वायुमंडल की संरचना (Structure of Atmosphere): पृथ्वी की विभिन्न परतें, विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण तथ्य

 

वायुमंडल की संरचना (Structure of Atmosphere): पृथ्वी की विभिन्न परतें, विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण तथ्य :-

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व वायुमंडल के कारण ही संभव है। वायुमंडल हमें साँस लेने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करता है, सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से रक्षा करता है तथा पृथ्वी के तापमान को संतुलित बनाए रखता है। भूगोल तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से वायुमंडल की संरचना एवं उसकी विभिन्न परतें एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इस लेख में हम वायुमंडल की संरचना, उसकी पाँच प्रमुख परतों, उनकी विशेषताओं तथा उनसे जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को सरल भाषा में समझेंगे।

वायुमंडल क्या है?

“वायुमंडल (Atmosphere) पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए गैसों का विशाल आवरण है।” इसका विस्तार लगभग 10,000 किलोमीटर तक माना जाता है, लेकिन इसका लगभग 99 प्रतिशत भार केवल 32 किलोमीटर की ऊँचाई तक ही सीमित रहता है। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वायुमंडल पृथ्वी से जुड़ा रहता है। ऊँचाई बढ़ने पर वायु का घनत्व और वायुदाब लगातार कम होते जाते हैं।

वायुमंडल की संरचना

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वायुमंडल की प्रमुख परतें :-

वैज्ञानिकों ने वायुमंडल को मुख्य रूप से पाँच परतों में विभाजित किया है—

  • 1. क्षोभमंडल (Troposphere)
  • 2. समतापमंडल (Stratosphere)
  • 3. मध्यमंडल (Mesosphere)
  • 4. आयनमंडल (Ionosphere)
  • 5. बाह्यमंडल (Exosphere)

अब प्रत्येक परत को विस्तार से समझते हैं।

1. क्षोभमंडल (Troposphere) :-

क्षोभमंडल वायुमंडल की सबसे निचली तथा सबसे महत्वपूर्ण परत है। पृथ्वी पर होने वाली लगभग सभी मौसमी गतिविधियाँ इसी परत में होती हैं।

ऊँचाई :-                                                                                                       

  •  ध्रुवों पर लगभग 8 किलोमीटर
  • विषुवत रेखा पर लगभग 18 किलोमीटर

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • वायुमंडल का अधिकांश भार इसी परत में पाया जाता है।
  • बादल, वर्षा, आँधी, तूफान, कोहरा तथा हिमपात जैसी सभी मौसमी घटनाएँ इसी परत में होती हैं।
  • ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता जाता है।
  • औसतन प्रत्येक 1 किलोमीटर की ऊँचाई पर तापमान लगभग 6.5°C कम हो जाता है। इसे सामान्य ताप पतन दर (Normal Lapse Rate) कहा जाता है।
  • लगभग प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान में 1°C की कमी आती है।

क्षोभसीमा (Tropopause) :-

क्षोभमंडल और समतापमंडल के बीच की सीमा को क्षोभसीमा कहते हैं। इसी क्षेत्र के निकट अत्यधिक तीव्र गति से बहने वाली पवनों को जेट पवन (Jet Streams) कहा जाता है। ये पवनें मौसम तथा विमानन दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।

2. समतापमंडल (Stratosphere) :-

क्षोभमंडल के ऊपर स्थित परत को समतापमंडल कहा जाता है। यह अपेक्षाकृत शांत एवं स्थिर परत है।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • प्रारम्भिक भाग में तापमान लगभग स्थिर रहता है।
  • लगभग 20 किलोमीटर की ऊँचाई के बाद तापमान बढ़ने लगता है।
  • तापमान बढ़ने का मुख्य कारण ओजोन परत है।
  • ओजोन सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet) किरणों को अवशोषित कर लेती है, जिससे तापमान बढ़ जाता है।
  • इस परत में मौसम संबंधी हलचल बहुत कम होती है।
  • विमान उड़ाने के लिए उपयुक्त
  • समतापमंडल में वायु अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। इसलिए लंबी दूरी के कई वाणिज्यिक विमान इसी परत में उड़ान भरना पसंद करते हैं।

3. मध्यमंडल (Mesosphere) :-

समतापमंडल के ऊपर स्थित परत को मध्यमंडल कहा जाता है।

ऊँचाई- लगभग 50 से 80 किलोमीटर तक।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • इस परत में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान तेजी से घटता है।
  • इसकी ऊपरी सीमा पर तापमान लगभग –100°C तक पहुँच जाता है।
  • यह वायुमंडल का सबसे ठंडा भाग माना जाता है।
  • पृथ्वी की ओर आने वाले अधिकांश छोटे उल्कापिंड इसी परत में घर्षण के कारण जलकर नष्ट हो जाते हैं।

4. आयनमंडल (Ionosphere) :-

मध्यमंडल के ऊपर स्थित आयनमंडल लगभग 80 से 640 किलोमीटर तक फैला होता है।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • इस परत में विद्युत आवेशित कणों (आयन) की अधिकता होती है।
  • ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बढ़ता जाता है।
  • रेडियो संचार के लिए यह परत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • विभिन्न आवृत्तियों की रेडियो तरंगें इसी परत से परावर्तित होकर दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचती हैं।

आयनमंडल को कई उप-परतों में बाँटा गया है :-

D परत (D Layer) :-

  • निम्न आवृत्ति तथा दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाली रेडियो तरंगों के परावर्तन में सहायक होती है।

E परत (E Layer) :-

  • इसे केनेली-हीविसाइड (Kennelly-Heaviside) परत भी कहा जाता है।
  • मध्यम तथा उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों के परावर्तन में सहायता करती है।
  • ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाले ध्रुवीय प्रकाश (Aurora) से इसका संबंध माना जाता है।

ध्रुवीय प्रकाश दो प्रकार के होते हैं—

  • Aurora Borealis (उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश)
  • Aurora Australis (दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश)

F परत (F Layer) :-

  • इसे एपलटन (Appleton) परत भी कहा जाता है।
  • मध्यम एवं उच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों के परावर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • लंबी दूरी के रेडियो संचार में इसका विशेष महत्व है।

G परत (G Layer):-

  • यह निम्न, मध्यम तथा उच्च सभी प्रकार की रेडियो तरंगों के परावर्तन में सहायक मानी जाती है।

5. बाह्यमंडल (Exosphere):-

  • यह वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है।
  • ऊँचाई लगभग 640 से 1,000 किलोमीटर तक।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • यहाँ वायु अत्यंत विरल होती है।
  • विद्युत आवेशित कणों की प्रधानता बनी रहती है।
  • इस परत में क्रमशः नाइट्रोजन (N₂), ऑक्सीजन (O₂), हीलियम (He) तथा हाइड्रोजन (H₂) की अलग-अलग परतें पाई जाती हैं।
  • लगभग 1,000 किलोमीटर के बाद वायुमंडल अत्यंत विरल हो जाता है।
  • लगभग 10,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर वायुमंडल धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन हो जाता है।

वायुमंडल का महत्व :-

  • वायुमंडल पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
  • जीवों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराना।
  • सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से रक्षा करना।
  • पृथ्वी का तापमान संतुलित रखना।
  • जल चक्र को संचालित करना।
  • मौसम और जलवायु का निर्माण करना।
  • रेडियो संचार को संभव बनाना।
  • छोटे उल्कापिंडों को पृथ्वी तक पहुँचने से पहले जलाकर नष्ट करना।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य :-

  1. वायुमंडल का लगभग 99% भार 32 किलोमीटर तक सीमित है।
  2. क्षोभमंडल में सभी मौसमी घटनाएँ होती हैं।
  3. सामान्य ताप पतन दर 6.5°C प्रति किलोमीटर होती है।
  4. ओजोन परत समतापमंडल में स्थित होती है।
  5. वायुमंडल का सबसे कम तापमान मध्यमंडल में पाया जाता है।
  6. रेडियो तरंगों का परावर्तन मुख्य रूप से आयनमंडल से होता है।
  7. बाह्यमंडल वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है।
  8. जेट पवनें क्षोभसीमा के निकट बहती हैं।
  9. ध्रुवीय प्रकाश आयनमंडल से संबंधित महत्वपूर्ण घटना है।

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निष्कर्ष :-

वायुमंडल पृथ्वी की सुरक्षा कवच के समान कार्य करता है। इसकी प्रत्येक परत की अपनी अलग विशेषता और उपयोगिता है। क्षोभमंडल हमें मौसम प्रदान करता है, समतापमंडल की ओजोन परत हानिकारक किरणों से रक्षा करती है, मध्यमंडल उल्कापिंडों को नष्ट करता है, आयनमंडल रेडियो संचार को संभव बनाता है और बाह्यमंडल अंतरिक्ष की ओर संक्रमण क्षेत्र का कार्य करता है।

यदि आप भूगोल, UPSC, SSC, PCS, रेलवे, NDA, CDS, CTET, UPTET या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो वायुमंडल की संरचना एवं उसकी विभिन्न परतों का अध्ययन अवश्य करें। यह विषय परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण को समझने में भी सहायता करता है।

 

 

 

भारत की प्रमुख झीलें: भारत की मीठे, खारे और लैगून झीलों की सम्पूर्ण जानकारी

इस लेख में भारत की प्रमुख झीलें/झीलों का विस्तृत परिचय दिया गया है। भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है। यहाँ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर विशाल तटीय क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार की झीलें पाई जाती हैं। भारत की झीलें न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक हैं, बल्कि सिंचाई, मत्स्य पालन, पर्यटन, जलविद्युत उत्पादन, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, SSC, राज्य लोक सेवा आयोग, रेलवे, बैंकिंग तथा अन्य सरकारी परीक्षाओं में भारत की प्रमुख झीलों से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।

भारत की प्रमुख झीलें

और पढ़े :-विश्व की प्रमुख जलसंधियाँ (Straits)

भारत की प्रमुख झीलें :-

1. वूलर झील (Wular Lake):-

वूलर झील जम्मू एवं कश्मीर में स्थित भारत की सबसे बड़ी मीठे (ताजे) जल की झील है। यह झेलम नदी पर निर्मित गोखुर (Oxbow) झील का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। यह झील कश्मीर घाटी की जल व्यवस्था तथा मत्स्य पालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. डल झील (Dal Lake):-

