वैदिक साहित्य | ऋग्वेद | सामवेद | यजुर्वेद | अथर्ववेद

वैदिक साहित्य से हमारा तात्पर्य चारों वेद (ऋग्वेद,सामवेद,यजुर्वेद,अथर्ववेद) विभिन्न ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक एवं उपनिषदों से है। उपवेद अत्यंत परवर्ती (बाद के) होने के कारण वैदिक साहित्य के अंग नहीं माने जाते हैं। इन्हें वैदिकोत्तर साहित्य के अन्तर्गत रखा जाता है। वैदिक साहित्य श्रुति नाम से विख्यात है। श्रुति का अर्थ है सुनकर लिखा हुआ साहित्य। यह वह साहित्य है जो मनुष्यों द्वारा लिखा नहीं गया अपितु जिन्हें ईश्वर ने ऋषियों को आत्म ज्ञान देकर उनकी रचना की है। इसलिये इन्हें अपौरुषेय और नित्य कहा जाता है।

ऋग्वेद

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पहले के तीन वेदों ऋग्वेद सामवेद और यजुर्वेद को वेदत्रयी कहा जाता है। अथर्ववेद इसमें सम्मिलित नहीं है क्योंकि इसमें यज्ञ से भिन्न लौकिक विषयों का वर्णन है।

1- ऋग्वेद :-

ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं –
1. ऐतरेय ब्राह्मण
2. कौषीतकी ब्राह्मण
ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों के गद्य भाग हैं जिनके द्वारा वेदों को समझने में सहायता मिलती है।

आरण्यक:-

आरण्यक शब्द का अर्थ वन में लिखा जाने वाला और इन्हें वन-पुस्तक कहा जाता है। इनमें दार्शनिक सिद्धान्तों और रहस्यवाद का वर्णन है। ये कर्मयोग तथा ज्ञानमार्ग के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
ऋग्वेद के दो आरण्यक हैं-
1. ऐतरेय
2. कौषीतकी

उपनिषद :-

ये वेदों के अंतिम भाग हैं। अत: इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। कुल उपनिषदों की संख्या 108 है परन्तु इनमें से 10 उप- निषद ही विशेष महत्त्व के हैं।
ऋग्वेद के दो उपनिषद हैं-
1- ऐतरेय,
2- कौषीतकी

  • ऋग्वेद में मदिरापान को अधार्मिकता एवं अपराधप्रेरक बताया गया है।
  •  ऋग्वेद में राजा को पुरायभेत्ता, गोपजनस्य कहा गया है।
  • ऋग्वेद में पुरोहितों की संख्या सात बतायी गयी है।
  • ऋग्वेद में वर्णित देवताओं में प्रमुख इन्द्र थे ।
  • ऋग्वेद में उल्लिखित सरस्वती नदी की अवेस्ता में उल्लिखित हेलमन्द नदी
    से समता स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
  • भारतीय ग्रंथ ऋगवेद की तुलना ईरानी भाषा में लिखित जेन्द अवेस्ता से की जाती है।
  • ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु है।
  • ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती है।
  • ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदीतम (सर्वश्रेष्ठ नदी) कहा गया है।
  • ऋग्वेद में उल्लेख नहीं मिलता चावल व नमक |
  • ऋग्वेद में आर्य शब्द का उल्लेख 36 बार किया गया है।
  • जुआरियों पर शोकगीत का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
  • ऋग्वेद में सोमयज्ञ का उल्लेख मिलता है !

2- सामवेद :-

साम‘ का अर्थ है गायन । इसमें कुल मंत्रों की मौलिक
संख्या 1549 है। इन मंत्रों में इसके मात्र 75 मंत्र ही हैं, शेष मंत्र ऋग्वेद से लिये गये हैं। अतः इसे ऋग्वेद से अभिन्न माना जाता है। सप्तस्वरों (सा रे गा मा पा ) का उल्लेख सामवेद में ही मिलता है।
सामवेद की मुख्यतः तीन शाखायें हैं.
1- कौथुम
2- राणायनीय
3- जैमिनीय

सामवेद के मूलतः दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं-                                                   1- ताण्ड्य
2- जैमिनीय 

सामवेद के दो आरण्यक हैं-                                                                1- जैमिनीय आरण्यक                                                                     2- छान्दोग्यारण्यक 

सामवेद के दो उपनिषद हैं-
1- छान्दोग्य उपनिषद
2- जैमिनीय उपनिषद 

छान्दोग्य उपनिषद सबसे प्राचीन उपनिषद् माना जाता है। देवकी के पुत्र कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख इसी उपनिषद में है।

3- यजुर्वेद :-

यह एक कर्मकाण्डीय वेद है। इसमें विभिन्न यज्ञों से
संबंधित अनुष्ठान विधियों का उल्लेख है । यजुर्वेद की दो शाखायें हैं –
1- शुक्ल यजुर्वेद,
2- कृष्ण यजुर्वेद

  • शुक्ल यजुर्वेद का केवल एक ब्राह्मण ग्रन्थ – शतपथ ब्राह्मण है ।
  • शतपथ ब्राह्मण सबसे प्राचीन तथा सबसे बड़ा ब्राह्मण ग्रन्थ माना जाता है।
  • कृष्ण यजुर्वेद का भी एक ब्राह्मण ग्रन्थ है जिसका नाम तैत्तरीय ब्राह्मण है।
  • यजुर्वेद के कई उपनिषद हैं, इनमें प्रमुख हैं-
    “बृहदारण्यक उपनिषद, कठोपनिषद, ईशोपनिषद आदि ।
  • यजुर्वेद के आरण्यक है- वृहदारण्यक, तैत्तिरीय और शतपथ ।

4- अथर्ववेद :-

चारों वेदों में यही वेद सर्वाधिक लोकप्रिय था। इस
वेद में 20 अध्याय, 731 सून और 6000 मंत्र हैं।

इस वेद में वशीकरण, जादू टोना, मारण, भूतप्रेतों आदि के मंत्र तथा नाना प्रकार की औषधियों का वर्णन है। इसमें जनसाधारण के लोकप्रिय विश्वासों और अंधविश्वासों का वर्णन है। इसकी अधिकांश ऋचायें दुरात्माओं या प्रेतात्माओं से मुक्ति का मार्ग बताती हैं।
अथर्ववेद की दो शाखायें हैं।
1-शौनक,
2- पिप्पलाद ।

  • अथर्ववेद का मात्र एक ही ब्राह्मण ग्रंथ है– गोपथ ब्राह्मण |
  • अथर्ववेद का कोई आरण्यक नहीं है।
  • अधर्ववेद के तीन उपनिषद हैं –
    1- मुण्डकोपनिषद,
    2- माण्डूक्योपनिषद,
    3 प्रश्नोपनिषद
  • मान्डूक्योपनिषद सभी उपनिषदों में छोटा है।                                                                                                                           

    वैदिक साहित्य से संबंधित विविध स्मरणीय :-                            

  •  मान्डूक्योपनिषद सभी उपनिषदों में छोटा है।                           
  • “सत्यमेव जयते “ मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
  • मुण्डकोपनिषद में यज्ञों को टूटी फूटी नौकाओं के समान कहा गया है।        
  • शतपथ ब्राह्मण में पुनर्जन्म का सिद्धान्त, पुरुरवा – उर्वशी आख्यान, राम- कथा आदि का वर्णन किया गया है।
                                                                                       
  • “अधिक अन्न उपजाओ” वाक्यांश तैत्तरीय उपनिषद में मिलता है।
  • यम और नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद का वर्णन कठोपनिषद में मिलता है।
                                                                                       
  • अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
  • राजा की उत्पत्ति का सिद्धान्त सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।
  • राजसूय यज्ञ का विस्तृत वर्णन शतपथ ब्राह्मण में मिलता है ।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को ही समस्त दुखों का कारण माना गया है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण से पता चलता है कि उत्तर वैदिक काल में क्षत्रियों की स्थिति ब्राह्मणों से श्रेष्ठ थी।
  • शतपथ ब्राह्मण में स्त्री को अर्द्धांगिनी कहा गया है ।
  • छांदोग्य उपनिषद में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है।
  • जाबालोपनिषद में सर्वप्रथम चारों आश्रमों का एक साथ उल्लेख मिलता है।
  • पुत्री को ऐतरेय ब्राह्मण में समस्त  दुखों का कारण माना गया है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में राजत्त्व की दैवीय उत्पत्ति ” के सिद्धान्त का उल्लेख मिलता है।
  • जुताई से सम्बन्धित कर्मकाण्डों का वर्णन शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।
  •  पुत्र परिवार का रक्षक हैं” यह उक्ति ऐतरेय ब्राह्मण में मिलती है।

