कामागाटा मारू प्रकरण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस घटना ने पंजाब विद्रोह को विस्फोटक स्थिति मे पहुचाने का कार्य किया था।

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पंजाब के एक क्रांतिकारी बाबा गुरदत्त सिंह ने कामागारा मारु जलपान जापान से किराए पर लिया। इसमे 35। पंजाबी सिक्खो और 21 मुसलमानो को सिंगापुर से बैकूबर (कनाडा) ले जाने का प्रयत्न किया गया।
इन लोगो का मानना था कि वह कनाडा मे रहकर सुखमय जीवन व्यतीत करेगे तथा बाद मे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे अपना योगदान देगें ।
कनाड़ा सरकार सरकार ने आंतरिक सुरक्षा कारणो से जहाज पर सवार यात्रियो को बंदरगाह पर उतरने की अनुमति नही दी।
कामागाटा मारु जलयान को मजबूरन लौटना पड़ा और 27 सितम्बर 1914 को पुन: कलकत्ता बंदरगाह पर लौट आया।
जहाज के यात्रियों को पूर्ण विश्वास था कनाडा सरकार ने ब्रिटिश सरकार के दबाव मे जहाज को वापस कर दिया गया ।
कलकत्ता पहुंचते ही गुरदत्त सिंह को गिरफ्तार करने का प्रयास किया गया लेकिन वह भागने मे सफल करने रहे।
गुरुदत्त सिंह के अलावा अन्य यात्रियों को पंजाब भेजने के लिए जबरन ट्रेन पर की बैठाने का प्रयास किया गया। लेकिन थाकियों ने बैठने से मना कर दिया।
यात्रियों के विरोध करने से पुलिस और यात्रियों के बीच संघर्ष हुआ जिसमें 22 लोग मारे गए। शेष बचे यात्रियों को विशेष ट्रेन से पंजाब भेज दिया गया|
पंजाब पहुचकर इन लोगों द्वारा अनेक डकैतियों को अंजाम दिया गया ।
कामागाटा मारु घटना और प्रथम विश्व युद्ध शुरुआत होने से गदर दल के नेता अत्याधिक उत्तेजित हो गए जिसके फलस्वरूप इनके द्वारा अग्रेजो पर हिंसक आक्रमण करने की योजनाएं बनायी गई |
भारतीय गदर दल के नेताओं ने विदेशों में रह रहे भारतीय कांतिकारियों से आग्रह किया कि वह भारत में जाकर ब्रिटिश सरकार से संघर्ष करें।