डल झील श्रीनगर (जम्मू एवं कश्मीर) में स्थित प्रसिद्ध हिमानी निर्मित मीठे जल की झील है। इसकी लंबाई लगभग 8 किलोमीटर तथा चौड़ाई लगभग 3 किलोमीटर है। कई स्थानों पर दलदल होने के कारण इसकी गहराई अपेक्षाकृत कम है। शिकारे और हाउसबोट इस झील की प्रमुख पहचान हैं।

3. सांभर झील (Sambhar Lake) :-

राजस्थान के जयपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित सांभर झील भारत की सबसे बड़ी अंतःस्थलीय खारे जल की झील है। यह देश में नमक उत्पादन का प्रमुख केंद्र है तथा भारत की नमक आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

4. देबर झील (Jaisamand Lake) :-

राजस्थान के उदयपुर में स्थित देबर झील मीठे जल की प्रसिद्ध झील है। इसे भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील माना जाता है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में उदयपुर के राजा द्वारा कराया गया था। यह अपने विशाल जलाशय और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है।

5. लोकटक झील (Loktak Lake) :-

मणिपुर में स्थित लोकटक झील उत्तर-पूर्व भारत की सबसे प्रसिद्ध मीठे पानी की झील है। यह विश्वभर में तैरती द्वीपीय झील के रूप में जानी जाती है। इस झील में स्थित केबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान विश्व का एकमात्र तैरता राष्ट्रीय उद्यान है। यहाँ तैरते हुए घास-पौधों के द्वीपों को फुमदी (Phumdi) कहा जाता है। इसी झील पर जलविद्युत परियोजना भी संचालित है।

6. चिल्का झील (Chilika Lake) :-

ओडिशा में स्थित चिल्का झील भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है। यह झींगा उत्पादन, मत्स्य पालन तथा प्रवासी पक्षियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है और देश का महत्वपूर्ण आर्द्र क्षेत्र भी है।

7. कोलेरू झील (Kolleru Lake) :-

आंध्र प्रदेश में कृष्णा और गोदावरी डेल्टा के बीच स्थित कोलेरू झील ताजे जल की प्रमुख झील है। यह अनेक प्रवासी पक्षियों का निवास स्थान है और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

8. पुलिकट झील (Pulicat Lake) :-

आंध्र प्रदेश के तट पर स्थित पुलिकट झील खारे जल की लैगून झील है। यह समुद्र से बालू की भित्ति द्वारा अलग होकर बनी है। यह भारत की महत्वपूर्ण तटीय झीलों में से एक है।

9. वेंबनाद झील (Vembanad Lake) :-

केरल तट पर स्थित वेंबनाद झील खारे जल की प्रसिद्ध लैगून झील है। इसी झील में वेलिंगटन द्वीप स्थित है, जहाँ राष्ट्रीय नौकायन प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं। भारत का सबसे छोटा राष्ट्रीय राजमार्ग NH-47A भी इसी द्वीप पर स्थित है।

10. लोनार झील (Lonar Lake) :-

महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार झील उल्कापात/ज्वालामुखीय गतिविधि से निर्मित अद्वितीय झील है। यह विश्व की दुर्लभ भू-वैज्ञानिक धरोहरों में गिनी जाती है।

11. रेणुका झील :-

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित रेणुका झील मीठे जल की झील है। यहाँ चिड़ियाघर तथा लायन सफारी भी स्थित है, जिससे यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन गई है।

12. रूपकुंड झील :-

उत्तराखण्ड के मध्य हिमालय में स्थित रूपकुंड झील प्राकृतिक मीठे जल की झील है। यह ऊँचाई पर स्थित होने के कारण पर्वतारोहियों और ट्रेकिंग प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

13. सास्थमकोट्टा झील :-

केरल के कोल्लम जिले में स्थित सास्थमकोट्टा झील राज्य की सबसे बड़ी मीठे जल की झील मानी जाती है और पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत है।

14. सातताल (सत्ता झील) :-

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित सातताल कई झीलों का समूह है। यह प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग माना जाता है तथा प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

15. सूरजताल :-

हिमाचल प्रदेश में बारालाचा दर्रे के निकट स्थित सूरजताल ताजे जल की ऊँचाई वाली झील है। यह हिमालय की प्रमुख झीलों में शामिल है।

16. तवा जलाशय (तवावोहिर झील) :-

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में नर्मदा नदी पर बाँध बनाकर इस विशाल जलाशय का निर्माण किया गया है। यह सिंचाई, मत्स्य पालन तथा जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

17. सोंगमो (छांगू) झील :-

सिक्किम के गंगटोक जिले में स्थित सोंगमो झील मीठे जल की अत्यंत सुंदर हिमालयी झील है। वर्षभर पर्यटकों का यहाँ आगमन होता है।

18. अष्टमुडी झील :-

केरल के कोल्लम जिले में स्थित अष्टमुडी झील एक लैगून (कयाल) झील है जिसकी आठ शाखाएँ हैं। इसे रामसर समझौते के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्र भूमि घोषित किया गया है।

19. भीमताल झील :-

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित भीमताल झील मीठे जल की सुंदर झील है। इसके मध्य में एक छोटा द्वीप स्थित है। यह राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का प्रमुख आकर्षण है।

20. चेम्बरमबक्कम झील :-

तमिलनाडु के चिंगलपट्टू जिले में चेन्नई से लगभग 40 किलोमीटर दक्षिण स्थित चेम्बरमबक्कम झील से अड़्यार नदी का उद्गम होता है। यह चेन्नई के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत भी है।

21. पंचभद्रा झील :-

राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित पंचभद्रा झील खारे जल की झील है। यहाँ नमक उत्पादन किया जाता है, लेकिन वर्षा की कमी तथा प्रदूषण के कारण झील का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है।

22. चो-ल्हामु झील :-

सिक्किम के उत्तरी भाग में लगभग 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित चो-ल्हामु झील भारत की सबसे ऊँचाई पर स्थित झील मानी जाती है। तीस्ता नदी का उद्गम भी इसी झील से होता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य :-

– भारत की सबसे बड़ी मीठे जल की झील — वूलर झील
– भारत की सबसे बड़ी अंतःस्थलीय खारे जल की झील — सांभर झील
– भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील — चिल्का झील
– भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील — देबर (जयसमंद) झील
– भारत की सबसे ऊँची झील — चो-ल्हामु झील
– विश्व का एकमात्र तैरता राष्ट्रीय उद्यान — केबुल लामजाओ (लोकटक झील)
– उल्कापात से निर्मित झील — लोनार झील
– आठ शाखाओं वाली झील — अष्टमुडी झील

निष्कर्ष :-

भारत की झीलें प्राकृतिक धरोहर होने के साथ-साथ देश की जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, पर्यटन, मत्स्य पालन तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। वूलर, डल, सांभर, चिल्का, लोकटक, वेंबनाद, लोनार, चो-ल्हामु और अन्य प्रमुख झीलें अपने-अपने विशिष्ट भौगोलिक एवं पारिस्थितिक महत्व के कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हैं। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो भारत की इन प्रमुख झीलों के स्थान, प्रकार तथा विशेषताओं का अध्ययन अवश्य करें।

विश्व की प्रमुख झीलें स्थिति, क्षेत्रफल और महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान (GK) तथ्य

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ‘विश्व भूगोल’ (World Geography) एक अत्यंत महत्वपूर्ण खंड है। इस खंड के अंतर्गत “विश्व की प्रमुख झीलें” (Major Lakes of the World) से संबंधित प्रश्न अक्सर बहुविकल्पीय या मिलान करने वाले प्रश्नों के रूप में पूछे जाते हैं। चाहे वह झीलों की भौगोलिक स्थिति (Location) हो, उनका क्षेत्रफल (Area) हो, या फिर उनकी विशिष्ट पारिस्थितिक विशेषताएं—एक गंभीर छात्र के रूप में आपको इन सभी तथ्यों की गहरी समझ होनी चाहिए। इस व्यापक ब्लॉग में, हम प्रामाणिक भौगोलिक आंकड़ों के आधार पर विश्व की सबसे बड़ी झीलों की विस्तृत समीक्षा करेंगे, ताकि आपकी आगामी परीक्षाओं में एक भी अंक न छूटे।

झील क्या है और इनका भौगोलिक महत्व क्या है?

भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के अनुसार, झील (Lake) जल का वह स्थिर भाग है जो चारों तरफ से स्थलखंडों (Landmass) से घिरा होता है। झील का दूसरा मुख्य गुण उसका स्थायित्व और प्रवाहहीनता है। झीलें न केवल मीठे पानी (Freshwater) का प्रमुख स्रोत होती हैं, बल्कि वे उस क्षेत्र की जलवायु, जैव विविधता और स्थानीय आर्थिकी (जैसे पर्यटन और मत्स्य पालन) को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करती हैं। परीक्षाओं में अक्सर झीलों को उनके आकार (Largest Lakes in the World) या उनकी लवणता (Salinity) के आधार पर पूछा जाता है।

विश्व की प्रमुख झीलें: विस्तृत विवरण (Detailed Analysis) :-

आइए अब हम विश्व की सबसे महत्वपूर्ण झीलों का क्रमानुसार और सविस्तार अध्ययन करते हैं जो परीक्षाओं के लिए सबसे ज्यादा प्रासंगिक हैं:

विश्व की प्रमुख झीलें

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1. कैस्पियन सागर झील (Caspian Sea):-

स्थिति (Location): रूस, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और ईरान (एशिया और यूरोप की सीमा पर)।
क्षेत्रफल: 3,71,000 वर्ग किलोमीटर

  •  यह विश्व की सबसे बड़ी झील (Largest Lake in the World) है। अपने विशाल आकार के कारण ही इसे ‘सागर’ कहा जाता है।
  •  यह एक खारे पानी की झील (Saltwater Lake) है।
  •  मानचित्र आधारित प्रश्नों के लिए इसके आस-पास के देशों के नाम ( TARI K: Turkmenistan, Azerbaijan, Russia, Iran, Kazakhstan) याद रखना आवश्यक है।

2. सुपीरियर झील (Lake Superior):-

स्थिति (Location): अमेरिका (USA) व कनाडा की सीमा पर (उत्तर अमेरिका महाद्वीप)। 
क्षेत्रफल: 82,414 वर्ग किलोमीटर
 

  • यह क्षेत्रफल के हिसाब से विश्व की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील (Largest Freshwater Lake) है।
  •  यह उत्तरी अमेरिका की ‘महान झीलों’ (Great Lakes) में से एक है।

3. विक्टोरिया झील (Lake Victoria):-

स्थिति (Location): यूगांडा, तंजानिया और केन्या (अफ़्रीका महाद्वीप)। 
क्षेत्रफल: 68,800 वर्ग किलोमीटर
 