 

  • चारों वर्णों के कर्मों के विषय में जानकारी ऐतरेय ब्राह्मण में प्राप्त होती है।
  • उपनिषदों में पशुबध, यज्ञ अनुष्ठान एवं कर्मकाण्डीय व्यवस्था के विरुद्ध
    आवाज उठायी गयी है।
  • पत्नी ही गृह है अर्थात जायेदस्तम्/ नामक उक्ति का उल्लेख ऋग्वेद में है |
  • शूद्र शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद के दसवें मण्डल में मिलता है।
  • सोमयज्ञ का विशद उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
  • ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं मिलता है।
  • ऋग्वेद के दसवें मण्डल में गंगा तथा राजन्य का उल्लेख मिलता है।

 

  • ऋग्वेद में पिता शब्द 335 बार, माता शब्द 234 बार, इन्द्र 250 बार, अग्नि 200 बार, जन 275 बार, गंगा 1 बार, जमुना 2 बार, सूर्य 10 बार, बाह्मण 15 बार, क्षत्रिय 9 बार, वैश्य तथा शूद्र 1-1 बार प्रयोग हुआ है।
  • ऋग्वेद में यज्ञ कर्मकाण्डो मे पूजारी ‘होता’ कहलाता था।
  • सामवेद में मत्रों का गायन करने वाला उद्गाता कहलाता था।
  • यजुर्वेद के कर्मकांड को संपन्न करने वाले पुरोहित को अध्वर्यु कहा जाता था।
  • अथर्ववेद के मत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता था।

नूरजहाँ(NUR JAHAN) 31 मई 1577| एक महान शासिका

 

नूरजहाँ के पिता मिर्जा ग्यास बेग जो तेहरान के निवासी और तातार सुल्तान, खोरासान के बेलगार बेगी के बजीर ख्वाजा मोहम्मद शरीफ का पुत्र था । 

मिर्जा ग्यास बेग के समक्ष विषम परिस्थितियों के कारण यह अपना भाग्य आजमाने के लिए भारत आने के लिए विवश हुआ |

मलिक मसूद जो कि धनी व्यापारी था उसके संरक्षण में भारत की यात्रा पर निकलाजब यह कन्धार पहुँचा तो इसकी पत्नी ने एक पुत्री को  जन्म दिया। 

नूरजहाँ

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  • भारत मे मालिक मसूद द्वारा अकबर के समक्ष ग्यास बेग का परिचय एक ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति रूप में कराया गया और इसी व्यक्तित्व के कारण बेग काबुल के दीवान के उच्च पद पर आसीन हुआ |
  • 17 वर्ष की आयु मे मेहरुन्निसा का विवाह फारस के एक साहसी युवक अली कुली बेग इस्तगलू दिया गयाजिसे बंगाल में एक जागीर और शेर अफगन की उपाधि से नवाजा गया |
  • शेर अफगन के विद्रोही हो जाने के कारण जहाँगीर द्वारा बंगाल के नये राज्यपाल कुतुबुद्दीन को इसे अपने अधीनस्थ करने के लिए भेजा गया |
  • इस अभियान में कुतुबुद्दीन शेर अफगन के हाथो मारा गया तथा स्वयं शेअफगन  कुतुबुदीन के अंगरक्षको द्वारा मारा गया। 
  • शेर अफगन की विधवा मेहरुन्निसा को 1607 ई. मे आगरा लाया गया और इसे सुल्ताना सलीमा बेगम के संरक्षण मे छोड़ दिया गया । 
  • 1611 ई.मे जहाँगीर ने मेहरुन्निसा से विवाह कर उसे नूर महल की उपाधि प्रदान  की जो कालांतर मे नूरजहाँ अर्थात संसार का प्रकाश में बदल दी गई। 
  • 1613 ई. में नूरजहाँ को पट्टमहिषी अथवा बादशाह बेगम कहा गया
  • नूरजहाँ द्वारा विवाह के बाद “नूरजहाँ गुट’ बनाया गया। 

नूरजहाँ का चरित्र:- 

  • विवाह के समय जहाँगीर की आयु 42 वर्ष तथा नूरजहाँ की आयु 34 वर्ष थी। 
  • नूरजहाँ एक सुन्दर शिक्षित तथा तीक्ष्ण बुद्धि वाली महिला थी |
  • जिसे कविता संगीत और चित्रकला का शौक था। 
  • नूरजहाँ द्वारा कविताएं लिखना, पुस्तकालय निर्माण वस्त्र, श्रृंगार और आभूषणों आदि के नयेनये डिजाइन बनवाना । 
  • जहांगीर से विवाह के समय नूरजहाँ द्वारा पहनी गयी नूरमहली’ पोशाक हरम की महिलाओं में लोकप्रिय रही। 
  • नूरजहाँ एक धैर्यवान और साहसी महिला थी इसे शासन में रुचि समस्याओं को हल करने की धार्मिक, सदाचारी कुशलता, चरित्रवान, निर्धनो की सहायता, करुणा, उदारता, आदि गुणो से परिपूर्ण थी। 
  • शासन में रुचि होने के कारण नूरजहाँ द्वारा शासन मे हस्तक्षेप किया गया जिससे सत्ता अपने हाथ मे रखने का प्रयास किया गया। 

नूरजहाँ का राजनीति और इतिहास पर प्रभाव :- 

  • जहांगीर से विवाह के बाद नूरजहाँ इसकी प्रमुख बेगम बन गई फलस्वरूप इसके द्वारा अपने पिता मिर्जा गियास बेग ( जिसे बाद मे एत्मादुद्दौला की उपाधि मिली) भाई आसफखाँ अन्य रिश्तेदारों को उच्च पद प्रदान किए गए। 
  • नूरजहाँ की स्वीकृति लेने के बाद ही उस समय किसी भी महिला को भूमि दान में दी जा सकती थी
  • नूरजहाँ के द्वारा  जहांगीर के साथ झरोखा दर्शन में प्रतिभाग करनासिक्कों पर नाम लिखा जाना, आदेश पत्रो पर बादशाह के हस्ताक्षरों के  साथ साथ नूरजहाँ का नाम लिखना, आदि शासन में किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय की स्वीकृति बिना नूरजहाँ की स्वीकृति के सम्भव थी अर्थात सत्ता नूरजहाँ के हाथो मे चली गई थी । 
  • नूरजहाँ द्वारा विवाह के कुछ ही वर्षो बाद नूरजहाँ गुट बनाया गया जिसमें नूरजहाँ, एत्मादुद्दौला (पिता) अस्मत बेगम (माँ) आसफ खाँ (भाई) तथा शाहजादा खुर्रम शामिल थे। 
  • शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) का विवाह नूरजहाँ द्वारा अपने भाई आसफखां  की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम से किया गया। 
  • 1621 मे लाडली बेगम (शेर अफगन नूरजहाँ की पुत्री) का विवाह शाहजादा शहरयार से कर दिया गया। 
  • नूरजहाँ का मानना था कि शाहजहाँ एक अहंवादी व्यक्ति है- जो सत्ता का बंटबारा नही चाहेगा, इसलिए वह शाहजादा शहरयार को बादशाह बनाने के पक्ष मे थी
  • शहरयार एक दुर्बल चरित्र अल्पायु होने के कारण सत्ता नूरजहाँ के हाथों मे रह सकती थी। 
  • 1626 ई. में महाबत खाँ ने विद्रोह किया और उसने बादशाह जहाँगीर को व्यक्तिगत रूप से बन्दी बनाकर नूरजहाँ के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयत्न  किया । 
  • शाहजहाँ के द्वारा किये गए  विद्रोह का  कारण नूरजहाँ की सत्ता प्रियता थीं। 

1945 की वेवल योजना (The Wavell Plan) : 

