महालवाड़ी पद्धति (Mahalwari System) क्या थी |

महालवाड़ी पद्धति (The Mahalwari System) में  भूमि कर की इकाई ग्राम अथवा महल (जागीर का एक भाग) होता था।

महालवाड़ी पद्धति में  कृषक के  खेत से कोई सरोकार नही होता था |  

महालवाड़ी

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भूमि समस्त ग्राम सभा की सम्मिलित रूप से होती थी, जिसको भागीदारों का समूह (body of co-sharers) कहते थे

सभी किसान  सम्मिलित रूप से भूमि कर देने के लिए जिम्मेदार  होते थे, यद्यपि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी होता था

किसान जब किसी कारण से  अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता थायह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था। 

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त तथा अवध (यू. पी.) में भूमि कर व्यवस्था

समय-समय पर अंग्रेज़ों के अधीन रहा उत्तरपश्चिमी प्रान्त तथा अवध जिसे आजकल उत्तर प्रदेश कहते हैं | 1801 में अवध के नवाब ने  इलाहाबाद तथा उसके आसपास के प्रदेश कम्पनी को सौप दिए ,जिन्हें अभ्यर्पित जिले (ceded districts) कहते थे

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात कम्पनी ने यमुना तथा गंगा के मध्य का प्रदेश विजय कर लियाइन जिलों को विजित (conquered) प्रान्त कहते थे

अन्तिम आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) के पश्चात लार्ड हेस्टिंग्ज़ ने उत्तरी भारत में और अधिक क्षेत्र प्राप्त कर लिए

 अभ्यर्पित प्रदेश के प्रथम लेफ्टिनेन्ट गवर्नर हेनरी वैल्ज़ली ने ज़मींदारों तथा कृषकों से ही सीधे भूमि कर लेना प्रारम्भ किया  तथा यह मांग नवाबों की मांग से प्रथम वर्ष में ही 20 लाख रुपया अधिक थी

तीन वर्ष के अन्तराल में  दस लाख रुपया वार्षिक और बढ़ा दिया गया। इस बसूली को इतनी कढाई से लागू किया गया जो भारतीय इतिहास में पहले कभी नही हुआ था |

नवाब के अनुसार जिस वर्ष उपज अच्छी नही होती थी,  करो की मांग में शिथिलता बरती जाती थी |

1822 के रेग्यूलेशन (Regulations of 1822 ) –

आयुक्तों के बोर्ड (Board of Commissioners) के सचिव होल्ट मैकेन्ज़ी ने 1819 के पत्र में उत्तरी भारत में ग्राम समाजों की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा यह सुझाव दिया था कि भूमि का सर्वेक्षण किया जाए, भूमि में लोगों के अधिकारों का लेखा तैयार किया जाए, प्रत्येक ग्राम अथवा महल से कितना भूमि कर लेना है, यह निश्चित किया जाए तथा प्रत्येक ग्राम से भूमि कर प्रधान अथवा लम्बरदार द्वारा संग्रह करने की व्यवस्था की जाए । 

 1822 के रेग्यूलेशन – 7 (Regulation-VII) द्वारा इस सुझाव को कानूनी रूप दे दिया गयाभूमि कर भूभाटक (Land Rent) (अर्थात जमीदार को  भूमि के उपयोग के बदले दिया जाने वाला नियमित किराया ) का 30 प्रतिशत निश्चित किया गया जो ज़मींदारों को देना पड़ता था

वे  प्रदेश जहां ज़मींदार नहीं होते थे तथा भूमि ग्राम समाज की सम्मिलित रूप से होती थी, भूमि कर भूभाटक का 95 प्रतिशत निश्चित किया गयासरकार की मांग अत्यधिक होने के कारण तथा संग्रहण में अत्यधिक दृढ़ता होने के कारण यह व्यवस्था छिन्नभिन्न हो गई। 

1833 का रेग्यूलेशन नौ तथा मार्टिन बर्ड की भूमि कर व्यवस्था –

विलियम बैंटिंक की सरकार ने 1822 की योजना की पूर्ण रूपेण समीक्षा की तथा इस परिणाम पर पहुंची कि इस योजना से लोगों को बहुत कठिनाई हुई है तथा यह अपनी कठोरता के कारण ही टूट गई हैबहुत सोचविचार के पश्चात् 1833 के रेग्यूलेशन पारित किए गए जिसके द्वारा भूमि की उपज तथा भूभाटक का अनुमान लगाने की पद्धति सरल बना दी गईभिन्नभिन्न प्रकार की भूमि के लिए भिन्नभिन्न औसत भाटक निश्चित किया गयाप्रथम बार खेतों के मानचित्रों तथा पंजियों (registers) का प्रयोग किया गया। 

यह नई योजना मार्टिन बर्ड की देखरेख में लागू की गईउन्हें उत्तरी भारत में भूमि कर व्यवस्था का प्रवर्तक (Father of Land Settlements in Northern India) के नाम से स्मरण किया जाता हैइसके अनुसार एक भाग की भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था जिसमें खेतों की परिधियां निश्चित की जाती थीं और बंजर तथा उपजाऊ भूमि स्पष्ट की जाती थीइसके पश्चात समस्त भाग का और फिर समस्त ग्राम का भूमि कर निश्चित किया जाता थाप्रत्येक ग्राम अथवा महल के अधिकारियों को स्थानीय आवश्यकता के अनुसार समायोजन (adjustment) करने का अधिकार होता थाभाटक का 66 प्रतिशत भाग राज्य सरकार का भाग निश्चित किया गया और यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई । 

इस योजना के अन्तर्गत भूमि व्यवस्था का कार्य 1833 में आरम्भ किया गया ।तथा  लेफ्टिनेन्ट – गवर्नर जेम्ज़ टॉमसन (1843- 1853) के कार्यकाल में समाप्त किया गया। 

परन्तु भाटक 66 प्रतिशत भूमि कर के रूप में प्राप्त करना भी बहुत अधिक था तथा चल नहीं सका इसलिए लार्ड डलहौज़ी ने इसका पुनरीक्षण कर 1855 में सहारनपुर नियम के अनुसार 50 प्रतिशत भाग का सुझाव दियादुर्भाग्यवश भूव्यवस्था अधिकारियों ने इस नियम को स्थगित करने का प्रयत्न किया उन्होंने इस 50 प्रतिशत के अर्थ प्रदेश के भाटक के ‘वास्तविक भाटक’ (actual rental) के स्थान पर ‘सम्भावित तथा शक्य’ (prospective and potential) भाटक लिया जिसके फलस्वरूप कृषक की अवस्था और भी बुरी हो गई जिस कारण इन में से बहुत से लोग 1857 के विद्रोह में सम्मिलित हो गए। 

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