  • यह अफ़्रीका महाद्वीप की सबसे बड़ी झील है।
  •  विश्व की सबसे लंबी नदी ‘नील नदी’ (Nile River) का उद्गम इसी विक्टोरिया झील से होता है।
  • भूमध्य रेखा (Equator) इस झील के बीच से होकर गुजरती है, जो परीक्षाओं का एक अत्यंत लोकप्रिय तथ्य है।

4. अरल सागर झील (Aral Sea):-

स्थिति (Location): कजाकिस्तान व उज्बेकिस्तान (मध्य एशिया)।
क्षेत्रफल: 68,000 वर्ग किलोमीटर
 

  • यह झील कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान की प्राकृतिक सीमा बनाती है।
  •  आधुनिक समय में मानवीय हस्तक्षेप और अत्यधिक सिंचाई के कारण यह झील लगभग 90% तक सूख चुकी है, जो वैश्विक पर्यावरण चर्चाओं का मुख्य विषय है।

5. मिशिगन झील (Lake Michigan):-

स्थिति (Location): संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)।
क्षेत्रफल: 58,000 वर्ग किलोमीटर
उत्तरी अमेरिका की पांच ‘महान झीलों’ (Great Lakes) में से यह एकमात्र ऐसी झील है जो पूरी तरह से अमेरिका के भीतर स्थित है।
 प्रसिद्ध ‘शिकागो’ शहर इसी झील के किनारे बसा हुआ है।

6. टंगानिका झील (Lake Tanganyika) :-

स्थिति (Location): तंजानिया, जाम्बिया, बुरुंडी व कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य (अफ़्रीका)।
क्षेत्रफल: 32,893 वर्ग किलोमीटर
 

  • यह विश्व की सबसे लंबी (Longest Lake) और बैकाल झील के बाद दूसरी सबसे गहरी मीठे पानी की झील है।
  •  यह अफ़्रीकी रिफ्ट वैली (Rift Valley) में स्थित है।

7. बैकाल झील (Lake Baikal):-

स्थिति (Location): रूस (साइबेरिया क्षेत्र)।
क्षेत्रफल: 31,500 वर्ग किलोमीटर
 

  • यह विश्व की सबसे गहरी झील (Deepest Lake in the World) है। इसकी गहराई लगभग 1,642 मीटर है।
  •  इसे “साइबेरिया का मोती” (Pearl of Siberia) भी कहा जाता है। पानी के आयतन (Volume) की दृष्टि से यह दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है।

8. टिटिकाका झील (Lake Titicaca):-

स्थिति (Location): पेरू व बोलीविया (दक्षिण अमेरिका)।
क्षेत्रफल: 8,001 वर्ग किलोमीटर

  • यह विश्व की सबसे ऊंची नौगम्य झील (Highest Navigable Lake) है, जो एंडीज पर्वतमाला पर स्थित है।

9. मृत सागर (Dead Sea):-

स्थिति (Location): जॉर्डन, इजरायल और फिलिस्तीन।
 

  • यह समुद्र तल से लगभग 430 मीटर नीचे, पृथ्वी का सबसे निचला बिंदु (Lowest Point on Earth) है।
  •  इसकी अत्यधिक लवणता (High Salinity) के कारण इसमें कोई भी जीव जीवित नहीं रह सकता।

विश्व की प्रमुख झीलों की त्वरित सूची (Quick Revision Table):-

क्रम संख्या झील का नाम स्थित क्षेत्रफल (वर्ग कि.मी.)
1कैस्पियन सागर झील रूस, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान 371000
2सुपीरियर झीलअमेरिका व कनाडा82414
3विक्टोरिया झीलयूगांडा, तंजानिया, केन्या 68800
4अरल सागर झीलकजाकिस्तान व उज्बेकिस्तान68000
5ह्यूरन झीलयू०एस०ए० व कनाडा 59600
6मिशिगन झीलयू०एस०ए०58000
7टंगानिका झीलतंजानिया, जाम्बिया, बुरुंडी व कांगो | 32893
8बैकाल झीलरूस31500
9ग्रेट बियर झीलकनाडा31080
10मलावी झीलमलावी, मोजाम्बिक व तंजानिया30044
11ग्रेट स्लेव झीलकनाडा28930
12ईरी झीलयू०एस०ए० व कनाडा 25719
13विनिपेग झीलकनाडा24514
14न्यासा झीलमलावी, मोजाम्बिक, तंजानिया22490
15ऑन्टारियों झीलयू०एस०ए० व कनाडा19477
16लेडोगा झीलरूस18130
17चाड झीलचाड (अफ़्रीका)17800
18बाल्खश झीलकजाकिस्तान16400
19बोस्टक झीलअंटार्कटिका15690
20नासिर झीलमिस्र (Egypt) 12900
21ओनेगा झील रूस9891
22निकारागुआ झीलनिकारागुआ8135
23टिटिकाका पेरू व बोलीविया 8001

 परीक्षाओं में झीलों को ‘उत्तर से दक्षिण’ या ‘पूर्व से पश्चिम‘ के क्रम में व्यवस्थित करने वाले प्रश्न बहुत लोकप्रिय हैं। विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका की महान झीलों (Great Lakes: Superior, Huron, Michigan, Erie, Ontario) का पश्चिम से पूर्व का क्रम अवश्य याद रखें।

निष्कर्ष (Conclusion):-

विश्व की झीलें न केवल हमारे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, बल्कि परीक्षाओं की दृष्टि से भी ज्ञान का एक बड़ा स्रोत हैं। इस लेख के माध्यम से हमने कैस्पियन सागर, सुपीरियर, विक्टोरिया और बैकाल जैसी प्रमुख झीलों से जुड़े उन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को कवर किया है जो अक्सर परीक्षाओं का हिस्सा बनते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) :-

प्रश्न 1: विश्व की सबसे बड़ी झील कौन सी है?
उत्तर: विश्व की सबसे बड़ी झील ‘कैस्पियन सागर’ (Caspian Sea) है, जिसका क्षेत्रफल 3,71,000 वर्ग किलोमीटर है। यह खारे पानी की झील है।

प्रश्न 2: विश्व की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील कौन सी है?
उत्तर: क्षेत्रफल के आधार पर विश्व की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील ‘सुपीरियर झील’ (Lake Superior) है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की सीमा पर स्थित है।

प्रश्न 3: विश्व की सबसे गहरी झील कौन सी है और यह कहाँ स्थित है?
उत्तर: विश्व की सबसे गहरी झील ‘बैकाल झील’ (Lake Baikal) है, जो रूस के साइबेरिया क्षेत्र में स्थित है। इसकी गहराई लगभग 1,642 मीटर है।

प्रश्न 4: नील नदी का उद्गम किस झील से होता है?
उत्तर: दुनिया की सबसे लंबी नदी ‘नील नदी’ का उद्गम अफ्रीका महाद्वीप में स्थित ‘विक्टोरिया झील’ (Lake Victoria) से होता है।

प्रश्न 5: विश्व की सबसे ऊंची नौगम्य (Navigable) झील कौन सी है?
उत्तर: दक्षिण अमेरिका के पेरू और बोलीविया देश की सीमा पर स्थित ‘टिटिकाका झील’ (Lake Titicaca) विश्व की सबसे ऊंची नौगम्य झील है।

कर्क रेखा(kark rekha)वह काल्पनिक लकीर जिसने भारत को दो हिस्सों में बांटा

कर्क रेखा(kark rekha)/कर्क वृत्त (Tropic of CANCER) गोलार्द्ध में एक अक्षांश वृत्त है। जो ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।

kark rekha

और पढ़े :- विश्व की स्थानीय पवने|चिनूक| फाॅन| सिराको|हरमट्टन|नार्वेस्टर

  • कर्क रेखा, विषुवत रेखा / भूमध्य रेखा से 23 डिग्री 30 मिनट उत्तर (23.30′ उत्तर) की ओर समानान्तर रेखा है।
  • कर्क रेखा पर सूर्य 21 जून को लम्बवत् चमकता है। इसे कर्क संक्रान्ति या ग्रीष्म संक्रान्ति (Summer Solstice) भी कहा जाता है। क्योंकि इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में अधिकतम गर्मी पड़ती है।
  • 21 जून उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ा दिन होता है व रात सबसे छोटी होती है। क्योकि 21 जून को सूर्य कर्क रेखा के एकदम ऊपर होता है| इस दिन सबसे अधिक गर्मी होती है (स्थानीय मौसम को छोड़कर), क्योंकि सूर्य की किरणें यहां एकदम लंबवत पड़ती हैं।
  • 21 जून को नार्वे जो उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, में अर्द्धरात्रि का सूर्य (Midnight Sun) दिखाई पड़ता है। इस तिथि को नार्वे में 24 घंटे का दिन होता है।
  • सूर्य एक महीने में लगभग 8 डिग्री अक्षांश की तथा एक दिन में 16′ मिनट अक्षांश की यात्रा करता है।
  • अधसौर बिन्दु पृथ्वी के चतुर्विक एक पथ बनाता है जो एक स्प्रिंग की तरह पृथ्वी को कर्क तथा मकर रेखाओं के मध्य लपेटे रहता है। इस पथ को क्रान्तिक वृत्त (Ecliptic) कहा जाता है।
  • भारत में, कर्क रेखा आठ राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात (जसदन), राजस्थान (कलिंजर), मध्य प्रदेश (शाजापुर), छत्तीसगढ़ (सोनहट), झारखंड (लोहरदगा), त्रिपुरा (उदयपुर), मिजोरम (चम्फाई), पश्चिम बंगाल (कृष्णानगर)।
  • kark rekha

 

  • भारत की माही नदी (Mahi River) कर्क रेखा को दो बार काटती है।

 

कर्क रेखा 3 महाद्वीपों के  17 देशों से होकर गुजरती है।

क्रम संख्या महाद्वीप का नाम देश के नाम
1उत्तरी अमेरिकाबहामास (द्वीपसमूह), मेक्सिको
2अफ्रीकामिस्र, लीबिया, नाइजर, अल्जीरिया, माली, पश्चिमी सहारा, मॉरिटानिया
3एशियाताइवान, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब

kark rekha

विश्व की प्रमुख जलसंधियाँ (Straits)

जलसंधियाँ (Straits) पानी का एक संकीर्ण (तंग) मार्ग होता है, जो दो बड़े जल निकायों (जैसे दो समुद्र, महासागर या बड़े जलाशय) को आपस में जोड़ता है। यह आमतौर पर दो भू-भागों (जैसे द्वीपों या महाद्वीपों) के बीच स्थित होता है और जहाज़ों के लिए नौवहन योग्य होता है। अर्थात

जलसंधियाँ (Straits)और पढ़े :-प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ| गोदावरी| कृष्णा| कावेरी|महानदी 

पानी के ऐसे तंग मार्ग को जलसंधि कहते हैं जो दो बड़े पानी के समूहों को जोड़ता हो और जिसमें से नौकाएँ गुज़रकर एक बड़े जलाशय से दूसरे बड़े जलाशय तक जा सकें।
इसका आकार अक्सर डमरू जैसा होता है, इसलिए इसे जलडमरूमध्य या जलडमरू भी कहा जाता है।

विश्व की प्रमुख जलसंधियाँ (Straits) निम्नलिखित है :-

क्रम संख्या जलसन्धि का नाम भू भाग को अलग करता हैजलीय भाग को अलग करता है
1बेरिंग जल संधिएशिया (रूस) एवं उत्तरी अमेरिका (आलस्का)पूर्वी साईबेरियन सागर एवं बेरिंग सागर
2लापैरोज जल संधिसखालिन द्वीप एवं हैकेडो द्वीपओखोट्स सागर एवं जापान सागर
3तत्तर जल संधि पूर्वी रूस एवं सखालिनओखोट्स सागर एवं जापान सागर
4फोरमोसा जल संधिताइवान एवं चीनपूर्वी चीन सागर एवं दक्षिणी चीन सागर
5 लूजोन जल संधिताइवान एवं लूजोन (फिलीपिंस)दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत महासागर
6मलक्का जल संधिमलय प्रायद्वीप एवं सुमात्राजावा सागर (द. चीन सागर) एवं बंगाल की खाड़ी
7जाहौर जल संधिसिंगापुर एवं मलेशियादक्षिणी चीन सागर एवं मलक्का जलसंधि
8होरमुज जल संधिसं.अ. अमीरात एवं ईरानफारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ी
9बास्पोरस जल संधिएशिया एवं यूरोपकाला सागर एवं मरमरा (एजियन) सागर
10बाव - एल मंडेव जलसंधियमन - जिबूतीलाल सागर एवं अरब सागर
11 कारीमाटा जलसंधिइण्डोनेशियादक्षिणी चीन सागर एवं जावा सागर
12कोरिया जल संधिदक्षिण कोरिया एवं क्यूशू (जापान)पीला सागर एवं जापान सागर
13सुण्डा जल संधिजावा एवं सुमात्राजावा सागर एवं हिंद महासागर
14मकस्सार जल संधिबोर्नियो (केलिमंटन) एवं सेलिबीज द्वीपसेलेवीज सागर एवं जावा सागर
15डारडनेल्स जल संधि एशिया एवं यूरोपमरमरा सागर एवं भूमध्य सागर
16 पाक जल संधिभारत एवं श्रीलंका मन्नार एवं बंगाल की खाड़ी
17सुशीमा जलसंधिजापानजापान सागर एवं पूर्वी चीन सागर
18सुगारु जलसंधिजापानजापान सागर एवं प्रशांत महासागर
19नेमुरो जलसंधिजापानप्रशान्त महासागर
20 टोकरा जलसंधिजापानपूर्वी चीन सागर एवं प्रशांत महासागर
21 वाला बैंक जलसंधिपलावान-बोर्नियोंटाइरेनियन सागर और भूमध्यसागर
22डाबर जल संधिइंग्लैण्ड-फ्रांसइंग्लिश चैनल एवं उत्तरी सागर
23डेनमार्क जलसंधिइंग्लैण्ड-फ्रांसउत्तरी अटलांटिक एवं आर्कटिक महासागर
24जिब्राल्टर जल सन्धि ('भूमध्यसागर की कुंजी' के नाम से प्रसिद्ध ) यूरोप (स्पेन) और अफ्रीका (मोरक्को)भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर
25ओरन्टो जलसन्धि इटली और बाल्कन प्रायद्वीपएड्रियाटिक सागर और आयोनियन सागर । ।।
26 नार्थ चैनलआयरलैण्ड-इंग्लैण्डआयरिश सागर एवं अटलांटिक सागर
27बोनीफेसियो जलसन्धिसार्डिनिया (इटली) और कोर्सिका द्वीप (फ्रांस) टाइरेनियन सागर और भूमध्यसागर
28डारडानेल्स जलसन्धि*बाल्कन प्रायद्वीप और अनातोलिया प्रायद्वीप मरमरा का सागर और एजिअन सागर
29 मेसिना जलसन्धिसिसली और इटली प्रायद्वीप टाइरेनियन सागर और भूमध्यसागर
30कर्च जलसन्धिकर्च (यूक्रेन) और रूसअजोव सागर और काला सागर
31बासपोरस जलसन्धिइस्तानबुल और अनातोलिया प्रायद्वीप (तुर्की) काला सागर और मरमरा का सागर
32 नेअर्स जलसंधि ग्रीनलैंड एंव एलिसमेरे द्वीप ।आर्कटिक महासागर एवं बैफिन की खाड़ी को
33 हड्सन जल संधिबैफिन द्वीप एवं ऊनगावा प्रायद्वीप (क्यूबेक) हड्सन की खाड़ी एवं लैब्राडोर सागर ।
34 बेली द्वीप जल संधि लैब्रोडोर एवं न्यूफाउंडलैंड।सेंट लॉरेंस की खाड़ी एवं अटलांटिक महासागर
35 यूकाटन जल संधियुकाटन प्रायद्वीप (उ0पू0 मैक्सिको) एवं क्यूबामैक्सिको की खाड़ी एवं कैरीबियन सागर
36 बेरिंग जल संधि चुक्ची प्रायद्वीप रूस (एशिया) एवं अलास्का (उ0 अमेरिका) आर्कटिक महासागर एवं बैरिंग सागर ।
37डेविस जल संधिग्रीनलैंड एवं बैफिन द्वीप। बैफिन की खाड़ी एवं लैब्राडोर सागर
38फ्लोरिडा जल संधिफ्लोरिडा एवं क्यूबामैक्सिको की खाड़ी एवं अटलांटिक महासागर।
मैगलेन जलसन्धि दक्षिण अमेरिका और तिएरा डेल फ्यूगो अटलांटिक महासागर और प्रशान्त महासागर
ड्रेक जलसन्धि दक्षिण अमेरिका अंटार्कटिक दक्षिण अटलांटिक महासागर और प्रशान्त महासागर

अमेज़न नदी (Amazon River)

“पृथ्वी का फेफड़ा” (lungs of Earth) कहीं जाने वाली अमेज़न नदी (Amazon River) विश्व की सबसे चौड़ी तथा विशाल जलराशि की नदी है।

अमेज़न नदी

और पढ़े :-सिंधु नदी तंत्र| झेलम(वितस्ता)| चेनाब (अस्किनी)| रावी 

नाम – अमेज़न नदी (Amazon River)

लंबाई – लगभग 6,575–7,000 किमी (विश्व की सबसे लंबी या दूसरी सबसे लंबी नदी – नील नदी से विवाद) |

उद्गम स्थल – पेरू के एंडीज पर्वत में मिसमी चोटी (Nevado Mismi) से

मुख्य सहायक नदियाँ – मेडेरा, नेग्रो, टापाजोस, जुरुआ, पुरुस, जावारी, यूपुरा |

सबसे बड़ी सहायक नदी- रियो नेग्रो (Rio Negro)

प्रवाह क्षेत्र – दक्षिण अमेरिका के 9 देश: पेरू, ब्राजील, कोलंबिया, वेनेजुएला, इक्वाडोर, बोलिविया, गुयाना, सूरीनाम, फ्रेंच गुयाना |

डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा नहीं (गंगा-ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ा)

जल प्रवाह – विश्व में सर्वाधिक (लगभग 2,09,000 घन मीटर/सेकंड) |

वर्षा – विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र (250–400 सेमी वार्षिक)

वन – अमेज़न वर्षावन (विश्व का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन) |

जैव-विविधता – विश्व का सबसे अधिक जैव-विविधता वाला क्षेत्र (लाखों प्रजातियाँ)

मछलियाँ – पिरान्हा, अरापाइमा (दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की मछली), इलेक्ट्रिक ईल

जनजातियाँ – यानोमामी, कायापो, तिकुना आदि

प्रमुख शहर – मानुस (ब्राजील), इकितोस (पेरू)

आर्थिक महत्व – जल परिवहन, मत्स्य पालन, जल विद्युत, पर्यटन

पर्यावरणीय समस्या – वनों की कटाई (Deforestation), जलवायु परिवर्तन, खनन प्रदूषण |

महत्वपूर्ण तथ्य
– विश्व की सबसे अधिक जल मात्रा वाली नदी (20% मीठा पानी अटलांटिक में छोड़ती है)
– अमेज़न वर्षावन को “पृथ्वी का फेफड़ा” (Earth’s Lungs) कहा जाता है
– विश्व की सबसे चौड़ी नदी भी (मानसून में 48 किमी तक चौड़ी हो जाती है)
– नदी में 3,000+ मछली प्रजातियाँ (गंगा में सिर्फ 200-250)
– पेरू में इसका नाम “सोलिमोन्स” (Solimões) है, ब्राजील में “अमेज़न”
मीठे पानी का डॉल्फिन (Pink River Dolphin) केवल यहीं पायी जाती है।

यह दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में बहती है।

इसका उद्गम  एण्डीज़ पर्वत (पेरू) से होता है।

यह अटलांटिक महासागर में मिलती है।

इसकी लंबाई लगभग 6400 किलोमीटर है।

अमेज़न नदी के आसपास का क्षेत्र अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट कहलाता है।

इस क्षेत्र में सबसे अधिक वर्षा होती है और यह वन्य जीवों की बहुत विविधता वाला क्षेत्र है।

अमेज़न नदी – प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: अमेज़न नदी किस महाद्वीप में बहती है?

उत्तर: दक्षिण अमेरिका

प्रश्न 2: अमेज़न नदी का उद्गम कहाँ होता है?

उत्तर: एण्डीज़ पर्वत, पेरू में

प्रश्न 3: अमेज़न नदी किस महासागर में मिलती है?

उत्तर: अटलांटिक महासागर

प्रश्न 4: अमेज़न नदी की लगभग लंबाई कितनी है?

उत्तर: लगभग 6400 किलोमीटर

प्रश्न 5: अमेज़न नदी के आसपास का घना जंगल क्या कहलाता है?

