गदर आंदोलन का इतिहास: स्थापना, उद्देश्य और भारत की आजादी में योगदान

​भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल भारतीय सीमाओं तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसकी गूंज गदर आंदोलन के रूप में सात समंदर पार अमेरिका और कनाडा तक भी सुनाई दी थी। इस विदेशी धरती पर पनपे गदर आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलाने का काम किया। आइए जानते हैं क्या था गदर आंदोलन और क्यों यह भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

गदर आंदोलन

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गदर दल की स्थापना और प्रमुख क्रांतिकारी :-

​गदर आंदोलन की शुरुआत गदर दल द्वारा की गई थी। इस दल का गठन 1 नवंबर 1913 को संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में लाला हरदयाल द्वारा किया गया था।

इस क्रांतिकारी संस्था के अन्य प्रमुख सहयोगियों में शामिल थे:

रामचंद्र और बरकतउल्ला
​भगवान सिंह, करतार सिंह सराबा और भाई परमानन्द
​रामदास पुरी, जी.डी. कुमार, तारकनाथ दास और सोहन सिंह भखना (स्थापना से पूर्व की गतिविधियों में सक्रिय)
सैन फ्रांसिस्को में इसका मुख्यालय स्थापित किया गया और अमेरिका के कई अन्य शहरों में इसकी शाखाएं खोली गईं।

​आंदोलन के मुख्य उद्देश्य:-

​गदर आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को आजाद कराना था। इसके प्रमुख लक्ष्यों में शामिल थे:

  • ​ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करना और साम्राज्यवाद विरोधी साहित्य का प्रकाशन करना।
    ​1857 के विद्रोह की याद में ‘गदर’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन।
  • ​विदेशी सेनाओं में नियुक्त भारतीय सैनिकों में राष्ट्रवाद की भावना जगाना और उन्हें विद्रोह के लिए प्रेरित करना।
  • ​हथियार प्राप्त करना और उन्हें भारतीय क्रांतिकारियों के बीच वितरित करना।
    ​आंदोलन का विस्तार और पृष्ठभूमि
  • ​गदर दल के सदस्य मुख्य रूप से पंजाब के किसान और भूतपूर्व सैनिक थे, जो रोजगार की तलाश में कनाडा और अमेरिका में बसे हुए थे। दल की स्थापना से पहले ही वैंकूवर (कनाडा) में ‘स्वदेशी सेवक गृह’ और सिएटल में ‘यूनाइटेड इंडिया हाउस’ जैसी संस्थाएं सक्रिय थीं, जिनका लक्ष्य भारत को विदेशी गुलामी से मुक्त कराना था।

प्रमुख विचारकों के कथन :-

​इतिहास के पन्नों में इस आंदोलन से जुड़ी कुछ महान हस्तियों के विचार आज भी प्रेरणा देते हैं:

​सुभाष चंद्र बोस: क्रांतिकारियों का उद्देश्य आतंकवाद नहीं अपितु क्रांति है, और क्रांति का उद्देश्य भारत में राष्ट्रीय सरकार की स्थापना है।
​महात्मा गांधी: आप लोगों ने देखा नहीं कि इन आतंकवादियों ने अपना इतिहास अपने खून से लिखा है।
​बाल गंगाधर तिलक: ईश्वर ने विदेशियों को हिन्दुस्तान का राज्य कोई तांबे की प्लेट में रखकर नहीं दिया है… श्रीमद्भगवतगीता से कर्म की शिक्षा ग्रहण करो।

आंदोलन की विफलता के कारण :-

​इतने महान उद्देश्यों के बावजूद गदर आंदोलन सफल नहीं हो सका। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

रणनीति और संगठन का अभाव: आंदोलनकारियों ने प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होते ही बिना अपनी शक्ति का सही आकलन किए विद्रोह कर दिया।

​नेतृत्व की कमी: लाला हरदयाल एक अच्छे विचारक और प्रचारक तो थे, लेकिन उनमें सांगठनिक सामर्थ्य की कमी थी। उनके अमेरिका छोड़ने के बाद आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया।

जनमानस से दूरी: आंदोलनकारियों ने भारतीय आम जनता के बीच अपनी पैठ जमाने का विशेष प्रयास नहीं किया।

संसाधनों की कमी: आंदोलन को सफल होने के लिए पर्याप्त हथियार, धन और प्रशिक्षण नहीं मिल सका।

​निष्कर्ष: गदर आंदोलन की महत्ता :-

​भले ही गदर आंदोलन अपने तात्कालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहा, लेकिन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी धर्मनिरपेक्षता थी। इस दल में विभिन्न समुदायों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़े। इसने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई दिशा दी और आने वाली पीढ़ियों को सशस्त्र राष्ट्रवाद की प्रेरणा प्रदान की।

Balaji Vishwanath(बालाजी विश्वनाथ) मराठा साम्राज्य के ‘द्वितीय संस्थापक’ और प्रथम शक्तिशाली पेशवा

इस ब्लॉग में हम बालाजी विश्वनाथ(Balaji Vishwanath) के प्रारंभिक जीवन, उनके उत्थान और किस तरह उन्होंने अपनी कूटनीति से मराठा साम्राज्य की दिशा बदल दी, इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित इस साम्राज्य को एक कठिन दौर से निकालकर पुनर्जीवित करने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह हैं बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) (1713-1720)। उन्हें अक्सर मराठा शक्ति का ‘द्वितीय संस्थापक’ कहा जाता है।भारतीय इतिहास में मराठा साम्राज्य का नाम वीरता और कूटनीति का पर्याय है।
Balaji Vishwanath

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प्रारंभिक जीवन और संघर्ष :- 

बालाजी विश्वनाथ का जन्म कोंकण के एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह परिवार अपनी बौद्धिक क्षमता और प्रशासनिक कुशलता के लिए प्रसिद्ध था। उनके पूर्वज जंजीरा राज्य के श्रीवर्धन में वंशानुगत कर संग्रहकर्ता (Revenue Collectors) थे।

​हालाँकि, जंजीरा के सिद्दियों के साथ उनके संबंध खराब हो गए, जिसके कारण उन्हें अपना पैतृक स्थान छोड़कर सासवड़ में बसना पड़ा। कर और वित्त संबंधी उनके गहरे ज्ञान ने उन्हें मराठा प्रशासन में जगह दिलाई।

सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ना :-

  • बालाजी विश्वनाथ का राजनीतिक सफर काफी प्रभावशाली रहा |
  • ​1696- वे पुणे के सभासद बने।
  • ​1699-1702: पुणे के सर सूबेदार के रूप में कार्य किया।
  • ​1704-1707: दौलताबाद के सर सूबेदार रहे।

​कहा जाता है कि औरंगजेब के अंतिम समय में जब मुगल सेना दक्षिण में थी, तब बालाजी ने गुप्त रूप से रसद आपूर्ति और मराठा हितों की रक्षा के बीच एक महीन संतुलन बनाए रखा था।

साहू जी का समर्थन और गृहयुद्ध की स्थिति :-

औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी बहादुरशाह ने शाहू जी (शिवाजी महाराज के पौत्र) को कैद से मुक्त कर दिया। मुगलों का उद्देश्य मराठों के बीच गृहयुद्ध भड़काना था, और वे सफल भी रहे। शाहू जी के सामने उनकी चाची ताराबाई खड़ी थीं, जिन्होंने शाहू को एक ‘ढोंगी’ (Impostor) घोषित कर दिया था।

इस कठिन समय में बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) ने शाहू जी का साथ दिया। अक्टूबर 1707 में खेड़ के युद्ध में बालाजी की कूटनीति के कारण ताराबाई के सेनापति धन्नाजी जाधव शाहू जी की ओर आ गए, जिससे शाहू जी की जीत सुनिश्चित हुई।

​’सेनाकर्ते’ पद का सृजन :-

जब धन्नाजी जाधव के पुत्र चंद्रसेन ने ताराबाई से हाथ मिला लिया, तब शाहू जी ने सेना को संगठित करने के लिए एक नया पद ‘सेनाकर्ते’ बनाया और बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) को इस पर नियुक्त किया। यह उनकी बढ़ती शक्ति का पहला बड़ा संकेत था।

