अकबर (1542-1605) AKBAR THE GREAT से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य

  • अकबर का जन्म – 15 अक्टूबर 1542                                                                     
  • जन्म स्थान       – अमरकोट( सिंध )में राणा वीर साल राजपूत के घर
  • पूरा नाम           – जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर
  • पिता                  – हुमायूं
  •  माता                – हमीदा बानो बेगम (मरियम मकानी के रूप में मान्यता)
  •  राज अभिषेक    – 14 फरवरी 1556 कालानौर (गुरदासपुर उम्र 13 वर्ष 4 माह)
  • पुत्र                    -सलीम, मुराद, दानियाल,
  •  पुत्रिया               – खानम सुल्तान, सुक्रून निशा बेगम, आराम बानो बेगम
  • उत्तराधिकारी–
  • सलीम (जहांगीर )       
  • मुराद  ( मृत्यु 1599 ईसवी )                                                                                           
  • दानियाल ( मृत्यु 1604 में मदिरापान से)
  •     चाचा     – कामरान, हिन्दाल, अस्करी

अकबर

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अकबर :-

  • अकबर के जन्म के समय हुमायूं अमरकोट से दूर साह हुसैन अरगून के विरुद्ध थट्टा और भक्खर अभियान पर था|
  • टार्दी  बेग खान (घुड़सवार) ने अकबर के जन्म का समाचार हुमायूं को दिया|
  • अकबर को कामरान ने काबुल दुर्ग की दीवार पर तोपों के सामने लटकाया था|
  • अकबर के शिक्षक पीर मोहब्बत तथा बैरम खान थे
  • गजनी के राज्यपाल (1551) के रूप में अकबर को हुमायूँ  ने मात्र 9 वर्ष की अवस्था में दायित्व सौंपा|
  • पहला विवाह चाचा हिंदाल की पुत्री रुकैया बेगम से|
  • सरहिंद युद्ध (22जून 1555) अकबर ने हुमायूं के साथ युद्ध में भाग लिया तथा विजय का श्रेय हुमायूँ द्वारा अकबर को दिया गया|
  • पहली बार अकबर को बैरम खां के संरक्षण में पंजाब के सूबेदार का दायित्व सौंपा गया|
  • हुमायूँ की मृत्यु 24 जनवरी 1556 को हुई |
  • मुल्ला बेकसी :-
  • हुमायूं की मृत्यु के समय अकबर पंजाब में सिकंदरसूर  के विरुद्ध युद्धरत था | विद्रोह न फैले पहले इसलिए हुमायूं की शक्ल के समान दिखने वाले मुल्ला बेकसी को 17 दिनों तक शाही  लिवास पहनाकर जनता दर्शन कराए जाते रहे|
  • अकबर ने बैरम खां को “खाने खाना” की उपाधि प्रदान की | प्यार से उसे “खानी बाबा” कहा जाता था|

हेमू :-

उपाधियां – हेमू विक्रमादित्य और हेमचंद्र विक्रमादित्य

मृत्यु -5 नवंबर 1556

हेमू ने वजीर के रूप में सूर साम्राज्य के आदिलशाह सूरी के यहां कार्य किया| 24 लड़ाइयां लड़ी जिसमें से 22 में उसे विजय प्राप्त हुई है|

हेमू ने 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली की लड़ाई में अकबर की मुगल सेना को हराया|

शाह अबुल माली ने अकबर के राज्य अभिषेक में शामिल होने से इंकार कर दिया जो कभी हुमायूँ का अत्यंत विश्वासपात्र होता था|

विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला हेमू  14 वाँ और अंतिम शासक था |वह दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला अंतिम हिन्दू सम्राट था |

बैरम खां की संरक्षता (1556-1560):-

उपाधि – खान -ए -खाना

कल्ला मीनार :- कल्ला को फारसी में सिर कहते है अतः सिकन्दर शाह सूरी के साथ लड़ने में जितने सर कटे उनको इसमें भर दिया गया |कल्ला मीनार बैरम खां द्वारा बनवाई गयी थी |इसे सर मीनार भी कहते है |

प त्नी-सलीमा बेगम (अकबर की चचेरी बहन)

पानीपत का तृतीय युद्ध :-

तिथि – 5 नवंबर 1556 ईस्वी में

पक्ष -अकबर और हेमू (हेमचंद्र)

परिणाम – अकबर विजयी

“हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी, जबकि अकबर की विजय एक दैवीय संयोग था |” -डॉक्टर आर पी त्रिपाठी |

युद्ध के दौरान के हेमू के आंख में तीर लगना उसकी हार का कारण बना सैनिकों में भगदड़ मच गई तथा हेमू को अकबर के समक्ष पेश किया गया जहां पर बैरम खां ने अपनी तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया| पानीपत के इस युद्ध में विजय का श्रेय बैरम खां को दिया जाता है |

पेटीकोट सरकार/पर्दा शासन (1560 से 1564):-

बैरम खां के पतन के बाद अकबर हरम की स्त्रियों के प्रभाव में आ गया तथा उनको शासन में  कुछ हस्तक्षेप करने का अधिकार प्रदान कर दिया|

हरम दल में राजमाता हमीदा बानो बेगम, माहम आनगा, अधम खां, शिहाबुद्धीन अतगा, मुल्ला पीर मोहम्मद तथा मुनीम खां शामिल थे|

शिहाबुद्धीन अतगा– माहम अनगा का दमाद (दिल्ली का सूबेदार)

मुल्लापीर – अकबर का अध्यापक

माहम अनगा  का सर्वाधिक प्रभाव था|

अकबर के प्रमुख युद्ध:-

पानीपत का द्वितीय युद्ध:-

5 नवम्बर 1556 में अकबर तथा हेमू के मध्य अकबर विजयी|

हल्दीघाटी का युद्ध:-

18 जून 1576 गोगुंडा के निकट हल्दीघाटी के मैदान में राणा प्रताप उर्फ कीका व  मुगल सेनापति मानसिंह के मध्य राणा प्रताप पराजित हुआ|

कलिंजर विजय (1569):-

मजनू खां काकशाह  तथा राजा रामचंद्र के बीच साही सेना के सामने राजा रामचंद्रने समर्पण कर दिया|

  • मेड़ता विजय (1562)
  • गढ़करंगा (गोंडवाना) विजय (1564)
  • मेवाड़ विजय (1568)
  • रणथम्भौर विजय (1569)
  • कालिंजर विजय (1569)
  • गुजरात विजय (1572-73 )
  • काबुल विजय (1581)
  • कश्मीर विजय (1585-86)
  • सिंध विजय (1591)
  • उड़ीसा विजय (1592)

प्रश्न नं 1 -अकबर को किसने हराया?

हेमू (हेमचन्द्र )ने अपने स्वामी आदिल शाह की ओर से 24 युद्धों में से 22 युद्धों पर विजय हासिल की |दिल्ली पर अधिकार कर उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला 14वाँ  और अंतिम शासक था |वह दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला अंतिम हिंदू सम्राट था|

प्रश्न नं 2 -अकबर  की पत्नी कितनी थी ?

  • हरखा बाई उर्फ़ जोधाबाई (राजा भारमल की पुत्री )
  • सलीमा बेगम (बैरम खां की विधवा)
  • बीकानेर के राजा कल्याणमल की पुत्री से विवाह|
  • जैसलमेर के रावल हरराय की पुत्री से विवाह |
  • उपरोक्त को शामिल करते हुए अकबर की लगभग 300 रानियां थी |

प्रश्न नं 3 -अकबर को किसने मारा था?

अकबर के जीवन के अंतिम दिन बहुत ही कष्ट दायक गुजरे | 4 अक्टूबर 1605 को अकबर अतिसार से पीड़ित हो गया इस बीमारी को उसका वैध हकीम अली पहचान नहीं सका अंततः  25 से 26 अक्टूबर 1605 को मध्य रात्रि को अकबर की मृत्यु हो गई|

प्रश्न नं 4 -अकबर की सबसे प्रिय रानी कौन थी?

अकबर की सबसे प्रिय रानी जोधाबाई थी |

प्रश्न नं 5 -अकबर के नवरत्न कौन से थे ?

  • -अबुल फजल
  • -फैजी
  • -तानसेन (संगीतकर )
  • -बीरबल
  • -राजा टोडरमल
  • -राजा मानसिंह
  • -अब्दुल रहीम खान -ए-खाना
  • -हकीम हुक्काम
  • -मुल्लाह दो पियाजा

वारेन हेस्टिंग्स(1773-1785) के शासन काल की महत्वपूर्ण घटनाएं

भारत के गवर्नर जनरल एवं वायसराय

भारत के गवर्नर जनरल एवं वायसरायो में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स (1773 से 1785) अत्यधिक महत्वकांक्षी गवर्नर था |

1773 का रेगुलेटिंग एक्ट भारत में शासन की जिम्मेदारी गवर्नर जनरल तथा उसकी चार सदस्यीय परिषद पर डाल दिया गया| हेस्टिंग्स,बारवेल, क्लेवरिंग, फ्रांसिस तथा मानसन परिषद के सदस्य थे |

पहली बार ब्रिटिश कैबिनेट को भारतीय मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया| 500 पाउंड के स्थान पर 1500 धारकों को संचालक चुनने का अधिकार दिया गया संचालक मंडल का कार्यकाल 4 वर्ष कर दिया गया | बंगाल के गवर्नर को समस्त अंग्रेजी क्षेत्रों का गवर्नर कहां गया|

1774 में इसी अधिनियम के तहत उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट )की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश थे सर एलिजा इम्पे मुख्य न्यायधीश तथा चेम्बर्स, लिमेंस्टर और हायड अन्य न्यायाधीश थे |

कंपनी के कर्मचारियों के लिए निजी व्यापार पूर्णता प्रतिबंधित कर दिया गया इनके वेतन में वृद्धि की गई तथा नजराना, भेट,घूस पर रोक लगा दी गई इस एक्ट के सभी प्रावधान “परीक्षण एवं संतुलन” के सिद्धांत पर आधारित है|

वारेन हेस्टिंग्स

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1781 का अधिनियम :-

कलकत्ता स्थित उच्चतम न्यायालय के न्याय क्षेत्र को निर्धारित कर दिया गया | न्यायालय द्वारा कानून बनाने या उनका क्रियान्वयन करते समय भारतीयों के रीति-रिवाजों धार्मिक मान्यताओं का ध्यान रखा जाए |

राजस्व एकत्रित करने की व्यवस्था में कोई रुकावट न डाली जाए|

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट :-

तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री “पिट द यंगर” द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया|

6 कमिश्नरो के नियंत्रण बोर्ड की स्थापना की गई जिसे “बोर्ड आफ कंट्रोल” कहते थे|

कंपनी के मामलों की छानबीन एक प्रवर समिति (SELECT COMMITTEE) और एक गुप्त समिति (SECRET COMMITTEE)नियुक्त की गई|

इस एक्ट के द्वारा यह पहला और अंतिम अवसर था, जब एक अंग्रेजी सरकार भारतीय मामले पर टूट गई|

गवर्नर जनरल के अधीन बंबई और मद्रास के गवर्नर पूर्ण रूप से कर दिए गए भारत में कंपनी के अधिकार क्षेत्र को “ब्रिटिश अधिकृत भारतीय प्रदेश” कहा गया| इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धारा यह थी कि इसके द्वारा भारत में आक्रमण आक्रमक युद्ध को केवल समाप्ति नहीं कर दिया अपितु जो प्रत्याभूति (GUARANTEE) की सन्धिया कर्नाटक,अबध जैसे  भारतीय राजाओं से की गई थी उन्हें समाप्त कर दिया गया और यह कहा गया कि “विजय की योजनाये तथा भारत में साम्राज्य का विस्तार इस राष्ट्र की इच्छा सम्मान तथा निति  के विरुद्ध है|”

1774 का रोहिल्ला युद्ध :-

अप्रैल 1774 में मीरानपुर कटरा के स्थान पर नवाब व कंपनी की सम्मिलित सेना द्वारा रोहिल्ला सरदार हाफिज रहमत खान के साथ निर्णायक युद्ध लड़ा गया, जिसके जिसमें हाफिज रहमत का मारा गया| रूहेलखंड अवध में सम्मिलित कर लिया गया तथा 2लाख  रुहेलो को देश से निकाल दिया गया| रुहेला ग्राम लूटे गए, बच्चे मार डाले गए तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किए गए|

वारेन हेस्टिंग्स के इस आचरण की बर्क,मेकाले आदि ने कड़ी आलोचना की| लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह युद्ध हेस्टिंग द्वारा केवल धन तथा राजनैतिक लाभ के लिए लड़ा गया उसका नैतिकता की तरफ कोई विचार नहीं रहा|

1775-82 प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध :-

18 मई 1775 ई. को आरस के मैदान में अंग्रेज और मराठा सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ | मराठे पराजित हुए लेकिन पुना पर उनका अधिकार बना रहा| कलकत्ता की अंग्रेजी सरकार की ओर से वारेन हेस्टिंग ने पूना दरबार में कर्नल अपटन को भेजकर पुरंदर की संधि (1मार्च 1776 ) कर ली|