उत्तर: अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट

प्रश्न 6: अमेज़न नदी दुनिया की किस प्रकार की नदी मानी जाती है?

उत्तर: दुनिया की सबसे अधिक जल वाली नदी

प्रश्न 7: अमेज़न क्षेत्र में वर्षा कैसी होती है?

उत्तर: बहुत अधिक

प्रश्न 8: अमेज़न रेनफ़ॉरेस्ट में किसकी अधिक विविधता पाई जाती है?

उत्तर: वनस्पति और वन्य जीवों की

 

भारत की झीलें | 8 प्रकार की झीलें| विवर्तनिक| क्रेटर| हिमनदीय

भारत की झीलें: प्रकृति की विविधता और सौंदर्य, भारत अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता के साथ, विभिन्न प्रकार की झीलों का घर है, जो प्रकृति की अनुपम देन हैं। ये झीलें न केवल पर्यावरणीय और पारिस्थितिक महत्व रखती हैं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं।

भारत में झीलें विवर्तनिक, हिमनदीय, ज्वालामुखीय, तटीय, गोखुर, कृत्रिम, क्रेटर और भूस्खलन झीलों के रूप में वर्गीकृत की जा सकती हैं। यह ब्लॉग इन आठ प्रकार की झीलों, उनके निर्माण, विशेषताओं और प्रमुख उदाहरणों पर प्रकाश डालता है, जो भारत की प्राकृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

भारत की झीलें

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1. विवर्तनिक झीलें (Tectonic Lakes) :-

विवर्तनिक झीलें भूपर्पटी की गतियों, जैसे भ्रंश (faulting) या रिफ्टिंग, के कारण बनती हैं।                                                                            इस प्रकार की  झीलें गहरी और लंबी होती हैं, जो रिफ्ट घाटियों में पाई जाती हैं।                                                                                          भारत में वूलर झील (जम्मू-कश्मीर) इसका प्रमुख उदाहरण है, जो झेलम नदी पर बनी देश की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है।                        राजस्थान की नक्की झील (माउंट आबू) भी भ्रंशों से बनी है। कुमाऊं हिमालय की भीमताल और नैनीताल जैसी झीलें भी विवर्तनिक गतिविधियों का परिणाम हैं। भारत की झीलें जैव विविधता और पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

2. हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes):-

हिमनदीय झीलें हिमनदों के पीछे हटने से बने गड्ढों में पानी भरने से बनती हैं। ये उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आम हैं। सिक्किम की त्सोमगो (छांगु) झील और उत्तराखंड की रूपकुंड झील इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

हिमनदीय झीलें ठंडे, साफ पानी और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण इन झीलों में हिमनदीय बाढ़ (GLOF) का खतरा बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है।

भारत की झीलें ट्रेकिंग और धार्मिक पर्यटन को आकर्षित करती हैं।

3. ज्वालामुखीय झीलें (Volcanic Lakes)/क्रेटर झीलें (Crater Lakes) :-

ज्वालामुखीय गतिविधियों से बनी झीलें ज्वालामुखीय क्रेटरों या गड्ढों में बनती हैं।

भारत में ऐसी झीलें दुर्लभ हैं, लेकिन महाराष्ट्र की लोनार झील एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक उल्कापात (meteorite impact) से बनी क्रेटर झील है, जो अपने खारे पानी और अद्वितीय जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसका पानी क्षारीय (alkaline) है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

यह झील स्थानीय और वैश्विक शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का केंद्र है। क्रेटर झीलें दुर्लभ होती हैं, लेकिन इनका सौंदर्य और वैज्ञानिक महत्व भारत की भूवैज्ञानिक विविधता को रेखांकित करता है।

लोनार झील UNESCO विश्व धरोहर स्थल के लिए नामांकित है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

4. तटीय झीलें (Coastal/Lagoon Lakes):-

तटीय झीलें समुद्र तटों के पास रेत के अवरोधों (sandbars) या लैगून के कारण बनती हैं। ओडिशा की चिल्का झील, जो भारत की सबसे बड़ी खारी झील है, इसका प्रमुख उदाहरण है। यह प्रवासी पक्षियों, जैसे फ्लेमिंगो, के लिए महत्वपूर्ण है और रामसर साइट के रूप में मान्यता प्राप्त है।

केरल की वेम्बनाड झील, जो कयाल प्रणाली का हिस्सा है, भी तटीय झील का उदाहरण है। ये झीलें मछली पालन, पर्यटन और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समुद्र स्तर वृद्धि से खतरे में हैं।

5. गोखुर झीलें (Oxbow Lakes):-

गोखुर झीलें नदियों के घुमावदार मार्ग (meanders) के कटने से बनती हैं, जब नदी अपने पुराने मार्ग को छोड़ देती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के मैदानों में ऐसी कई झीलें पाई जाती हैं।

जैसे बिहार की कावर झील एक गोखुर झील है, जो प्रवासी पक्षियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। ये झीलें मीठे पानी की आपूर्ति और मछली पालन के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अवसादन (siltation) के कारण इनका क्षेत्रफल घट रहा है।

6. कृत्रिम झीलें (Man-made Lakes):-

कृत्रिम झीलें मानव द्वारा बनाए गए जलाशय हैं, जो सिंचाई, जलापूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए बनाए जाते हैं। तमिलनाडु की भवानीसागर झील, राजस्थान की फतेहसागर झील और मध्य प्रदेश की गांधी सागर झील इसके उदाहरण हैं।

यह झीलें स्थानीय अर्थव्यवस्था और कृषि को समर्थन देती हैं। तेलंगाना की हुसैन सागर झील, जो हैदराबाद में है, सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व रखती है। हालांकि, प्रदूषण और अतिक्रमण इन झीलों के लिए चुनौती हैं।

7. लैगून झीले (Lagoon Lakes):-

लैगून झीलों का निर्माण समुद्र-तट के किनारे बालू जमा होने के कारण होता है। उड़ीसा की चिल्का झील, पुलीकट (आंध्र प्रदेश), वेम्बनाद तथा अष्टामुदी-केरल के कयाल लैगून के कुछ उदाहरण हैं।

8. भूस्खलन झीलें (Landslide Lakes) :-

भूस्खलन झीलें तब बनती हैं, जब भूस्खलन या मलबा नदी के प्रवाह को अवरुद्ध करता है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में ऐसी झीलें आम हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड की गोविंद सागर झील भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्र में बनी है। ये झीलें अस्थायी हो सकती हैं और बाढ़ का खतरा पैदा करती हैं। इनका प्रबंधन और निगरानी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय गतिविधियां इन्हें अस्थिर बना सकती हैं।

द्रवण झीलें (Dissolution Lakes ):-

इन झीलों निर्माण सतह में एक गर्त के कारण होता है, जो चूना पत्थर तथा जिप्सम जैसे घुलनशील शैल के भूमिगत विलयन के कारण बनता है। ऐसे झीलें चेरापूंजी में तथा उसके आस-पास, शिलाँग (मेघालय), भीमताल, कुमाऊं तथा गढ़वाल (उत्तराखण्ड) में पायी जाती हैं।

भारत की झीलें प्रकृति और मानव गतिविधियों की विविधता का प्रतीक हैं। विवर्तनिक और हिमनदीय झीलें हिमालय के सौंदर्य को दर्शाती हैं, तो तटीय और गोखुर झीलें मैदानी और तटीय क्षेत्रों की जैव विविधता को समृद्ध करती हैं। कृत्रिम और क्रेटर झीलें मानव और भूवैज्ञानिक इतिहास को दर्शाती हैं। 

प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण इन झीलों के लिए खतरा हैं। इनके संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयास, नीतिगत हस्तक्षेप और जागरूकता आवश्यक है। ये झीलें भारत की प्राकृतिक धरोहर हैं, जिन्हें सहेजना हमारा कर्तव्य है।

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ| गोदावरी| कृष्णा| कावेरी|महानदी

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ मुख्य रूप से दक्कन के पठार और प्रायद्वीपीय क्षेत्र से निकलती हैं और अपनी उत्पत्ति, प्रवाह और विशेषताओं के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटी जा सकती हैं:-

1- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ
2- पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ।
ये नदियाँ प्रायद्वीपीय भारत के भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नीचे प्रमुख नदियों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है :-

1- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ :-

ये नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। ये सामान्यतः लंबी होती हैं और बड़े डेल्टा का निर्माण करती हैं। प्रमुख नदियाँ हैं:-

और पढ़े :-सिंधु नदी तंत्र| झेलम(वितस्ता)| चेनाब (अस्किनी)| रावी

* गोदावरी नदी :-

उत्पत्ति – त्र्यंबकेश्वर, महाराष्ट्र (पश्चिमी घाट)।
लंबाई लगभग 1,465 किमी (भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी)।
प्रवाह– महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– यह दक्कन की सबसे बड़ी नदी है और इसका विशाल डेल्टा आंध्र प्रदेश में कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख सहायक नदियाँ – प्राणहिता, मंजीरा, इंद्रावती, सबरी।

* कृष्णा नदी :-

उत्पत्ति– महाबलेश्वर, महाराष्ट्र (पश्चिमी घाट)।
लंबाई– लगभग 1,400 किमी।
प्रवाह– महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– इसका डेल्टा उपजाऊ है और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– तुंगभद्रा, भीमा, कोयना, घाटप्रभा।

* कावेरी:-

उत्पत्ति– तलकावेरी, कर्नाटक (पश्चिमी घाट)।
लंबाई– लगभग 805 किमी।
प्रवाह– कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– इसे “दक्षिण की गंगा” कहा जाता है। इसका डेल्टा तमिलनाडु में धान की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– हेमावती, कबिनी, अर्कावती, भवानी।

•महानदी :-

उत्पत्ति– सिहावा, छत्तीसगढ़।
लंबाई– लगभग 858 किमी।
प्रवाह– छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता:- इसका डेल्टा ओडिशा में कृषि और बाढ़ नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– शिवनाथ, तेल, हसदेव।

•पेन्नार नदी:-

उत्पत्ति– नंदी पहाड़ियाँ, कर्नाटक।
लंबाई– लगभग 597 किमी।
प्रवाह– कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में।
विशेषता– यह छोटी नदी है, लेकिन इसका डेल्टा कृषि के लिए उपयोगी है।

स्वर्णरेखा नदी :-

उत्पत्ति– रानीचुआ पहाड़ी (छोटा नागपुर पठार) नागड़ी गांव के पास जिला रांची (झारखंड)
लंबाई– 400 किलोमीटर
प्रवाह– झारखंड (रांची, सरायकेला, खरसावां, पूर्वी सिंह भूमि)
ओडीशा (मयूरभंज, बालासोर) पश्चिम बंगाल- मेदिनीपुर
विशेषता– औद्योगिक नगर जमशेदपुर इसी नदी के किनारे स्थित है।
इसके किनारे तांबा और यूरेनियम का खनन होता है।
प्रमुख सहायक नदियां– खरकई, रारू, कांची, अंजी, करकरी

2. पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ :-

ये नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में गिरती हैं। ये सामान्यतः छोटी, तेज बहाव वाली और खड़ी ढलानों पर बहने वाली होती हैं। प्रमुख नदियाँ हैं:

नर्मदा नदी :-

उत्पत्ति– अमरकंटक, मध्य प्रदेश।
लंबाई– लगभग 1,312 किमी।
प्रवाह– मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी पश्चिमी बहाव वाली नदी है। यह रिफ्ट घाटी में बहती है और इसका मुहाना (एस्चुरी) गुजरात में है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– होशंगाबाद, तवा, बरना।

•ताप्ती नदी :-

उत्पत्ति– मुलताई, मध्य प्रदेश।
लंबाई– लगभग 724 किमी।
प्रवाह– मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– यह नर्मदा के समानांतर बहती है और इसका मुहाना भी गुजरात में है।
प्रमुख सहायक नदियाँ– पूर्णा, गिरना, पांझरा।

माही नदी :-

उत्पत्ति– मध्य प्रदेश (विंध्याचल पर्वत)।
लंबाई– लगभग 583 किमी।
प्रवाह– मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– यह गुजरात में कृषि और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण है।

•साबरमती :-

उत्पत्ति– अरावली पर्वतमाला, राजस्थान।
लंबाई– लगभग 371 किमी।
प्रवाह– राजस्थान और गुजरात से होकर अरब सागर में।
विशेषता– अहमदाबाद शहर इसके किनारे बसा है।

लूनी नदी :-

उत्पत्ति– राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित नाग पहाड़ (अरावली श्रेणी) से।
लंबाई– 495 किलोमीटर
प्रवाह– अजमेर, नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर और जालौर कच्छ के रण (गुजरात)।
विशेषता– इस नदी को “आधी मीठी, आधी खारी” नदी भी कहते हैं, क्योंकि उद्गम स्थल से बालोतरा (बाड़मेर) तक इसका पानी मीठा होता है, तथा इससे आगे रेगिस्तान में इसका पानी खारा हो जाता है। यह मौसमी नदी है, तथा कच्छ के रण (गुजरात) में विलीन हो जाती है। प्रमुख सहायक नदियां- लीलड़ी, बाड़ी, सुकड़ी, मीठड़ी, जवाई, खारी और जोजरी, सागाई और गुहिया।
इस नदी को लवण्वती, मरू गंगा, रेगिस्तान की गंगा आदि नाम से भी जाना जाता है।

 बनास नदी :-

उत्पत्ति– खमनोर पहाड़ (Khamnor Hills)अरावली पर्वत श्रेणी, जिला राजसमंद (राजस्थान)।
लंबाई– 512 किलोमीटर
प्रवाह– राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर तथा टोंक जिलों से बहती है। विशेषता- इसका उद्गम स्थल वन क्षेत्र होने के कारण इसे “वन की नदी” कहा जाता है। यह नदी मुख्यतः राजस्थान में बहती है। यह चंबल नदी में मिल जाती है, जो यमुना की सहायक नदी है। प्रमुख सहायक नदियां- बेड़च, कोठारी, मोरेर, मेन्ल,खारी,दई, गंभीरी आदि।

शरावती नदी :-

उत्पत्ति– कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिले की अंबुथीर्था (Ambutirtha) पहाड़ी जो पश्चिमी घाट में स्थित है।
लंबाई– 128 किलोमीटर
प्रवाह– शिमोगा जिले से चलकर उत्तर कन्नड़ जिले के होनावर के समीप अरब सागर में गिरती है। विशेषता- यह एक बारहमासी नदी है।
यह नदी अपनी प्राकृतिक सुंदरता तथा विश्व प्रसिद्ध जोग जलप्रपात (Jog Falls) के लिए प्रसिद्ध है।

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ  की विशेषताएँ और महत्व :-

भौगोलिक प्रभाव- प्रायद्वीपीय नदियाँ कठोर चट्टानी भूभाग से होकर बहती हैं, जिसके कारण इनमें जलप्रपात और घाटियाँ आम हैं। उदाहरण: कावेरी का होगेनक्कल जलप्रपात।
कृषि और अर्थव्यवस्था- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ अपने डेल्टा क्षेत्रों में धान, गन्ना और अन्य फसलों के लिए उपजाऊ भूमि प्रदान करती हैं। पश्चिमी नदियाँ जलविद्युत और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सांस्कृतिक महत्व- कावेरी, गोदावरी और नर्मदा जैसी नदियाँ धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पवित्र मानी जाती हैं।

– प्रायद्वीपीय नदियाँ हिमालयी नदियों (जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र) की तुलना में छोटी और मौसमी होती हैं, क्योंकि ये मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर हैं।
– इन नदियों पर कई बाँध और जलाशय बनाए गए हैं, जैसे गोदावरी पर जायकवाड़ी बाँध और कृष्णा पर नागार्जुन सागर बाँध, जो सिंचाई और बिजली उत्पादन में सहायक हैं।

 

सिंधु नदी तंत्र| झेलम(वितस्ता)| चेनाब (अस्किनी)| रावी

सिंधु नदी तंत्र :-

* सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित बोखर- चू हिमनद से होता है। इसकी सहायक नदियां झेलम, चेनाव, रावी, व्यास तथा सतलज हैं। सिंधु नदी तंत्र यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पश्चिमी नदी तंत्र है।

सिंधु नदी तंत्र

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* सिंधु नदी की कुल लंबाई 2880 किलोमीटर जिसमें 709 किलोमीटर भारत में शेष 2171 किलोमीटर पाकिस्तान में प्रवाहित होती है। कुल जल ग्रहण क्षेत्र लगभग 1165000 वर्ग किलोमीटर है। जिसमें 321284 वर्ग किलोमीटर भारत में है।

•इसका उद्गम स्थल बोखर- चू हिमनद कैलाश श्रेणी के उत्तरी ढ़ाल पर अवस्थित है। यह नदी काराकोरम, लद्दाख, जास्कर पर्वत श्रेणियां में प्रवाहित होती है। तिब्बत में इस नदी को सिंगी खंबन या लायंस माउथ(lion’s mouth) नाम से जाना जाता है।

•जास्कर नदी इसमें लेह के नीचे मिलती है। तथा कारगिल के पास बायें किनारे से सुरू एवं द्रास नदियां मिलती हैं। काराकोरम श्रेणी में स्थित सियाचिन हिमनद से स्योक, नुबरा सहायक नदियां उत्तर पश्चिम ओर से निकलकर सिंधु नदी में मिलती हैं।

* सिंधु नदी में दाएं से मिलने वाली नदियां श्योक, गिलगिट, काबुल, कुर्रम, टोची, गोमल, जोब(zhob) आदि।

* बाए से मिलने वाली नदियां जास्कर, सुरू, सोहन, चेनाव (झेलम, रावी ,व्यास, सतलज) आदि।

झेलम (वितस्ता):-

 झेलम नदी, सिंधु नदी तंत्र की महत्वपूर्ण नदी है, जिसका  उद्गम पीर पंजाल पर्वत के पदस्थली में स्थित बेरीनाग झरने से होता है। जो कश्मीर घाटी के दक्षिणी पूर्वी भाग में स्थित है। श्रीनगर इसी नदी के किनारे बसा है। अपने उद्गम स्थल से लगभग 110 किलोमीटर उत्तर पश्चिम बहने के बाद यह नदी बुलर झील में प्रवेश करती है। मुजफ्फराबाद (पाकिस्तान) से मंगला तक यह नदी भारत पाकिस्तान सीमा के लगभग समानांतर प्रवाहित होती है। यह ट्रिग्यू में चेनाब नदी से मिलती है। कश्मीर घाटी में झेलम की ढाल अधिक गहरी नहीं है। इसलिए अनंतनाग से बारामुला तक झेलम नदी नौकागम्य है। किशनगंगा इसकी सहायक नदी है। जिसे पाकिस्तान में नीलम नदी के नाम से जाना जाता है। यह नदी कश्मीर की सबसे महत्वपूर्ण नदी है।

चेनाब (अस्किनी):-

•यह सिंधु नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
* चंद्रा तथा भागा चेनाब नदी की दो सहायक नदियां हैं। जो ऊपरी भाग से मिलती हैं।
* हिमाचल प्रदेश में चेनाब नदी को चंद्रा-भागा नाम से जानते हैं।
•चंद्रा-भागा का उद्गम बारा-लाच्चा दर्रे के दोनों तरफ से होता है।
•बारा लाच्चा दर्रा हिमाचल प्रदेश के लाहौल जिले में स्थित है।
* चंद्रा नदी का उद्गम एक हिमनद से होता है, जबकि भाग नदी प्रपाती है।
* चंद्रा और भागा दोनों नदिया टांडी में मिलने के बाद चेनाब के रूप में पीर पंजाल तथा वृहद हिमालय के बीच बहती हैं।

•चेनाब नदी किश्तवार के निकट कैंची मोड़ के साथ पीर पंजाल पर्वत श्रेणी में रिआसी में पार कर पाकिस्तान में प्रवेश करती है। •बागलिहार, सेलाल तथा दुलहस्ती जैसी महत्वपूर्ण जल बिजली परियोजनाएं इसी नदी पर स्थित है।
* बागलिहार परियोजना जम्मू कश्मीर के डोडा जिले में स्थित है। जो 450 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर जम्मू कश्मीर को पर्याप्त बिजली आपूर्ति करती है।

 रावी (पुरुष्णी अथवा इरावती):-

* रावी नदी का उद्गम कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) में रोहतांग दर्रे के पास होता है। इसी स्रोत के निकट से ही व्यास नदी का भी उद्गम होता हैं।
•रावी नदी की घाटी को कुल्लू घाटी कहते हैं।
•यह नदी धौलाधार श्रेणी में एक महाखड्ड के निर्माण के बाद पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है। यहां यह नदी भारत पाक सीमा के साथ-साथ बहती है।
गुरुदासपुर तथा अमृतसर इसी नदी पर स्थित है। इन्हीं जिलों को पार कर यह नदी पाकिस्तान में प्रवेश करती है।