​कूटनीति की पराकाष्ठा: कान्होजी आंग्रे के साथ संधि :-

​मराठा साम्राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती पश्चिमी तट के रक्षक कान्होजी आंग्रे थे, जो ताराबाई का समर्थन कर रहे थे। बालाजी विश्वनाथ ने यहाँ युद्ध के बजाय कूटनीति का रास्ता चुना। उन्होंने कान्होजी को समझाया कि मराठा राज्य की एकता ही सर्वोपरि है। परिणामस्वरूप, कान्होजी शाहू जी के पक्ष में आ गए, जिससे शाहू की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई।

दिल्ली की संधि (1719): मराठा साम्राज्य का ‘मैग्नाकार्टा’ :-

​बालाजी विश्वनाथ की सबसे बड़ी उपलब्धि मुगल सम्राट और सैयद बंधुओं (हुसैन अली और अब्दुल्ला खान) के साथ की गई संधि थी। 1719 में हुई इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं:
​स्वराज्य की मान्यता: मुगलों ने शिवाजी महाराज के ‘स्वराज्य’ पर शाहू जी के अधिकार को मान्यता दी।

चौथ और सरदेशमुखी:-

मराठों को दक्कन के छह मुगल प्रांतों से ‘चौथ’ (कुल राजस्व का 1/4) और ‘सरदेशमुखी’ (1/10) वसूलने का कानूनी अधिकार मिल गया।

सैन्य सहायता: इसके बदले में मराठों ने मुगलों को 15,000 सैनिक देने और दक्कन में शांति बनाए रखने का वादा किया।

​स्वजनों की मुक्ति: शाहू जी की माता और अन्य परिजनों को मुगल कैद से रिहा किया गया।
​इतिहासकार सर रिचर्ड टेम्पल ने इस संधि को “मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा” (Magna Carta) कहा है, क्योंकि इसने मराठों को कानूनी रूप से दक्षिण भारत का स्वामी बना दिया।

​बालाजी विश्वनाथ का मूल्यांकन :-

2 अप्रैल, 1720 को बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) का निधन हो गया, लेकिन मात्र सात वर्षों के पेशवाई कार्यकाल में उन्होंने जो नींव रखी, उस पर उनके पुत्र बाजीराव प्रथम ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया।

सफलता के मुख्य बिंदु:-

  • ​स्वनिर्मित व्यक्तित्व: वे शून्य से उठकर पेशवा के पद तक पहुँचे।
  • वित्तीय सुधार: उन्होंने महादजी कृष्ण जोशी जैसे साहूकारों की मदद से राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारी।
  • राजनीतिक दूरदर्शिता: उन्होंने गृहयुद्ध को समाप्त कर मराठा सरदारों को एक ध्वज के नीचे लाने का सफल प्रयास किया।
  • ​राजस्व प्रणाली: उनके समय में ही मराठों को नियमित रूप से 35% वार्षिक कर और चौथ मिलने लगी, जिससे राज्य कोष समृद्ध हुआ।

निष्कर्ष :-

​बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक महान राजनीतिज्ञ और ‘राजमर्मज्ञ’ (Statesman) थे। उन्होंने तलवार से ज्यादा अपनी बुद्धि और कूटनीति का प्रयोग कर मराठा साम्राज्य को विघटन से बचाया। उनकी मृत्यु के समय तक, मराठा साम्राज्य एक क्षेत्रीय शक्ति से ऊपर उठकर अखिल भारतीय शक्ति बनने की ओर अग्रसर हो चुका था।

​भारतीय इतिहास में उन्हें हमेशा एक ऐसे वास्तुकार के रूप में याद किया जाएगा, जिसने मराठा पेशवाई की गरिमा और शक्ति को चरम पर पहुँचाने का आधार तैयार किया।

​FAQ – बालाजी विश्वनाथ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न :-

​प्रश्न: बालाजी विश्वनाथ पेशवा कब बने?
​उत्तर: वे 1713 ईस्वी में पेशवा बने।

​प्रश्न: ‘सेनाकर्ते’ का क्या अर्थ है?
​उत्तर: सेनाकर्ते का अर्थ है ‘सेना को संगठित करने वाला’।

प्रश्न: दिल्ली की संधि किसके बीच हुई थी?
​उत्तर: यह संधि पेशवा बालाजी विश्वनाथ (मराठों की ओर से) और सैयद बंधुओं (मुगलों की ओर से) के बीच हुई थी।

आशा है कि आपको मराठा इतिहास का यह स्वर्णिम अध्याय पसंद आया होगा। इतिहास से जुड़ी ऐसी ही अन्य जानकारियों के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करें!

  दांडी मार्च(Dandi March)| एक क्रांति की शुरुआत (12 मार्च – 6 अप्रैल, 1930) 

 दांडी मार्च(dandi march)को सॉल्ट मार्च व डांडी सत्याग्रह भी कहा जाता है2 मार्च 1930 को गांधी जी ने वायसराय को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन के दुष्प्रभावों तथा अपनी 11 सूत्रीय मांगों का उल्लेख किया, जो सरकार के सम्मुख पेश की गयीं थींउन्होंने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों को पूरा करने का कोई प्रयत्न नहीं करेगी तो 12 मार्च को वे नमक कानून का उल्लंघन करेंगे

Dandi March

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सरकार द्वारा पत्र का कोई सार्थक जवाब मिलने के विरोध में गांधीजी ने 12 मार्च 1930 साबरमती आश्रम से अपने 78 समर्थकों के साथ डांडी के लिये पद यात्रा प्रारंभ की तथा 24 दिनों में 240 कि.मी. की पदयात्रा के पश्चात 5 अप्रैल को डांडी पहुंचे6 अप्रैल को गांधीजी ने समुद्रतट में नमक बनाकर कानून तोड़ा । 

इससे पहले गांधीजी की डांडी पदयात्रा के दौरान रास्ते में हजारों किसानों ने उनका संदेश सुना तथा कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। कई ग्रामीणों ने सरकारी नौकरियों का परित्याग कर दिया । 

9 अप्रैल को गांधी जी ने एक निर्देश जारी करके आंदोलन के लिये निम्नलिखित कार्यक्रम प्रस्तुत किये :- 

जहां कहीं भी संभव हो, लोग नमक कानून तोड़कर नमक तैयार करें। 

  • शराब की दुकानों, विदेशी कपड़े की दुकानों तथा अफीम के ठेकों के समक्ष धरने आयोजित किये जायें। 
  • यदि हमारे पास पर्याप्त शक्ति हो तो हम करों की अदायगी का विरोध कर सकते हैं । 

वकील अपनी वकालत छोड़ सकते हैं । 

  • जनता, याचिकाओं पर रोक लगाकर न्यायालयों का बहिष्कार कर सकती है। 
  • सरकारी कर्मचारी अपने पदों से त्यागपत्र दे सकते हैं । 
  • हर घर में लोग चरखा कातें और सूत बनायें । 
  • छात्र, सरकारी स्कूल एवं कालेजों का बहिष्कार करें। 
  • स्थानीय नेता, मेरी गिरफ्तारी के बाद अहिंसा बनाये रखने में सहयोग दें । 
  • इन सभी कार्यक्रमों में सत्य एवं अहिंसा को सर्वोपरि रखा जाये तभी हमें पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति हो सकती है । 

सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभिक चरण के रूप में, 12 मार्च 1930 को प्रारंभ हुई इस ऐतिहासिक यात्रा में गांधीजी ने 6 अप्रैल को डांडी में मुट्ठीभर नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ानमक कानून के उल्लंघन को भारतीयों द्वारा, ब्रिटिश कानूनों के विरोध एवं साम्राज्यवाद की समाप्ति के प्रयासों के प्रतीक के रूप में देखा गयाइस यात्रा, इसके विकास तथा लोगों पर इसके प्रभाव को समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया

गुजरात में गांधीजी की अपील पर तीन सौ ग्रामीण सरकारी कर्मचारियों ने सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र दे दियाकांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी स्थानीय स्तर पर कांग्रेस को लोकप्रिय बनाने एवं उसे संगठित करने के सराहनीय प्रयास किये। 

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कर्क रेखा(kark rekha)वह काल्पनिक लकीर जिसने भारत को दो हिस्सों में बांटा