मुंबई सरकार ने पुरंदर की संधि अस्वीकार कर दी तथा एक सेना कर्नल इगर्टन के अधीन नवंबर 1778 में पूना की ओर भेजा,कर्नल कौकबर्न के नेतृत्व में 9 जनवरी 1779 को पश्चिमी घाट स्थित तालगांव की लड़ाई में अंग्रेज पराजित हुए इसके बाद अंग्रेजों को बड़गांव की अपमानजनक संधि स्वीकार करनी पड़ी|

बडगाव की संधि वारेन हेस्टिंग्स ने मानने से इनकार कर दिया तथा युद्ध जारी रखा | केप्टन पोफम के अधीन ग्वालियर पर आक्रमण तथा जनरल गाडर्ड  के अधीन पूना पर आक्रमण किया यहाँ अंग्रेजों की खोई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हुई | अग्रजो और मराठो के मध्य सालबई  की संधि 1782 से लगभग 20 वर्षों की शांति प्रदान की|

वारेन हेस्टिंग्स

द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध(1780-84):-

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के फलस्वरूप फ्रांस  तथा इंग्लैंड में कुछ युद्ध छिड़ गया| वारेन हेस्टिंग्स ने भारत की समस्त फ्रांसीसी बस्तियों को अपने अधीन करने का निश्चय किया| उसने हैदर अली के अधीन रहने वाले मालाबार तट पर स्थित माही बंदरगाह को जीत लिया| वारेन हेस्टिंग्स ने आक्रमण का तर्क दिया कि हैदर अली को फ्रांसीसी सहायता पहुंच सकती है|

जुलाई 1780 में हैदर अली ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया यहीं से द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध आरंभ हुआ हैदर अली ने अंग्रेज जनरल वेली को कर्नाटक में हराया वारेन हेस्टिंग्स ने कूटनीतिक चाल चलकर निजाम को गुंटूर देकर हैदर अली से अलग किया तथा सिंधिया भोंसले को मिला लिया| 1780 में जनरल आयारकुट ने पोर्टनोवा, पॉलीलुर, शोलीग्लुर  में  अकेले पड़े हैदर अली को कई बार हराया|

हैदर अली ने 1782 में आयारकुट को हराया |7 दिसंबर 1782 को हैदर अली की मृत्यु तथा उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा | 1784 में मंगलौर की संधि से द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध समाप्त हुआ|

वारेन हेस्टिंग्स

बनारस के राजा चैत सिंह के साथ विवादास्पद संबंध :-

मराठा और मैसूर के युद्ध से कंपनी पर बहुत अधिक वित्तीय भार पड़ा है जिसके कारण वारेन हेस्टिंग्स को वे कार्य करने पड़े जिसके लिए अंत में उस पर महाभियोग (impeachment) का मुकदमा चलाया गया |

नवाब को चैत सिंह के अधीन किया गया जिससे जो धन चैत सिंह नवाब को देता था, वह कंपनी को देने लगा | जिससे वारेन हेस्टिंग्स बार-बार धन वसूलने लगा| मैंकाले के अनुसार बार-बार धन मांगने से चैट सिंह विरोध करें जिससे वह इसको अपराध मान कर उसके समस्त प्रदेश को जब्त कर लिया जाये| चैत सिंह ने वारेन हेस्टिंग्स के पैरों में अपनी पगड़ी तक रखी लेकिन उसने चेत सिंह को बंदी बना लिया |

इस निष्ठुरता से सैनिकों ने विद्रोह किया जिसे आसानी से दबा दिया गया| वारेन हेस्टिंग्स को अनुमान से बहुत कम धन प्राप्त हुआ, अर्थात वह असफल रहा | इसके बाद उसने यही अवध में करने का रास्ता चुना|

नंदकुमार को फांसी (1775):-

नंदकुमार मुर्शिदाबाद का भूतपूर्व दीवान था| इसने वारेन हेस्टिंग्स पर 3 लाख 50 हजार  घूस लेने का आरोप लगाया| इसलिए हेस्टिंग्स ने न्यायाधीश इम्पे की मदद से जालसाजी के मुकदमे में नंदकुमार को फांसी पर चढ़ा दिया| भारत के गवर्नर जनरल एवं वायसराय में यह सबसे बड़ा कलंक माना गया |

एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल :-

वारेन हेस्टिंग के समय विलियम जोंस ने कोलकाता में 1784 में इसकी स्थापना की|

भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय: तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला

भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय: तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला

आज हम जिस विश्वविद्यालय की कल्पना करते हैं, उसके आधुनिक स्वरूप से बहुत पहले भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे अनेक शिक्षा केंद्र विकसित हो चुके थे, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे। इन संस्थानों में केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं दी जाती थी, बल्कि व्याकरण, दर्शन, चिकित्सा, राजनीति, तर्कशास्त्र, गणित और अन्य विषयों का भी अध्ययन होता था।

तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला इसी समृद्ध शिक्षा परंपरा के तीन महत्वपूर्ण केंद्र थे। इनमें से प्रत्येक की अपनी अलग विशेषता थी। तक्षशिला का संबंध प्राचीन गांधार क्षेत्र से था, नालंदा ने बौद्ध अध्ययन के साथ अनेक विषयों में अपनी पहचान बनाई और विक्रमशिला पाल काल में बौद्ध विद्या का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला

इस लेख में हम इन तीनों शिक्षा केंद्रों के इतिहास, स्थान, शिक्षा व्यवस्था, प्रसिद्ध विद्वानों और भारतीय इतिहास में उनके महत्व को सरल भाषा में समझेंगे।

तक्षशिला: प्राचीन शिक्षा परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र :-

प्राचीन तक्षशिला वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के क्षेत्र में स्थित था। यह गांधार क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण नगर था और प्राचीन व्यापारिक मार्गों के निकट होने के कारण विभिन्न संस्कृतियों के संपर्क में रहता था।

तक्षशिला को अक्सर प्राचीन भारत के सबसे पुराने उच्च शिक्षा केंद्रों में गिना जाता है। हालांकि यहाँ एक आधुनिक विश्वविद्यालय जैसी केंद्रीकृत व्यवस्था थी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। अलग-अलग आचार्य अपने-अपने विषयों में विद्यार्थियों को शिक्षा देते थे।

तक्षशिला में किन विषयों की शिक्षा दी जाती थी?

प्राचीन स्रोतों और परंपराओं में तक्षशिला से कई विषयों के अध्ययन का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख रूप से—

– वेद और वेदांग
– व्याकरण
– दर्शन
– चिकित्सा
– राजनीति और अर्थशास्त्र
– सैन्य शिक्षा
– धनुर्विद्या
– कानून
– गणित और अन्य ज्ञान-विषय

शामिल थे।

तक्षशिला की एक खास बात यह थी कि विद्यार्थी किसी विशेष आचार्य से शिक्षा प्राप्त करने के लिए वहाँ आते थे। इस कारण इसे केवल एक भवन या परिसर के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक शिक्षा-परंपरा और विद्वानों के केंद्र के रूप में समझना अधिक उचित है।

तक्षशिला और प्रसिद्ध विद्वान :-

तक्षशिला का नाम कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के साथ जोड़ा जाता है। पाणिनि, संस्कृत के महान व्याकरणाचार्य, गांधार क्षेत्र से संबंधित माने जाते हैं। इसी तरह चाणक्य (कौटिल्य) और चरक का संबंध भी तक्षशिला की शिक्षा परंपरा से जोड़ा जाता है।

हालाँकि इन सभी व्यक्तियों के तक्षशिला में अध्ययन या अध्यापन से संबंधित लोकप्रिय विवरणों को एक समान ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त नहीं हैं।

GK Fact:- तक्षशिला के पुरातात्विक अवशेष आज पाकिस्तान में स्थित हैं और यह क्षेत्र प्राचीन गांधार सभ्यता के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है।

बौद्ध धर्म (Buddhism) इतिहास, संस्थापक, सिद्धांत और प्रमुख शिक्षाएँ :-

नालंदा: एशिया के विद्वानों को आकर्षित करने वाला शिक्षा केंद्र :-

बिहार में स्थित नालंदा प्राचीन भारत के सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्रों में गिना जाता है। इसकी ख्याति भारत की सीमाओं से बाहर तक पहुँची हुई थी। चीन और तिब्बत सहित एशिया के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वान यहाँ अध्ययन और बौद्धिक संवाद के लिए आए।

नालंदा की स्थापना सामान्यतः गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल से जोड़ी जाती है। लगभग पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में विकसित हुआ यह संस्थान आगे चलकर एक विशाल बौद्ध शिक्षा केंद्र में बदल गया।

नालंदा में शिक्षा :-

नालंदा में बौद्ध दर्शन का विशेष महत्व था, लेकिन शिक्षा केवल बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं थी। व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन और अन्य विषयों का भी अध्ययन किया जाता था।

नालंदा की विशेषता उसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप था। यहाँ आने वाले विदेशी यात्रियों ने इसकी शिक्षा व्यवस्था और विद्वानों का उल्लेख किया है।

ह्वेनसांग और नालंदा

नालंदा के इतिहास को समझने में चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) का विवरण बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने भारत की यात्रा के दौरान नालंदा में अध्ययन किया और यहाँ के प्रसिद्ध आचार्य शिलभद्र से शिक्षा प्राप्त की।

ह्वेनसांग के विवरण से उस समय नालंदा में होने वाले अध्ययन, मठों और विद्वानों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

एक अन्य चीनी यात्री इत्सिंग (Yijing) ने भी भारत और नालंदा की शिक्षा परंपरा का उल्लेख किया।

नालंदा का पुस्तक-संग्रह :-

नालंदा में बड़ी संख्या में पांडुलिपियों और ग्रंथों के संग्रह का उल्लेख मिलता है। यहाँ बौद्ध साहित्य के अलावा दर्शन, व्याकरण और अन्य विषयों से संबंधित ज्ञान सामग्री भी उपलब्ध थी।

नालंदा के पुस्तकालय के आकार और पुस्तकों की संख्या के बारे में कई लोकप्रिय दावे मिलते हैं। लेकिन इन संख्याओं को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए, क्योंकि सभी दावों के लिए समान स्तर के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

नालंदा का पतन :-

12वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और उसके बाद बिहार के बौद्ध शिक्षा केंद्र राजनीतिक और सैन्य उथल-पुथल से प्रभावित हुए। नालंदा भी इससे अछूता नहीं रहा।

नालंदा के विनाश को सामान्यतः तुर्क सैन्य अभियानों से जोड़ा जाता है। इसके बाद यहाँ की पुरानी शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

आज नालंदा के अवशेष भारत की प्राचीन शिक्षा, बौद्ध संस्कृति और स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

GK Fact: नालंदा के पुरातात्विक अवशेष बिहार में स्थित हैं और प्राचीन नालंदा महाविहार को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।

विक्रमशिला: पाल काल का प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र :-

विक्रमशिला वर्तमान बिहार के भागलपुर क्षेत्र में स्थित एक महत्वपूर्ण प्राचीन बौद्ध शिक्षा केंद्र था। इसकी स्थापना पाल वंश के शासक धर्मपाल के शासनकाल में मानी जाती है।

पाल शासकों ने बिहार और बंगाल में बौद्ध धर्म तथा उससे जुड़े शिक्षा केंद्रों को संरक्षण दिया। इसी वातावरण में विक्रमशिला का विकास हुआ।

विक्रमशिला की विशेषता :-

विक्रमशिला विशेष रूप से बौद्ध दर्शन और बौद्ध विद्या की कुछ विशिष्ट परंपराओं के अध्ययन के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ विद्वानों और विद्यार्थियों के लिए व्यवस्थित शैक्षणिक वातावरण विकसित किया गया था।

विक्रमशिला का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। इसके विद्वानों ने हिमालयी क्षेत्रों और तिब्बत में बौद्ध ज्ञान के प्रसार में योगदान दिया।

अतीश दीपंकर और विक्रमशिला :-

विक्रमशिला से जुड़े प्रमुख विद्वानों में अतीश दीपंकर श्रीज्ञान का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। वे बौद्ध दर्शन के महत्वपूर्ण आचार्य थे और बाद में तिब्बत गए, जहाँ उन्होंने बौद्ध परंपरा के विकास में योगदान दिया।

इस प्रकार विक्रमशिला भारत और तिब्बत के बीच बौद्ध ज्ञान के आदान-प्रदान की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी बना।

विक्रमशिला का पतन :-

पाल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ बिहार और बंगाल के कई बौद्ध शिक्षा केंद्रों को मिलने वाला राजकीय संरक्षण भी कम हुआ। बाद के राजनीतिक परिवर्तनों और सैन्य अभियानों ने इन संस्थानों को और प्रभावित किया।

विक्रमशिला भी अंततः नष्ट हो गया और शिक्षा के एक सक्रिय केंद्र के रूप में उसका अस्तित्व समाप्त हो गया।

तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला में क्या अंतर था?