व्यास (विपाशा अथवा अर्गीकिया):-

व्यास नदी का उद्गम स्थल व्यास कुंड है जो कुल्लू हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे के दक्षिण में स्थित है
*व्यास नदी सतलज नदी की सहायक नदी है
•धौलाधार श्रेणी को पार कर व्यास नदी कोटी एवं लार्जी के पास एक महाखड्ड का निर्माण करती है।

•मनाली एवं कुल्लू जो हिमाचल प्रदेश में अवस्थित है। इसी नदी के किनारे स्थित है। यहीं पर इसके द्वारा एक अनुप्रस्थ घाटी का निर्माण होता है, जिसे कुल्लू घाटी कहते हैं।
•व्यास नदी कांगड़ा घाटी को पार कर पश्चिम की ओर मुड़कर पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है।
•पंजाब के मैदान में कपूरथला तथा अमृतसर जिलों को पार कर यह हरिके (भारत) के पास सतलज नदी में मिल जाती है।

सतलज (साताद्रु अथवा सातुद्री):-

•सतलज नदी का उद्गम मानसरोवर झील (चीन) के निकट स्थित राकास झील (राकास ताल) से होता है।
•सतलज नदी एक पूर्ववर्ती नदी का उदाहरण है।
•सतलज नदी को तिब्बत में लांग चेन खम्बाब नाम से जाना जाता है।
•यह नदी जास्कर और वृहद हिमालय श्रेणी में एक महाखड्ड का निर्माण करती है।
शिपकी ला दर्रे से होती हुई हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करती है।
•हिमाचल प्रदेश में यह नदी जास्कर श्रेणी को पार कर पश्चिम की ओर मुड़कर कल्पा को पार कर रामपुर के पास धौलाधार श्रेणी को एक महाखड्ड के द्वारा पार करती है।
•सतलज नदी शिवालिक श्रेणी को पार कर भाखड़ा गांव के पास महाखड्ड पर भाखड़ा बांध का निर्माण किया गया है।
•भाखड़ा बांध के पास रोपड़ में यह नदी पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है।
•सतलज नदी कपूरथला के दक्षिण पश्चिम किनारे पर स्थित हरिके नामक स्थान पर व्यास नदी में मिलती है, तथा आगे चलकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है।

घाघरा (पौराणिक सरस्वती):-

•घाघरा नदी का उद्गम सिरमुर के शिवालिक के पाद मलवा पंख (Talus Fan) से होता है। जो की अंबाला (हरियाणा) के निकट स्थित है।
•घाघरा नदी एक अतः स्थलीय अपवाह का उदाहरण है।
•यह नदी शिवालिक श्रेणी को पार करके जब मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद विलुप्त हो जाती है। लेकिन यह करनाल जिले में फिर से प्रकट हो जाती है। तब इसे सरिता हरका कहा जाता है। जो की हनुमानगढ़ (बीकानेर राजस्थान) के निकट पुनः विलुप्त हो जाती है।
•वैदिक काल में घाघरा नदी को सरस्वती नाम से जाना जाता था।
•घाघरा नदी पाकिस्तान में कच्छ के क्षेत्र (Raan of kachchh) में मिल जाती है।

विश्व की स्थानीय पवने|चिनूक| फाॅन| सिराको|हरमट्टन|नार्वेस्टर

विश्व की स्थानीय पवने निम्नलिखित हैं:-

1- गर्म स्थानीय पवने:- 

चिनूक हवा (Chinook wind):-                                                    एक प्रकार की गर्म और शुष्क हवा होती है जो मुख्य रूप से पर्वतीय इलाकों से नीचे की ओर बहती है, खासकर उत्तरी अमेरिका में। यह हवा विशेष रूप से *रॉकी पर्वत* (Rocky Mountains) के आस-पास के क्षेत्रों में पाई जाती है। यह हवा उत्तरी अमेरिका के राॅकी पर्वत श्रेणियां के पूर्वी ढाल पर अलबर्टा, पश्चिमी सस्केचवान तथा मोंटाना राज्यों में ढालों से नीचे की और शुष्क और गर्म दक्षिणी-पश्चिमी पवनें प्रवाहित होती हैं।

बसंत काल में इनकी गर्मी से तापमान अचानक बढ़ जाता है। और बर्फ पिघलने की क्रिया तेजी से होने लगती है इन्हीं पवनो को चिनूक कहते हैं। यह पवन वहां के स्थानीय पशुपालकों के लिए लाभदायक होती है क्योंकि इसके आगमन से चरागाहों की बर्फ पिघल जाती है। और वह बर्फ मुक्त हो जाते हैं। जिससे उनके पशुओं को चारा उपलब्ध होता है। चिनूक हवा का प्रभाव मौसम पर बहुत अधिक पड़ता है, और इसे “चिनूक” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हवा अक्सर चिनूक नामक स्थानों से आती है।

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चिनूक हवा के प्रमुख लक्षण:-

1.गर्म और शुष्क:- चिनूक हवा में आमतौर पर उच्च तापमान होता है, जो ठंडी और नम हवा की तुलना में बहुत अधिक गर्म होती है।

2.पर्वतीय क्षेत्रों से बहना:- यह हवा जब पर्वतों से नीचे की ओर आकर उतरती है, तो उसे “चिनूक” कहा जाता है। इस प्रक्रिया को “ओरोग्राफिक लिफ्टिंग” कहते हैं, जिसमें हवा पर्वतों के ऊपर चढ़ने के बाद, जब नीचे उतरती है, तो उसकी नमी घट जाती है और तापमान बढ़ जाता है।

3.तेज़ी से मौसम में बदलाव:- चिनूक हवा के कारण अचानक मौसम में परिवर्तन होता है, और इससे ठंडे मौसम में भी गर्मी का अनुभव हो सकता है। यह हवा कभी-कभी हिमपात (snow) को भी जल्दी पिघला देती है।

4.विविध प्रभाव:- चिनूक हवा के कारण बर्फ़ीले इलाकों में जल्दी गर्मी आती है, जिससे बर्फ़ जल्दी पिघलती है और स्थानीय तापमान में तेजी से वृद्धि होती है।

चिनूक हवा विशेष रूप से *कनाडा के प्रेयरी इलाकों* और *संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी राज्यों* में महसूस की जाती है। यह हवा कृषि, मौसम और दिनचर्या पर महत्वपूर्ण असर डाल सकती है।

विश्व की स्थानीय पवने

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फाॅन (Foehn):-
फाॅन पवन एक गर्म तथा अत्यधिक शुष्क पवन है। जो आल्पस पर्वत के उत्तरी ढ़ाल से नीचे उतरती है। इसको ऑस्ट्रिया तथा जर्मनी में फाॅन कहा जाता है। इसका प्रभाव सबसे अधिक स्विट्जरलैंड में होता है।

यह पवन जब पर्वत से नीचे उतरती है तो इसका तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस से 20 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। इसी कारण अपने मार्ग की बर्फ को पिघला देती है, जिससे मौसम सुहावना हो जाता है, इसके प्रभाव से यहां अंगूर की फसल शीघ्र पक जाती है। चारागाह पशुओं के चरने योग्य बन जाते हैं। यह पवन मुख्यतः शीत ऋतु के अंत में तथा बसंत ऋतु के प्रारंभ में चला करती है।

 सिराको (SIROCCO):-
यह पवन अत्यधिक आर्द्र और अत्यधिक शुष्क सहारा मरुस्थल में भूमध्य सागर की ओर चलने वाली गर्म हवा है। भूमध्य सागर से गुजरते समय यह नमी धारण करती है तथा इटली में वर्षा करती है।

मरुस्थल की रेत के साथ वर्षा होने पर पानी की बूंदे लाल हो जाती है, इसी कारण इटली में इसे रक्त की वर्षा (Blood rain) कहते हैं। इटली में इसे सिराको (sirocco), स्पेन में लेवेंच (Levech) तथा मैड्रिया तथा कनारी द्वीप समूह में इसे लेस्ट नाम से जाना जाता है। इसे विभिन्न स्थानों में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। जैसे:- मिस्र में खमसिन, लीबिया में गिबली, ट्यूनीशिया में चिली, स्पेन में लेवेंच, मेडिरा व कनारी में लेस्ट, अरब के रेगिस्तान में सिमूम।

सिराको पवन प्रायः सभी मौसमों में चलती है, लेकिन बसंत काल में भूमध्य सागर में चलने वाले चक्रवातों के समय अत्यधिक सक्रिय होती है। यह हवाएं कृषि और बागवानी फसलों के लिए विनाशकारी होती हैं। जैसे स्पेन इटली आदि में इसके चलने से अंगूर और जैतून की फसलों के फूल झड़ने से अत्यधिक नुकसान होता है।

अरब के रेगिस्तानों में सिमूम के नाम से पुकारी जाने वाली यह हवा अत्यधिक गर्म शुष्क रेत की आंधियां होती हैं। जिससे यहां की दृश्यता लगभग शून्य हो जाती है।

हरमट्टन (HARMATTAN):-
सहारा मरुस्थलीय प्रदेश में चलने वाली गर्म अति शुष्क और रेत युक्त गिनी की तट की ओर चलने वाली पवन को “हरमट्टन” कहते हैं। यह पवन इतनी गर्म होती है, जिसके फलस्वरुप पौधों के तनों में दरारें पड़ जाती हैं।

यह हवाएं गिनी तट पर पहुंचती हैं, तो वहां की आर्द्र हवा (उमस) का वाष्पीकरण होने के कारण हवाएं ठंडी हो जाती हैं, फलस्वरुप लोगों को उमस से राहत मिलती है, इसी कारण इस पवन को “डॉक्टर पवन” (Doctor wind) की संज्ञा दी जाती है।

 लू (Loo):-
उष्ण प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में बहने वाली शुष्क हवाओं को “लू” कहते हैं। भारत में इस पवन का तापक्रम 38 डिग्री सेल्सियस से 49 डिग्री सेल्सियस तक होता है। यह भारत में मई के अंतिम सप्ताह से जून के अंतिम सप्ताह तक बहती है।

 ब्रिक फील्डर (Brick Fielder):-
ब्रिक फील्डर दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के मरुस्थलीय प्रदेशों (विक्टोरिया) से चलने वाली गर्म शुष्क धूल भरी स्थानीय हवा है। इसे “साउदर्ली बूस्टर” के नाम से भी जाना जाता है। इसके प्रभाव से ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण पूर्वी तटीय क्षेत्र का तापमान बहुत बढ़ जाता है, और यहां का मौसम गर्म और शुष्क हो जाता है।