कर्क रेखा(kark rekha)/कर्क वृत्त (Tropic of CANCER) गोलार्द्ध में एक अक्षांश वृत्त है। जो ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।

kark rekha

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  • कर्क रेखा, विषुवत रेखा / भूमध्य रेखा से 23 डिग्री 30 मिनट उत्तर (23.30′ उत्तर) की ओर समानान्तर रेखा है।
  • कर्क रेखा पर सूर्य 21 जून को लम्बवत् चमकता है। इसे कर्क संक्रान्ति या ग्रीष्म संक्रान्ति (Summer Solstice) भी कहा जाता है। क्योंकि इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में अधिकतम गर्मी पड़ती है।
  • 21 जून उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ा दिन होता है व रात सबसे छोटी होती है। क्योकि 21 जून को सूर्य कर्क रेखा के एकदम ऊपर होता है| इस दिन सबसे अधिक गर्मी होती है (स्थानीय मौसम को छोड़कर), क्योंकि सूर्य की किरणें यहां एकदम लंबवत पड़ती हैं।
  • 21 जून को नार्वे जो उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, में अर्द्धरात्रि का सूर्य (Midnight Sun) दिखाई पड़ता है। इस तिथि को नार्वे में 24 घंटे का दिन होता है।
  • सूर्य एक महीने में लगभग 8 डिग्री अक्षांश की तथा एक दिन में 16′ मिनट अक्षांश की यात्रा करता है।
  • अधसौर बिन्दु पृथ्वी के चतुर्विक एक पथ बनाता है जो एक स्प्रिंग की तरह पृथ्वी को कर्क तथा मकर रेखाओं के मध्य लपेटे रहता है। इस पथ को क्रान्तिक वृत्त (Ecliptic) कहा जाता है।
  • भारत में, कर्क रेखा आठ राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात (जसदन), राजस्थान (कलिंजर), मध्य प्रदेश (शाजापुर), छत्तीसगढ़ (सोनहट), झारखंड (लोहरदगा), त्रिपुरा (उदयपुर), मिजोरम (चम्फाई), पश्चिम बंगाल (कृष्णानगर)।
  • kark rekha

 

  • भारत की माही नदी (Mahi River) कर्क रेखा को दो बार काटती है।

 

कर्क रेखा 3 महाद्वीपों के  17 देशों से होकर गुजरती है।

क्रम संख्या महाद्वीप का नाम देश के नाम
1उत्तरी अमेरिकाबहामास (द्वीपसमूह), मेक्सिको
2अफ्रीकामिस्र, लीबिया, नाइजर, अल्जीरिया, माली, पश्चिमी सहारा, मॉरिटानिया
3एशियाताइवान, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब

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अमीर खुसरो (amir khusro) भारतीय संस्कृति और संगीत के अमर संवाहक

निःसंदेह भारतीय कवियों में बहुत उच्च स्थान अमीर खुसरो(amir khusro) को प्राप्त है| अमीर खुसरो जिसका लोकप्रिय नाम “तूती-ए-हिन्द” था। इनका जन्म 1253 ई० में पटियाला(उ०प्र० के एटा जिले में स्थित) में हुआ था।खुसरो के पिता एक तुर्की शरणार्थी थे।

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बलबन के पुत्र राजकुमार महमूद खाँ के समय में अमीर खुसरो(amir khusro) ने स्वयं कवि का पद ग्रहण किया और उसकी मृत्यु के बाद बलबन से लेकर गयासुद्दीन तुगलक तक अमीर खुसरो ने आठ सुल्तानों का शासन देखा था प्रारम्भ में वह बलबन के सबसे बड़े पुत्र मुहम्मद की सेवा में रहा। इसके पश्चात् वह कैकूबाद, क्यूमर्स, अलाउद्दीन खिलजी, जलालुद्दीन खिलजी, मुबारक खिलजी, खुसरवशाह तथा गयासुद्दीन तुगलक तक के शासन काल को अपने आँखों से देखा तथा इनकी सेवा में रहा। सभी सुल्तानों का संरक्षण प्राप्त करता रहा।

अपने जीवन के अन्तिम दिनों में उसने संसार छोड़ दिया और शेख निजामुद्दीन औलिया का शिष्य हो गया। अमीर खुसरो (amir khusro)ने बहुत कुछ लिखा है। कहा जाता है कि उसने 4 लाख से अधिक पद लिखे थे।

  • अमीर खुसरो (amir khusro) पहला मुस्लिम कवि है जिसने हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया और जिसने भारतीय काव्य-परम्परा को ग्रहण किया। उसकी महत्त्वपूर्ण रचनाओं में तुगलकनामा, खजियन-उल-फतूह और तारीख-ए-अलाई आते हैं।
  • अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण अभियान के समय उसके साथ गया था। निजामुद्दीन औलिया ने अमीर खुसरो (amir khusro) को तुर्कल्लाह की उपाधि दी थी। इसकी मृत्यु 1325 ई० में निजामुद्दीन औलिया के मृत्यु के दूसरे दिन गयासुद्दीन तुगलक के समय में हुई।
  •  सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने अपनी फारसी रचनाओं में भारतीय मुहावरों एवं प्रचलित शब्दों का प्रयोग कर उसे भारतीय पर्यावरण के अनुसार ढालने का सफल प्रयास किया।
  • अमीर खुसरो (amir khusro)पहला व्यक्ति था| जिसने हिन्दी, हिन्दवी और फारसी में एक साथ लिखा। अमीर खुसरो (amir khusro) को खड़ी बोली के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है।
  • खुसरो की हिन्दवी रचनाओं की भाषा ठेठ खड़ी बोली तथा ब्रज है। उसने ठेठ खड़ी बोली का प्रयोग पहेलियों, मुकरियों आदि के रूप में किया है।
  • अमीर खुसरो (amir khusro)फारसी कविता का भारतीयकरण करने वाला प्रथम कवि था। यह भारत की तुलना स्वर्ग के उद्यानों से करता है। वह कहता है कि “मैं भारतीय तुर्क हूँ और तुम्हें हिन्दवी में उत्तर दे सकता हूँ। अरबी की बात करने के लिए मेरे पास मिश्री-शक्कर नहीं है।”
  • साहित्य के अतिरिक्त संगीत के क्षेत्र में भी अमीर खुसरो का महत्वपूर्ण योगदान है। उसने भारतीय और पारशियन (ईरानी) रागों का सुन्दर मिश्रण किया और एक नवीन रागशैली इमान, जिल्फ, साजगरी आदि को जन्म दिया।
  • उसने फारसी-अरबी मूल के कई राग जैसे-एमन व घोर आदि भारतीय संगीत में शामिल किया तथा भारतीय कव्वाली में एक नवीन शैली को जोड़ा।
  • अमीर खुसरो ने अनेक काव्यात्मक शैलियों में हिन्दी का प्रयोग किया और फारसी की एक नयी शैली सृष्टि की, जो सबक-ए-हिन्दी अर्थात् हिन्दुस्तानी की शैली के नाम से प्रसिद्ध हुई।

भारत की तत्कालीन समाज पर दृष्टि डालते हुए- सल्तनत काल में गरीब व असहाय किसानों के बारे में अमीर खुसरो ने लिखा है कि- “राजकीय मुकुट का प्रत्येक मोती गरीब किसान की अश्रुपूरित आँखों से गिरी हुई रक्त की घनीभूत बूंद है।” अमीर खुसरो की इस कथन को मोरलैण्ड ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है।

प्रसिद्ध रचनाएं:-           

अमीर खुसरो की प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार हैं:- 

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किरान-उस सदायम(Qiran-us-Sadain):-

 अमीर खुसरो(amir khusro)की यह पहली मसनवी है जो 1289 ई० में लिखी गयी इस किताब  में बुगरा खाँ व उसके बेटे कैकूबाद के मिलन का वर्णन है। इसमें दिल्ली, उसकी इमारतों, शाही दरबार, अमीरों व अधिकारियों के सामाजिक जीवन के बारे में वर्णन है।

मिफ्ता उल-फुतुह (miftah-ul-futuh):-

इसकी रचना 1291 ई० में जलालुद्दीन खिलजी के संरक्षण में हुई । इसमें जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों, मलिक छज्जू का विद्रोह व उसका दमन, रणथम्भौर पर सुल्तान की चढ़ाई और झायन की विजय का वर्णन है।

