भारतीय इतिहास में मध्यकालीन युग के दौरान कई विदेशी आक्रमणकारी आए, लेकिन महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) का नाम उन शासकों में प्रमुख है जिसने अपनी सैन्य शक्ति और लूटपाट के जरिए भारत की संपत्ति और मंदिरों को भारी नुकसान पहुँचाया। अधिकांश इतिहासकारों, विशेषकर हेनरी इलियट के अनुसार, गजनवी ने सन् 1000 से 1027 ई० के बीच भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए।
इस लेख में हम महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) के उन सभी 17 आक्रमणों, उनके पीछे के वास्तविक उद्देश्यों और भारत पर पड़े उनके दीर्घकालिक प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

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महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) कौन था?
महमूद गजनवी, सुबुक्तगीन का पुत्र था और गजनी (वर्तमान अफगानिस्तान) का शासक था। वह एक कुशल सेनापति और कूटनीतिज्ञ था, जिसका मुख्य लक्ष्य अपने मध्य एशियाई साम्राज्य को मजबूत करने के लिए धन एकत्रित करना था।
महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi)के भारत पर प्रमुख आक्रमणों का विवरण :-
हेनरी इलियट के मत का समर्थन करते हुए, यहाँ गजनवी के उन आक्रमणों की सूची दी गई है जिन्होंने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी:-
प्रथम आक्रमण (1000 ई०): सीमावर्ती नगरों पर प्रहार :-
गजनवी का पहला हमला भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती नगरों पर हुआ। उसने हिन्दुशाही राज्य के कुछ दुर्गों को जीता और अपनी शक्ति का अहसास कराकर वापस गजनी लौट गया।
दूसरा आक्रमण (1001 ई०): राजा जयपाल से संघर्ष:-
यह आक्रमण हिन्दुशाही राजा जयपाल के विरुद्ध था। पेशावर के पास हुए भीषण युद्ध में जयपाल पराजित हुए। महमूद ने उन्हें बंदी बनाया और बाद में 25 हाथी तथा 2,50,000 दीनार लेकर मुक्त किया। इस पराजय के अपमान को सहन न कर पाने के कारण राजा जयपाल ने आत्मदाह कर लिया।
तीसरा आक्रमण (1004 ई०):-
1004 ई० मे भेजा (वर्तमान उच्छ) के राजा बजरा को पराजित किया। यह आक्रमण राजा जयपाल के विरुद्ध बजरा द्वारा सैनिक सहायता न दिए जाने के कारण किया गया था |
चौथा आक्रमण (1005 ई०):-
1005 ई० मुल्तान पर आक्रमण कर वहाँ के शासक फतह दाऊद को हराया। यहाँ उसने जयपाल के पौत्र सुखपाल को ‘नौशाशाह’ के नाम से शासक नियुक्त किया, जिसने इस्लाम स्वीकार कर लिया था।
पांचवा आक्रमण (1008 ई०):-
महमूद गजनवी का यह आक्रमण राजा सुखपाल के विरुद्ध किया गया क्योकि ,सुखपाल द्वारा पुनः हिन्दू धर्म अपनाने के कारण गजनवी ने उसे बंदी बनाया।
छठा आक्रमण (1008 ई.) :-
यह आक्रमण 1008 ई० में जयपाल के पुत्र आनन्दपाल के विरुद्ध युद्ध हुआ, जिसमें महमूद की जीत हुई। महमूद के द्वारा मुल्तान पर आक्रमण किये जाने के समय आनंदपाल द्वारा बाधा पहुचने के कारण यह आक्रमण किया गया था |
सातवां आक्रमण (1009 ई.) :-
