भारत की झीलें | 8 प्रकार की झीलें| विवर्तनिक| क्रेटर| हिमनदीय

भारत की झीलें: प्रकृति की विविधता और सौंदर्य, भारत अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता के साथ, विभिन्न प्रकार की झीलों का घर है, जो प्रकृति की अनुपम देन हैं। ये झीलें न केवल पर्यावरणीय और पारिस्थितिक महत्व रखती हैं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं।

भारत में झीलें विवर्तनिक, हिमनदीय, ज्वालामुखीय, तटीय, गोखुर, कृत्रिम, क्रेटर और भूस्खलन झीलों के रूप में वर्गीकृत की जा सकती हैं। यह ब्लॉग इन आठ प्रकार की झीलों, उनके निर्माण, विशेषताओं और प्रमुख उदाहरणों पर प्रकाश डालता है, जो भारत की प्राकृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

भारत की झीलें

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1. विवर्तनिक झीलें (Tectonic Lakes) :-

विवर्तनिक झीलें भूपर्पटी की गतियों, जैसे भ्रंश (faulting) या रिफ्टिंग, के कारण बनती हैं।                                                                            इस प्रकार की  झीलें गहरी और लंबी होती हैं, जो रिफ्ट घाटियों में पाई जाती हैं।                                                                                          भारत में वूलर झील (जम्मू-कश्मीर) इसका प्रमुख उदाहरण है, जो झेलम नदी पर बनी देश की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है।                        राजस्थान की नक्की झील (माउंट आबू) भी भ्रंशों से बनी है। कुमाऊं हिमालय की भीमताल और नैनीताल जैसी झीलें भी विवर्तनिक गतिविधियों का परिणाम हैं। भारत की झीलें जैव विविधता और पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

2. हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes):-

हिमनदीय झीलें हिमनदों के पीछे हटने से बने गड्ढों में पानी भरने से बनती हैं। ये उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आम हैं। सिक्किम की त्सोमगो (छांगु) झील और उत्तराखंड की रूपकुंड झील इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

हिमनदीय झीलें ठंडे, साफ पानी और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण इन झीलों में हिमनदीय बाढ़ (GLOF) का खतरा बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है।

भारत की झीलें ट्रेकिंग और धार्मिक पर्यटन को आकर्षित करती हैं।

3. ज्वालामुखीय झीलें (Volcanic Lakes)/क्रेटर झीलें (Crater Lakes) :-

ज्वालामुखीय गतिविधियों से बनी झीलें ज्वालामुखीय क्रेटरों या गड्ढों में बनती हैं।

भारत में ऐसी झीलें दुर्लभ हैं, लेकिन महाराष्ट्र की लोनार झील एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक उल्कापात (meteorite impact) से बनी क्रेटर झील है, जो अपने खारे पानी और अद्वितीय जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसका पानी क्षारीय (alkaline) है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

यह झील स्थानीय और वैश्विक शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का केंद्र है। क्रेटर झीलें दुर्लभ होती हैं, लेकिन इनका सौंदर्य और वैज्ञानिक महत्व भारत की भूवैज्ञानिक विविधता को रेखांकित करता है।

लोनार झील UNESCO विश्व धरोहर स्थल के लिए नामांकित है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

4. तटीय झीलें (Coastal/Lagoon Lakes):-

तटीय झीलें समुद्र तटों के पास रेत के अवरोधों (sandbars) या लैगून के कारण बनती हैं। ओडिशा की चिल्का झील, जो भारत की सबसे बड़ी खारी झील है, इसका प्रमुख उदाहरण है। यह प्रवासी पक्षियों, जैसे फ्लेमिंगो, के लिए महत्वपूर्ण है और रामसर साइट के रूप में मान्यता प्राप्त है।

केरल की वेम्बनाड झील, जो कयाल प्रणाली का हिस्सा है, भी तटीय झील का उदाहरण है। ये झीलें मछली पालन, पर्यटन और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समुद्र स्तर वृद्धि से खतरे में हैं।

5. गोखुर झीलें (Oxbow Lakes):-

गोखुर झीलें नदियों के घुमावदार मार्ग (meanders) के कटने से बनती हैं, जब नदी अपने पुराने मार्ग को छोड़ देती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के मैदानों में ऐसी कई झीलें पाई जाती हैं।

जैसे बिहार की कावर झील एक गोखुर झील है, जो प्रवासी पक्षियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। ये झीलें मीठे पानी की आपूर्ति और मछली पालन के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अवसादन (siltation) के कारण इनका क्षेत्रफल घट रहा है।

6. कृत्रिम झीलें (Man-made Lakes):-

कृत्रिम झीलें मानव द्वारा बनाए गए जलाशय हैं, जो सिंचाई, जलापूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए बनाए जाते हैं। तमिलनाडु की भवानीसागर झील, राजस्थान की फतेहसागर झील और मध्य प्रदेश की गांधी सागर झील इसके उदाहरण हैं।

यह झीलें स्थानीय अर्थव्यवस्था और कृषि को समर्थन देती हैं। तेलंगाना की हुसैन सागर झील, जो हैदराबाद में है, सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व रखती है। हालांकि, प्रदूषण और अतिक्रमण इन झीलों के लिए चुनौती हैं।

7. लैगून झीले (Lagoon Lakes):-

लैगून झीलों का निर्माण समुद्र-तट के किनारे बालू जमा होने के कारण होता है। उड़ीसा की चिल्का झील, पुलीकट (आंध्र प्रदेश), वेम्बनाद तथा अष्टामुदी-केरल के कयाल लैगून के कुछ उदाहरण हैं।

8. भूस्खलन झीलें (Landslide Lakes) :-

भूस्खलन झीलें तब बनती हैं, जब भूस्खलन या मलबा नदी के प्रवाह को अवरुद्ध करता है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में ऐसी झीलें आम हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड की गोविंद सागर झील भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्र में बनी है। ये झीलें अस्थायी हो सकती हैं और बाढ़ का खतरा पैदा करती हैं। इनका प्रबंधन और निगरानी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय गतिविधियां इन्हें अस्थिर बना सकती हैं।

द्रवण झीलें (Dissolution Lakes ):-

इन झीलों निर्माण सतह में एक गर्त के कारण होता है, जो चूना पत्थर तथा जिप्सम जैसे घुलनशील शैल के भूमिगत विलयन के कारण बनता है। ऐसे झीलें चेरापूंजी में तथा उसके आस-पास, शिलाँग (मेघालय), भीमताल, कुमाऊं तथा गढ़वाल (उत्तराखण्ड) में पायी जाती हैं।

भारत की झीलें प्रकृति और मानव गतिविधियों की विविधता का प्रतीक हैं। विवर्तनिक और हिमनदीय झीलें हिमालय के सौंदर्य को दर्शाती हैं, तो तटीय और गोखुर झीलें मैदानी और तटीय क्षेत्रों की जैव विविधता को समृद्ध करती हैं। कृत्रिम और क्रेटर झीलें मानव और भूवैज्ञानिक इतिहास को दर्शाती हैं। 

प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण इन झीलों के लिए खतरा हैं। इनके संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयास, नीतिगत हस्तक्षेप और जागरूकता आवश्यक है। ये झीलें भारत की प्राकृतिक धरोहर हैं, जिन्हें सहेजना हमारा कर्तव्य है।

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