तीनों संस्थानों को एक ही तरह का “विश्वविद्यालय” मानना पूरी तरह सही नहीं है। वे अलग-अलग समय और राजनीतिक परिस्थितियों में विकसित हुए थे।

आधार तक्षशिला नालंदा विक्रमशिला
वर्तमान स्थानपाकिस्तानबिहारबिहार
प्रमुख कालप्राचीन काल लगभग पाचवी शताब्दी लगभग आठवी नवी शताब्दी
प्रमुख क्षेत्र गांधार मगध मगध क्षेत्र
प्रमुख शिक्षा परंपराबहुविषयकबौद्ध एवं बहुविषयकबौद्ध विद्या
प्रमुख संरक्षणविभिन्न शासक गुप्त एवं बाद के शासक पाल वंश
प्रसिद्ध व्यक्तित्वपाणिनि से परंपरागत संबंधह्वेनसांग, शिलभद्रअतीश दीपंकर

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि तीनों शिक्षा केंद्रों की अपनी अलग पहचान थी।

प्राचीन भारत के इन शिक्षा केंद्रों का महत्व :-

इन संस्थानों का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे बहुत पुराने थे। उनकी वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता इस बात में है कि उन्होंने ज्ञान के प्रसार और विभिन्न क्षेत्रों के बीच बौद्धिक संपर्क को बढ़ावा दिया।

तक्षशिला व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों के संपर्क क्षेत्र में था। नालंदा ने चीन और अन्य एशियाई क्षेत्रों के विद्वानों को आकर्षित किया। विक्रमशिला के विद्वानों ने तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों में बौद्ध ज्ञान के प्रसार में भूमिका निभाई।

इस प्रकार इन संस्थानों को प्राचीन भारत के व्यापक सांस्कृतिक और बौद्धिक नेटवर्क का हिस्सा माना जा सकता है।

आधुनिक समय में इनकी विरासत :-

आज तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला के अवशेष इतिहास और पुरातत्व के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था, स्थापत्य, धर्म और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संपर्क का अध्ययन किया जाता है।

विशेष रूप से नालंदा की विरासत को आधुनिक समय में फिर से महत्व मिला है। प्राचीन नालंदा महाविहार का पुरातात्विक परिसर UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

इन स्थानों की विरासत हमें यह समझने में मदद करती है कि भारतीय उपमहाद्वीप में शिक्षा की परंपरा केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं थी। ज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान भारत से बाहर के क्षेत्रों तक भी हुआ।

नालंदा के इतिहास, पुरातात्त्विक अवशेष और विश्व धरोहर संबंधी जानकारी के लिए।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य :-

1. तक्षशिला वर्तमान में किस देश में स्थित है?
उत्तर: पाकिस्तान

2. तक्षशिला किस प्राचीन क्षेत्र का महत्वपूर्ण नगर था?
उत्तर: गांधार

3. नालंदा वर्तमान में किस राज्य में स्थित है?
उत्तर: बिहार

4. नालंदा की स्थापना किस शासक के शासनकाल से जोड़ी जाती है?
उत्तर: कुमारगुप्त प्रथम

5. नालंदा में अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध चीनी यात्री कौन थे?
उत्तर: ह्वेनसांग

6. ह्वेनसांग ने नालंदा में किस आचार्य से शिक्षा प्राप्त की?
उत्तर: शिलभद्र

7. विक्रमशिला की स्थापना किस पाल शासक से संबंधित है?
उत्तर: धर्मपाल

8. अतीश दीपंकर का संबंध किस शिक्षा केंद्र से था?
उत्तर: विक्रमशिला

9. तक्षशिला किस क्षेत्र में स्थित था?
उत्तर: गांधार

10. नालंदा के प्राचीन अवशेष किस राज्य में हैं?
उत्तर: बिहार

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :-

क्या तक्षशिला को भारत का पहला विश्वविद्यालय कहा जा सकता है?

तक्षशिला को प्राचीन भारत के सबसे पुराने उच्च शिक्षा केंद्रों में गिना जाता है, लेकिन “पहला विश्वविद्यालय” कहना आधुनिक विश्वविद्यालय की अवधारणा को प्राचीन व्यवस्था पर लागू करना होगा। इसलिए इसे एक महत्वपूर्ण प्राचीन शिक्षा केंद्र कहना अधिक उचित है।

  • नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की थी?

नालंदा की स्थापना सामान्यतः गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल से जोड़ी जाती है।

  • विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की?

विक्रमशिला की स्थापना पाल शासक धर्मपाल के शासनकाल में मानी जाती है।

  • तक्षशिला कहाँ स्थित था?

प्राचीन तक्षशिला वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में स्थित था।

  • नालंदा कहाँ स्थित है?

प्राचीन नालंदा महाविहार के अवशेष वर्तमान बिहार में स्थित हैं।

  • विक्रमशिला किसके लिए प्रसिद्ध था?

विक्रमशिला विशेष रूप से बौद्ध दर्शन और बौद्ध विद्या की परंपरा के लिए प्रसिद्ध था।

  • भारत के इन प्राचीन शिक्षा केंद्रों का सबसे बड़ा महत्व क्या था?

इनका महत्व शिक्षा के साथ-साथ ज्ञान, संस्कृति और विभिन्न क्षेत्रों के बीच बौद्धिक आदान-प्रदान के केंद्र के रूप में था।

निष्कर्ष :-

तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला को केवल प्राचीन इमारतों या खंडहरों के रूप में देखना इनके इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा। ये ऐसे शिक्षा केंद्र थे जिनके माध्यम से अलग-अलग क्षेत्रों के विद्यार्थी, शिक्षक और विचार एक-दूसरे के संपर्क में आए।

तक्षशिला की बहुविषयक शिक्षा परंपरा, नालंदा की अंतरराष्ट्रीय विद्वत् प्रतिष्ठा और विक्रमशिला की बौद्ध विद्या की परंपरा—तीनों मिलकर भारतीय इतिहास में शिक्षा के विकास की एक महत्वपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

आज इनसे जुड़े पुरातात्विक स्थल हमें अतीत की उस दुनिया से जोड़ते हैं, जहाँ ज्ञान की यात्रा सीमाओं से बंधी नहीं थी।

लाला लाजपत राय (1865–1928): जीवन परिचय, योगदान, आंदोलन एवं मृत्यु |

लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों में से एक थे। वे एक निर्भीक राष्ट्रवादी, समाज सुधारक, शिक्षाविद्, लेखक, पत्रकार और प्रभावशाली वक्ता थे। उनके अदम्य साहस और देशभक्ति के कारण उन्हें “पंजाब केसरी” या “शेर-ए-पंजाब” के नाम से सम्मानित किया गया। उन्होंने भारतीयों में स्वाभिमान, आत्मविश्वास और स्वतंत्रता की भावना जागृत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लाला लाजपत राय

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जन्म एवं प्रारंभिक जीवन :-

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के लुधियाना जिले के धुड़ीके गाँव में एक वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता मुंशी राधाकृष्ण अग्रवाल अध्यापक थे तथा माता गुलाब देवी धार्मिक एवं संस्कारी महिला थीं। परिवार से मिले संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को प्रारंभ से ही राष्ट्रभक्ति और समाज सेवा की ओर प्रेरित किया।

शिक्षा एवं वकालत :-

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में प्राप्त की और आगे चलकर कानून की पढ़ाई पूरी की। वकालत की शुरुआत उन्होंने हिसार में की, लेकिन बाद में लाहौर चले गए। यहीं से उनका सार्वजनिक जीवन अधिक सक्रिय हुआ और वे राष्ट्रीय आंदोलन से गहराई से जुड़ गए।

आर्य समाज से जुड़ाव :-

स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर लाला लाजपत राय आर्य समाज के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। उनका विश्वास था कि शिक्षा और सामाजिक सुधार के बिना राष्ट्र का विकास संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से उन्होंने डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर की स्थापना और उसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र जागरण :-

लाला लाजपत राय ने पत्रकारिता को जनचेतना का प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने ‘पंजाबी’, ‘वंदेमातरम्’ तथा अंग्रेज़ी समाचार पत्र ‘द पीपल (The People)’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की और भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना को मजबूत किया।

‘बाल-लाल-पाल’ की त्रिमूर्ति :-

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की तिकड़ी ‘बाल-लाल-पाल’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस त्रिमूर्ति ने उग्र राष्ट्रवाद को नई दिशा दी और स्वदेशी आंदोलन को जन-आंदोलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इंग्लैंड और अमेरिका की यात्रा :-

1905 में वे गोपाल कृष्ण गोखले के साथ इंग्लैंड गए, जहाँ उन्होंने भारत की वास्तविक स्थिति से ब्रिटिश जनता को परिचित कराने का प्रयास किया। बाद में वे अमेरिका भी गए और वहाँ भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए अनेक व्याख्यान दिए।

कांग्रेस और स्वराज्य दल :-

सन् 1920 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए। प्रारंभ में वे महात्मा गांधी की असहयोग नीति से पूरी तरह सहमत नहीं थे, लेकिन बाद में उसका समर्थन किया। 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेने के निर्णय से असहमति होने पर उन्होंने चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के साथ स्वराज्य दल के गठन में सहयोग दिया तथा केंद्रीय विधान सभा के सदस्य बने।

साइमन कमीशन का विरोध और शहादत :-

सन् 1928 में ब्रिटिश सरकार द्वारा साइमन कमीशन भारत भेजा गया, जिसमें कोई भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। इसका पूरे देश में विरोध हुआ। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते समय पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए। अंततः 17 नवम्बर 1928 को उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। महात्मा गांधी ने उनकी मृत्यु पर कहा था, “भारतीय सौर मण्डल से एक सितारा डूब गया है।”

उनका प्रसिद्ध कथन था :-

“मेरे शरीर पर पड़ी प्रत्येक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की एक कील सिद्ध होगी।”

लाला लाजपत राय का योगदान :-

  •  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
  •  स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा का समर्थन किया।
  •  आर्य समाज के माध्यम से सामाजिक सुधार को बढ़ावा दिया।
  •  डी.ए.वी. शिक्षा आंदोलन को मजबूत बनाया।
  •  पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया।
  •  स्वराज्य दल के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  •  साइमन कमीशन के विरोध का नेतृत्व किया।

निष्कर्ष :-

लाला लाजपत राय का जीवन राष्ट्रभक्ति, त्याग और साहस का प्रेरणादायक उदाहरण है। उन्होंने अपने विचारों, लेखनी, संघर्ष और बलिदान से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की। उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और भारतीय इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

Frequently Asked Questions (FAQ) :-

प्रश्न 1. लाला लाजपत राय का जन्म कब हुआ था?
उत्तर: 28 जनवरी 1865।

प्रश्न 2. लाला लाजपत राय को किस उपनाम से जाना जाता है?
उत्तर: पंजाब केसरी (शेर-ए-पंजाब)।

प्रश्न 3. लाला लाजपत राय किस प्रसिद्ध त्रिमूर्ति के सदस्य थे?
उत्तर: बाल-लाल-पाल।

प्रश्न 4. लाला लाजपत राय की मृत्यु कब हुई?
उत्तर: 17 नवम्बर 1928।

प्रश्न 5. उनकी मृत्यु का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुए पुलिस लाठीचार्ज में लगी गंभीर चोटें।

संबंधित आधिकारिक स्रोत :- National Archives of India – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित दस्तावेज़।

क्रिप्स मिशन (1942): उद्देश्य, मुख्य प्रावधान, असफलता के कारण | सम्पूर्ण जानकारी

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में क्रिप्स मिशन (Cripps Mission) एक महत्व पूर्ण घटना थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में बढ़ते राजनीतिक संकट को दूर करने तथा भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से मार्च 1942 में सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक मिशन भारत भेजा।

क्रिप्स मिशन

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सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स ब्रिटिश संसद के सदस्य, प्रसिद्ध मजदूर नेता तथा ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य थे। वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार की नीतियों और सीमाओं के कारण उनका मिशन सफल नहीं हो सका।

क्रिप्स मिशन क्यों भेजा गया?