इस पवन में धूल की मात्रा होने के कारण दृश्यता को प्रभावित करती है। यह अर्जेंटीना में चलने वाली “जोंडा पवन” के समकक्ष होती है। इसका नाम मध्य सिडनी में स्थित ब्रिक फील्ड पहाड़ी के नाम से पड़ा है।

 सिमूम(Simoom):-
यह एक गर्म शुष्क तथा दम घुटाने वाली हवा है। जो सहारा और अरब के मरुस्थलों में बसंत और ग्रीष्म में चलती है। यह अपने साथ बालू उड़ा कर लाती है, इन हवाओं का तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक हो जाता है। जिससे शरीर में इतनी गर्मी उत्पन्न होती है, कि पसीने के वाष्पीकरण से उसका समाधान नहीं हो पाता है। जिससे “हीट स्ट्रोक” होने का खतरा रहता है। इसलिए इसे “जहरीली हवा” भी कहते हैं।

काराबुरान (Kara buran):-
काराबुरान पवन मध्य एशिया में सिक्यांग के तारिम बेसिन में बहने वाली गर्म और शुष्क उत्तरी पूर्वी हवा है। यह हवा मरुस्थलों में धूल उड़ाकर लोएस (पाऊस) के मैदान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह हवा बसंत के आरंभ से ही लेकर ग्रीष्म के अंत तक बहती है।

 खमसिन(Khamsin):-
मिस्र में सिराको पवन को ही खमसिन नाम से जाना जाता है। जो मिस्र के उत्तर की ओर प्रवाहित होती है, इसकी उत्पत्ति उष्ण मरुस्थलीय प्रदेशों से होने के कारण इसमें धूल कणों की अधिकता होती है। मुख्यतः यह पवन बसंत ऋतु में चलती है।

 गिबली(Gibli):-
यह पवन उत्तरी अफ्रीका के लीबिया, ट्यूनीशिया से भूमध्य सागर की ओर चलने वाली स्थानीय पवन है। जो कि गर्म शुष्क और धूल भरी होती है। यह पवन जब भूमध्य सागर से गुजरती है तो नमी ग्रहण करती है, जिसके फल स्वरुप बादलों का निर्माण होकर बारिश होती है। जिसमें धूल के कणों की उपस्थिति रहती है। यह पवन सिराको पवन का ही विस्तार है। जिसे लीबिया में गिबली नाम से जाना जाता है।

 चिली(Chilli):-
यह ट्यूनीशिया में चलने वाली गर्म शुष्क हवा है, जो भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उत्तरी अफ्रीका से चलने वाली गर्म और शुष्क पवन सिराको को ही ट्यूनीशिया में चिली नाम से जाना जाता है।

 ब्लैक रोलर (Black Roller):-
ब्लैक रोलर एक गर्म स्थानीय पवन है, जो उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदान में दक्षिण पश्चिम या उत्तरी पश्चिमी तेज धूल भरी आंधियों के रूप में चलती है। इन पवनो में धूल की मात्रा इतनी होती है कि जो कि मार्ग में पढ़ने वाली इमारतों को ढ़क देती है।

 शामल (Shamal):-
यह एक गर्म हवा है, जो इराक, मेसोपोटामिया, फारस की खाड़ी की ओर उत्तर पूर्व से चलने वाली पवन है।

 नार्वेस्टर(Norwester):-
यह न्यूजीलैंड के दक्षिण द्वीप की पर्वतमालाओं से उत्पन्न होने वाली फाॅन पवन की भांति गर्म शुष्क झोकेदार पवन है।
भारत और बांग्लादेश में भी बंगाल की खाड़ी से आने वाली स्थानीय आंधी तूफान को नार्वेस्टर या काल वैसाखी कहा जाता है यह उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है यह गरज, बिजली, ओलावृष्टि और भारी बारिश लाती हैं। लेकिन यह कुछ फसलों के लिए लाभकारी सिद्ध होती है।

 सांता आना (Santa Ana):-
सांता आना धूलयुक्त, गर्म, शुष्क स्थानीय पवन है। जो कि दक्षिणी कैलिफोर्निया के तटीय मैदानों में चलती है। इस पवन के प्रकोप से कैलिफोर्निया के फलों के बगीचों को अपार क्षति होती है।पेड़-पौधे सूख जाते हैं, फलस्वरुप जंगलों में आग भी लग जाती है।

 कोयमबैंग (Coembang ):-
कोयमबैंग जावा, इंडोनेशिया में चलने वाली गर्म स्थानीय हवा है। फाॅन के समान लक्षण वाली पवन है। इस पवन द्वारा यहां की तंबाकू की फसल को अधिक नुकसान होता है।

 योमा(Yoma):-
योमा जापान की खड़ी घाटियों में चलने वाली गर्म, शुष्क स्थानीय पवन है। जो निर्धारित स्थानों पर नियमित चलती है।

जोन्डा (Zonda):-
यह अर्जेंटीना में चलने वाली गर्म, शुष्क, उमसदार स्थानीय पवन है। जो पश्चिम में एंडीज पर्वतमालाओं से नीचे मैदानों की ओर चलती है। इसे “शीत फाॅन” (Winter Foehn) भी कहते हैं।

 सोलैनो(Solano):-
यह दक्षिणी पूर्वी स्पेन तथा जिब्राल्टर में बहने वाली पूर्वी तथा दक्षिणी पूर्वी स्थानीय पवन है। यह पवन गर्मियों में शुष्क, गर्म होती है, तथा कभी-कभी नमी ग्रहण करके वर्षा भी करती है।

 ट्रेमोंटेनो (Tramontano):-
यह मध्य यूरोमें बहने वाली गर्म, शुष्क स्थानीय हवा है। जो यहां की संकरी घाटियों में बहती है।

 सिमून(Simun/Simoon):-
यह ईरान मैं चलने वाली कर गर्म, शुष्क स्थानीय पवन है। जो यहां के कुर्दिस्तान पर्वत के नीचे मैदानी भागों में चलती है।

 अयाला (Ayala):-
यह एक तीव्र प्रचंड गर्म स्थानीय पवन है। जो कि फ्रांस के सेंट्रल मैसिफ क्षेत्र में बहती है। मध्य एशिया, इराक, गिनी तट, अमेरिका के मेड्रिया,इटली मे इसी पवन को सिराॅको कहते हैं।

 बर्ग(berg):-
दक्षिण अफ्रीका में चलने वाली गर्म एवं शुष्क स्थानीय पवन है। यह यहां के आंतरिक पठारों से तटीय क्षेत्र की ओर बहती है।

 बाग्यो (Baguio):-
यह फिलिपींस द्वीप समूह क्षेत्र में बहने वाली उष्णकटिबंधीय चक्रवाती पवनें (Tropical Storm) है। जो जुलाई से नवंबर तक चलती हैं

2-ठंडी स्थानीय पवने :-

 मिस्ट्रल(Mistral):-यह एक ठंडी शुष्क स्थानीय हवा है। जो फ्रांस के उच्च पठार से होकर भूमध्य सागर की ओर तीव्र गति से चलती हैं। और यह उत्तरी पश्चिमी अथवा उत्तरी हवाएं जो मुख्यतः रोन डेल्टा तथा लायन्स की खाड़ी में चलती है।

यह ठंडी हवाएं मध्यवर्ती यूरोप में उपस्थित शीतकालीन प्रतिचक्रवात से होकर गुजरती हैं।इन हवाओं की औसत गति 60 किलोमीटर प्रति घंटा होती है, लेकिन कभी-कभी इनकी गति 130 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच जाती है।

 बोरा (Bora):-
एड्रियाटिक सागर के उत्तरी तट पर चलने वाली एक ठंडी पवन है। यह पवन मध्य यूरोप में उत्तरी पूर्वी पर्वतों के उच्च दाब क्षेत्र से भूमध्य सागर में विद्यमान निम्न दाब के क्षेत्र में प्रायः शीत काल में चलती है। इस पवन के लक्षण मिस्ट्रल पवन से मिलते जुलते होते हैं।

 विली विली (Willy Willy):-
यह पवन एक रूप से उष्णकटिबंधीय तीव्र तूफान की श्रेणी में आता है जो ठंडा अल्पकालिक एवं स्थानीय होता है। यह हवाएं ऑस्ट्रेलिया में उत्तरी -पश्चिमी तट के समीप उत्पन्न होती हैं।

 पोनेण्टी (Ponente):-
यह एक ठंडी पवन है, जिसके चलने से सामान्यता मौसम शुष्क हो जाता है। यह भूमध्य सागरीय क्षेत्र में कोर्सिका के तट पर तथा भूमध्य सागरीय फ्रांस में चलने वाली पश्चिम पवन हैं।

 पुर्गा (Purga):-
यह एक ठंडी स्थानीय पवन है। जो टुंड्रा प्रदेश के अलास्का व साइबेरिया क्षेत्र में प्रचंड हिम झंझावात या बर्फीले तूफानों के रूप में उत्तर- पश्चिम दिशा में चलते हैं।

 ब्लिजर्ड(Blizzard):-
यह एक ठंडी स्थानीय हवा है। जिसे ‘हिम झंझावात” भी कहते हैं। जो दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र साइबेरिया, कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में चलती है। यह पवन ध्रुवों से आने के कारण बर्फ के कणों से युक्त होती है। इसके चलने से यहां का तापमान अचानक हिमांक से नीचे गिर जाता है। सतह बर्फ से ढक जाती है, जिससे शीत लहर चलने लगती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में पश्चिम व पूर्व में कोई अवरोध न होने के कारण यह हवाएं समस्त मध्यवर्ती मैदानों को प्रभावित करती हुई दक्षिणी प्रान्तो तक पहुंच जाती है। यहां पर इनको “नॉर्दर्न (Northern)” कहते हैं, तथा साइबेरिया में इन्हें “बुरान” कहते हैं।

 बाइज (Bise):-
यह दक्षिणी फ्रांस में शीत ऋतु के समय चलने वाली अत्यधिक ठंडी पवन है।

 लेवेंतर(Leventer):-
दक्षिणी स्पेन में शीत ऋतु के समय चलने वाली ठंडी हवा है।

 पैंम्पीरो (Pempero):-
यह एक तीव्र गति से चलने वाली ठंडी हवा है। जो अर्जेंटीना तथा उरुग्वे के पम्पास क्षेत्र में चलती है। कभी-कभी यह पवन चमक और गरज के साथ तीव्र वर्षा भी करती हैं।