  • 1945 की वेवल योजना (The Wavell Plan),                             क्रिप्स शिष्टमण्डल (Cripps Mission) की असफलता से सभी को निराशा हुईकांग्रेस ने संविधान सभा की माँग के सिवाय ऐसी कोई मांग नहीं की जिससे अंग्रेजों को परेशानी होती। 
  • 1945 की वेवल योजना
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम स्वरूप जापान लगभग भारत द्वार पर खड़ा थाइस कठिन परिस्थिति से बचने के लिए कांग्रेस चुप नही रह सकती थी। 
  • और पढ़े :-चौरी चौरा कांड Chauri Chaura Kand (5 फरवरी 1922)
  •  गांधी जी ने अप्रैल 1942 में अंग्रेजों से “सुव्यवस्थित ढंग से भारत से चले जाने की बात कहीं।” 
  • इसी समय भारत छोडो का नारा प्रसिह हुआ । 
  • अंग्रेजों द्वारा भारत न छोड़ने की स्थिति में महात्मा गांधी के नेतृत्व मे सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाये जाने का प्रस्ताव रखा गया। 
  • गांधी जी और कार्यकारिणी के सदस्‌यों को बंदी बना लिया गयाइसी कारण जगहजगह विद्रोह होने लगा जिससे सैकड़ो व्यक्ति मारे गए और हजारों को जेल में बंद कर दिया गया। 
  • विद्रोह को समाप्त करने हेतु अक्टूबर 1943 में लार्ड लिन निथगो के स्थान पर लाई बेवल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया। 
  • मार्च 1945 को लाई वेवल विचार विमर्श के लिए इंग्लैण्ड गए |
  • 14 जून 945 को बेवल द्वारा विचार विमर्श के परिणाम के बारे मे रेडियो के माध्यम से जनता को अवगत कराया गया । 
  • जब तक नया संविधान बने तब तक वायसराय की कार्यकारिणी के पुनर्गठन का प्रस्ताव रखा गया। इस कार्यकारिणी में गवर्नर जनरल मुख्य सेनापति के अतिरिक्त सभी सदस्य भारतीय नेताओं में से चुने जाएंगे |
  • परिषद में मुसलमान और सवर्ण हिन्दूओं की संख्या बराबरबराबर होगी |
  • गवर्नर जनरल का निषेधाधिकार (Veto) समाप्त नही किया जाएगा लेकिन उसका प्रयोग करना आवश्यक नही होगा। 
  • विदेशी मामले भारतियों को सौंप दिए जाएंगे लेकिन जनजातीय एवं सीमाई मामले छोडकर क्योंकि यह रक्षा विभाग के का भाग माने जाएंगे | 
  • कार्यकारिणी की नियुक्ति के लिए एक सभा बुलाई जाएगी जिसमे सर्वसम्मति से सूची प्रस्तुत की जा सके । 
  • जिन प्रांतो में मंत्रि परिषद भंग हो गई तथा गवर्नर अपने पार्षदों की सहायता से कार्य कर रहे थेवहो भी मिली मुली सरकारें बनाई जाऐगी। 
  • द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन को, निर्णायक जीत हासिल होती  है, तो भारत के लिए नये संविधान निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी। 
  • कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों को जेल से रिहा कर दिया गया तथा शिमला सम्मेलन मे शामिल होने का निमंत्रण दिया गया इससे जनता में एक आशा की किरण जाग्रत हुई। 
  • शिमला सम्मेलन 25 जून 1945 को प्रारंभ हुआ और तीन दिन की कार्यवाही के बाद स्थगित कर दिया गया । 
  • 11 जुलाई 1945 को जिन्ना, लार्ड वेवल से मिलें जिसमें उन्होंने मुस्लिम लीग को ही समस्त मुसलमानों का प्रतिनिधि माना जाए और वायसराय की सूची में मुस्लिम लीग के बाहर के  किसी भी मुसलमान को शामिल न किया जाए। 
  • जिन्ना की इस शर्त को वेबल ने अस्वीकार कर दियाऔर शिमला सम्मेलन को असफल घोषित कर समाप्त करने की घोषणा की। 

रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System) 

रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System) के अनुसार प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी माना गया था ।और राज्य सरकार को भूमि कर देने के लिए उत्तरदायी थाउसे अपनी भूमि को किराये पर देना, गिरवी रखने तथा बेचने को अनुमति थी भूमि स्वामी को  उस समय तक भूमि से वंचित नहीं किया जा सकता था जब तक वह भूमि कर समय से  देता रहे । 

रैयतवाड़ी पद्धति 

और पढ़े :-छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

मद्रास की व्यवस्था –

मद्रास प्रेजीडेन्सी में प्रथम भूमि व्यवस्था बारामहल जिला प्राप्त करने के पश्चात 1792 में की गईकैप्टिन रीने टॉमस मुनरो की सहायता से खेत की अनुमानित आय का लगभग आधा भाग भूमि कर के रूप में निश्चित कियायह कर भूमि को किराये पर लेने में जो कर देना पड़ता उससे  भी अधिक थायही व्यवस्थ अन्य भागों में भी लागू कर दी गई। 

टॉमस मुनरो तथा मद्रास भूव्यवस्था –

टॉमस मुनरो जो मद्रास के 1820 से 1827 तक गवर्नर रहा ,इसने  पुरानी कर व्यवस्था को अनुचित बताया।इसने कुल उपज का तीसरा भाग भूमि कर का आधार मान कर रैयतवाड़ी पद्धति को, स्थाई भूमि व्यवस्था के प्रदेशों को छोड़ कर, बाकी सभी  प्रान्त में लागू कर दिया। कर की देनदारी से देखा जाय तो यह भी किराये पर लेने में जो कर देना पड़ता उससे  भी अधिक ही थादूसरे, भूमि कर क्योंकि धन के रूप में देना पड़ता था तथा इसका वास्तविक उपज अथवा मंडी में प्रचलित भावों से कोई सम्बन्ध नहीं था, इसलिए किसानो पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया। 

मुनरो की भूमि कर व्यवस्था लगभग 30 वर्ष तक चलती रही तथा इसी से उत्पीड़न बड़ा तथा कृषकों की कठिनाइयो में वृद्धि हुई कृषक लोग भूमि कर देने के लिए साहूकारों के जाल  में फंस गएभूमि कर संग्रहण करने के प्रबंध बहुत कड़े थे और इसके लिए प्रायः यातनाएं दी जाती थीं

अंग्रेजी संसद में इन यातनाओं के विषय में प्रश्न पूछे गएइन यातनाओं में भूखों मारना, शौच आदि के लिए जाने देना, मनुष्यों को कुबड़े बना कर बांध देना, घुटनों के पीछे ईंट रख कर बैठा देना, अस्थियों तथा अन्य अपमानजनक वस्तुओं के हार डाल इत्यादि सम्मिलित थे

1855 में कुल उपज का 30 प्रतिशत के आधार पर विस्तृत सर्वेक्षण तथा भूव्यवस्था को योजना लागू की गईवास्तविक कार्य 1861 में आरम्भ हुआ1864 के नियमों के अनुसार राज्य सरकार का भाग भू भाटक का 50 प्रतिशत निश्चित किया गया परन्तु यह नियम केवल कागजी काभूर्यवाही ही रहा तथा प्रशासन का अंग नहीं बना1877-78 के भीषण अकाल में ही मद्रासी कृषकों की वास्तविक स्थिति सामने आई। 

बम्बई में भूमि कर व्यवस्था –

यहां रैयतवाड़ी पद्धति लागू की गई जिससे ज़मींदार अथवा ग्राम सभाएं उनके लाभ को स्वयं हड़प कर जाएं। 

एल्फिन्सटन तथा चैप्लिन की रिपोर्ट –

एल्फिन्सटन 1819-27 तक बम्बई के गवर्नर थेउन्होंने 1819 में पेशवा से विजय किए प्रदेशों पर एक विस्तार रिपोर्ट प्रस्तुत कीउन्होंने मराठा प्रशासन की दो मुख्य बातों की ओर ध्यान दिलाया।                                         (1) ग्राम सभाओं का स्थानीय प्रशासन की इकाई के रूप में अस्तित्व‘       (2) मिरास भूधृति पद्धति का अस्तित्व (मिरासदार वंशानुगत भूमिदार कृषक होते थे जो स्वयं अपनी भूमि जोतते थे तथा राज्य सरकार को निश्चित भूमि कर देते थे)

चैप्लिन जो उस समय आयुक्त था, ने 1821 तथा 1822 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उसने भूमि कर की पुरानी पद्धति का वर्णन किया तथा कुछ मूल्यवान सुझाव दिए । 

प्रिंगल ने 1824-28 तक भूमि का भली भांति सर्वेक्षण किया तथा राज्य का भाग शुद्ध (net) उपज का 55 प्रतिशत निश्चित कियादुर्भाग्यवश अधिकतर सर्वेक्षण दोषपूर्ण थे तथा उपज के अनुमान ठीक नहीं थेफलस्वरूप भूमि कर अधिक निश्चित किया गया तथा कृषकों को बहुत दुःख हुआबहुत से कृषकों ने भूमि जोतनी बंद कर दी तथा बहुत सा क्षेत्र बंजर हो गया। 

 विगनेट का सर्वेक्षण तथा बम्बई में रैयतवाड़ी भूव्यवस्था –

1835 में लैफ्टिनेन्ट विनगेट जो इंजिनियरिंग कोर के पदाधिकारी थे, उन्हें भूमि सर्वेक्षण का अधीक्षक नियुक्त किया गया। उन्होंने 1847 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस पर  गो.ल्डस्मिट, कैप्टिन डेविडसन तथा कैप्टिन विगनेट के हस्ताक्षर थे। 

मुख्य रूप से ज़िले के भूमि कर की मांग उस जिले के इतिहास तथा उस जिले के लोगों की अवस्था अर्थात जनता की देने की शक्ति पर निर्भर थीतत्पश्चात समस्त जिले की मांग को व्यक्तिगत खेतों पर बांटा गया

प्राचीन समानता पर आधारित पद्धति के स्थान पर मांग भूमि की भूगर्भ (geological) अवस्था पर निर्धारित की गईइसके अतिरिक्त कर भूखण्डों पर निश्चित किया गया न कि उस कृषक की समस्त भूमि पर जिससे कोई भी कृषक जिस खेत को चाहे छोड़ सकता था और जिस खेत को चाहे जोत सकता था यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई परन्तु यह भी अधिकतर अनुमानों पर आधारित थी और यह कठोरता की ओर ही झुकी थी । 

पुनः भूव्यवस्था (resettlement) का कार्य 30 वर्ष के पश्चात 1868 में किया गया। अमेरिका के गृहयुद्ध (18 61-65)के कारण कपास के मूल्य बहुत बढ़ गएइस अस्थाई अभिवृद्धि के कारण सर्वेक्षण अधिकारियों को भूमि कर 66 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक बढ़ाने का अवसर मिल गयाकृषकों को न्यायालय में अपील करने का अधिकार नहीं था । 

इस कठोरता के कारण दक्कन में 1875 में कृषि उपद्रव हुए जिससे प्रेरित होकर सरकार ने 1879 में दक्कन राहत अधिनियम (Deccan Agriculturists Relief Act 1879) पारित किया जिससे कृषकों को साहूकारों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया गया परन्तु सब कष्टों के मूल अर्थात सरकार की अधिक भूमि कर की मांग के विषय कुछ नहीं किया गया । 

बम्बई में रैयतवाड़ी पद्धति के दो प्रमुख दोष थे अत्यधिक भूमि कर तथा उसकी अनिश्चितताइसमें अधिक भूमि कर के लिए न्यायालय में अपील करने की अनुमति नहीं थीकलक्टर को अधिकार था कि वह कृषक को भविष्य के लिए भूमि कर की दर बता दे और यह भी कह दे कि यदि उसे यह नई दर स्वीकार नहीं तो वह भूमि छोड़ दे। 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का छिन्नभिन्न होना (Disintegration of Village Economy)

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भूमि कर पद्धतियों का, विशेषकर अत्यधिक कर तथा नवीन प्रशासनिक तथा न्यायिक प्रणाली का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था अस्तव्यस्त हो गई

ग्राम पंचायतों के मुख्य कार्य, भूमि व्यवस्था, तथा न्यायिक कार्य समाप्त हो चुके थे तथा पाटिल अब केवल सरकार की ओर से भूमि कर संग्रहकर्ता ही रह गया थाइस प्रकार ग्रामों की प्राचीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थीभारतीय कुटीर उद्योग लगभग समाप्त हो चुके थे तथा ग्रामों में भूमि का महत्व बढ़ गया

इस नई भू-व्यवस्था से भूमि तथा कृषक दोनों ही चलनशील (mobile) हो गए, जिसके फलस्वरूप ग्रामों में साहूकार तथा अन्यत्रवासी भूमिपति landlords) उत्पन्न हो गए। 

उन्नीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवादी विचारकों का बारबार यही कहना था कि सरकार की भूराजस्व की मांग रैयतवाड़ी तथा ज़मींदारी व्यवस्था, दोनों में अत्यधिक हैभूराजस्व समय पर देने की अवस्था में सरकार ज़मींदारों तथा रैयतवाड़ों की भूमि ज़ब्त कर लेती थी और इसे पुनः नगरवासी व्यापारियों तथा सट्टेबाज़ों को बेच देती थी। 

ये नए लोग जो प्राय: खेतिहर नहीं होते थे, केवल अधिकाधिक किराए की ही चिन्ता करते थे और स्वयं भी प्रायः 

किरायासट्टेबाजों (rent speculators) को ही भूमि किराया संग्रह करने का कार्य भार सौंप देते थे । 

समाज में ज़मींदार तथा साहूकार जिनकी ग्राम निवासियों को अब अधिक आवश्यकता होने लगी थी, बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गएअब ग्रामीण श्रमिक वर्ग (proletariate) जिसमें छोटेछोटे किसान, मुज़ारे तथा भूमिहीन किसान सम्मिलित थे, उनकी संख्या बढ़ गई

सहकारिता के स्थान पर आपसी प्रतिद्वन्द्विता तथा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा पूंजीवाद के पूर्वाकांक्षित तत्व उत्पन्न हो गएअब उत्पादन के नए साधन जिनमें धन की आवश्यकता होती थी, मुद्रा अर्थव्यवस्था (money economy) कृषि का वाणिज्यीकरण

संचार व्यवस्था में सुधार तथा विश्व की मण्डियों के साथ सम्पर्क, इन सभी तत्वों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तथा भारतीय कृषि को एक नया रूप दे दिया। 

गांधी-इरविन समझौता 

गांधी-इरविन समझौता, 25 जनवरी 1931 को गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य सभी प्रमुख नेता बिना शर्त कारावास से रिहा कर दिये गये कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने गांधीजी को वायसराय से चर्चा करने के लिये अधिकृत कियातत्पश्चात 19 फरवरी 1931 को गांधीजी ने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन से भेंट की और उनकी बातचीत पंद्रह दिनों तक चली

इसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे ‘गांधी-इरविन समझौता’ कहा जाता हैइस समझौते ने कांग्रेस की स्थिति को सरकार के बराबर कर दिया इस समझौते में सरकार की ओर से लार्ड इरविन इस बात पर सहमत हुए कि- 

गांधी-इरविन समझौता 

  1. हिंसात्मक अपराधियों के अतिरिक्त सभी राजनैतिक कैदी छोड़ दिये जायेंगे अपहरण की सम्पत्ति वापस कर दी जायेगी । 
  2. विभिन्न प्रकार के जुर्मानों की वसूली को स्थगित कर दिया जायेगा । 
  3. सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र दे चुके भारतीयों के मसले पर सहानुभूतिपूर्वक विचारविमर्श किया जायेगा । 
  4. समुद्र तट की एक निश्चित सीमा के भीतर नमक तैयार करने की अनुमति दी जायेगी । 
  5. मदिरा, अफीम और विदेशी वस्तओं की दुकानों के सम्मुख शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की आज्ञा दी जायेगी । 
  6. आपातकालीन अध्यादेशों को वापस ले लिया जायेगा । 

किन्तु वायसराय ने गांधीजी की निम्न दो मांगे अस्वीकार कर दीं  

(i) पुलिस ज्यादतियों की जांच करायी जाये, तथा 

(ii) भगत सिंह तथा उनके साथियों की फांसी की सजा माफ कर दी जाये

कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने आश्वासन दिया कि-                                                                                                                            (i) सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया जायेगा, तथा               

(ii) कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में इस शर्त पर भाग लेगी कि सम्मेलन में संवैधानिक प्रश्नों के मुद्दे पर विचार करते समय परिसंघ, भारतीय उत्तरदायित्व तथा भारतीय हितों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिये अपरिहार्य मुद्दों पर विचार किया जायेगा (इसके अंतर्गत रक्षा, विदेशी मामले, अल्पसख्यकों की स्थिति तथा भारत की वित्तीय साख जैसे मुद्दे शामिल होंगे) । 

और पढ़े :- चौरी चौरा कांड Chauri Chaura Kand (5 फरवरी 1922)

कामागाटा मारू प्रकरण (1914)

 कामागाटा मारू प्रकरण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस घटना ने पंजाब विद्रोह को विस्फोटक स्थिति मे पहुचाने का कार्य किया था।

कामागाटा मारू प्रकरण

और पढ़े :-भूदान आंदोलन| Bhoodan Aandolan (18 अप्रैल 1951)

पंजाब के एक क्रांतिकारी बाबा गुरदत्त सिंह ने कामागारा मारु जलपान जापान से किराए पर लिया। इसमे 35। पंजाबी सिक्खो और 21 मुसलमानो को सिंगापुर से बैकूबर (कनाडा) ले जाने का प्रयत्न किया गया।

इन लोगो का मानना था कि वह कनाडा मे रहकर सुखमय जीवन व्यतीत करेगे तथा बाद मे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे अपना योगदान देगें ।

कनाड़ा सरकार सरकार ने आंतरिक सुरक्षा कारणो से जहाज पर सवार यात्रियो को बंदरगाह पर उतरने की अनुमति नही दी।

कामागाटा मारु जलयान को मजबूरन लौटना पड़ा और 27 सितम्बर 1914 को पुन: कलकत्ता बंदरगाह पर लौट आया।

जहाज के यात्रियों को पूर्ण विश्वास था कनाडा सरकार ने ब्रिटिश सरकार के दबाव मे जहाज को वापस कर दिया गया ।

कलकत्ता पहुंचते ही गुरदत्त सिंह को गिरफ्तार करने का प्रयास किया गया लेकिन वह भागने मे सफल करने रहे।

गुरुदत्त सिंह के अलावा अन्य यात्रियों को पंजाब भेजने के लिए जबरन ट्रेन पर की बैठाने का प्रयास किया गया। लेकिन थाकियों ने बैठने से मना कर दिया। 

यात्रियों के विरोध करने से पुलिस और यात्रियों के बीच संघर्ष हुआ जिसमें 22 लोग मारे गए। शेष बचे यात्रियों को विशेष ट्रेन से पंजाब भेज दिया गया|

पंजाब पहुचकर इन लोगों द्वारा अनेक डकैतियों को अंजाम दिया गया ।

कामागाटा मारु  घटना और प्रथम विश्व युद्ध  शुरुआत होने से गदर दल के नेता अत्याधिक उत्तेजित हो गए जिसके फलस्वरूप इनके द्वारा अग्रेजो पर हिंसक आक्रमण करने की योजनाएं बनायी गई |

भारतीय गदर दल के नेताओं ने विदेशों में रह रहे भारतीय कांतिकारियों से आग्रह किया कि वह भारत में जाकर ब्रिटिश सरकार से संघर्ष करें।

छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म उस समय हुआ जब भारत में मुगल सत्ता अपने चरम पर थी। मुगल बादशाह औरंगजेब हिन्दू धर्म को अपनी तलवार की दम पर समाप्त करना चाहता था। इस समय अधिकांश राजे-महाराजे दिल्ली दरबार मे सिजदा कर रहे थे। या अपनी रियासतों  की रक्षा के लिए मुगल बादशाह की गुलामी स्वीकार कर चुके थे। इसी समय मात्र 12 वर्ष की उम्र में पिता से प्राप्त पूना  की जागीर से छत्रपति शिवाजी महाराज ने माँ जीजाबाई और अपने गुरु एवं संरक्षक दादाजी कोणदेव की देखरेख/संरक्षण में मुगलों से हिन्दू धर्म की रक्षा करना एक मुख्य उद्देश्य बना लिया था।

छत्रपति शिवाजी

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छत्रपति शिवाजी का प्रारंभिक जीवन :-

20 अप्रैल 1627 ई0 में शिवाजी का जन्म महाराष्ट्र के पूना के उत्तर दिशा
मे स्थित जुन्नाव नगर के निकट शिवनेर के दुर्ग में हुआ था ।

शिवाजी जो कि बाद मे छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध  हुए। इनके पिता का नाम शाह जी भोसले और माता जीजा बाई थी।

जीजाबाई देवगिरि के यादवराज परिवार के महान जागीर दार यादव राय की पुत्री थी ।

शाह जी भोसले अहमदनगर और बीजापुर के राजनैतिक संघर्ष में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। जिससे यह शक्तिशाली और सम्मानित सामन्त थे ।

शाहजी भोसले द्वारा तुकाबाई मोहिते नामक स्त्री से दूसरी शादी की परिणाम स्वरूप जीजाबाई अपने पुत्रा शिवाजी को लेकर पति से अलग रहने लगी ।

शिवाजी बचपन में ही पिता से अलग हो गए लेकिन पिता भोसले र्ने इनकी देखभाल व शिक्षा के लिए बफादार सेवक दादाजी कोंणदेव को नियुक्त कर दिया था।

शिवाजी को पिता शाह जी भोसलें से 12 वर्ष की उम्र में पूजा की जागीर प्राप्त हुई।

12 वर्ष की अल्पायु में शिवाजी का विवाह साईबाई निम्बालकर सें कर दिया गया।

शिवाजी पर उनकी माता जीजाबाई का प्रभाव अधिक था वह स्वभाव से बड़ी धार्मिक थी। इसलिए शिवाजी के चरित्र निर्माण मे धार्मिक रुचि पैदा करने हेतु रामायण, महाभारत तथा अन्य प्राचीन काल के हिन्दू वीरो की कहानियां सुनाया करती थी।

माता जीजाबाई द्वारा शिवाजी से हिन्दुओं की तीन परम पवित्र  वस्तुओं ब्राह्मण, गौ, और जाति की रक्षा के लिए प्रेरित किया गया।

शिवाजी के जीवन संघर्ष का एक मुख्य उद्देश्य एक स्वतंत्र  राज्य की स्थापना करना था। क्योंकि यह किसी मुसलमान शासक के जागीरदार बनकर जीवन व्यतीत करना नही चाहते थे। इस कट्टरता के कारण शिवाजी का मतभेद अपने संरक्षक दादाजी कोणदेव से था।

शिवाजी का मुगल सत्ता को समाप्त करने का उद्देश्य न होकर एक स्वतंक राज्य की स्थापना’ करना था। इसलिए वह मराठी की बिखरी शक्ति को संगठित करके महाराष्ट्र में एक स्वतंत्र  हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहते थे।

छत्रपति शिवाजी के विजय अभियान (conquests):-

1647 ई में शिवाजी के संरक्षक कोंणदेव की मृत्यु के पहले इनके संरक्षण में पूना के आस पास के किलो को जीत लिया गया। हांलाकि  इस कार्य से कोंणदेव सहमत नहीं थे।

20 वर्ष की उम्र में छत्रपति शिवाजी ने अनेक साहसी और योग्य मराठा सरदारों को एकत्रित कर लिया था। जिसमे तुकोजी और नरायन पन्त थे । तथा इनके पिता शाहजी भोसले द्वारा 1639 ई में श्यामजी, नीलकण्ठ, सोनाजी पन्त, बालकृष्ण दीक्षित और रघुनाथ राव बल्लाल जैसे योग्य व्यक्तियों को भेजा गया ।

1643 ई0 में बीजापुर के सिंहगढ़ किले को  शिवाजी द्वारा जीत लिया गया। तथा कुछ समय बाद चाकन, पुरन्दर, बारामती तोर्ना , खूपा, तिकोना, लोहगढ़, रायरी आदि  किलो पर अधिकार कर लिया गया |

शिवाजी द्वारा 1648 में नीलोजी नीलकण्ठ से  पुरन्दर का किला छल द्वारा विजित किया गया।

छत्रपति शिवाजी की जावली विजय:-

25 जनवरी 1656 . में शिवाजी और मराठा सरदार चन्द्रराव के मध्य जावली का युद्ध हुआ । इस युद्ध मे चन्द्रराव की शिवाजी द्वारा हत्या कर दी गई

छत्रपति शिवाजी द्वारा अप्रैल 1656 ई. मे रायगढ़ को अपनी राजधानी
बनाया गया।

छत्रपति शिवाजी का पहली बार मुगलो से सामना:-

1657 ई. में मुगल शाहजादा औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण किया। बीजापुर के शासक आदिलशाह ने शिवाजी से सहायता मांगी।

दक्षिण में मुगलो की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए शिवाजी
ने बीजापुर की सहायता की। तथा मुगल सेना पर आक्रमण कर
परेशान किया था और जुन्नार को लूट लिया।

कालांतर में बीजापुर द्वारा मुगलों से संधि  कर ली गई तब शिवाजी ने भी आक्रमण करना बंद कर दिया।

छत्रपति शिवाजी और अफजल खाँ :-

बीजापुर के शासक आदिल शाह द्वारा मुगलों से संधि करके उनके आक्रमण के भय से मुक्त हो गया । तथा छत्रपति शिवाजी  की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए तत्पर हो गया।

1659 ई. में बीजापुर राज्य ने शिवाजी को कैद करने या मार डालने के लिए सरदार अफजल खाँ को 10,000 घुडसवार तथा तोप खाने के साथ भेजा। शिवाजी को भयभीत करने के लिए अफजल खाँ गाँव- गांव उजाड़ दिये तथा मन्दिरों को तोपो से तोड़ दिया गया।

अफजल खां  द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में युद्ध करना कठिन देखकर कूटनीति से विजय करने के उद्देश्य से अपने दूत कृष्णा जी भास्कर को शिवाजी के पास भेजा और मिलने की इच्छा प्रकट की |

