी मौजूदगी में सूर्य में नाभिकीय संलयन क्रिया होती है, जो तारों में भी संपन्न होती है। इसकी खोज 1766 में हेनरी कैवेंडिश द्वारा की गई थी।

जलवाष्प (H2O):-

वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा परिवर्तनशील होती है, जो लगभग 0 से 4% के मध्य बनी रहती है, यह एक ग्रीनहाउस गैस है, जो मौसम और जलवायु को प्रभावित करती है।

ओजोन (O3):-

ओजोन वायुमंडल में लगभग 0.000004% मौजूद है। वायुमंडल की अधिकांश ओजोन गैस 15 से 35 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्टैटोस्फियर में मौजूद ओजोन परत में पाई जाती है। इसका क्वथनांक – 112 डिग्री सेंटीग्रेड होता है। ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने का कार्य करती है, जिससे जीवो में त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले नुकसान से बचाती है।

उपरोक्त के अलावा हमारे वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) नाइट्रोजन ऑक्साइड ( NO2) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) आदि मानवीय गतिविधियों के कारण उपस्थित हो सकती है।

सिंधु नदी तंत्र| झेलम(वितस्ता)| चेनाब (अस्किनी)| रावी

सिंधु नदी तंत्र :-

* सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित बोखर- चू हिमनद से होता है। इसकी सहायक नदियां झेलम, चेनाव, रावी, व्यास तथा सतलज हैं। सिंधु नदी तंत्र यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पश्चिमी नदी तंत्र है।

सिंधु नदी तंत्र

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* सिंधु नदी की कुल लंबाई 2880 किलोमीटर जिसमें 709 किलोमीटर भारत में शेष 2171 किलोमीटर पाकिस्तान में प्रवाहित होती है। कुल जल ग्रहण क्षेत्र लगभग 1165000 वर्ग किलोमीटर है। जिसमें 321284 वर्ग किलोमीटर भारत में है।

•इसका उद्गम स्थल बोखर- चू हिमनद कैलाश श्रेणी के उत्तरी ढ़ाल पर अवस्थित है। यह नदी काराकोरम, लद्दाख, जास्कर पर्वत श्रेणियां में प्रवाहित होती है। तिब्बत में इस नदी को सिंगी खंबन या लायंस माउथ(lion’s mouth) नाम से जाना जाता है।

•जास्कर नदी इसमें लेह के नीचे मिलती है। तथा कारगिल के पास बायें किनारे से सुरू एवं द्रास नदियां मिलती हैं। काराकोरम श्रेणी में स्थित सियाचिन हिमनद से स्योक, नुबरा सहायक नदियां उत्तर पश्चिम ओर से निकलकर सिंधु नदी में मिलती हैं।

* सिंधु नदी में दाएं से मिलने वाली नदियां श्योक, गिलगिट, काबुल, कुर्रम, टोची, गोमल, जोब(zhob) आदि।

* बाए से मिलने वाली नदियां जास्कर, सुरू, सोहन, चेनाव (झेलम, रावी ,व्यास, सतलज) आदि।

झेलम (वितस्ता):-

 झेलम नदी, सिंधु नदी तंत्र की महत्वपूर्ण नदी है, जिसका  उद्गम पीर पंजाल पर्वत के पदस्थली में स्थित बेरीनाग झरने से होता है। जो कश्मीर घाटी के दक्षिणी पूर्वी भाग में स्थित है। श्रीनगर इसी नदी के किनारे बसा है। अपने उद्गम स्थल से लगभग 110 किलोमीटर उत्तर पश्चिम बहने के बाद यह नदी बुलर झील में प्रवेश करती है। मुजफ्फराबाद (पाकिस्तान) से मंगला तक यह नदी भारत पाकिस्तान सीमा के लगभग समानांतर प्रवाहित होती है। यह ट्रिग्यू में चेनाब नदी से मिलती है। कश्मीर घाटी में झेलम की ढाल अधिक गहरी नहीं है। इसलिए अनंतनाग से बारामुला तक झेलम नदी नौकागम्य है। किशनगंगा इसकी सहायक नदी है। जिसे पाकिस्तान में नीलम नदी के नाम से जाना जाता है। यह नदी कश्मीर की सबसे महत्वपूर्ण नदी है।

चेनाब (अस्किनी):-

•यह सिंधु नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
* चंद्रा तथा भागा चेनाब नदी की दो सहायक नदियां हैं। जो ऊपरी भाग से मिलती हैं।
* हिमाचल प्रदेश में चेनाब नदी को चंद्रा-भागा नाम से जानते हैं।
•चंद्रा-भागा का उद्गम बारा-लाच्चा दर्रे के दोनों तरफ से होता है।
•बारा लाच्चा दर्रा हिमाचल प्रदेश के लाहौल जिले में स्थित है।
* चंद्रा नदी का उद्गम एक हिमनद से होता है, जबकि भाग नदी प्रपाती है।
* चंद्रा और भागा दोनों नदिया टांडी में मिलने के बाद चेनाब के रूप में पीर पंजाल तथा वृहद हिमालय के बीच बहती हैं।