इस आक्रमण का मुख्य कारण आनंदपाल को पराजित करने के बाद युद्ध की लूट में कुछ ही हाथी मिले कोई विशेष धन नहीं प्राप्त हुआ इसी भूख को मिटाने के लिए 1009 ई. में कांगड़ा के पहाड़ी प्रदेश नगरकोट पर आक्रमण किया। यहां बहुत सा हिंदुओं का धन एकत्रित था इस किले से अपार धन मिला।कांगड़ा के नगरकोट मंदिर से उसे अपार सोना-चांदी प्राप्त हुआ।
आठवां आक्रमण (1010 ई.) :-
महमूद गजनवी द्वारा मुल्तान के शासक दाऊद को पहले पराजित किया गया था लेकिन उसके द्वारा अधीनता स्वीकार कर लेने के बाद पुनः शासक बनाया गया लेकिन 1010 ईस्वी में दाऊद द्वारा विद्रोह किए जाने के कारण यह आक्रमण किया गया।
नौवां आक्रमण (1011-1012 ई.):-
थानेश्वर के चक्रस्वामी मंदिर को लूटा गया, जिससे उसकी धार्मिक कट्टरता उजागर हुई।
दसवां आक्रमण (1012 ई०) :-
- 1012 ई० में महमूद गजनवी ने त्रिलोचन पाल पर दसवां आक्रमण किया।
- आनंदपाल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र त्रिलोचन पाल गद्दी पर बैठा।
- त्रिलोचन पाल ने अपने पुत्र भीमपाल के सुझाव पर महमूद गजनवी का विरोध करने की नीति अपनाई।
- भीमपाल ने मर्गला दर्रे में किलाबंदी कर महमूद की सेना को रोकने का प्रयास किया।
- महमूद गजनवी ने मर्गला दर्रे को जीतकर नंदन दुर्ग पर चढ़ाई कर दी।
- त्रिलोचन पाल और भीमपाल कश्मीर भाग गए तथा वहाँ के राजा संग्राम राज से सहायता मांगी।
- कश्मीरी मंत्री तुंग को महमूद गजनवी के विरुद्ध सहायता के लिए भेजा गया।
- तोसी (पुंछ क्षेत्र की आधुनिक तोही) नदी के किनारे महमूद गजनवी और कश्मीर-त्रिलोचन पाल की संयुक्त सेनाओं के बीच युद्ध हुआ।
- 1018-19 ई० में रामगंगा नदी के किनारे त्रिलोचन पाल ने महमूद गजनवी का सामना किया, लेकिन वह पराजित हुआ।
- 1021-22 ई० में त्रिलोचन पाल की हत्या कर दी गई, जिससे शाही वंश का अंत हो गया; उसका पुत्र भीमपाल 1026 ई० तक लोहर क्षेत्र में शासन करता रहा।
ग्यारवाँ आक्रमण (1015-16 ई.) :-
महमूद गजनवी द्वारा (1015-16 ई.) में कश्मीर मे प्रवेश करने का प्रयास किया गया लेकिन भौगोलिक स्थितियों के कारण वह लोहकोट से आगे नहीं बढ़ सका।
बारहवाँ आक्रमण (1018 ई०) :-
- महमूद गजनवी ने 1018 ई० में कन्नौज पर बारहवाँ आक्रमण किया।
- उस समय कन्नौज भारतीय साम्राज्य की प्रमुख राजधानी थी।
- कन्नौज पर उस समय गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक राज्यपाल का शासन था।
- महमूद ने पहली बार गंगा नदी घाटी में प्रवेश किया।
- कन्नौज अभियान के दौरान उसने बटन, महावन, मथुरा और वृन्दावन पर आक्रमण किया।
- बरन (बुलन्दशहर) के शासक हरदत्त ने भयभीत होकर महमूद की अधीनता स्वीकार कर ली।
- हरदत्त ने अपने कुछ साथियों सहित इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।
- महावन में यदुवंशी शासक कुलचन्द ने वीरतापूर्वक महमूद का सामना किया, लेकिन पराजित हुआ।
- सम्मान की रक्षा के लिए कुलचन्द ने अपनी दोनों पत्नियों की हत्या कर स्वयं आत्महत्या कर ली।
- महमूद ने मन्दिरों की नगरी मथुरा पर आक्रमण कर भारी लूटमार की और अपार धन प्राप्त किया।
चौदहवां आक्रमण :-