कृष्णाजी भास्कर ने शिवाजी को यह संदेश दिया कि वह बीजापुर का अधिपत्य स्वीकार कर ले तो आदिलशाह क्षमा  के साथ साथ उसका राज्य भी बना रहेगा।

कृष्णा जी भास्कर एक हिन्दू था । शिवाजी द्वारा उसे धर्म की दुहाई देकर उसके मन की बात जानने का प्रयास किया। जिसके फलस्वरूप अफजल खा  की नियत  कुछ ठीक नहीं का अनुमान शिवाजी को हो गया था।

प्रतापगढ़ के निकट अफजल खाँ और शिवाजी की मुलाकात होना निश्चित हुआ। दोनो केवल दो – दो अंगरक्षकों के साथ आयेगें। तथा शिवाजी को बिना अस्त्र शस्त्र आना था। लेकिन शिवाजी द्वारा बघनख, लोहे की टोपी,कटार आदि छुपाकर धारण की गई।

अफजल खाँ के साथ प्रख्यात तलवार बाज सैयद बाँदा था। शिवाजी का दूत गोपीनाथ था ।

2 नवम्बर 1659 ई. प्रतापगढ़ के वार नामक स्थान पर अफजल खाँ द्वारा शिवाजी पर तलवार से प्रहार किया लेकिन बड़ी चालाकी से शिवाजी द्वारा अफजल खाँ की हत्या कर दी गई।
,
अफजल खाँ की हत्या के बाद उसके रक्षक सैयद बाँदा ने प्रहार किया लेकिन जीवमहल शिवाजी के रक्षक द्वारा उसका हाथ काट दिया गया।

मराठा सेना द्वारा  बीजापुर की सेना पर भयंकर आक्रमण किया और उसे परास्त किया।

छत्रपति शिवाजी और शाइस्ता खाँ :-

1660 ई मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा शाइस्ता खाँ को  दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसने बीजापुर से मिलकर शिवाजी को समाप्त करने की योजना बनाई । वह कुछ हद तक सफल रहे क्योंकि शिवाजी को पूना, चाकन और कल्याण से हाथ धोना पड़ा।

15 अप्रैल 1663 ई. शिवाजी 400 सैनिको के साथ बारात के रूप में पूना मे घुस गए तथा अचानक आक्रमण कर दिया इस आक्रमण से भयभीत होकर शाइस्ताखां भाग खड़ा हुआ। लेकिन शिवाजी द्वारा इसका एक अंगूठा काटने में सफलता मिली।

छत्रपति शिवाजी और राजा जयसिंह :-

1665 ई में औरंगजेब ने राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । राजा जयसिंह एक योग्यतम् सेनापति और कूटनीतिज्ञ था। वह फारसी, उर्दू, तुर्की, राजस्थानी भाषा का ज्ञाता था।

शाहजहाँ के शासन काल में राजा जयसिंह द्वारा सैकड़ो युद्ध  में भाग लिया गया। तथा उनमें जीत हासिल की।

शिवाजी के विरुद्ध अभियान के समय राजा जयसिंह की उम्र 60 वर्ष होते हुए भी उसे इस अभियान की बागड़ोर सौपी गई।

जयसिंह द्वारा कूटनीति के द्वारा , बीजापुर, मराठा सरदार (जो सरदार शिवाजी से नफरत रखते थे) यूरोपीय शक्तियों को शिवाजी के पक्ष मे जाने से रोकने में सफलता प्राप्त की।

जयसिंह द्वारा कूटनीतिक मजबूती के साथ आक्रमण किया गया। वज्रगढ़ पर विजय के बाद शिवाजी को पुरन्दर के किले में घेर लिया। मजबूरन शिवाजी को आत्मसमर्पण करना पड़ा ।

छत्रपति शिवाजी और राजा जयसिंह के मध्य पुरन्दर की संधि :-

शिवाजी बिना किसी शर्त के राजा जयसिंह से मिलने गए। और दोनों के मध्य 22 जून 1665 ई. मे पुरंदर की संधि  की गई |

इस संधि  मे 23 किले और 4 लाख हूण की वार्षिक आय की भूमि शिवाजी द्वारा मुगलो को देना स्वीकार किया गया।

शिवाजी के पास अब 12 किले और एक लाख हूण की वार्षिक आय की जमीन रह गयी 1

इस संधि  में शिवाजी ने स्वयं न जाकर अपने पुत्र शम्भाजी को लगभग 5000 घुडसवारों के साथ मुगलो की सेवा मे भेजना स्वीकार किया।

शिवाजी द्वारा मुगलो का अधिपत्य स्वीकार कर  लिया और बीजापुर के विरुद्ध मुगलो को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया।

कुछ समय पश्चात शिवाजी द्वारा एक शर्त के अनुसार, कोंकण और बालाघाट की भूमि के बदले मुगलो को 13 वर्षो मे 40 लाख
हूण देना स्वीकार किया।

1666 में शिवाजी मुगल प्रदेश की सुबेदारी और सीढ़ियों से जंजीरा
का टापू प्राप्त हो जाने के लालच में औरंगजेब से मिलने आगरा जाना स्वीकार किया।

शिवाजी और औरंगजेब की मुलाकात कराने हेतु जयसिंह ने अपने पुत्र रामसिंह को नियुक्त किया।

9 मई 1666 ई० को शिवाजी अपने पुत्र शम्भाजी और 4000
मराठा सैनिकों के साथ आगरा पहुंचें।

औरंगजेब द्वारा शिवाजी के साथ उचित व्यवहार नही किया गया। जिससे शिवाजी ने अपना अपमान समझा और बीमारी का बहाना करके बादशाह से मिलने से इनकार कर दिया।

शिवाजी को रामसिंह की देख रेख मे जयपुर भवन में नजरबन्द कर लिया गया।

छत्रपति शिवाजी द्वारा अपने सौतेले भाई हीरो जी को अपना कड़ा पहनाकर अपने विस्तर पर लिटाकर स्वयं व पुत्र शम्भाजी मिठाई के खाली टोकरों में बैठकर भागने में सफल हुए ।

1670 ई. में शिवाजी ने मुगलों से पुनः युद्ध करना आरम्भ कर दिया। कुछ ही वर्षो में मुगलों और बीजापुर से अनेक किले तथा भू-भाग जीतने मे सफलता प्राप्त की।

नानाजी द्वारा कोंगना के किले को जीत लिया गया जिसे शिवाजी द्वारा सिंहगढ़ का नाम दिया।

13 अक्टूबर 1670 को दिलेर खाँ और शाहजादा मुअज्जम के झगड़े का लाभ उठाकर शिवाजी ने सूरत का बन्दरगाह दोबारा लूट लिया।

शिवाजी द्वारा अब तक पुरंदर , कल्याण, माहुली, सलहेर, मुल्हेर, पन्हाला, पार्ली  और सतारा आदि किलो को जीत के साथ-साथ जवाहरनगर और रामनगर को जीत लिया गया।

16 जून 1674 ई. में काशी के प्रसिद्ध विद्वान श्री गंगा भट्ट के द्वारा शिवाजी का राज्याभिषेक कराया गया। छत्रपति की उपाधि धारण की और रायगढ़ को राजधानी बनाया।

राज्याभिषेक के 12 दिन पश्चात शिवाजी की माता जीजाबाई की मृत्यु हो गई।

शिवाजी के भाई व्यंकोजी ने शिवाजी का अधिपत्य स्वीकार कर शासन करते रहें।

वर्षो युद्ध करके शिवाजी द्वारा कोंकण प्रदेश पर अधिकार कर लिया गया लेकिन जंजीरा के टापू और सीदियों को अपने अधिकार मे लेने में असफल रहे।
14 अप्रैल 1680 ई. को 53 वर्ष की आयु में छत्रपति शिवाजी की बीमारी के
कारण मृत्यु हो गई |

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विश्व की प्रमुख जलसंधियाँ (Straits)

जलसंधियाँ (Straits) पानी का एक संकीर्ण (तंग) मार्ग होता है, जो दो बड़े जल निकायों (जैसे दो समुद्र, महासागर या बड़े जलाशय) को आपस में जोड़ता है। यह आमतौर पर दो भू-भागों (जैसे द्वीपों या महाद्वीपों) के बीच स्थित होता है और जहाज़ों के लिए नौवहन योग्य होता है। अर्थात

जलसंधियाँ (Straits)और पढ़े :-प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ| गोदावरी| कृष्णा| कावेरी|महानदी 

पानी के ऐसे तंग मार्ग को जलसंधि कहते हैं जो दो बड़े पानी के समूहों को जोड़ता हो और जिसमें से नौकाएँ गुज़रकर एक बड़े जलाशय से दूसरे बड़े जलाशय तक जा सकें।
इसका आकार अक्सर डमरू जैसा होता है, इसलिए इसे जलडमरूमध्य या जलडमरू भी कहा जाता है।

विश्व की प्रमुख जलसंधियाँ (Straits) निम्नलिखित है :-

क्रम संख्या जलसन्धि का नाम भू भाग को अलग करता हैजलीय भाग को अलग करता है
1बेरिंग जल संधिएशिया (रूस) एवं उत्तरी अमेरिका (आलस्का)पूर्वी साईबेरियन सागर एवं बेरिंग सागर
2लापैरोज जल संधिसखालिन द्वीप एवं हैकेडो द्वीपओखोट्स सागर एवं जापान सागर
3तत्तर जल संधि पूर्वी रूस एवं सखालिनओखोट्स सागर एवं जापान सागर
4फोरमोसा जल संधिताइवान एवं चीनपूर्वी चीन सागर एवं दक्षिणी चीन सागर
5 लूजोन जल संधिताइवान एवं लूजोन (फिलीपिंस)दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत महासागर
6मलक्का जल संधिमलय प्रायद्वीप एवं सुमात्राजावा सागर (द. चीन सागर) एवं बंगाल की खाड़ी
7जाहौर जल संधिसिंगापुर एवं मलेशियादक्षिणी चीन सागर एवं मलक्का जलसंधि
8होरमुज जल संधिसं.अ. अमीरात एवं ईरानफारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ी
9बास्पोरस जल संधिएशिया एवं यूरोपकाला सागर एवं मरमरा (एजियन) सागर
10बाव - एल मंडेव जलसंधियमन - जिबूतीलाल सागर एवं अरब सागर
11 कारीमाटा जलसंधिइण्डोनेशियादक्षिणी चीन सागर एवं जावा सागर
12कोरिया जल संधिदक्षिण कोरिया एवं क्यूशू (जापान)पीला सागर एवं जापान सागर
13सुण्डा जल संधिजावा एवं सुमात्राजावा सागर एवं हिंद महासागर
14मकस्सार जल संधिबोर्नियो (केलिमंटन) एवं सेलिबीज द्वीपसेलेवीज सागर एवं जावा सागर
15डारडनेल्स जल संधि एशिया एवं यूरोपमरमरा सागर एवं भूमध्य सागर
16 पाक जल संधिभारत एवं श्रीलंका मन्नार एवं बंगाल की खाड़ी
17सुशीमा जलसंधिजापानजापान सागर एवं पूर्वी चीन सागर
18सुगारु जलसंधिजापानजापान सागर एवं प्रशांत महासागर
19नेमुरो जलसंधिजापानप्रशान्त महासागर
20 टोकरा जलसंधिजापानपूर्वी चीन सागर एवं प्रशांत महासागर
21 वाला बैंक जलसंधिपलावान-बोर्नियोंटाइरेनियन सागर और भूमध्यसागर
22डाबर जल संधिइंग्लैण्ड-फ्रांसइंग्लिश चैनल एवं उत्तरी सागर
23डेनमार्क जलसंधिइंग्लैण्ड-फ्रांसउत्तरी अटलांटिक एवं आर्कटिक महासागर
24जिब्राल्टर जल सन्धि ('भूमध्यसागर की कुंजी' के नाम से प्रसिद्ध ) यूरोप (स्पेन) और अफ्रीका (मोरक्को)भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर
25ओरन्टो जलसन्धि इटली और बाल्कन प्रायद्वीपएड्रियाटिक सागर और आयोनियन सागर । ।।
26 नार्थ चैनलआयरलैण्ड-इंग्लैण्डआयरिश सागर एवं अटलांटिक सागर
27बोनीफेसियो जलसन्धिसार्डिनिया (इटली) और कोर्सिका द्वीप (फ्रांस) टाइरेनियन सागर और भूमध्यसागर
28डारडानेल्स जलसन्धि*बाल्कन प्रायद्वीप और अनातोलिया प्रायद्वीप मरमरा का सागर और एजिअन सागर
29 मेसिना जलसन्धिसिसली और इटली प्रायद्वीप टाइरेनियन सागर और भूमध्यसागर
30कर्च जलसन्धिकर्च (यूक्रेन) और रूसअजोव सागर और काला सागर
31बासपोरस जलसन्धिइस्तानबुल और अनातोलिया प्रायद्वीप (तुर्की) काला सागर और मरमरा का सागर
32 नेअर्स जलसंधि ग्रीनलैंड एंव एलिसमेरे द्वीप ।आर्कटिक महासागर एवं बैफिन की खाड़ी को
33 हड्सन जल संधिबैफिन द्वीप एवं ऊनगावा प्रायद्वीप (क्यूबेक) हड्सन की खाड़ी एवं लैब्राडोर सागर ।
34 बेली द्वीप जल संधि लैब्रोडोर एवं न्यूफाउंडलैंड।सेंट लॉरेंस की खाड़ी एवं अटलांटिक महासागर
35 यूकाटन जल संधियुकाटन प्रायद्वीप (उ0पू0 मैक्सिको) एवं क्यूबामैक्सिको की खाड़ी एवं कैरीबियन सागर
36 बेरिंग जल संधि चुक्ची प्रायद्वीप रूस (एशिया) एवं अलास्का (उ0 अमेरिका) आर्कटिक महासागर एवं बैरिंग सागर ।
37डेविस जल संधिग्रीनलैंड एवं बैफिन द्वीप। बैफिन की खाड़ी एवं लैब्राडोर सागर
38फ्लोरिडा जल संधिफ्लोरिडा एवं क्यूबामैक्सिको की खाड़ी एवं अटलांटिक महासागर।
मैगलेन जलसन्धि दक्षिण अमेरिका और तिएरा डेल फ्यूगो अटलांटिक महासागर और प्रशान्त महासागर
ड्रेक जलसन्धि दक्षिण अमेरिका अंटार्कटिक दक्षिण अटलांटिक महासागर और प्रशान्त महासागर

महालवाड़ी पद्धति (Mahalwari System) क्या थी |

महालवाड़ी पद्धति (The Mahalwari System) में  भूमि कर की इकाई ग्राम अथवा महल (जागीर का एक भाग) होता था।

महालवाड़ी पद्धति में  कृषक के  खेत से कोई सरोकार नही होता था |  

महालवाड़ी

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भूमि समस्त ग्राम सभा की सम्मिलित रूप से होती थी, जिसको भागीदारों का समूह (body of co-sharers) कहते थे

सभी किसान  सम्मिलित रूप से भूमि कर देने के लिए जिम्मेदार  होते थे, यद्यपि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी होता था

किसान जब किसी कारण से  अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता थायह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था। 

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त तथा अवध (यू. पी.) में भूमि कर व्यवस्था

समय-समय पर अंग्रेज़ों के अधीन रहा उत्तरपश्चिमी प्रान्त तथा अवध जिसे आजकल उत्तर प्रदेश कहते हैं | 1801 में अवध के नवाब ने  इलाहाबाद तथा उसके आसपास के प्रदेश कम्पनी को सौप दिए ,जिन्हें अभ्यर्पित जिले (ceded districts) कहते थे

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात कम्पनी ने यमुना तथा गंगा के मध्य का प्रदेश विजय कर लियाइन जिलों को विजित (conquered) प्रान्त कहते थे

अन्तिम आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) के पश्चात लार्ड हेस्टिंग्ज़ ने उत्तरी भारत में और अधिक क्षेत्र प्राप्त कर लिए

 अभ्यर्पित प्रदेश के प्रथम लेफ्टिनेन्ट गवर्नर हेनरी वैल्ज़ली ने ज़मींदारों तथा कृषकों से ही सीधे भूमि कर लेना प्रारम्भ किया  तथा यह मांग नवाबों की मांग से प्रथम वर्ष में ही 20 लाख रुपया अधिक थी

तीन वर्ष के अन्तराल में  दस लाख रुपया वार्षिक और बढ़ा दिया गया। इस बसूली को इतनी कढाई से लागू किया गया जो भारतीय इतिहास में पहले कभी नही हुआ था |

नवाब के अनुसार जिस वर्ष उपज अच्छी नही होती थी,  करो की मांग में शिथिलता बरती जाती थी |

1822 के रेग्यूलेशन (Regulations of 1822 ) –

आयुक्तों के बोर्ड (Board of Commissioners) के सचिव होल्ट मैकेन्ज़ी ने 1819 के पत्र में उत्तरी भारत में ग्राम समाजों की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा यह सुझाव दिया था कि भूमि का सर्वेक्षण किया जाए, भूमि में लोगों के अधिकारों का लेखा तैयार किया जाए, प्रत्येक ग्राम अथवा महल से कितना भूमि कर लेना है, यह निश्चित किया जाए तथा प्रत्येक ग्राम से भूमि कर प्रधान अथवा लम्बरदार द्वारा संग्रह करने की व्यवस्था की जाए । 

 1822 के रेग्यूलेशन – 7 (Regulation-VII) द्वारा इस सुझाव को कानूनी रूप दे दिया गयाभूमि कर भूभाटक (Land Rent) (अर्थात जमीदार को  भूमि के उपयोग के बदले दिया जाने वाला नियमित किराया ) का 30 प्रतिशत निश्चित किया गया जो ज़मींदारों को देना पड़ता था

वे  प्रदेश जहां ज़मींदार नहीं होते थे तथा भूमि ग्राम समाज की सम्मिलित रूप से होती थी, भूमि कर भूभाटक का 95 प्रतिशत निश्चित किया गयासरकार की मांग अत्यधिक होने के कारण तथा संग्रहण में अत्यधिक दृढ़ता होने के कारण यह व्यवस्था छिन्नभिन्न हो गई। 

1833 का रेग्यूलेशन नौ तथा मार्टिन बर्ड की भूमि कर व्यवस्था –

विलियम बैंटिंक की सरकार ने 1822 की योजना की पूर्ण रूपेण समीक्षा की तथा इस परिणाम पर पहुंची कि इस योजना से लोगों को बहुत कठिनाई हुई है तथा यह अपनी कठोरता के कारण ही टूट गई हैबहुत सोचविचार के पश्चात् 1833 के रेग्यूलेशन पारित किए गए जिसके द्वारा भूमि की उपज तथा भूभाटक का अनुमान लगाने की पद्धति सरल बना दी गईभिन्नभिन्न प्रकार की भूमि के लिए भिन्नभिन्न औसत भाटक निश्चित किया गयाप्रथम बार खेतों के मानचित्रों तथा पंजियों (registers) का प्रयोग किया गया। 

यह नई योजना मार्टिन बर्ड की देखरेख में लागू की गईउन्हें उत्तरी भारत में भूमि कर व्यवस्था का प्रवर्तक (Father of Land Settlements in Northern India) के नाम से स्मरण किया जाता हैइसके अनुसार एक भाग की भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था जिसमें खेतों की परिधियां निश्चित की जाती थीं और बंजर तथा उपजाऊ भूमि स्पष्ट की जाती थीइसके पश्चात समस्त भाग का और फिर समस्त ग्राम का भूमि कर निश्चित किया जाता थाप्रत्येक ग्राम अथवा महल के अधिकारियों को स्थानीय आवश्यकता के अनुसार समायोजन (adjustment) करने का अधिकार होता थाभाटक का 66 प्रतिशत भाग राज्य सरकार का भाग निश्चित किया गया और यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई । 

इस योजना के अन्तर्गत भूमि व्यवस्था का कार्य 1833 में आरम्भ किया गया ।तथा  लेफ्टिनेन्ट – गवर्नर जेम्ज़ टॉमसन (1843- 1853) के कार्यकाल में समाप्त किया गया। 

परन्तु भाटक 66 प्रतिशत भूमि कर के रूप में प्राप्त करना भी बहुत अधिक था तथा चल नहीं सका इसलिए लार्ड डलहौज़ी ने इसका पुनरीक्षण कर 1855 में सहारनपुर नियम के अनुसार 50 प्रतिशत भाग का सुझाव दियादुर्भाग्यवश भूव्यवस्था अधिकारियों ने इस नियम को स्थगित करने का प्रयत्न किया उन्होंने इस 50 प्रतिशत के अर्थ प्रदेश के भाटक के ‘वास्तविक भाटक’ (actual rental) के स्थान पर ‘सम्भावित तथा शक्य’ (prospective and potential) भाटक लिया जिसके फलस्वरूप कृषक की अवस्था और भी बुरी हो गई जिस कारण इन में से बहुत से लोग 1857 के विद्रोह में सम्मिलित हो गए। 

अमेज़न नदी (Amazon River)

“पृथ्वी का फेफड़ा” (lungs of Earth) कहीं जाने वाली अमेज़न नदी (Amazon River) विश्व की सबसे चौड़ी तथा विशाल जलराशि की नदी है।

अमेज़न नदी

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नाम – अमेज़न नदी (Amazon River)

लंबाई – लगभग 6,575–7,000 किमी (विश्व की सबसे लंबी या दूसरी सबसे लंबी नदी – नील नदी से विवाद) |

उद्गम स्थल – पेरू के एंडीज पर्वत में मिसमी चोटी (Nevado Mismi) से

मुख्य सहायक नदियाँ – मेडेरा, नेग्रो, टापाजोस, जुरुआ, पुरुस, जावारी, यूपुरा |

सबसे बड़ी सहायक नदी- रियो नेग्रो (Rio Negro)

प्रवाह क्षेत्र – दक्षिण अमेरिका के 9 देश: पेरू, ब्राजील, कोलंबिया, वेनेजुएला, इक्वाडोर, बोलिविया, गुयाना, सूरीनाम, फ्रेंच गुयाना |

डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा नहीं (गंगा-ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ा)

जल प्रवाह – विश्व में सर्वाधिक (लगभग 2,09,000 घन मीटर/सेकंड) |

वर्षा – विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र (250–400 सेमी वार्षिक)

वन – अमेज़न वर्षावन (विश्व का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन) |

जैव-विविधता – विश्व का सबसे अधिक जैव-विविधता वाला क्षेत्र (लाखों प्रजातियाँ)

मछलियाँ – पिरान्हा, अरापाइमा (दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की मछली), इलेक्ट्रिक ईल

जनजातियाँ – यानोमामी, कायापो, तिकुना आदि

प्रमुख शहर – मानुस (ब्राजील), इकितोस (पेरू)

आर्थिक महत्व – जल परिवहन, मत्स्य पालन, जल विद्युत, पर्यटन

पर्यावरणीय समस्या – वनों की कटाई (Deforestation), जलवायु परिवर्तन, खनन प्रदूषण |

महत्वपूर्ण तथ्य
– विश्व की सबसे अधिक जल मात्रा वाली नदी (20% मीठा पानी अटलांटिक में छोड़ती है)
– अमेज़न वर्षावन को “पृथ्वी का फेफड़ा” (Earth’s Lungs) कहा जाता है
– विश्व की सबसे चौड़ी नदी भी (मानसून में 48 किमी तक चौड़ी हो जाती है)
– नदी में 3,000+ मछली प्रजातियाँ (गंगा में सिर्फ 200-250)
– पेरू में इसका नाम “सोलिमोन्स” (Solimões) है, ब्राजील में “अमेज़न”
मीठे पानी का डॉल्फिन (Pink River Dolphin) केवल यहीं पायी जाती है।

यह दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में बहती है।

इसका उद्गम  एण्डीज़ पर्वत (पेरू) से होता है।

यह अटलांटिक महासागर में मिलती है।

इसकी लंबाई लगभग 6400 किलोमीटर है।

अमेज़न नदी के आसपास का क्षेत्र अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट कहलाता है।

इस क्षेत्र में सबसे अधिक वर्षा होती है और यह वन्य जीवों की बहुत विविधता वाला क्षेत्र है।

अमेज़न नदी – प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: अमेज़न नदी किस महाद्वीप में बहती है?

उत्तर: दक्षिण अमेरिका

प्रश्न 2: अमेज़न नदी का उद्गम कहाँ होता है?

उत्तर: एण्डीज़ पर्वत, पेरू में

प्रश्न 3: अमेज़न नदी किस महासागर में मिलती है?

उत्तर: अटलांटिक महासागर

प्रश्न 4: अमेज़न नदी की लगभग लंबाई कितनी है?

उत्तर: लगभग 6400 किलोमीटर

प्रश्न 5: अमेज़न नदी के आसपास का घना जंगल क्या कहलाता है?

उत्तर: अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट

प्रश्न 6: अमेज़न नदी दुनिया की किस प्रकार की नदी मानी जाती है?

उत्तर: दुनिया की सबसे अधिक जल वाली नदी

प्रश्न 7: अमेज़न क्षेत्र में वर्षा कैसी होती है?

उत्तर: बहुत अधिक

प्रश्न 8: अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट में किसकी अधिक विविधता पाई जाती है?

उत्तर: वनस्पति और वन्य जीवों की