•चेनाब नदी किश्तवार के निकट कैंची मोड़ के साथ पीर पंजाल पर्वत श्रेणी में रिआसी में पार कर पाकिस्तान में प्रवेश करती है। •बागलिहार, सेलाल तथा दुलहस्ती जैसी महत्वपूर्ण जल बिजली परियोजनाएं इसी नदी पर स्थित है।
* बागलिहार परियोजना जम्मू कश्मीर के डोडा जिले में स्थित है। जो 450 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर जम्मू कश्मीर को पर्याप्त बिजली आपूर्ति करती है।

 रावी (पुरुष्णी अथवा इरावती):-

* रावी नदी का उद्गम कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) में रोहतांग दर्रे के पास होता है। इसी स्रोत के निकट से ही व्यास नदी का भी उद्गम होता हैं।
•रावी नदी की घाटी को कुल्लू घाटी कहते हैं।
•यह नदी धौलाधार श्रेणी में एक महाखड्ड के निर्माण के बाद पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है। यहां यह नदी भारत पाक सीमा के साथ-साथ बहती है।
गुरुदासपुर तथा अमृतसर इसी नदी पर स्थित है। इन्हीं जिलों को पार कर यह नदी पाकिस्तान में प्रवेश करती है।

व्यास (विपाशा अथवा अर्गीकिया):-

व्यास नदी का उद्गम स्थल व्यास कुंड है जो कुल्लू हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे के दक्षिण में स्थित है
*व्यास नदी सतलज नदी की सहायक नदी है
•धौलाधार श्रेणी को पार कर व्यास नदी कोटी एवं लार्जी के पास एक महाखड्ड का निर्माण करती है।

•मनाली एवं कुल्लू जो हिमाचल प्रदेश में अवस्थित है। इसी नदी के किनारे स्थित है। यहीं पर इसके द्वारा एक अनुप्रस्थ घाटी का निर्माण होता है, जिसे कुल्लू घाटी कहते हैं।
•व्यास नदी कांगड़ा घाटी को पार कर पश्चिम की ओर मुड़कर पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है।
•पंजाब के मैदान में कपूरथला तथा अमृतसर जिलों को पार कर यह हरिके (भारत) के पास सतलज नदी में मिल जाती है।

सतलज (साताद्रु अथवा सातुद्री):-

•सतलज नदी का उद्गम मानसरोवर झील (चीन) के निकट स्थित राकास झील (राकास ताल) से होता है।
•सतलज नदी एक पूर्ववर्ती नदी का उदाहरण है।
•सतलज नदी को तिब्बत में लांग चेन खम्बाब नाम से जाना जाता है।
•यह नदी जास्कर और वृहद हिमालय श्रेणी में एक महाखड्ड का निर्माण करती है।
शिपकी ला दर्रे से होती हुई हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करती है।
•हिमाचल प्रदेश में यह नदी जास्कर श्रेणी को पार कर पश्चिम की ओर मुड़कर कल्पा को पार कर रामपुर के पास धौलाधार श्रेणी को एक महाखड्ड के द्वारा पार करती है।
•सतलज नदी शिवालिक श्रेणी को पार कर भाखड़ा गांव के पास महाखड्ड पर भाखड़ा बांध का निर्माण किया गया है।
•भाखड़ा बांध के पास रोपड़ में यह नदी पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है।
•सतलज नदी कपूरथला के दक्षिण पश्चिम किनारे पर स्थित हरिके नामक स्थान पर व्यास नदी में मिलती है, तथा आगे चलकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है।

घाघरा (पौराणिक सरस्वती):-

•घाघरा नदी का उद्गम सिरमुर के शिवालिक के पाद मलवा पंख (Talus Fan) से होता है। जो की अंबाला (हरियाणा) के निकट स्थित है।
•घाघरा नदी एक अतः स्थलीय अपवाह का उदाहरण है।
•यह नदी शिवालिक श्रेणी को पार करके जब मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद विलुप्त हो जाती है। लेकिन यह करनाल जिले में फिर से प्रकट हो जाती है। तब इसे सरिता हरका कहा जाता है। जो की हनुमानगढ़ (बीकानेर राजस्थान) के निकट पुनः विलुप्त हो जाती है।
•वैदिक काल में घाघरा नदी को सरस्वती नाम से जाना जाता था।
•घाघरा नदी पाकिस्तान में कच्छ के क्षेत्र (Raan of kachchh) में मिल जाती है।

भूदान आंदोलन| Bhoodan Aandolan (18 अप्रैल 1951)

भूदान आंदोलन भूमि वितरण को समान बनाने तथा देश में असमान भूमि जोत गरीबी, बेकारी को मिटाने के लिए प्रसिद्ध गांधीवादी नेता आचार्य विनोबा भावे द्वारा भारत में 18 अप्रैल 1951 में शुरू किया गया, भूदान आंदोलन जिसे भूमि दान आंदोलन भी कहा जाता है।

भूदान आंदोलन

 

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यह एक सामाजिक सुधार आंदोलन था। इसका मुख्य उद्देश्य भूमिहीन किसानों को भूमि प्रदान करना और सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करना था। यह आंदोलन अपने में एक बृहद रचनात्मक कार्य था, जो महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रेरित था और अहिंसा, स्वैच्छिक दान, और सामुदायिक सहयोग पर आधारित था।

उत्पत्ति :-
आंदोलन की शुरुआत 18 अप्रैल 1951 को तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में हुई, जब विनोबा भावे ने वहां के जमींदारों से भूमिहीन किसानों के लिए जमीन दान करने की अपील की। मार्च 1956 तक इस कार्यक्रम में दान के रूप में 40 लाख एकड़ जमीन मिल गई थी यह करीब दो लाख परिवारों में बांटी गई एक जमींदार, वेदिरे रामचंद्र रेड्डी, ने 100 एकड़ जमीन दान की, जिससे आंदोलन को गति मिली।

उद्देश्य :-
इस आंदोलन के द्वारा अहिंसात्मक तरीके से भूमि वितरण की समानता तथा इसके माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना था।
* भूमिहीन किसानों और हरिजनों को जमीन प्रदान करना।
* सामाजिक समानता को बढ़ावा देना और जमींदारी व्यवस्था के प्रभाव को कम करना।
* विनोबा भावे ने सर्वोदय समाज (सभी का उत्थान) की स्थापना की।

कार्यप्रणाली :-
* विनोबा भावे ने देश भर में अपने अनुयायियों के साथ गांव-गांव पैदल यात्रा की तथा जमींदारों, धनी लोगों से स्वेच्छा से अपनी जमीन का 1/6 वाॅं हिस्सा दान करने को कहते और यह जमीन इस गांव के भूमिहीन किसानों, विशेषकर समाज के वंचित वर्गों में वितरित कर दी जाती थी।
* यह आंदोलन अहिंसक और स्वैच्छिक था। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता तथा रचनात्मकता को देखकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख जयप्रकाश नारायण और कई कांग्रेसी नेता सक्रिय राजनीति छोड़कर इस आंदोलन में जुड़ गए। इस आंदोलन की विशेषता यह रही कि, इसमें किसी पर जोर जबरदस्ती या बल का प्रयोग नहीं किया गया।

प्रभाव :-
* भूदान आंदोलन के तहत देश भर में लगभग 40 लाख एकड़ जमीन दान की गई, इस आंदोलन में बंजर तथा विवादित भूमिका का भी वितरण कर दिया गया था। जिससे किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ा।
* इस आंदोलन ने सामाजिक जागरूकता उत्पन्न की और ग्रामीण भारत में भूमि सुधार के लिए प्रोत्साहित किया।
भूदान आंदोलन की रचनात्मकता के चलते तथा जनता का उत्साह देखते हुए 1955 में उड़ीसा में एक अन्य आंदोलन ग्रामदान आंदोलन (गांवों का दान) और संपत्तिदान आंदोलन प्रारंभ किया गया।

चुनौतियां :-
* दान की गई जमीन का वितरण और प्रबंधन कुछ समय बाद निष्प्रभावी हो चुका था।
* कुछ चालक जमीदारों ने ऐसी भूमि का वितरण किया जो पहले से ही बंजर या अनुपजाऊ थी। इससे जिन भूमिहीनों को लाभ होना था उन्हें उस प्रकार का वास्तविक लाभ नहीं मिल सका।
उस समय भूमि के हस्तांतरण में अनेक प्रकार की प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं थी। जिसके कारण इस आंदोलन की गतिशीलता प्रभावित हुई ।

वर्तमान स्थिति :-
* वर्तमान समय में भूदान आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रभाव कम हो गया है, लेकिन भूदान आंदोलन ने भूमि सुधार और सामाजिक समानता के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत किया।
* यह आंदोलन वर्तमान समय में भी सामाजिक कार्यकर्ताओं और सुधारकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

निष्कर्ष :-
भूदान आंदोलन एक अनूठा प्रयोग था, जिसने भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने की कोशिश की। विनोबा भावे की अहिंसक और स्वैच्छिक दृष्टिकोण ने इसे एक ऐतिहासिक पहल बनाया, हालांकि इस आंदोलन की कुछ सीमाओं के कारण यह पूर्ण रूप से अपनी क्षमता तक नहीं पहुंच सका।

इन्हे भी जाने :-भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन(20वीं सदी )