- मथुरा और वृंदावन पर आक्रमण: मथुरा को लूटने के बाद महमूद ने वृंदावन पर हमला किया और वहां से उसे लूट में अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई।
- कन्नौज पर चढ़ाई: वृंदावन के बाद महमूद कन्नौज की ओर बढ़ा। उस समय वहां गुर्जर-प्रतिहार वंश के अंतिम शासक राज्यपाल का शासन था।
- राजा राज्यपाल का पलायन: महमूद के डर से राजा राज्यपाल बिना युद्ध किए ही कन्नौज छोड़कर गंगा के पूर्वी किनारे पर स्थित बारी नामक स्थान पर भाग गया।
- कन्नौज की लूट: राजा के भाग जाने के बाद महमूद ने कन्नौज शहर में जमकर लूटपाट की।
- मन्झावन का युद्ध: कन्नौज के बाद महमूद ने कानपुर के निकट मन्झावन पर आक्रमण किया, जिसे ‘ब्राह्मणों के किले’ के रूप में जाना जाता था। यहाँ उसे कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा।
- 25 दिनों का संघर्ष: मन्झावन में 25 दिनों तक चले लंबे संघर्ष के बाद अंततः महमूद को विजय प्राप्त हुई।
- वापसी की राह और अन्य जीत: गजनी लौटते समय महमूद ने मार्ग में पड़ने वाले असी और सिरसावा (सहारनपुर के पास) के किलों को भी जीता और अपार धन के साथ वापस लौट गया।
पन्द्रहवाँ आक्रमण (1021-22 ई.) :-
- महमूद गजनवी पुनः भारत आया और इस बार उसने पंजाब पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने का निश्चय किया।
- प्रत्यक्ष शासन की स्थापना : महमूद ने पंजाब में प्रत्यक्ष शासन (Direct Rule) स्थापित करने का उद्देश्य रखा, जिसके लिए भारत में एक सैनिक केंद्र बनाने की योजना बनाई।
- पंजाब का सामरिक महत्व : पंजाब का क्षेत्र विजय के बाद शासन के लिए उपयुक्त था, इसलिए महमूद ने इसे अपना आधार बनाया।
- स्थानीय सिक्कों को अपनाया : महमूद गजनवी ने पंजाब के प्रचलित शाही सिक्कों को ही अपनाया।
- घुड़सवार तथा नंदी चिन्ह : उसने सिक्कों पर पहले से प्रचलित “घुड़सवार तथा नंदी” का चिन्ह रखा।
- संस्कृत शिलालेख : सिक्कों पर संस्कृत भाषा में “आव्यक्तमेकं अवतार महमूद” (महमूद एक अवतार है) खुदवाया गया।
- दिल्लीवाला सिक्का : महमूद गजनवी ने सर्वप्रथम भारतीय ढंग के सिक्के जारी किए, जिनका वजन 56 ग्रेन था और जो “दिल्लीवाला” नाम से प्रसिद्ध हुए।
सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण\सोलहवां आक्रमण (1025-1026 ई०) :-
यह महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) का 16वाँ और सबसे प्रसिद्ध आक्रमण था। उसने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ शिव मंदिर को निशाना बनाया। उस समय वहाँ का राजा भीमदेव था। मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त कर उसने वहां से अकल्पनीय धन-दौलत लूटी।
- 1025-26 ई. में महमूद गजनवी ने विशाल सेना के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। यह उसके सबसे प्रसिद्ध अभियानों में से एक था।
- सोमनाथ मंदिर गुजरात में स्थित था और भारत के सबसे प्रमुख एवं धनवान शिव मंदिरों में से एक था।
- मंदिर में अत्यधिक धन-संपत्ति होने के कारण महमूद इसे लूटने आया था।