क्रिप्स मिशन भेजे जाने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध अपने निर्णायक चरण में था और ब्रिटेन अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहा था।

मुख्य कारण निम्नलिखित थे—

1. जापान का बढ़ता खतरा :-

दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटेन को लगातार पराजय का सामना करना पड़ रहा था। जापानी सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी और भारत पर आक्रमण की आशंका बढ़ गई थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटेन को भारत के सहयोग की आवश्यकता थी।

2. मित्र राष्ट्रों का दबाव :-

अमेरिका, सोवियत संघ और चीन जैसे मित्र राष्ट्र चाहते थे कि ब्रिटेन भारत को राजनीतिक अधिकार देकर भारतीय जनता का विश्वास प्राप्त करे। इसलिए ब्रिटेन पर भारत के साथ समझौता करने का दबाव बढ़ गया।

3. भारतीयों का समर्थन प्राप्त करना :-

भारतीय नेताओं ने स्पष्ट किया था कि यदि भारत को उत्तरदायी शासन दिया जाए तथा युद्ध के बाद पूर्ण स्वतंत्रता का आश्वासन मिले, तभी भारतीय जनता ब्रिटेन का पूरा सहयोग करेगी।

क्रिप्स मिशन के मुख्य प्रावधान :-

क्रिप्स मिशन ने भारत के भविष्य के लिए कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव प्रस्तुत किए।

1. डोमिनियन स्टेटस :-

युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस (Dominion Status) दिया जाएगा। भारत राष्ट्रमंडल के साथ अपने संबंध स्वयं तय करेगा तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में स्वतंत्र रूप से भाग ले सकेगा।

2. संविधान सभा का गठन :-

युद्ध समाप्त होने के बाद नया संविधान बनाने के लिए एक संविधान निर्मात्री परिषद (Constituent Assembly) बनाई जाएगी।

  • कुछ सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा चुने जाएंगे।
  • देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन उनके शासकों द्वारा किया जाएगा।

3. नए संविधान को स्वीकार करने की शर्तें :-

ब्रिटिश सरकार संविधान सभा द्वारा बनाए गए संविधान को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार करेगी।

  • जो प्रांत संविधान स्वीकार नहीं करेंगे, उन्हें भारतीय संघ से अलग होने का अधिकार होगा।
  • ऐसे प्रांत अपना अलग संविधान बना सकेंगे।
  • देशी रियासतों को भी यही अधिकार प्राप्त होगा।
  • सत्ता के हस्तांतरण तथा अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा पर ब्रिटिश सरकार और संविधान सभा के बीच समझौता होगा।

4. रक्षा का नियंत्रण :-

जब तक नई व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक भारत की रक्षा और सुरक्षा का दायित्व ब्रिटिश सरकार के पास रहेगा। गवर्नर-जनरल की शक्तियाँ भी पहले की तरह बनी रहेंगी।

और पढ़े :- दांडी मार्च(Dandi March)| एक क्रांति की शुरुआत (12 मार्च – 6 अप्रैल, 1930)

क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों की विशेषताएँ :-

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव पहले दिए गए प्रस्तावों की तुलना में कुछ महत्वपूर्ण मामलों में अलग थे।

  • पहली बार संविधान बनाने का अधिकार भारतीयों को दिया गया।
  • संविधान सभा के गठन की स्पष्ट योजना प्रस्तुत की गई।
  • प्रांतों को भारतीय संघ से अलग होने का विकल्प दिया गया।
  • स्वतंत्र भारत को राष्ट्रमंडल से अलग होने की स्वतंत्रता दी गई।
  • भारतीयों की प्रशासन में अधिक भागीदारी का आश्वासन दिया गया।

हालाँकि, यही प्रावधान बाद में विवाद का प्रमुख कारण भी बने।

क्रिप्स मिशन क्यों असफल हुआ?

क्रिप्स मिशन भारतीयों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका। लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने इसके प्रस्तावों का विरोध किया।

कांग्रेस के विरोध के कारण :-

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने निम्न आधारों पर क्रिप्स मिशन को अस्वीकार किया—

  • भारत को पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर केवल डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव।
  • देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के लिए चुनाव के बजाय मनोनयन की व्यवस्था।
  • प्रांतों को भारतीय संघ से अलग होने का अधिकार, जिससे राष्ट्रीय एकता को खतरा था।
  • सत्ता के तत्काल हस्तांतरण का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
  • रक्षा विभाग पर भारतीयों का वास्तविक नियंत्रण नहीं दिया गया।
  • गवर्नर-जनरल की व्यापक शक्तियाँ यथावत रखी गईं।

कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों का अध्ययन किया और वार्ता में भाग लिया।

मुस्लिम लीग के विरोध के कारण :-

मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स मिशन को स्वीकार नहीं किया।

इसके प्रमुख कारण थे—

  • लीग एक संयुक्त भारतीय संघ के पक्ष में नहीं थी।
  • संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया से वह संतुष्ट नहीं थी।
  • प्रस्तावों में पृथक पाकिस्तान की मांग स्वीकार नहीं की गई थी।
  • मुसलमानों के आत्मनिर्णय के सिद्धांत को स्पष्ट मान्यता नहीं दी गई।

अन्य दलों का विरोध :-

अन्य राजनीतिक दलों और समूहों ने भी विभिन्न कारणों से इन प्रस्तावों का विरोध किया।

  • उदारवादियों ने प्रांतों को अलग होने का अधिकार देने का विरोध किया।
  • हिन्दू महासभा ने इसे भारत की एकता के विरुद्ध बताया।
  • दलित नेताओं को आशंका थी कि विभाजन की स्थिति में उनके हित प्रभावित होंगे।
  • सिक्खों को भय था कि पंजाब का विभाजन उनके हितों के लिए हानिकारक होगा।

ब्रिटिश सरकार की भूमिका :-

ब्रिटिश सरकार ने यह स्पष्ट किया कि क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव 1940 के अगस्त प्रस्ताव का ही विस्तृत रूप हैं। इससे भारतीय नेताओं को लगा कि ब्रिटिश सरकार वास्तव में सत्ता हस्तांतरण के प्रति गंभीर नहीं है।

क्रिप्स ने प्रारंभ में राष्ट्रीय सरकार के गठन की बात कही, लेकिन बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका आशय केवल कार्यकारिणी परिषद के विस्तार से था। इससे भारतीय नेताओं का विश्वास और कम हो गया।

असफलता के प्रमुख कारण :-

क्रिप्स मिशन की असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—

  • पूर्ण स्वतंत्रता का स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया।
  • सत्ता के तत्काल हस्तांतरण की योजना नहीं थी।
  • रक्षा विभाग ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में रखा गया।
  • गवर्नर-जनरल की शक्तियाँ कम नहीं की गईं।
  • प्रांतों को अलग होने का अधिकार देकर विभाजन की संभावना बढ़ाई गई।
  • संविधान लागू करने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं थी।
  • ब्रिटिश सरकार की वास्तविक मंशा पर भारतीय नेताओं को विश्वास नहीं था।
  • चर्चिल, लॉर्ड लिनलिथगो, एमरी तथा वेवेल जैसे ब्रिटिश नेताओं का पूरा समर्थन मिशन को प्राप्त नहीं था।
  • वायसराय के वीटो अधिकार के प्रश्न पर कांग्रेस और क्रिप्स के बीच वार्ता टूट गई।

गांधीजी और नेहरू की प्रतिक्रिया :-

महात्मा गांधी ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों की तीखी आलोचना करते हुए कहा—

“यह आगे की तारीख का चेक था, जिसका बैंक नष्ट होने वाला था।”
(It was a post-dated cheque on a crashing bank.)

जवाहरलाल नेहरू ने कहा—

“क्रिप्स योजना को स्वीकार करना भारत को अनिश्चित खंडों में विभाजित करने का मार्ग प्रशस्त करना था।”

इन टिप्पणियों से स्पष्ट होता है कि भारतीय नेतृत्व को इन प्रस्तावों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

क्रिप्स मिशन का परिणाम :-

क्रिप्स मिशन अप्रैल 1942 में बिना किसी समझौते के समाप्त हो गया। सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स इंग्लैंड लौट गए और भारतीय जनता में ब्रिटिश सरकार के प्रति असंतोष और बढ़ गया।

इस असफलता के बाद भारतीय नेताओं को विश्वास हो गया कि ब्रिटिश सरकार स्वेच्छा से सत्ता हस्तांतरित नहीं करेगी। यही वातावरण आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement), 1942 की पृष्ठभूमि बना।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य :-

  • वर्ष: मार्च 1942
  • नेतृत्व: सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स
  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री: विंस्टन चर्चिल
  • मुख्य उद्देश्य: द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का सहयोग प्राप्त करना
  • मुख्य प्रस्ताव: युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस और संविधान सभा का गठन
  • सबसे विवादास्पद प्रावधान: प्रांतों को भारतीय संघ से अलग होने का अधिकार
  • गांधीजी की टिप्पणी: “आगे की तारीख का चेक, जिसका बैंक नष्ट होने वाला था।”
  • परिणाम: मिशन असफल रहा और इसके बाद भारत छोड़ो आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

निष्कर्ष :-

क्रिप्स मिशन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण लेकिन असफल राजनीतिक प्रयास था। ब्रिटिश सरकार भारतीयों का विश्वास जीतने में असफल रही क्योंकि उसके प्रस्तावों में तत्काल सत्ता हस्तांतरण, पूर्ण स्वतंत्रता और वास्तविक उत्तरदायी शासन का अभाव था। मिशन की विफलता ने भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना को और अधिक प्रबल किया तथा अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। परीक्षा की दृष्टि से क्रिप्स मिशन के उद्देश्य, प्रमुख प्रावधान, असफलता के कारण और गांधीजी की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं।

अधिक जानकारी के लिए :- National Archives Of India

बौद्ध धर्म (Buddhism) इतिहास, संस्थापक, सिद्धांत और प्रमुख शिक्षाएँ

बौद्ध धर्म के संस्थापक सिद्धार्थ थे, जिन्हें गौतम के नाम से भी जाना जाता है। यह वह समय था जब लोगों के जीवन में तेजी से परिवर्तन हो रहे थे। महाजनपदों के कुछ राजा इस समय बहुत शक्तिशाली हो गए थे। हजारों सालों के बाद फिर से नगर उभर रहे थे। गांवों के जीवन में भी बदलाव आ रहा था। बहुत से विचारक इन परिवर्तनों को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जीवन के सच्चे अर्थ को भी जानना चाह रहे थे।

बौद्ध धर्म

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सिद्धार्थ का जन्म 566 ई.पू. में शाक्य कुल में हुआ था।
प्रो. रामशरण शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत’ कक्षा-11 में महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. बताया है।
वे कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी वन (नेपाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा के पास) में पैदा हुए थे।

उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के राजा थे। उनकी माता का नाम मायादेवी था, जो कोशल राजवंश की कन्या थीं। वह गौतम के जन्म के सात दिन बाद ही चल बसी थीं। एक जनश्रुति के अनुसार यह कहा जाता है कि एक ज्योतिषी ने यह भविष्यवाणी की थी कि गौतम या तो एक महान चक्रवर्ती सम्राट होंगे या फिर एक महान संन्यासी।

गौतम का छोटी आयु में विवाह यशोधरा नामक एक सुंदर कन्या से कर दिया। यशोधरा से गौतम को एक पुत्र राहुल, प्राप्त हुआ। किंतु गौतम, एक बार एक बूढ़े आदमी की दुर्दशा और फिर एक रोगी के कष्टों को देखकर द्रवित हो गए तथा उन्होंने एक मरे हुए आदमी को देखा तब तो वे घबरा गए। सांसारिक दुखों से दुखी होकर वे संन्यास की ओर आकर्षित हुए, फिर 29 वर्ष की आयु में एक रात को उन्होंने अपना घर-बार, पत्नी, बच्चे तथा संपूर्ण सांसारिक जीवन को छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया।

ज्ञान प्राप्ति के लिए उन्होंने बोधगया (बिहार) में एक पीपल वृक्ष के नीचे कई दिनों तक तपस्या की। अंततः 35 वर्ष की आयु में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद से वे बुद्ध के रूप में जाने गए। प्रज्ञा प्राप्त होने के बाद बुद्ध ने काशी के पास मृगवन अथवा मृगदाव (आधुनिक सारनाथ) में पदार्पण किया और वहां अपना पहला उपदेश दिया, जिसे “धर्म चक्रप्रवर्तन” (धर्म प्रचार का प्रारंभ) कहा जाता है। कुशीनारा में मृत्यु से पहले का शेष जीवन उन्होंने पैदल ही एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने और लोगों को शिक्षा देने में व्यतीत किया।

जीवन के सिद्धांत एवं दर्शन :-

जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्वाण यानी शांति और परमानंद की स्थिति प्राप्त करना है। जिसका अर्थ है- जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।
 कुछ स्थलों पर बुद्ध ने इस संपूर्ण प्रक्रिया को इन तीन शब्दों में सीमित कर दिया है-
 शील (सदाचार)
 समाधि (सम्यक् ध्यान)
 प्रज्ञा (सम्यक् ज्ञान)

  •  बुद्ध के निर्वाण के दो सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
  •  बुद्ध के उपदेशों में प्रचारित नैतिक सिद्धांत बहुत सरल थे, जैसे- मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्णायक है, कोई देवी देवता या ईश्वर नहीं।
  • सामान्य नैतिक नियमों जैसे सच बोलना, दान देना, तन-मन को शुद्ध रखना और काम क्रोधादि मनोवेगों पर नियंत्रण रखने के अतिरिक्त – बौद्ध धर्म ने प्रेम, दया, धृति (धैर्य) और सभी प्राणियों के प्रति वैचारिक, शाब्दिक और कार्मिक अहिंसा, पर बल दिया।
  •  बौद्ध धर्म ने मोक्ष-प्राप्ति के लिए वैदिक कर्मकांड और अनुष्ठान विधियों की प्रभावकारिता को अस्वीकार किया और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को भी नहीं माना।

बुद्ध के अनुयायी (Followers of Buddha)

बुद्ध के अनुयायी दो श्रेणियों में विभाजित हैं :
उपासक :- यानी साधारण अनुयायी जो गृहस्थ जीवन में रहते हैं,