खजाइनुल फुतुह(khazain-ul-futuh):-

इस किताब को तारीख-ए-अलाई भी कहा जाता है। इस किताब में  अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल के प्रथम सोलह वर्षों तक की घटनाओं तथा अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत के सैनिक अभियानों व उसके गुजरात, चित्तौड़, मालवा तथा वारंगल की विजयों का उल्लेख है।अपनी रचना खजाइनुल-फुतुह में शतरंज के बारे में वर्णन किया और इसके अनुसार इस खेल का आविष्कार भारत में हुआ |

आशिका(ashiqah):-

इस किताब में गुजरात के राजा करन की पुत्री देवल रानी और अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र खाँ की प्रेमगाथा का वर्णन है। इसमें  अलाउद्दीन खिलजी की गुजरात तथा मालवा विजय व मंगोलों द्वारा स्वयं अपने कैद किए जाने का वर्णन किया है। आशिका काव्य शैली में लिखित ग्रन्थ है। अमीर खुसरो ने इसे अलाउद्दीन खिलजी के पुत्र खिज्र खाँ के आदेश पर लिखा था।

नूह-सिपिहर(nuh sipihr):-

इस ग्रन्थ में खुसरो ने भारत की तुलना स्वर्ग के उद्यानों से की है।इसमें अलाउद्दीन खिलजी के पुत्र मुबारकशाह खिलजी का चाटुकारितापूर्वक वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ में अमीर खुसरो ने मुबारक खिलजी की विजयों के साथ-साथ भारत की जलवायु, पशु-पक्षियों तथा धार्मिक जीवन का रोचक विवरण दिया है। 

तुगलकनामा(tughlaq nama):-

काव्य शैली में लिखित अमीर खुसरो (amir khusro)की यह अन्तिम ऐतिहासिक मसनवी है। इसमें खुसरव शाह व गयासुद्दीन तुगलक के मध्य कुटनीति व युद्ध तथा गयासुद्दीन तुगलक द्वारा दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त करने का विवरण है। 

एजाज-ए-खुसरवी(ejaz e khusrawi):-

इसमें धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के बारे में विशेषकर सूफी मत से सम्बन्धित जानकारी मिलती है।

निस्सन्देह भारतीय कवियों में बहुत उच्च स्थान अमीर खुसरो(amir khusro) को प्राप्त है। उसने 4 लाख से अधिक पद लिखे थे। वही पहला मुस्लिम कवि है जिसने हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया और जिसने भारतीय काव्य-परम्परा को ग्रहण किया। 

बिम्बिसार कौन थे | bimbisar kaun tha | इतिहास और विरासत

बिम्बिसार कौन थे (bimbisar kaun tha) प्राचीन भारत के इतिहास में राजा बिम्बिसार एक ऐसे शासक का नाम है, जिन्होंने एक छोटे से जनपद को शक्तिशाली साम्राज्य बनाने की नींव रखी। वे हर्यक वंश (Haryanka Dynasty) के संस्थापक थे और मगध (आधुनिक बिहार) के राजा थे। उनका शासनकाल लगभग 544 ई.पू. से 492 ई.पू. तक माना जाता है।

 bimbisar kaun tha

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बिम्बिसार गौतम बुद्ध और महावीर जैन के समकालीन थे। वे न केवल एक कुशल योद्धा और कूटनीतिज्ञ थे, बल्कि बौद्ध तथा जैन धर्म के बड़े संरक्षक भी थे। जैन ग्रंथों में उन्हें श्रेणिक (Shrenika) या सेनिय के नाम से जाना जाता है।

उनकी दूरदर्शिता के कारण मगध बाद में नंद वंश और मौर्य साम्राज्य जैसे महान साम्राज्यों का केंद्र बना।

प्रारंभिक जीवन और राज्यारोहण :-

बिम्बिसार का जन्म लगभग 558 ई.पू. हुआ था। उनके पिता का नाम भट्टिय (Bhattiya) था, जो मगध का एक छोटा शासक थे। मात्र 15 वर्ष की आयु में बिम्बिसार सिंहासन पर बैठे और लगभग 52 वर्ष तक शासन किया |

उन्होंने अपनी राजधानी राजगृह (आधुनिक राजगीर, बिहार) को मजबूत बनाया। राजगृह पहाड़ियों से घिरा होने के कारण प्राकृतिक सुरक्षा कवच था। कुछ स्रोतों के अनुसार, चीनी यात्री Xuan Zang के अनुसार बिम्बिसार ने राजगृह शहर का निर्माण करवाया था।

कूटनीति और राज्य विस्तार :-

बिम्बिसार ने युद्ध से ज्यादा विवाह संबंधों (matrimonial alliances) के जरिए राज्य विस्तार किया। उनकी प्रमुख रानियाँ थीं:

  •  कोसलदेवी — कोसल नरेश प्रसेनजित की बहन। इस विवाह से काशी क्षेत्र मगध को दहेज में मिला और कोसल के साथ मैत्री स्थापित हुई।
  •  चेल्लना — वैशाली की लिच्छवी राजकुमारी।
  •  अन्य रानियाँ जैसे अंग की राजकुमारी और क्षेमा आदि।

सैन्य अभियानों में उन्होंने अंग (आधुनिक भागलपुर क्षेत्र) पर विजय प्राप्त की। अंग के राजा ब्रह्मदत्त को हराकर उन्होंने मगध की पूर्वी सीमा मजबूत की और व्यापार मार्ग खोले।

उनके शासन में मगध गंगा घाटी का सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया। उन्होंने पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) की नींव भी रखी, जो बाद में मगध की राजधानी बनी।

प्रशासनिक सुधार और उपलब्धियाँ :-

  • बिम्बिसार एक कुशल प्रशासक थे। उन्होंने:
  •  कुशल कर संग्रह प्रणाली विकसित की।
  •  जासूसी व्यवस्था (spy system) मजबूत की।
  •  सेना को संगठित किया।
  •  कृषि और व्यापार को बढ़ावा दिया।

उनके समय में मगध की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई और लोहे के संसाधनों का उपयोग बढ़ा।

बुद्ध और महावीर से संबंध :-

बिम्बिसार गौतम बुद्ध के सबसे बड़े संरक्षक थे। जब बुद्ध ज्ञान प्राप्त कर राजगृह आए, तो बिम्बिसार ने उन्हें वेणुवन (Bamboo Grove) दान में दिया। यह बौद्ध संघ का पहला विहार था।

वे स्वयं बुद्ध के उपदेश सुनते थे और बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। जैन परंपरा के अनुसार वे महावीर जैन के भी भक्त थे और जैन मुनियों का सम्मान करते थे।

उनके संरक्षण में बौद्ध और जैन दोनों धर्मों का प्रसार हुआ। राजगृह उस समय धार्मिक और बौद्धिक केंद्र बन गया।

दुखांत अंत: पुत्र के हाथों कैद और मृत्यु :-

बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु (Ajatashatru) ने देवदत्त (बुद्ध के चचेरे भाई) के प्रभाव में आकर पिता के विरुद्ध साजिश रची। अजातशत्रु ने पिता को कैद कर सिंहासन छीन लिया।

बौद्ध परंपरा के अनुसार अजातशत्रु ने बिम्बिसार की हत्या कर दी।
जैन परंपरा में कहा जाता है कि बिम्बिसार ने कैद में आत्महत्या कर ली।

आज भी राजगीर में बिम्बिसार की जेल के खंडहर मौजूद हैं, जहाँ से वे गृद्धकूट पर्वत पर बुद्ध को ध्यान करते देखते थे। बाद में अजातशत्रु को पछतावा हुआ और वह भी बौद्ध धर्म की ओर मुड़ा।

विरासत :-

बिम्बिसार ने मगध को वह मजबूत आधार दिया, जिस पर अजातशत्रु, नंद और मौर्य साम्राज्य खड़े हुए। वे प्राचीन भारत के पहले ऐसे शासक थे, जिनकी ऐतिहासिकता बौद्ध, जैन और पुराण साहित्य में मिलती है।

उनकी कूटनीति, धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक कौशल आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने साबित किया कि बुद्धिमानी और दूरदृष्टि से छोटा राज्य भी महान साम्राज्य बन सकता है।

निष्कर्ष :-

राजा बिम्बिसार सिर्फ एक योद्धा या राजा नहीं थे। वे एक दूरदर्शी शासक, बुद्ध के सच्चे भक्त और मगध साम्राज्य के सच्चे निर्माता थे। आज बिहार के राजगीर में उनके नाम से जुड़े स्थल — वेणुवन, बिम्बिसार की जेल, गृद्धकूट आदि — हजारों पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करते हैं।

उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सत्ता की लालसा कितनी खतरनाक हो सकती है, और धार्मिक सहिष्णुता तथा कूटनीति कितनी शक्तिशाली।

मोहनजोदड़ो | हड़प्पा सभ्यता | सिन्धु सभ्यता

 

सिन्धु सभ्यता का सबसे उपयुक्त नाम हड़प्पा सभ्यता है क्योंकि सबसे पहले हड़प्पा स्थल ही खोजा गया थासन् 1921 में दयाराम साहनी को सिन्धु सभ्यता की खोज का श्रेय दिया जाता हैइस सभ्यता का काल हाल के शोधों के आधार पर 3500 ई.पू. माना जाता है जबकि उत्खनन के आधार पर इसकी तिथि 2500 ई.पू. निर्धारित की गई है फिर भी इसकी तिथि सर्वमान्य रूप से 2350 से 1750 ई.पू. निर्धारित की गई है। 

सिन्धु सभ्यता को प्रथम नगरीय क्रान्ति कहा जाता है सिन्धु सभ्यता के अवशेष जहाँ कहीं भी मिले वे अत्यंत विकसित अवस्था में मिले अतः इसके आदि और अंत का पता एक यक्ष प्रश्न की भाँति बना है |

हड़प्पा सभ्यता एक बृहत त्रिभुजाकार रूप में विकसित थी। इस सभ्यता का- 

  • सबसे पूर्वी किनारा – आलमगीरपुर (यू.पी.),  हिंडन नदी के किनारे                                            
  • पश्चिमी किनारा – सुत्कारोंडोर (पाकिस्तान), दाश्क नदी के किनारे                                                
  •  उत्तरी किनारा – माण्डा (जम्मू कश्मीर), चिनाव नदी के किनारे                                                         
  •  दक्षिणी किनारा – दैमाबाद (महाराष्ट्र),  गोदावरी नदी के किनारे 

हड़प्पा सभ्यता

और पढ़े :- वैदिक साहित्य | ऋग्वेद | सामवेद | यजुर्वेद | अथर्ववेद

हड़प्पा सभ्यता से सम्बद्ध प्रमुख नगर निम्नलिखित हैं- 

1- हड़प्पा :-

(मान्टगोमरी जिला (आधुनिक शाहिवाल )पाकिस्तान, रावी नदी के किनारे बांयें तट पर)

  • सर्वप्रथम उल्लेख – चार्ल्स मेसन
  • खोजकर्ता – दयाराम साहनी (जान मार्शल के निर्देशन पर)
  • वर्ष – सन् 1921 ई

. हड़प्पा सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता / सैंधव सभ्यता :-

  • क्षेत्रफल की दृष्टि से यह सिंधु सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा स्थल हैइसके दुर्ग टीले को AB नाम दिया गया हैदुर्ग के बाहर 6 मीटर ऊंचे टीले को 7 नाम दिया गया हैइसी टीले पर अन्नागार, अनाज कूटने के वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं। 
  • एक कब्रिस्तान हड़प्पा नगर दक्षिणी दिशा में मिलता है जिसे समाधि R-37 नाम दिया गया । 
  • यहाँ पर 6-6 की दो पंक्तियों में निर्मित कुल 12 कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष प्राप्त हुआ। 
  • हड़प्पा का नगर लगभग 5 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में विस्तृत है जिनमें मुख्यतया दो टीले पूर्व तथा पश्चिम मिलते हैंपूर्वी टीले पर नगर जबकि पश्चिमी टीले पर दुर्ग निर्मित था । 
  • सिन्धु सभ्यता की अभिलेख युक्त मोहरें सबसे अधिक हड़प्पा सभ्यता से ही प्राप्त हुई हैं। 

चन्हूदड़ो:-

स्थिति सिन्ध प्रान्त, पाकिस्तान, (सिन्धु नदी के बायें तट पर        खोजकर्त्ता एन. जी. मजूमदार (सन् 1931 ई.) 

साक्ष्य जो प्राप्त हुये – 

  • मनके बनाने का कारखाना । 
  • एक ऐसी मुद्रा जिस पर तीन घड़ियाल और दो मछलियों की आकृतियाँ हैंवक्राकार ईंटें । 
  • लिपिस्टिक, काजल, कंघा, उस्तरा आदि । 
  • चन्हूदड़ों में सिंधु संस्कृति के बाद झूकर संस्कृति तथा झांगर संस्कृति विकसित हुई।
  • चन्हूदड़ो एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ पर मिट्टी की पकी हुई पाइपनुमा नालियों का प्रयोग किया गया। 
  • यहाँ प्राक् हड़प्पा संस्कृति जिसे झूकर संस्कृति तथा भाँगर संस्कृति कहते हैं, का भी अवशेष प्राप्त हुआ है। 

लोथल नगर :-

  • स्थिति अहमदाबाद, गुजरात, भोगवा नदी के किनारे                   
  •  खोजकर्त्ता एस. आर. राव                                             
  •  वर्ष – सन् 1954 
  •  इसे लघु हड़प्पा या लघु मोहन जोदड़ो भी कहा जाता है|
  • इसका अर्थ मृतकों का टीला है । 
  • लोथल में भी पकी ईंटों से बना एक विशाल आकार का स्थापत्य प्राप्त हुआ है जिसे एस. आर. राव ने बन्दरगाह / गोदीवाड़ा (डाकमार्क) बताया हैयह एक नहर द्वारा भोगवा नदी से सम्बद्ध थाइस प्रकार यह गोदीवाड़ा के साक्ष्य वाला प्राचीनतम स्थल है। 
  • इस नगर की जल प्रबंधन व्यवस्था सबसे उत्तम थी। 
  • चन्हूदड़ो की भाँति लोथल से भी भनके बनाने का कारखाना प्राप्त हुआ हैलोथल में भाण्डागार के भी साक्ष्य मिले हैं। 
  • यह हड़प्पा कालीन सभ्यता का एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था । 

(2) मोहनजोदड़ो :-

  • स्थित – लरकाना जिला, पाकिस्तान, सिन्धु नदी के दाहिने तट पर    
  • खोजकर्त्ता – रखाल दास बनर्जी 
  •  वर्ष – सन् 1922 ई. 
  •  इसे मृतकों का टीला या नखलिस्तान या  सिन्धु का बाग कहा जाता है
  •  यह सैन्धव सभ्यता का सबसे बड़ा नगर था जिसकी जनसंख्या सबसे अधिक थी। 
  • यह नगर भी पूर्व तथा पश्चिम दो भागों में विभक्त था । 
  • मोहनजोदड़ो का तात्पर्य हैप्रेतों का टीला ” | मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल विशाल स्नानागार है जबकि सबसे बड़ी इमारत अन्नागार या अन्नकोठार है|
  • यहाँ से एक विशाल भवन मिला है जिसे पुरोहित आवास कहा गया हैयहाँ से मिली नर्तकी की कांसे की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है । 
  • मोहनजोदड़ो का नगर नियोजन “ग्रिड प्रणाली” पर आधारित था। 
  • बृहत् स्नानागार सामान्य जनता के लिये था और इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठान संबंधी स्नान के लिये किया जाता थाइसे जान मार्शल ने तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया है। 

जुड़वां राजधानियाँ  

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो एक दूसरे से 482 किलोमीटर दूर सिन्धु नदी द्वारा जुड़े थेस्टुअर्ट विग्गर महोदय ने इन दोनों नगरों को सिन्धु सभ्यता की जुड़वाँ राजधानियाँ कहा है । 

कालीबंगा :-

  • स्थिति राजस्थान, सरस्वती नदी / घग्घर नदी के तट पर 
  • खोजकर्त्ता – अमलानन्द घोष 
  • वर्ष –  सन् 1951 ई.
  • कालीबंगा का तात्पर्य है “काले रंग की चूड़ियाँ । 
  •  यहाँ जुते हुये खेत के साक्ष्य मिलते हैं यहाँ खेतों में चना और सरसों को एक साथ बोये जाने का संकेत मिलता है। 
  • यहाँ से भूकम्प के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं 
  • कालीबंगा के दुर्गटीले के दक्षिणी भाग में मिट्टी और कच्ची ईंटों के बने हये 5-6 चबूतरे मिले हैं जिनके ऊपर कई अग्निकुण्ड या आयताकार वेदिकायें बनी हैं। 
  • यहाँ से अण्डाकार कब्रें एक युगल शवाधान के भी साक्ष्य मिले हैं।         
  • यहाँ एक बच्चे की खोपड़ी में 6 छिद्र किये जाने का प्रमाण मिला है। इसे शल्य क्रिया का प्राचीनतम उदाहरण माना जाता है। 
  • कालीबंगा के मकान कच्ची ईंटों के बने हैंनगर टीलों से अलंकृत ईंटों के प्रयोग के प्रमाण मिले हैं। 
  • कालीबंगा में जल निकास प्रणाली का अभाव था यहाँ पर निर्मित अग्नि- कुण्ड से पशुओं और हिरणों की हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं जिससे यहाँ पशुबलि दिये जाने के संकेत मिलते हैं। 

धौलावीरा :-

  • स्थिति – कच्छ, गुजरात 
  • खोजकर्त्ता जे. पी. जोशी (सन 1967-69 ई.)                         
  • साक्ष्य – एक पुराना कुआँ 
  • हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम (क्रीड़ागार), नेवले की पत्त्थर की मूर्ति, विशाल जलाशय (सबसे आश्चर्यजनक), पालिशदार श्वेत पाषाण खण्ड बड़ी संख्या में प्राप्त हुये हैं 
  • यह भारत में स्थित सिन्धु सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा नगर हैजबकि भारत में स्थित सबसे बड़ा नगर है। 
  • यहाँ के उत्खनन से हड़प्पा संस्कृति के तीन चरणों का पता चला है। 

 बनवाली :-

  • स्थिति – हिसार, हरियाणा 
  • खोजकर्त्ता – आर. एस. बिष्ट 
  • वर्ष – सन् 1974 ई. 
  • यहाँ से भी कई मकानों से अग्निवेदियाँ मिली हैं। बनवाली में सिन्धु सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता जल-निकास प्रणाली का अभाव था। यहाँ से प्राक् हड़प्पा, हड़प्पा एवं हड़प्पोत्तर काल के प्रमाण प्राप्त हुये हैं । 

राखीगढ़ी :-

  • स्थिति हरियाणा के जीन्द जिले में अवस्थित । 
  • भारत में सैन्धव सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल हैइसकी खोज सूरज भानु द्वारा की गईयह घग्घर नदी के तट पर स्थित है। 

रोपड़ :-                                                                                 

  •  पंजाब प्रान्त में रोपड़ सतलुज नदी के बायें तट पर स्थित है। 
  • यहाँ के एक कब्रिस्तान से मनुष्य के साथ पालतू कुत्ते को दफनाये जाने का साक्ष्य मिला है। 
  • हरियाणा के हिसार जिले में स्थित कुणाल से चाँदी के दो मुकुट प्राप्त हुये हैं
  • गुजरात के कच्छ के रण में अवस्थित सुरकोटदा के खोजकर्ता जगपति जोशी हैंयहाँ से घोड़े की अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं । 
  •  पाकिस्तान में अवस्थित अल्लाहदीनों एक बन्दरगाह नगर था। 
  • आलमगीरपुर . प्र. के मेरठ जिले में हिण्डन नदी के किनारे अवस्थित है इसकी खोज यज्ञदत्त शर्मा द्वारा की गई। 
  • कुन्तासी गुजरात के राजकोट जिले में अवस्थित हैयह एक बन्दरगाह नगर था । 

मनुस्मृति | manusmriti | विवाद क्यों

मनुस्मृति हिंदू धर्म के प्राचीन धर्मशास्त्रों (कानूनी ग्रंथों) में सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित ग्रंथ है। इसे ‘मानव धर्मशास्त्र’ भी कहा जाता है।

मनुस्मृति

यह हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में सबसे प्रमुख एवं सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है और हिन्दू समाज और सभ्यता के लोकमान्य स्वरूप को प्रकट करता हैसंक्षेप में, मनुस्मृति हिन्दू सामाजिक व्यवस्था का आधार है मनुस्मृति की मूल रचना मौर्योत्तर युग में शुंग काल में हुई । 

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 मनुस्मृति के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु :-

1. परिचय और रचना:-

लेखक:- पारंपरिक रूप से इसके रचयिता ऋषि मनु को माना जाता है, जिन्हें संसार का प्रथम पुरुष और विधि-विधाता कहा गया है।                   

 समय:- इतिहासकारों के अनुसार इसकी वर्तमान विषय-वस्तु लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच संकलित की गई थी।

संरचना:- इसमें कुल 12 अध्याय और 2684 श्लोक हैं।

2. मुख्य विषय-वस्तु:-

मनुस्मृति में जीवन के लगभग हर पहलू के लिए नियम दिए गए हैं:

वर्ण व्यवस्था:- समाज को चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में विभाजित कर उनके कर्तव्यों का निर्धारण। मनुस्मृति में शूद्रों के लिये सेवा करने की बात कही गई है

 आश्रम व्यवस्था:- जीवन को चार चरणों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) में बाँटने का निर्देश।

 संस्कार:- जन्म से लेकर मृत्यु तक के 16 संस्कारों का वर्णन।

राजधर्म:- राजा के कर्तव्य, शासन व्यवस्था, दंड विधान और न्याय प्रणाली की व्याख्या।

3. सामाजिक और कानूनी महत्व:-

प्राचीन कानून:- इसे भारत का प्रथम व्यवस्थित ‘विधि ग्रंथ’ (Law Book) माना जाता है। मध्यकाल में कई राजाओं ने इसके आधार पर न्याय व्यवस्था चलाई।

स्त्री और परिवार:- इसमें परिवार की संरचना और संपत्ति के अधिकारों की चर्चा है। इसमें एक प्रसिद्ध श्लोक है: “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता वास करते हैं)।

मनु ने ब्राह्मण को शुद्ध कन्या के साथ विवाह की अनुमति दी है लेकिन नियोग प्रथा की निन्दा की है। 

4. विवाद और आलोचना:-

आधुनिक युग में मनुस्मृति की कुछ आलोचनाएँ भी होती हैं, जिसके मुख्य कारण हैं:

 जातिगत भेदभाव:- कुछ अध्यायों में शूद्रों के लिए कठोर दंड और असमान सामाजिक व्यवस्था का समर्थन किया गया है।

 लैंगिक असमानता:- कई विद्वान मानते हैं कि इसमें महिलाओं की स्वतंत्रता पर कुछ पाबंदियाँ लगाई गई हैं। मनुस्मृति में स्त्रियों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं दिया गयाइसके अतिरिक्त इसमें विधवाओं के लिये मुण्डन की बात कही गई है। 

 डॉ. बी.आर. अंबेडकर:- समानता के अधिकारों के विरोध में होने के कारण 25 दिसंबर 1927 को डॉ. अंबेडकर ने ‘महाड सत्याग्रह’ के दौरान मनुस्मृति का दहन किया था।

निष्कर्ष:-

मनुस्मृति केवल एक कानूनी किताब नहीं है, बल्कि यह अपने समय के भारतीय समाज का एक व्यापक प्रतिबिंब है। यह प्राचीन भारत की संस्कृति, दर्शन और नैतिकता को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है।

याज्ञवल्क्य स्मृति मनुस्मृति की अपेक्षा अधिक सुव्यवस्थित एवं संक्षिप्त है इसी स्मृति ने स्त्रियों को सर्वप्रथम सम्पत्ति का अधिकार प्रदान कियानारद स्मृति मूलतः गुप्त कालीन रचना हैनारद स्मृति में स्वर्ण मुद्राओं के लिये “दीनार” शब्द का प्रयोग किया गया है