- महमूद गजनवी मुल्तान के रास्ते काठियावाड़ पहुंचा और फिर अनहिलवाड़ा (काठियावाड़ की राजधानी) पहुंचा।
- अनहिलवाड़ा का शासक भीमदेव बिना युद्ध किए भाग गया। महमूद ने बिना विरोध के शहर को लूट लिया।
- महमूद ने सोमनाथ मंदिर पर कब्जा कर लिया, मंदिर को ध्वस्त कर दिया और अपार धन-राशि लूट ली।
- लूट की अपार संपत्ति के साथ महमूद सिंध के रेगिस्तान से गुजरकर गजनवी लौटा। मार्ग में जातियों ने उसे काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन वह सुरक्षित वापस पहुंच गया।
सत्रहवां अंतिम आक्रमण (1027 ई०) :-
1027 ई. में अंतिम आक्रमण: महमूद गजनवी ने 1027 ई. में भारत पर अपना अंतिम (17वां) आक्रमण किया, जिसमें उसने जाटों और खोखरों को दंड देने के लिए कार्रवाई की।
- सोमनाथ मंदिर को लूटकर वापस जाते समय सिंध के जाटों और खोखरों ने महमूद की सेना को भारी क्षति पहुँचाई थी।
- प्रतिशोध स्वरूप महमूद ने खोखरों पर आक्रमण कर उन्हें कोटोरता से समाप्त कर दिया।
महमूद गजनवी ने कुल 17 बार भारत पर आक्रमण किया। - उसने गुजरात से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक के क्षेत्रों को रौंदा और अनेक भारतीय शासकों को पराजित किया।
- महमूद का मुख्य उद्देश्य साम्राज्य स्थापित करना नहीं, बल्कि धन लूटना था, जिसमें वह पूरी तरह सफल रहा।
- उसके आक्रमणों का एकमात्र स्थायी प्रभाव पंजाब, सिंध और मुल्तान को गजनवी साम्राज्य में मिलाना था।
- महमूद के आक्रमणों ने भारत की राजनैतिक और सैनिक दुर्बलता को उजागर किया।
महमूद गजनवी की मृत्यु 1030 ई. में हुई।
गजनवी के आक्रमणों के वास्तविक उद्देश्य :-
इतिहासकारों के अनुसार: गजनवी के भारत आने के पीछे तीन मुख्य कारण थे:
अतुलनीय धन की प्राप्ति: वह भारत को ‘सोने की चिड़िया’ मानकर यहाँ के मंदिरों और नगरों को लूटना चाहता था।
धर्म का प्रचार: वह अपनी कट्टरपंथी छवि के जरिए मध्य एशिया में ‘इस्लाम के रक्षक’ के रूप में पहचान बनाना चाहता था।
सैन्य शक्ति का प्रदर्शन: भारत से लूटे गए धन का उपयोग उसने अपनी गजनी सेना को आधुनिक बनाने में किया।
भारत पर आक्रमणों का परिणाम और प्रभाव :-
धन की भारी निकासी: भारत की सदियों से संचित संपत्ति गजनी चली गई।
राजनैतिक कमजोरी: इन आक्रमणों ने साबित कर दिया कि भारतीय राजाओं में एकता का अभाव था।
मुस्लिम शासन की नींव: पंजाब, सिंध और मुल्तान को गजनी साम्राज्य में मिलाकर उसने भविष्य के मुस्लिम शासकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
कला और संस्कृति का विनाश: मथुरा और सोमनाथ जैसे प्राचीन सांस्कृतिक केंद्रों को अपूरणीय क्षति हुई।
निष्कर्ष :-
महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi)एक क्रूर लुटेरा था या एक महान विजेता, यह इतिहासकारों के बीच बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उसके आक्रमणों ने भारत को गहरे घाव दिए। 1030 ई० में उसकी मृत्यु के साथ ही गजनवी साम्राज्य का पतन शुरू हो गया, लेकिन उसके द्वारा छोड़ी गई राजनैतिक अस्थिरता ने भारत का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।