भिक्षु (बौद्ध संन्यासी):-, जो संसार को त्याग कर संन्यासी का जीवन बिताते हैं।
 भिक्षु, संघों में रहते हैं, जिनकी स्थापना प्रारंभ में स्वयं बुद्ध ने की थी।

  •  स्त्रियों को भी संघ में प्रवेश दिया जाता था और उन्हें भिक्षुणी कहा जाता था।
  •  बौद्ध धर्म में सभी अनुयायियों को समान अधिकार प्राप्त होते थे, चाहे वे किसी भी वर्ण या जाति के हों।
  • ई.पू. 483 में कुशीनगर में बुद्ध का निर्वाण (निधन) हो गया। उस समय उनकी आयु 80 वर्ष की थी।
  • प्रो. मक्खन लाल ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत में’ बताया है कि “ई.पू. 486 में कुशीनगर में बुद्ध का निर्वाण (निधन) हो गया उस समय उनकी आयु 80 वर्ष थी।”

(i) स्तूप (Stupa)

स्तूप:- ऐसे स्थल जहां पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियां या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।
स्तूप की संरचना:- स्तूप का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना ज़्यादा जटिल हो गई जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढांचा देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे जिस पर अक्सर एक छतरी लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।

सामाजिक एवं धार्मिक सुधार :-

  • बुद्ध ने धार्मिक यज्ञ अनुष्ठानों में पशुओं की हत्या को अमानवीय बताया।
  • पशुओं के प्रति इस दृष्टिकोण से शाकाहारी खान-पान को बढ़ावा मिला।
  • सदाचारी जीवन बिताने का उद्देश्य मन को शुद्ध करना और निर्वाण प्राप्त करना।
  • वर्ण-व्यवस्था को दिए जाने वाले महत्त्व का उन्होंने विरोध किया, क्योंकि उच्च वर्ण वाले निम्न वर्ण वालों, शूद्रों तथा दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करते थे।

 विहार :- वे स्थान होते थे, जहां बौद्ध भिक्षु रहते थे और आराधना तथा धर्मोपदेश देते हुए जीवन व्यतीत करते थे। ये विहार पाठशालाओं के रूप में भी काम करते थे।

  • भिक्षु जगह-जगह नए विचारों का प्रचार करते रहते थे, इसीलिए बौद्ध धर्म जल्दी ही भारत के अनेक भागों में फैल गया।
  • इसने भारतीय जीवन के प्रायः सभी पक्षों को प्रभावित किया।
    बौद्ध विहार, शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र बन गए।
  • धनी व्यापारी बौद्धों को धन दान में देते थे और सुंदर स्मारक बनवाते थे। इन्हें सर्वोत्तम शिल्पों से सजाया गया था।
  • बाद में बौद्ध भिक्षु भारतीय संस्कृति को एशिया के दूसरे देशों में भी ले गए; जैसे- मध्य एशिया, चीन, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश।
  • बौद्धों और जैनों ने अहिंसा के सिद्धांत को लोकप्रिय बना दिया।

बुद्ध की शिक्षाएं (Buddha’s Teachings)

बुद्ध की शिक्षाओं के आधारभूत सिद्धांत में चार आर्य-सत्य (उदात्त सच्चाइयां) समाहित हैं, अर्थात्:
1. दुःख, यानी संसार दुःखमय है;
2. दुःख समुदाय, यानी दुःख उत्पन्न करने वाले कई कारण होते हैं;
3. दुःख निरोध, यानी दुःख को रोका जा सकता है; और
4. दुःख निरोधगामिनी-प्रतिपदा, यानी दुःख को रोकने का एक मार्ग होता है।

  • बुद्ध के अनुसार, लोग केवल काम (इच्छा या लालसा) के कारण दुःख पाते हैं और काम पर विजय पाना ही दुःखों से बचने का सुनिश्चित मार्ग है।
  • भगवान बुद्ध के अनुसार मृत्यु भी इन दुःखों से छुटकारा नहीं दिला सकती, क्योंकि मृत्यु के बाद पुनर्जन्म के साथ ही दुःखों का अंतहीन सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।
  • किंतु मनुष्य, अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करके इन दुःखों एवं कष्टों की श्रृंखला से मुक्त हो सकता है और निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर सकता है।

अष्टांगिक मार्ग (The Eightfold Path)

  1. सम्यक् दृष्टि
  2. सम्यक् संकल्प
  3. सम्यक् वाक्
  4. सम्यक् कर्मान्त
  5. सम्यक् आजीव
  6. सम्यक् व्यायाम
  7. सम्यक् स्मृति
  8. सम्यक् समाधि

 

बौद्ध धर्म की विशेषताएँ (Characteristics of Buddhism)

  • बुद्ध ने अपनी शिक्षा सामान्य लोगों की प्राकृत भाषा में दी।
  • बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता है।
  • बौद्ध धर्म  विशेष रूप से निम्न वर्णों का समर्थन पा सका, क्योंकि इसमें वर्ण व्यवस्था की निंदा की गई है।
  • बौद्ध संघ का दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो।
  • संघ में प्रवेश का अधिकार स्त्रियों को भी था, जिससे उन्हें पुरुषों की बराबरी प्राप्त होती थी। ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और अधिक जनतांत्रिक था।
  • अभी भी उत्तर बिहार के लोग गंगा के दक्षिण मगध में मरना पसंद नहीं करते हैं।
  • बुद्ध का व्यक्तित्व और धर्मोपदेश की प्रणाली दोनों ही बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक हुए।
    कठिन स्थितियों में भी वे धीर और शांत बने रहते थे
  • कहा जाता है कि एक बार एक अज्ञानी व्यक्ति ने उन्हें गालियां दीं। वे चुपचाप सुनते रहे। जब उस व्यक्ति का गाली देना बंद हुआ तो उन्होंने पूछा, “वत्स, यदि कोई दान को स्वीकार नहीं करे तो उस दान का क्या होगा?” विरोधी ने उत्तर दिया, “वह देने वाले के पास ही रह जाएगा।” तब बुद्ध ने कहा, “वत्स, मैं तुम्हारी गालियां स्वीकार नहीं करता।”

बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण (Reasons for the Expansion of Buddhism)

  • जनसाधारण की भाषा पालि को अपनाने से भी बौद्ध धर्म के प्रचार को बल मिला।
    इससे आम जनता बौद्ध धर्म को सुगमता से समझ पाई।
  • गौतम बुद्ध ने संघ की स्थापना की, जिसमें हर व्यक्ति जाति या लिंग के भेद के बिना प्रवेश कर सकता था।                                                                                                     
  • भिक्षुओं के लिए एक ही शर्त थी कि उन्हें संघ के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना होगा।
    बौद्ध संघ में शामिल होने के बाद इसके सदस्यों को तीन संकल्प लेने पड़ते थे-
  1. इंद्रियनिग्रह                                                                                                    
  2. अपरिग्रह एवं
  3. श्रद्धा का

बौद्ध धर्म के त्रिरत्न: बुद्ध, धम्म, संघ)
संघ के तत्त्वावधान में सुगठित प्रचार की व्यवस्था होने से बुद्ध के जीवनकाल में ही बौद्ध धर्म ने तेजी से प्रगति की। मगध, कोसल और कौशाम्बी के राजाओं, अनेक गणराज्यों और वहां की जनता ने बौद्ध धर्म को अपना लिया।
 बुद्ध के निर्वाण के दो सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
 अशोक ने अपने धर्मदूतों के द्वारा इस धर्म को मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया और श्रीलंका में फैलाया और इसे विश्व धर्म का रूप दिया।
 आज भी श्रीलंका, बर्मा और तिब्बत तथा चीन और जापान के कुछ भागों में बौद्ध धर्म प्रचलित है।

बौद्ध धर्म की चुनौतियाँ, ह्रास और परिवर्तन

 हम देखते हैं कि आरंभ में प्रत्येक धर्म, सुधार की भावना से प्रेरित होता है, परंतु कालक्रमणे वह उन्हीं कर्मकांडों और अनुष्ठानों के जाल में फंस जाता है जिनकी वह आरंभ में निंदा करता है| इसमें भी ब्राह्मण धर्म की वे बुराइयां घुस गईं जिनके विरुद्ध इसने आरंभ में लड़ाई छेड़ी थी।

  • बौद्ध धर्म की चुनौतियों का सामना करने के लिए ब्राह्मणों ने —
     
  • अपने धर्म में सुधार किए,
  • गोधन की रक्षा पर बल दिया,
  • स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया।
  • दूसरी ओर बौद्ध धर्म में विकृतियां आती गईं।
     
  • धीरे-धीरे बौद्ध भिक्षु जनजीवन की मुख्य धारा से कटते गए।
  • उन्होंने जनसामान्य की भाषा पालि को छोड़ दिया और संस्कृत को ग्रहण कर लिया जो केवल विद्वानों की भाषा थी।
  • ईसा की पहली सदी से वे प्रतिमा पूजन करने लगे और बड़ी मात्रा में उपासकों से चढ़ावा भी लेने लगे।
  • इस चढ़ावे के अतिरिक्त बौद्ध विहारों को राजाओं से भी प्रचुर मात्रा में दान मिलने लगे।
  • इन सभी से बौद्ध भिक्षुओं का जीवन सुख का जीवन बन गया।
  • नालंदा जैसे बौद्ध विहार तो दो-दो सौ गांवों से कर वसूलते थे।
  • सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध विहार विलासी लोगों के प्रभुत्व में आ गए और कुकर्मों के केंद्र बन गए जिनका गौतम बुद्ध ने कड़ाई से निषेध किया था।
  • बौद्ध धर्म का यह नया रूप वज्रयान नाम से प्रसिद्ध हुआ। विहारों में अपार संपत्ति और स्त्रियों का प्रवेश होने से उनकी स्थिति और भी बिगड़ी।
  • बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे।
  • कहा गया है कि एक समय बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा था, “यदि विहारों में स्त्रियों का प्रवेश न हुआ होता तो यह धर्म हजार वर्ष टिकता लेकिन जब स्त्रियों को प्रवेशाधिकार दे दिया गया है, तो अब यह धर्म केवल पांच सौ वर्ष टिकेगा।”
  • कहा जाता है कि ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को सताया। सताए जाने के कई उदाहरण ईसा की छठी-सातवीं सदियों में मिलते हैं।
  • शैव संप्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतारा।
  • गौड़ देश के शिवभक्त शशांक ने बोध गया में उस बोधि वृक्ष को काट डाला जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
  • विहारों में अपार संपत्ति को देखकर तुर्की हमलावरों की ललचाई नजर उन पर पड़ी।
  • तुर्कों ने विहारों में अनेक बौद्धों का संहार किया यद्यपि कुछ भिक्षु जान बचाकर नेपाल और तिब्बत भाग गए।

बौद्ध धर्म के महत्त्व और प्रभाव (Importance and Influence of Buddhism)

  • ब्राह्मण धर्म में गाय की पूजनीयता और अहिंसा पर जोर देने का कारण, स्पष्टतः बौद्ध धर्म के उपदेशों का प्रभाव था।
  • बौद्ध धर्म ने बौद्धिक और साहित्यिक जगत में भी चेतना जगाई।
  • इसने लोगों को यह सुझाया कि किसी वस्तु को यों ही नहीं, बल्कि भली-भांति गुण-दोष का विवेचन करके ग्रहण करें।
  • बहुत हद तक अंधविश्वास का स्थान तर्क ने ले लिया। इससे लोगों में बुद्धिवाद पनपा।
    अपने नए धर्म के सिद्धांतों का प्रतिपादन करने के लिए बौद्धों ने नए प्रकार से साहित्य सर्जना की।
  • उन्होंने अपने लेखन से पालि भाषा को समृद्ध किया। आरंभिक पालि साहित्य तीन कोटियों में बांटा जा सकता है:
    प्रथम कोटि – बुद्ध के वचन एवं उपदेश
    द्वितीय कोटि – संघ के सदस्यों द्वारा पालनीय नियम
    तृतीय कोटि – धम्म का दार्शनिक विवेचन

 बौद्ध ग्रंथ किस प्रकार तैयार और संरक्षित किए जाते थे?

बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया। उनकी मृत्यु के बाद (पांचवीं-चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने ‘ज्येष्ठों’ या ज्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली (बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप) में बुलाई। वहां पर ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया। इन संग्रहों को त्रिपिटक कहा जाता है। ये हैं-
1. विनय पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था।               2.सुत्त पिटक में बुद्ध की शिक्षाओं का संग्रह था।
3.अभिधम्म पिटक में दर्शन संबंधी विषयों का संग्रह था।
 जब बौद्ध धर्म श्रीलंका जैसे नए इलाकों में फैला पवंशदी और महावंश जैसे क्षेत्र-विशेष के बौद्ध इतिहास को लिखा गया।

 इनमें से कई रचनाओं में बुद्ध की जीवनी लिखी गयी है।
थेरीगाथा:- यह अनूठा बौद्ध ग्रंथ सुत्त पिटक का हिस्सा है। इसमें भिक्षुणियों द्वारा रचित छंदों का संकलन किया गया है। इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर-दृष्टि मिलती है।

  • ईसा की प्रथम तीन सदियों में पालि और संस्कृत को मिलाकर बौद्धों ने एक नई भाषा विकसित की जिसे मिश्रित संस्कृत कहते हैं।
  • बौद्धों की साहित्यिक गतिविधियां मध्ययुग में भी चलती रहीं। पूर्वी भारत की कुछ प्रख्यात अपभ्रंश कृतियां बौद्धों की देन हैं।
  • बौद्ध विहार महान विद्या के केंद्र हो गए, जिन्हें आवासीय विश्वविद्यालय की संज्ञा दी जा सकती है।
  • इनमें, बिहार में नालंदा और विक्रमशिला तथा गुजरात में वल्लभी उल्लेखनीय हैं।

बौद्ध कला (Buddhist Art)

 भारत में पूजित पहली मानव-प्रतिमाएं शायद बुद्ध की हैं।
 श्रद्धालु उपासकों ने बुद्ध के जीवन की अनेक घटनाओं को पत्थरों में उकेरा। बिहार के गया तथा मध्य प्रदेश के सांची और भरहुत में जो चित्रफलक (पैनल) मिले हैं, वे बौद्ध कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
ईसा की पहली सदी से गौतम बुद्ध की फलक-प्रतिमाएं बनने लगीं।
 भिक्षुओं के निवास के लिए चट्टानों को काटकर कमरे बनाए जाने लगे और इस प्रकार, गया की बराबर पहाड़ियों में और पश्चिम भारत में नासिक के आसपास की पहाड़ियों में गुहा स्थापत्य की शुरुआत हुई।
 बौद्ध कला दक्षिण में कृष्णा डेल्टा में और उत्तर में मथुरा में फूली-फली।
 सांची, अमरावती, अजंता, नागार्जुन-कोण्डा तथा कार्ल में उत्कृष्ट बौद्ध कला के दर्शन होते हैं।

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1857 की क्रांति की शुरुआत कहाँ से हुई और इसके मुख्य नायक कौन थे? | 1857 Revolt in Hindi

 जानिए 1857 की क्रांति की शुरुआत कहाँ से हुई, इसके मुख्य कारण क्या थे और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर मंगल पांडे जैसे 1857 के विद्रोह के मुख्य नायक कौन थे।

भारतीय इतिहास में साल 1857 एक ऐसा मोड़ था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी। इसे ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ (First War of Independence) भी कहा जाता है। देश के कोने-कोने से राजाओं, सैनिकों, किसानों और आम जनता ने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई थी।

यदि आप इतिहास प्रेमी हैं या किसी प्रतियोगी परीक्षा (UPSC, SSC, State PSC) की तैयारी कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि 1857 की क्रांति की शुरुआत कहाँ से हुई और इस महान विद्रोह को दिशा देने वाले मुख्य नायक कौन थे। आइए इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।

1857 की क्रांति

 और पढ़े :- छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

1857 की क्रांति की शुरुआत कहाँ से हुई थी? (Origin of 1857 Revolt) :-

1857 के विद्रोह की कहानी को दो मुख्य भागों में समझा जा सकता है – पहली वो चिंगारी जिसने बारूद में आग लगाई, और दूसरा वो सामूहिक विस्फोट जिससे क्रांति की आधिकारिक शुरुआत हुई।

 1. बैरकपुर छावनी और मंगल पांडे (शुरुआती चिंगारी) :-

क्रांति की पहली घटना 29 मार्च 1857 को पश्चिम बंगाल की बैरकपुर छावनी में घटी। यहाँ 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने नए ‘एनफील्ड राइफल‘ के कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया। इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की अफवाह थी, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। मंगल पांडे ने रोष में आकर दो ब्रिटिश अधिकारियों पर गोली चला दी। इसके बाद 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई।

 2. मेरठ छावनी (क्रांति की आधिकारिक शुरुआत) :-

बैरकपुर की घटना के बाद असंतोष की आग उत्तर भारत में फैल गई। 10 मई 1857 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर से इस क्रांति की आधिकारिक और सामूहिक शुरुआत हुई। मेरठ छावनी के भारतीय सैनिकों ने खुला विद्रोह कर दिया। उन्होंने अपने साथी सैनिकों को जेल से छुड़ाया, ब्रिटिश अधिकारियों को मार गिराया और “दिल्ली चलो” के नारे के साथ दिल्ली की ओर कूच कर गए।

11 मई 1857 को इन क्रांतिकारियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र को भारत का सम्राट घोषित कर दिया।

 1857 की क्रांति के मुख्य नायक और उनके कार्यक्षेत्र :-

यह विद्रोह बहुत तेजी से उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत में फैल गया। अलग-अलग क्षेत्रों में कई महान नेताओं ने इस क्रांति का नेतृत्व किया। नीचे दी गई सारणी (Table) के माध्यम से आप प्रमुख नायकों और उनके क्षेत्रों को आसानी से समझ सकते हैं:

 1857 के विद्रोह के प्रमुख केंद्र और नेता :-

क्रमांक विद्रोह का केंद्र (Center) मुख्य नायक / नेतृत्वकर्ता (Leaders) ब्रिटिश दमनकर्ता (British Officer) |
1दिल्ली शाह जफ़र और जनरल बख्त खान जॉन निकलसन, हडसन
2झाँसी
रानी लक्ष्मीबाई|
ह्यूरोज़
3
कानपुर
नाना साहब और तात्या टोपे कॉलिन कैंपबेल
4लखनऊबेगम हज़रत महल कॉलिन कैंपबेल
5 बिहार (जगदीशपुर) कुंवर सिंह और अमर सिंह विलियम टेलर, विंसेंट आयर |
6फैजाबाद |मौलवी अहमदउल्ला कर्नल नील
7बरेली खान बहादुर खान जेम्स आउटराम |

 इन महान नायकों की वीरता की अनसुनी कहानियाँ :-

 1. रानी लक्ष्मीबाई (झाँसी) :-

जब अंग्रेजों ने ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) के तहत झाँसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की कोशिश की, तो रानी लक्ष्मीबाई ने गरजकर कहा था- मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। उन्होंने पीठ पर अपने दत्तक पुत्र को बांधकर अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया। उनकी वीरता को देखकर ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने कहा था कि विद्रोहियों में वह एकमात्र मर्द थीं।

 2. बाबू कुंवर सिंह (बिहार):-

बिहार के जगदीशपुर के जमींदार बाबू कुंवर सिंह ने 80 वर्ष की उम्र में इस क्रांति की कमान संभाली थी। जब एक लड़ाई के दौरान उनकी कलाई में अंग्रेजों की जहरीली गोली लगी, तो उन्होंने खुद अपनी तलवार से अपना हाथ काटकर गंगा मैया को समर्पित कर दिया था। उन्हें ‘बिहार का सिंह’ कहा जाता है।

 3. नाना साहब और तात्या टोपे (कानपुर) :-

पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब की पेंशन जब अंग्रेजों ने बंद कर दी, तो उन्होंने कानपुर में विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उनके सेनापति तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग) ने अपनी छापामार युद्ध नीति (Guerrilla Warfare) से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।

 1857 की क्रांति के मुख्य कारण क्या थे?

यह विद्रोह अचानक नहीं हुआ था, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से संचित हो रहा आक्रोश था:

राजनैतिक कारण: लॉर्ड डलहौजी की ‘हड़प नीति’ के कारण राजाओं में भारी असंतोष था।

आर्थिक कारण: अंग्रेजों की दमनकारी लगान व्यवस्था के कारण किसान और जमींदार कर्ज के जाल में डूब चुके थे।

धार्मिक और सामाजिक कारण: अंग्रेजों द्वारा सती प्रथा का अंत और ईसाई धर्म का प्रचार करने से भारतीयों को लगा कि उनका धर्म खतरे में है।

तत्कालिक कारण: एनफील्ड राइफल में चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग।

 निष्कर्ष (Conclusion):-

यद्यपि उचित समन्वय, आधुनिक हथियारों की कमी और कुछ स्थानीय शासकों द्वारा अंग्रेजों का साथ देने के कारण 1857 की क्रांति पूरी तरह सफल नहीं हो सकी, लेकिन इसने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) के हाथों में चला गया। इस क्रांति ने भारतीय जनमानस के भीतर राष्ट्रवाद का जो बीज बोया, उसी के परिणामस्वरूप आगे चलकर 1947 में भारत आज़ाद हुआ।

 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):-

Q.1 1857 की क्रांति का प्रतीक चिन्ह क्या था?

उत्तर: 1857 की क्रांति का प्रतीक चिन्ह ‘कमल का फूल और रोटी’ था, जिसका उपयोग संदेश फैलाने के लिए किया जाता था।

Q.2 भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम किसे कहा जाता है?

उत्तर: 1857 के विद्रोह को ही भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। यह नाम प्रसिद्ध इतिहासकार और स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) ने दिया था।

Q.3 1857 की क्रांति के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था?

उत्तर: 1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग (Lord Canning) था।

यदि आपको भारतीय इतिहास की यह जानकारी अच्छी लगी हो, तो इसे अपने दोस्तों और स्टडी ग्रुप्स में ज़रूर शेयर करें! कमेंट में बताएं कि आपका पसंदीदा स्वतंत्रता सेनानी कौन है।

और पढ़े :- दांडी मार्च(Dandi March)| एक क्रांति की शुरुआत (12 मार्च – 6 अप्रैल, 1930) 

दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) भारतीय राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ और ‘Grand Old Man of India’

​भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी उन महापुरुषों का नाम लिया जाता है जिन्होंने देश की आजादी की नींव रखी, तो दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्हें श्रद्धा से ‘भारत के वयोवृद्ध नेता’ (Grand Old Man of India) कहा जाता है।
​नौरोजी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक प्रखर अर्थशास्त्री, समाज सुधारक और शिक्षाविद् भी थे। आइए, इस ब्लॉग में उनके जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों को विस्तार से समझते हैं।

Dadabhai Naoroji

​और पढ़े :- छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा :-

​दादा भाई नौरोजी का जन्म आधुनिक महाराष्ट्र के खड़क नामक एक छोटे से गांव में एक निर्धन पारसी पुरोहित परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद उनकी मेधा अद्वितीय थी।
​

शिक्षा: उन्होंने बम्बई के प्रसिद्ध एलफिन्स्टन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।

​भारत की आशा: उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनके एक अंग्रेज प्रोफेसर ने उन्हें ‘भारत की आशा’ (The Promise of India) की संज्ञा दी थी।

​शिक्षण करियर: अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इसी कॉलेज में गणित और प्राकृतिक दर्शन के सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।

​ब्रिटेन का सफर और राजनीतिक करियर की शुरुआत :-

​1855 में दादा भाई ने अध्यापन का पेशा छोड़ दिया और एक व्यापारिक संस्था के साझेदार के रूप में लंदन चले गए। यहीं से उनके वैश्विक राजनीतिक जीवन का आरम्भ हुआ।

​1. ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य :-

​1892 में दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने इतिहास रचा जब वे उदारवादी दल (Liberal Party) की ओर से फिन्सबरी (Finsbury) निर्वाचन क्षेत्र से ब्रिटिश संसद (House of Commons) के सदस्य चुने गए। वे संसद पहुँचने वाले पहले भारतीय थे।

​2. रियासत और नगर निगम में सेवा :-

​बड़ौदा के दीवान: 1873 में उन्होंने बड़ौदा रियासत के दीवान का पद संभाला, लेकिन प्रशासनिक मतभेदों के कारण जल्द ही इस्तीफा दे दिया।

​बम्बई नगर निगम: वे बम्बई नगर निगम और नगर परिषद के निर्वाचित सदस्य भी रहे।

​प्रमुख संस्थाओं की स्थापना और सामाजिक कार्य :-

​दादा भाई नौरोजी का मानना था कि जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, स्वराज संभव नहीं है। इसके लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की:

​ज्ञान प्रसारक मंडली: बम्बई में शिक्षा और सामाजिक चेतना के लिए इसकी स्थापना की।

​महिला शिक्षा: उन्होंने महिलाओं के लिए एक हाई स्कूल स्थापित कर स्त्री शिक्षा की नींव रखी।

​बम्बई एसोसिएशन (1852): यह बम्बई की पहली राजनीतिक संस्था थी, जिसका श्रेय दादा भाई को ही जाता है।

​ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (लंदन): अंग्रेजों को भारतीय समस्याओं और सच्चाई से अवगत कराने के लिए उन्होंने लंदन में ‘लंदन इंडियन एसोसिएशन’ और ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ जैसी संस्थाएं बनाईं।

​भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ‘स्वराज’ की मांग :-

​दादा भाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने कांग्रेस के विकास में तीन अलग-अलग चरणों में नेतृत्व किया।

​कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल:-

​1886: कलकत्ता अधिवेशन
​1893: लाहौर अधिवेशन
​1906: कलकत्ता अधिवेशन

​स्वराज की पहली आधिकारिक घोषणा :-

​अक्सर ‘स्वराज’ का नारा बाल गंगाधर तिलक के नाम से जोड़ा जाता है, लेकिन कांग्रेस के मंच से पहली बार 1906 में स्वराज की मांग दादा भाई नौरोजी ने ही की थी। हालांकि, उस समय उनके स्वराज का अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन (Self-government) प्राप्त करना था।

​धन का निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth Theory):-

​ दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” में यह उजागर किया कि किस तरह ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति को लूटकर इंग्लैंड ले जा रहा है।

​शोषक नीतियां: उन्होंने आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा किया जा रहा आर्थिक शोषण है।

​गरीबी का अनावरण: उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन भारत को दिन-प्रतिदिन खोखला कर रहा है, जिससे एक समृद्ध देश ‘निर्धन’ बनता जा रहा है।

​ दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) के विचार:-

राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति ​अपने जीवन के शुरुआती और मध्य काल में नौरोजी ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे। उनके विचारों के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

​ब्रिटिश साहचर्य: वे शुरू में मानते थे कि अंग्रेजी राज से भारत को लाभ हुए हैं और वे इस संबंध को बनाए रखना चाहते थे।

​न्याय की मांग: उनकी राजनीतिक मांगें ‘न्याय’ और ‘अधिकारों’ पर आधारित थीं।

​विकासात्मक परिवर्तन: पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार, नौरोजी ने कांग्रेस को एक छोटी प्रशासनिक संस्था से उठाकर एक शक्तिशाली राष्ट्रीय सभा में बदल दिया।

​महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts):-

 
पूरा नाम …………… दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji)
उपाधि …………….. भारत के वयोवृद्ध नेता (Grand Old Man of India)
प्रसिद्ध पुस्तक ………..Poverty and Un-British Rule in India
ब्रिटिश संसद सदस्य …..1892 (फिन्सबरी से)
कांग्रेस अध्यक्ष ……… 1886, 1893, 1906
प्रमुख सिद्धांत ………..धन का निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth Theory)

 निष्कर्ष :-
​

दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का जीवन सेवा, त्याग और बौद्धिक संघर्ष की एक मिसाल है। एक निर्धन परिवार से निकलकर ब्रिटिश संसद की दहलीज तक पहुँचना और फिर अपनी पूरी शक्ति भारत की आजादी के लिए लगा देना, उन्हें युगों-युगों तक प्रेरणादायक बनाता है। उन्होंने भारतीयों को न केवल राजनीतिक रूप से संगठित किया, बल्कि आर्थिक रूप से जागरूक भी बनाया।
​आज का स्वतंत्र भारत दादा भाई नौरोजी जैसे दूरदर्शी नेताओं के संघर्षों का ही परिणाम है।

महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi)के भारत पर 17 आक्रमण: इतिहास, उद्देश्य और परिणाम

​भारतीय इतिहास में मध्यकालीन युग के दौरान कई विदेशी आक्रमणकारी आए, लेकिन महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) का नाम उन शासकों में प्रमुख है जिसने अपनी सैन्य शक्ति और लूटपाट के जरिए भारत की संपत्ति और मंदिरों को भारी नुकसान पहुँचाया। अधिकांश इतिहासकारों, विशेषकर हेनरी इलियट के अनुसार, गजनवी ने सन् 1000 से 1027 ई० के बीच भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए।
​इस लेख में हम महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) के उन सभी 17 आक्रमणों, उनके पीछे के वास्तविक उद्देश्यों और भारत पर पड़े उनके दीर्घकालिक प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

​Mahmud Ghaznavi

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महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) कौन था?

​महमूद गजनवी, सुबुक्तगीन का पुत्र था और गजनी (वर्तमान अफगानिस्तान) का शासक था। वह एक कुशल सेनापति और कूटनीतिज्ञ था, जिसका मुख्य लक्ष्य अपने मध्य एशियाई साम्राज्य को मजबूत करने के लिए धन एकत्रित करना था।

​महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi)के भारत पर प्रमुख आक्रमणों का विवरण :-

​हेनरी इलियट के मत का समर्थन करते हुए, यहाँ गजनवी के उन आक्रमणों की सूची दी गई है जिन्होंने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी:-
​

प्रथम आक्रमण (1000 ई०): सीमावर्ती नगरों पर प्रहार :-

​गजनवी का पहला हमला भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती नगरों पर हुआ। उसने हिन्दुशाही राज्य के कुछ दुर्गों को जीता और अपनी शक्ति का अहसास कराकर वापस गजनी लौट गया।

​ दूसरा आक्रमण (1001 ई०): राजा जयपाल से संघर्ष:-

​यह आक्रमण हिन्दुशाही राजा जयपाल के विरुद्ध था। पेशावर के पास हुए भीषण युद्ध में जयपाल पराजित हुए। महमूद ने उन्हें बंदी बनाया और बाद में 25 हाथी तथा 2,50,000 दीनार लेकर मुक्त किया। इस पराजय के अपमान को सहन न कर पाने के कारण राजा जयपाल ने आत्मदाह कर लिया।

​ तीसरा आक्रमण (1004 ई०):-

​1004 ई० मे भेजा (वर्तमान उच्छ) के राजा बजरा को पराजित किया। यह आक्रमण राजा जयपाल के विरुद्ध बजरा द्वारा सैनिक सहायता न दिए जाने के कारण किया गया था |
​

चौथा आक्रमण (1005 ई०):-

1005 ई० मुल्तान पर आक्रमण कर वहाँ के शासक फतह दाऊद को हराया। यहाँ उसने जयपाल के पौत्र सुखपाल को ‘नौशाशाह’ के नाम से शासक नियुक्त किया, जिसने इस्लाम स्वीकार कर लिया था।

​ पांचवा आक्रमण (1008 ई०):-
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महमूद गजनवी का यह आक्रमण राजा सुखपाल के विरुद्ध किया गया क्योकि ,सुखपाल द्वारा पुनः हिन्दू धर्म अपनाने के कारण गजनवी ने उसे बंदी बनाया। 

 छठा आक्रमण (1008 ई.) :-  

यह आक्रमण 1008 ई० में जयपाल के पुत्र आनन्दपाल के विरुद्ध युद्ध हुआ, जिसमें महमूद की जीत हुई। महमूद के द्वारा मुल्तान पर आक्रमण किये जाने के समय आनंदपाल द्वारा बाधा पहुचने के कारण यह आक्रमण किया गया था |

​ सातवां आक्रमण (1009 ई.) :-

​ इस आक्रमण का मुख्य कारण आनंदपाल को पराजित करने के बाद युद्ध की लूट में कुछ ही हाथी मिले कोई विशेष धन नहीं प्राप्त हुआ इसी भूख को मिटाने के लिए 1009 ई. में कांगड़ा के पहाड़ी प्रदेश नगरकोट पर आक्रमण किया। यहां बहुत सा हिंदुओं का धन एकत्रित था इस किले से अपार धन मिला।कांगड़ा के नगरकोट मंदिर से उसे अपार सोना-चांदी प्राप्त हुआ।

 आठवां आक्रमण (1010 ई.) :- 

महमूद गजनवी द्वारा मुल्तान के शासक दाऊद को पहले पराजित किया गया था लेकिन उसके द्वारा अधीनता स्वीकार कर लेने के बाद पुनः शासक बनाया गया लेकिन 1010 ईस्वी में दाऊद द्वारा विद्रोह किए जाने के कारण यह आक्रमण किया गया।

​नौवां आक्रमण (1011-1012 ई.):-

थानेश्वर के चक्रस्वामी मंदिर को लूटा गया, जिससे उसकी धार्मिक कट्टरता उजागर हुई।

दसवां आक्रमण (1012 ई०) :-

  • 1012 ई० में महमूद गजनवी ने त्रिलोचन पाल पर दसवां आक्रमण किया।
  • आनंदपाल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र त्रिलोचन पाल गद्दी पर बैठा।
  • त्रिलोचन पाल ने अपने पुत्र भीमपाल के सुझाव पर महमूद गजनवी का विरोध करने की नीति अपनाई।
  • भीमपाल ने मर्गला दर्रे में किलाबंदी कर महमूद की सेना को रोकने का प्रयास किया।
  • महमूद गजनवी ने मर्गला दर्रे को जीतकर नंदन दुर्ग पर चढ़ाई कर दी।
  • त्रिलोचन पाल और भीमपाल कश्मीर भाग गए तथा वहाँ के राजा संग्राम राज से सहायता मांगी।
  • कश्मीरी मंत्री तुंग को महमूद गजनवी के विरुद्ध सहायता के लिए भेजा गया।
  • तोसी (पुंछ क्षेत्र की आधुनिक तोही) नदी के किनारे महमूद गजनवी और कश्मीर-त्रिलोचन पाल की संयुक्त सेनाओं के बीच युद्ध हुआ।
  • 1018-19 ई० में रामगंगा नदी के किनारे त्रिलोचन पाल ने महमूद गजनवी का सामना किया, लेकिन वह पराजित हुआ।
  • 1021-22 ई० में त्रिलोचन पाल की हत्या कर दी गई, जिससे शाही वंश का अंत हो गया; उसका पुत्र भीमपाल 1026 ई० तक लोहर क्षेत्र में शासन करता रहा।

ग्यारवाँ आक्रमण (1015-16 ई.)​ :-

महमूद गजनवी द्वारा (1015-16 ई.) में कश्मीर मे प्रवेश करने का प्रयास किया गया लेकिन भौगोलिक स्थितियों के कारण वह लोहकोट से आगे नहीं बढ़ सका।

बारहवाँ आक्रमण (1018 ई०) :-

  • महमूद गजनवी ने 1018 ई० में कन्नौज पर बारहवाँ आक्रमण किया।
  • उस समय कन्नौज भारतीय साम्राज्य की प्रमुख राजधानी थी।
  • कन्नौज पर उस समय गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक राज्यपाल का शासन था।
  • महमूद ने पहली बार गंगा नदी घाटी में प्रवेश किया।
  • कन्नौज अभियान के दौरान उसने बटन, महावन, मथुरा और वृन्दावन पर आक्रमण किया।
  • बरन (बुलन्दशहर) के शासक हरदत्त ने भयभीत होकर महमूद की अधीनता स्वीकार कर ली।
  • हरदत्त ने अपने कुछ साथियों सहित इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।
  • महावन में यदुवंशी शासक कुलचन्द ने वीरतापूर्वक महमूद का सामना किया, लेकिन पराजित हुआ।
  • सम्मान की रक्षा के लिए कुलचन्द ने अपनी दोनों पत्नियों की हत्या कर स्वयं आत्महत्या कर ली।
  • महमूद ने मन्दिरों की नगरी मथुरा पर आक्रमण कर भारी लूटमार की और अपार धन प्राप्त किया।

चौदहवां आक्रमण :-

  • मथुरा और वृंदावन पर आक्रमण: मथुरा को लूटने के बाद महमूद ने वृंदावन पर हमला किया और वहां से उसे लूट में अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई।
  • ​कन्नौज पर चढ़ाई: वृंदावन के बाद महमूद कन्नौज की ओर बढ़ा। उस समय वहां गुर्जर-प्रतिहार वंश के अंतिम शासक राज्यपाल का शासन था।
  • ​राजा राज्यपाल का पलायन: महमूद के डर से राजा राज्यपाल बिना युद्ध किए ही कन्नौज छोड़कर गंगा के पूर्वी किनारे पर स्थित बारी नामक स्थान पर भाग गया।
    ​
  • कन्नौज की लूट: राजा के भाग जाने के बाद महमूद ने कन्नौज शहर में जमकर लूटपाट की।
    ​
  • मन्झावन का युद्ध: कन्नौज के बाद महमूद ने कानपुर के निकट मन्झावन पर आक्रमण किया, जिसे ‘ब्राह्मणों के किले’ के रूप में जाना जाता था। यहाँ उसे कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा।
  • ​25 दिनों का संघर्ष: मन्झावन में 25 दिनों तक चले लंबे संघर्ष के बाद अंततः महमूद को विजय प्राप्त हुई।
    ​
  • वापसी की राह और अन्य जीत: गजनी लौटते समय महमूद ने मार्ग में पड़ने वाले असी और सिरसावा (सहारनपुर के पास) के किलों को भी जीता और अपार धन के साथ वापस लौट गया।

पन्द्रहवाँ आक्रमण (1021-22 ई.) :-

  • महमूद गजनवी पुनः भारत आया और इस बार उसने पंजाब पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने का निश्चय किया।
  • प्रत्यक्ष शासन की स्थापना : महमूद ने पंजाब में प्रत्यक्ष शासन (Direct Rule) स्थापित करने का उद्देश्य रखा, जिसके लिए भारत में एक सैनिक केंद्र बनाने की योजना बनाई।
  • पंजाब का सामरिक महत्व : पंजाब का क्षेत्र विजय के बाद शासन के लिए उपयुक्त था, इसलिए महमूद ने इसे अपना आधार बनाया।
  • स्थानीय सिक्कों को अपनाया : महमूद गजनवी ने पंजाब के प्रचलित शाही सिक्कों को ही अपनाया।
  • घुड़सवार तथा नंदी चिन्ह : उसने सिक्कों पर पहले से प्रचलित “घुड़सवार तथा नंदी” का चिन्ह रखा।
  • संस्कृत शिलालेख : सिक्कों पर संस्कृत भाषा में “आव्यक्तमेकं अवतार महमूद” (महमूद एक अवतार है) खुदवाया गया।
  • दिल्लीवाला सिक्का : महमूद गजनवी ने सर्वप्रथम भारतीय ढंग के सिक्के जारी किए, जिनका वजन 56 ग्रेन था और जो “दिल्लीवाला” नाम से प्रसिद्ध हुए।​