विष्णु स्मृति मूलतः गुप्त कालीन रचना मानी जाती है जोकि गद्य में रचित है देवल स्मृति की रचना पूर्वमध्यकाल में हुईइसे मूलतः विधि विषयक नहीं माना जाता क्योंकि इसमें उन हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में शामिल करने का विधान मिलता था जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था। 

वैदिक साहित्य | ऋग्वेद | सामवेद | यजुर्वेद | अथर्ववेद

वैदिक साहित्य से हमारा तात्पर्य चारों वेद (ऋग्वेद,सामवेद,यजुर्वेद,अथर्ववेद) विभिन्न ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक एवं उपनिषदों से है। उपवेद अत्यंत परवर्ती (बाद के) होने के कारण वैदिक साहित्य के अंग नहीं माने जाते हैं। इन्हें वैदिकोत्तर साहित्य के अन्तर्गत रखा जाता है। वैदिक साहित्य श्रुति नाम से विख्यात है। श्रुति का अर्थ है सुनकर लिखा हुआ साहित्य। यह वह साहित्य है जो मनुष्यों द्वारा लिखा नहीं गया अपितु जिन्हें ईश्वर ने ऋषियों को आत्म ज्ञान देकर उनकी रचना की है। इसलिये इन्हें अपौरुषेय और नित्य कहा जाता है।

ऋग्वेद

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पहले के तीन वेदों ऋग्वेद सामवेद और यजुर्वेद को वेदत्रयी कहा जाता है। अथर्ववेद इसमें सम्मिलित नहीं है क्योंकि इसमें यज्ञ से भिन्न लौकिक विषयों का वर्णन है।

1- ऋग्वेद :-

ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं –
1. ऐतरेय ब्राह्मण
2. कौषीतकी ब्राह्मण
ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों के गद्य भाग हैं जिनके द्वारा वेदों को समझने में सहायता मिलती है।

आरण्यक:-

आरण्यक शब्द का अर्थ वन में लिखा जाने वाला और इन्हें वन-पुस्तक कहा जाता है। इनमें दार्शनिक सिद्धान्तों और रहस्यवाद का वर्णन है। ये कर्मयोग तथा ज्ञानमार्ग के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
ऋग्वेद के दो आरण्यक हैं-
1. ऐतरेय
2. कौषीतकी

उपनिषद :-

ये वेदों के अंतिम भाग हैं। अत: इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। कुल उपनिषदों की संख्या 108 है परन्तु इनमें से 10 उप- निषद ही विशेष महत्त्व के हैं।
ऋग्वेद के दो उपनिषद हैं-
1- ऐतरेय,
2- कौषीतकी

  • ऋग्वेद में मदिरापान को अधार्मिकता एवं अपराधप्रेरक बताया गया है।
  •  ऋग्वेद में राजा को पुरायभेत्ता, गोपजनस्य कहा गया है।
  • ऋग्वेद में पुरोहितों की संख्या सात बतायी गयी है।
  • ऋग्वेद में वर्णित देवताओं में प्रमुख इन्द्र थे ।
  • ऋग्वेद में उल्लिखित सरस्वती नदी की अवेस्ता में उल्लिखित हेलमन्द नदी
    से समता स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
  • भारतीय ग्रंथ ऋगवेद की तुलना ईरानी भाषा में लिखित जेन्द अवेस्ता से की जाती है।
  • ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु है।
  • ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती है।
  • ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदीतम (सर्वश्रेष्ठ नदी) कहा गया है।
  • ऋग्वेद में उल्लेख नहीं मिलता चावल व नमक |
  • ऋग्वेद में आर्य शब्द का उल्लेख 36 बार किया गया है।
  • जुआरियों पर शोकगीत का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
  • ऋग्वेद में सोमयज्ञ का उल्लेख मिलता है !

2- सामवेद :-

साम‘ का अर्थ है गायन । इसमें कुल मंत्रों की मौलिक
संख्या 1549 है। इन मंत्रों में इसके मात्र 75 मंत्र ही हैं, शेष मंत्र ऋग्वेद से लिये गये हैं। अतः इसे ऋग्वेद से अभिन्न माना जाता है। सप्तस्वरों (सा रे गा मा पा ) का उल्लेख सामवेद में ही मिलता है।
सामवेद की मुख्यतः तीन शाखायें हैं.
1- कौथुम
2- राणायनीय
3- जैमिनीय

सामवेद के मूलतः दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं-                                                   1- ताण्ड्य
2- जैमिनीय 

सामवेद के दो आरण्यक हैं-                                                                1- जैमिनीय आरण्यक                                                                     2- छान्दोग्यारण्यक 

सामवेद के दो उपनिषद हैं-
1- छान्दोग्य उपनिषद
2- जैमिनीय उपनिषद 

छान्दोग्य उपनिषद सबसे प्राचीन उपनिषद् माना जाता है। देवकी के पुत्र कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख इसी उपनिषद में है।

3- यजुर्वेद :-

यह एक कर्मकाण्डीय वेद है। इसमें विभिन्न यज्ञों से
संबंधित अनुष्ठान विधियों का उल्लेख है । यजुर्वेद की दो शाखायें हैं –
1- शुक्ल यजुर्वेद,
2- कृष्ण यजुर्वेद

  • शुक्ल यजुर्वेद का केवल एक ब्राह्मण ग्रन्थ – शतपथ ब्राह्मण है ।
  • शतपथ ब्राह्मण सबसे प्राचीन तथा सबसे बड़ा ब्राह्मण ग्रन्थ माना जाता है।
  • कृष्ण यजुर्वेद का भी एक ब्राह्मण ग्रन्थ है जिसका नाम तैत्तरीय ब्राह्मण है।
  • यजुर्वेद के कई उपनिषद हैं, इनमें प्रमुख हैं-
    “बृहदारण्यक उपनिषद, कठोपनिषद, ईशोपनिषद आदि ।
  • यजुर्वेद के आरण्यक है- वृहदारण्यक, तैत्तिरीय और शतपथ ।

4- अथर्ववेद :-

चारों वेदों में यही वेद सर्वाधिक लोकप्रिय था। इस
वेद में 20 अध्याय, 731 सून और 6000 मंत्र हैं।

इस वेद में वशीकरण, जादू टोना, मारण, भूतप्रेतों आदि के मंत्र तथा नाना प्रकार की औषधियों का वर्णन है। इसमें जनसाधारण के लोकप्रिय विश्वासों और अंधविश्वासों का वर्णन है। इसकी अधिकांश ऋचायें दुरात्माओं या प्रेतात्माओं से मुक्ति का मार्ग बताती हैं।
अथर्ववेद की दो शाखायें हैं।
1-शौनक,
2- पिप्पलाद ।

  • अथर्ववेद का मात्र एक ही ब्राह्मण ग्रंथ है– गोपथ ब्राह्मण |
  • अथर्ववेद का कोई आरण्यक नहीं है।
  • अधर्ववेद के तीन उपनिषद हैं –
    1- मुण्डकोपनिषद,
    2- माण्डूक्योपनिषद,
    3 प्रश्नोपनिषद
  • मान्डूक्योपनिषद सभी उपनिषदों में छोटा है।                                                                                                                           

    वैदिक साहित्य से संबंधित विविध स्मरणीय :-                            

  •  मान्डूक्योपनिषद सभी उपनिषदों में छोटा है।                           
  • “सत्यमेव जयते “ मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
  • मुण्डकोपनिषद में यज्ञों को टूटी फूटी नौकाओं के समान कहा गया है।        
  • शतपथ ब्राह्मण में पुनर्जन्म का सिद्धान्त, पुरुरवा – उर्वशी आख्यान, राम- कथा आदि का वर्णन किया गया है।
                                                                                       
  • “अधिक अन्न उपजाओ” वाक्यांश तैत्तरीय उपनिषद में मिलता है।
  • यम और नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद का वर्णन कठोपनिषद में मिलता है।
                                                                                       
  • अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
  • राजा की उत्पत्ति का सिद्धान्त सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।
  • राजसूय यज्ञ का विस्तृत वर्णन शतपथ ब्राह्मण में मिलता है ।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को ही समस्त दुखों का कारण माना गया है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण से पता चलता है कि उत्तर वैदिक काल में क्षत्रियों की स्थिति ब्राह्मणों से श्रेष्ठ थी।
  • शतपथ ब्राह्मण में स्त्री को अर्द्धांगिनी कहा गया है ।
  • छांदोग्य उपनिषद में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है।
  • जाबालोपनिषद में सर्वप्रथम चारों आश्रमों का एक साथ उल्लेख मिलता है।
  • पुत्री को ऐतरेय ब्राह्मण में समस्त  दुखों का कारण माना गया है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में राजत्त्व की दैवीय उत्पत्ति ” के सिद्धान्त का उल्लेख मिलता है।
  • जुताई से सम्बन्धित कर्मकाण्डों का वर्णन शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।
  •  पुत्र परिवार का रक्षक हैं” यह उक्ति ऐतरेय ब्राह्मण में मिलती है।

 

  • चारों वर्णों के कर्मों के विषय में जानकारी ऐतरेय ब्राह्मण में प्राप्त होती है।
  • उपनिषदों में पशुबध, यज्ञ अनुष्ठान एवं कर्मकाण्डीय व्यवस्था के विरुद्ध
    आवाज उठायी गयी है।
  • पत्नी ही गृह है अर्थात जायेदस्तम्/ नामक उक्ति का उल्लेख ऋग्वेद में है |
  • शूद्र शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद के दसवें मण्डल में मिलता है।
  • सोमयज्ञ का विशद उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
  • ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं मिलता है।
  • ऋग्वेद के दसवें मण्डल में गंगा तथा राजन्य का उल्लेख मिलता है।

 

  • ऋग्वेद में पिता शब्द 335 बार, माता शब्द 234 बार, इन्द्र 250 बार, अग्नि 200 बार, जन 275 बार, गंगा 1 बार, जमुना 2 बार, सूर्य 10 बार, बाह्मण 15 बार, क्षत्रिय 9 बार, वैश्य तथा शूद्र 1-1 बार प्रयोग हुआ है।
  • ऋग्वेद में यज्ञ कर्मकाण्डो मे पूजारी ‘होता’ कहलाता था।
  • सामवेद में मत्रों का गायन करने वाला उद्गाता कहलाता था।
  • यजुर्वेद के कर्मकांड को संपन्न करने वाले पुरोहित को अध्वर्यु कहा जाता था।
  • अथर्ववेद के मत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता था।

नूरजहाँ(NUR JAHAN) 31 मई 1577| एक महान शासिका

 

नूरजहाँ के पिता मिर्जा ग्यास बेग जो तेहरान के निवासी और तातार सुल्तान, खोरासान के बेलगार बेगी के बजीर ख्वाजा मोहम्मद शरीफ का पुत्र था । 

मिर्जा ग्यास बेग के समक्ष विषम परिस्थितियों के कारण यह अपना भाग्य आजमाने के लिए भारत आने के लिए विवश हुआ |

मलिक मसूद जो कि धनी व्यापारी था उसके संरक्षण में भारत की यात्रा पर निकलाजब यह कन्धार पहुँचा तो इसकी पत्नी ने एक पुत्री को  जन्म दिया। 

नूरजहाँ

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  • भारत मे मालिक मसूद द्वारा अकबर के समक्ष ग्यास बेग का परिचय एक ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति रूप में कराया गया और इसी व्यक्तित्व के कारण बेग काबुल के दीवान के उच्च पद पर आसीन हुआ |
  • 17 वर्ष की आयु मे मेहरुन्निसा का विवाह फारस के एक साहसी युवक अली कुली बेग इस्तगलू दिया गयाजिसे बंगाल में एक जागीर और शेर अफगन की उपाधि से नवाजा गया |
  • शेर अफगन के विद्रोही हो जाने के कारण जहाँगीर द्वारा बंगाल के नये राज्यपाल कुतुबुद्दीन को इसे अपने अधीनस्थ करने के लिए भेजा गया |
  • इस अभियान में कुतुबुद्दीन शेर अफगन के हाथो मारा गया तथा स्वयं शेअफगन  कुतुबुदीन के अंगरक्षको द्वारा मारा गया। 
  • शेर अफगन की विधवा मेहरुन्निसा को 1607 ई. मे आगरा लाया गया और इसे सुल्ताना सलीमा बेगम के संरक्षण मे छोड़ दिया गया । 
  • 1611 ई.मे जहाँगीर ने मेहरुन्निसा से विवाह कर उसे नूर महल की उपाधि प्रदान  की जो कालांतर मे नूरजहाँ अर्थात संसार का प्रकाश में बदल दी गई। 
  • 1613 ई. में नूरजहाँ को पट्टमहिषी अथवा बादशाह बेगम कहा गया
  • नूरजहाँ द्वारा विवाह के बाद “नूरजहाँ गुट’ बनाया गया। 

नूरजहाँ का चरित्र:- 

  • विवाह के समय जहाँगीर की आयु 42 वर्ष तथा नूरजहाँ की आयु 34 वर्ष थी। 
  • नूरजहाँ एक सुन्दर शिक्षित तथा तीक्ष्ण बुद्धि वाली महिला थी |
  • जिसे कविता संगीत और चित्रकला का शौक था। 
  • नूरजहाँ द्वारा कविताएं लिखना, पुस्तकालय निर्माण वस्त्र, श्रृंगार और आभूषणों आदि के नयेनये डिजाइन बनवाना । 
  • जहांगीर से विवाह के समय नूरजहाँ द्वारा पहनी गयी नूरमहली’ पोशाक हरम की महिलाओं में लोकप्रिय रही। 
  • नूरजहाँ एक धैर्यवान और साहसी महिला थी इसे शासन में रुचि समस्याओं को हल करने की धार्मिक, सदाचारी कुशलता, चरित्रवान, निर्धनो की सहायता, करुणा, उदारता, आदि गुणो से परिपूर्ण थी। 
  • शासन में रुचि होने के कारण नूरजहाँ द्वारा शासन मे हस्तक्षेप किया गया जिससे सत्ता अपने हाथ मे रखने का प्रयास किया गया। 

नूरजहाँ का राजनीति और इतिहास पर प्रभाव :- 

  • जहांगीर से विवाह के बाद नूरजहाँ इसकी प्रमुख बेगम बन गई फलस्वरूप इसके द्वारा अपने पिता मिर्जा गियास बेग ( जिसे बाद मे एत्मादुद्दौला की उपाधि मिली) भाई आसफखाँ अन्य रिश्तेदारों को उच्च पद प्रदान किए गए। 
  • नूरजहाँ की स्वीकृति लेने के बाद ही उस समय किसी भी महिला को भूमि दान में दी जा सकती थी
  • नूरजहाँ के द्वारा  जहांगीर के साथ झरोखा दर्शन में प्रतिभाग करनासिक्कों पर नाम लिखा जाना, आदेश पत्रो पर बादशाह के हस्ताक्षरों के  साथ साथ नूरजहाँ का नाम लिखना, आदि शासन में किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय की स्वीकृति बिना नूरजहाँ की स्वीकृति के सम्भव थी अर्थात सत्ता नूरजहाँ के हाथो मे चली गई थी । 
  • नूरजहाँ द्वारा विवाह के कुछ ही वर्षो बाद नूरजहाँ गुट बनाया गया जिसमें नूरजहाँ, एत्मादुद्दौला (पिता) अस्मत बेगम (माँ) आसफ खाँ (भाई) तथा शाहजादा खुर्रम शामिल थे। 
  • शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) का विवाह नूरजहाँ द्वारा अपने भाई आसफखां  की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम से किया गया। 
  • 1621 मे लाडली बेगम (शेर अफगन नूरजहाँ की पुत्री) का विवाह शाहजादा शहरयार से कर दिया गया। 
  • नूरजहाँ का मानना था कि शाहजहाँ एक अहंवादी व्यक्ति है- जो सत्ता का बंटबारा नही चाहेगा, इसलिए वह शाहजादा शहरयार को बादशाह बनाने के पक्ष मे थी
  • शहरयार एक दुर्बल चरित्र अल्पायु होने के कारण सत्ता नूरजहाँ के हाथों मे रह सकती थी। 
  • 1626 ई. में महाबत खाँ ने विद्रोह किया और उसने बादशाह जहाँगीर को व्यक्तिगत रूप से बन्दी बनाकर नूरजहाँ के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयत्न  किया । 
  • शाहजहाँ के द्वारा किये गए  विद्रोह का  कारण नूरजहाँ की सत्ता प्रियता थीं।