 

 सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण\सोलहवां आक्रमण (1025-1026 ई०) :-

​यह महमूद गजनवी(Mahmud Ghaznavi) का 16वाँ और सबसे प्रसिद्ध आक्रमण था। उसने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ शिव मंदिर को निशाना बनाया। उस समय वहाँ का राजा भीमदेव था। मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त कर उसने वहां से अकल्पनीय धन-दौलत लूटी।

  • 1025-26 ई. में महमूद गजनवी ने विशाल सेना के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। यह उसके सबसे प्रसिद्ध अभियानों में से एक था।                                         
  •  सोमनाथ मंदिर गुजरात में स्थित था और भारत के सबसे प्रमुख एवं धनवान शिव मंदिरों में से एक था।
  •  मंदिर में अत्यधिक धन-संपत्ति होने के कारण महमूद इसे लूटने आया था।
  • महमूद गजनवी मुल्तान के रास्ते काठियावाड़ पहुंचा और फिर अनहिलवाड़ा (काठियावाड़ की राजधानी) पहुंचा।
  •  अनहिलवाड़ा का शासक भीमदेव बिना युद्ध किए भाग गया। महमूद ने बिना विरोध के शहर को लूट लिया।
  • महमूद  ने सोमनाथ मंदिर पर कब्जा कर लिया, मंदिर को ध्वस्त कर दिया और अपार धन-राशि लूट ली।
  •  लूट की अपार संपत्ति के साथ महमूद सिंध के रेगिस्तान से गुजरकर गजनवी लौटा। मार्ग में जातियों ने उसे काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन वह सुरक्षित वापस पहुंच गया।

​ सत्रहवां अंतिम आक्रमण (1027 ई०) :-
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1027 ई. में अंतिम आक्रमण: महमूद गजनवी ने 1027 ई. में भारत पर अपना अंतिम (17वां) आक्रमण किया, जिसमें उसने जाटों और खोखरों को दंड देने के लिए कार्रवाई की।

  • सोमनाथ मंदिर को लूटकर वापस जाते समय सिंध के जाटों और खोखरों ने महमूद की सेना को भारी क्षति पहुँचाई थी।
  •  प्रतिशोध स्वरूप महमूद ने खोखरों पर आक्रमण कर उन्हें कोटोरता से समाप्त कर दिया।
     महमूद गजनवी ने कुल 17 बार भारत पर आक्रमण किया।
  •  उसने गुजरात से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक के क्षेत्रों को रौंदा और अनेक भारतीय शासकों को पराजित किया।
  •  महमूद का मुख्य उद्देश्य साम्राज्य स्थापित करना नहीं, बल्कि धन लूटना था, जिसमें वह पूरी तरह सफल रहा।
  •  उसके आक्रमणों का एकमात्र स्थायी प्रभाव पंजाब, सिंध और मुल्तान को गजनवी साम्राज्य में मिलाना था।
  •  महमूद के आक्रमणों ने भारत की राजनैतिक और सैनिक दुर्बलता को उजागर किया।
     महमूद गजनवी की मृत्यु 1030 ई. में हुई।

​गजनवी के आक्रमणों के वास्तविक उद्देश्य :-
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इतिहासकारों के अनुसार: गजनवी के भारत आने के पीछे तीन मुख्य कारण थे:
​अतुलनीय धन की प्राप्ति: वह भारत को ‘सोने की चिड़िया’ मानकर यहाँ के मंदिरों और नगरों को लूटना चाहता था।
​धर्म का प्रचार: वह अपनी कट्टरपंथी छवि के जरिए मध्य एशिया में ‘इस्लाम के रक्षक’ के रूप में पहचान बनाना चाहता था।
​सैन्य शक्ति का प्रदर्शन: भारत से लूटे गए धन का उपयोग उसने अपनी गजनी सेना को आधुनिक बनाने में किया।

​भारत पर आक्रमणों का परिणाम और प्रभाव :-

​धन की भारी निकासी: भारत की सदियों से संचित संपत्ति गजनी चली गई।
​राजनैतिक कमजोरी: इन आक्रमणों ने साबित कर दिया कि भारतीय राजाओं में एकता का अभाव था।
​मुस्लिम शासन की नींव: पंजाब, सिंध और मुल्तान को गजनी साम्राज्य में मिलाकर उसने भविष्य के मुस्लिम शासकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
​कला और संस्कृति का विनाश: मथुरा और सोमनाथ जैसे प्राचीन सांस्कृतिक केंद्रों को अपूरणीय क्षति हुई।

​निष्कर्ष :-

​महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi)एक क्रूर लुटेरा था या एक महान विजेता, यह इतिहासकारों के बीच बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उसके आक्रमणों ने भारत को गहरे घाव दिए। 1030 ई० में उसकी मृत्यु के साथ ही गजनवी साम्राज्य का पतन शुरू हो गया, लेकिन उसके द्वारा छोड़ी गई राजनैतिक अस्थिरता ने भारत का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।

पानीपत का प्रथम युद्ध (1526): कारण, परिणाम और बाबर की जीत का रहस्य

​पानीपत का प्रथम युद्ध (1526): वह निर्णायक संग्राम जिसने भारत का इतिहास बदल दिया
​भारतीय इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्होंने सत्ता के केंद्र को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। 21 अप्रैल, 1526 को लड़ा गया पानीपत का प्रथम युद्ध ऐसी ही एक युगांतकारी घटना थी। इस युद्ध ने न केवल दिल्ली सल्तनत के लोदी वंश का अंत किया, बल्कि भारत में मुगल साम्राज्य की नींव भी रखी।
​इस ब्लॉग में हम इस ऐतिहासिक युद्ध के कारणों, रणनीतियों और इसके दूरगामी परिणामों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

पानीपत का प्रथम युद्ध

और पढ़े :-छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

​1. युद्ध की पृष्ठभूमि और प्रमुख पक्ष :-

  • ​यह महान संघर्ष बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच पानीपत के मैदान में हुआ। जहाँ एक ओर सुल्तान इब्राहिम लोदी के पास एक विशाल सेना थी, वहीं दूसरी ओर बाबर की सेना संख्या में कम होने के बावजूद आधुनिक युद्ध कला और अनुशासन से लैस थी।
  • ​तिथि: 21 अप्रैल, 1526।
  • ​प्रमुख योद्धा: बाबर (मुगल) बनाम इब्राहिम लोदी (लोदी वंश)।
  • ​परिणाम: बाबर की शानदार जीत और मुगल शासन का उदय।
    ​

2. बाबर की आधुनिक युद्ध तकनीक: ‘तुलुगमा’ और ‘उस्मानी’ पद्धति :-

​बाबर की जीत का सबसे बड़ा कारण उसकी नवीन युद्ध नीतियाँ थीं, जिनका भारत में पहली बार सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया।
​

तुलुगमा पद्धति (Tulughma System):-

​बाबर ने उज्बेगों से सीखी हुई तुलुगमा पद्धति का उपयोग किया। इसमें सेना को विभिन्न टुकड़ियों (दाहिना, बायां, मध्यम, अग्रिम और सुरक्षित) में विभाजित किया जाता था ताकि दुश्मन को चारों ओर से घेरा जा सके।
​

उस्मानी पद्धति :-

​बाबर ने तोपों को सजाने की उस्मानी पद्धति का भी प्रयोग किया। इस विधि में दो गाड़ियों के बीच खाली जगह छोड़कर वहाँ तोपें रखी जाती थीं। इस तकनीक का नाम ‘उस्मानी’ इसलिए पड़ा क्योंकि इसका प्रयोग पहले उस्मानी शासकों ने सफवियों के विरुद्ध किया था।

​3. युद्ध का घटनाक्रम और इब्राहिम लोदी का अंत :-

​बाबर ने युद्ध से पहले स्थिति का पूरा जायजा लिया और अपनी सुरक्षा के लिए खाइयां खोदकर तथा पेड़ों की बाड़ खड़ी करके मजबूत मोर्चाबंदी की।
​शुरुआती हमला: बाबर ने पहले अपने कुछ सिपाही भेजकर अप्रत्याशित हमला करवाया, जो शुरू में बहुत सफल नहीं रहा।
​निर्णायक संघर्ष: अंततः 20 अप्रैल को लोदी की सेना आगे बढ़ी। बाबर ने इब्राहिम लोदी की भूलों का लाभ उठाकर उसे चारों तरफ से घेर लिया। 
​तोपों का प्रहार: बाबर के कुशल तोपचियों, उस्ताद अली और मुस्तफा ने तोपों और बंदूकों से शत्रुओं पर भीषण प्रहार किया।
​इब्राहिम लोदी की मृत्यु: सुल्तान इब्राहिम लोदी युद्ध के मैदान में ही मारा गया। वह मध्यकाल का पहला ऐसा शासक था जिसकी मृत्यु युद्धस्थल में हुई। उसके साथ ग्वालियर के राजा विक्रमजीत भी वीरगति को प्राप्त हुए।
​

4. युद्ध के पश्चात: मुगल साम्राज्य की घोषणा :-

​27 अप्रैल, 1526 को बाबर ने खुद को ‘पादशाह’ घोषित किया और भारत में औपचारिक रूप से मुगल साम्राज्य की स्थापना की। दिल्ली की मस्जिदों में उसके नाम का ‘खुत्बा’ पढ़ा गया।
​आगरा और दिल्ली की राजधानियों पर कब्जा करने के बाद, हुमायूँ को आगरा के खजाने से प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा प्राप्त हुआ, जिसका वजन 320 रत्ती था। हुमायूँ ने यह हीरा ग्वालियर के राजा विक्रमजीत के परिवार से प्राप्त किया था।

​5. बाबर की उदारता और ‘कलंदर’ की उपाधि :-

​बाबर ने युद्ध के बाद प्राप्त धन को अपने सैनिकों और अमीरों में बहुत उदारतापूर्वक बाँटा। उसकी इसी बेमिसाल उदारता के कारण लोगों ने उसे ‘कलंदर’ कहना शुरू कर दिया। हालांकि, उसने इब्राहिम लोदी के परिवार को संरक्षण दिया, लेकिन लोदी की माँ ने षड्यंत्र रचकर बाबर के खाने में जहर मिलवा दिया था, जिससे वह बाल-बाल बच गया।

​6. युद्ध के बाद बाबर की चुनौतियाँ :-

​पानीपत की जीत ने दिल्ली का सिंहासन तो दे दिया, लेकिन बाबर की स्थिति अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी। उसे कई मोर्चों पर समस्याओं का सामना करना पड़ा:
​विद्रोह: सम्भल, बयाना, मेवात और ग्वालियर जैसे क्षेत्रों के अफगान सरदारों ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी थी।
​राजपूतों का खतरा: मेवाड़ के राणा सांगा और चंदेरी के मेदनी राय के नेतृत्व में राजपूत मुगलों को भारत से बाहर निकालने के लिए संगठित हो रहे थे।
​आंतरिक असंतोष: भीषण गर्मी के कारण बाबर के अपने सैनिक काबुल लौटना चाहते थे।

​7. सैनिकों का मनोबल और भविष्य की योजना :-

​एक कुशल वक्ता होने के नाते, बाबर ने अपने सैनिकों को एक प्रभावी भाषण दिया। उसने काबुल की गरीबी और भारत के उज्जवल भविष्य का तुलनात्मक चित्र पेश किया, जिससे प्रेरित होकर उसके सैनिक भारत में रुकने को तैयार हो गए।
​इसके बाद बाबर ने ‘मैत्री और युद्ध’ की दोहरी नीति अपनाई। जो अफगान सरदार समर्पण कर रहे थे, उन्हें अपनी सेवा में लिया (जैसे शेख घूरनन और अली खां मेवाती) और जो विरोध कर रहे थे, उनके विरुद्ध सैन्य अभियान चलाकर इटावा, कन्नौज और जौनपुर जैसे क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
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निष्कर्ष :-

​पानीपत के प्रथम युद्ध ने भारत में युद्ध के स्वरूप को हमेशा के लिए बदल दिया। तोपखाने और नई रणनीतियों के प्रवेश ने भारी-भरकम पारंपरिक सेनाओं को कमजोर कर दिया। हालांकि इस युद्ध के बाद बाबर के सामने राणा सांगा और बंगाल के अफगानों जैसी बड़ी चुनौतियाँ शेष थीं, लेकिन पानीपत ने वह नींव रख दी थी जिस पर आगे चलकर अकबर और शाहजहाँ जैसे महान सम्राटों ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया।