Balaji Vishwanath(बालाजी विश्वनाथ) मराठा साम्राज्य के ‘द्वितीय संस्थापक’ और प्रथम शक्तिशाली पेशवा

इस ब्लॉग में हम बालाजी विश्वनाथ(Balaji Vishwanath) के प्रारंभिक जीवन, उनके उत्थान और किस तरह उन्होंने अपनी कूटनीति से मराठा साम्राज्य की दिशा बदल दी, इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित इस साम्राज्य को एक कठिन दौर से निकालकर पुनर्जीवित करने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह हैं बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) (1713-1720)। उन्हें अक्सर मराठा शक्ति का ‘द्वितीय संस्थापक’ कहा जाता है।भारतीय इतिहास में मराठा साम्राज्य का नाम वीरता और कूटनीति का पर्याय है।
Balaji Vishwanath

​और पढ़े :- छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष :- 

बालाजी विश्वनाथ का जन्म कोंकण के एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह परिवार अपनी बौद्धिक क्षमता और प्रशासनिक कुशलता के लिए प्रसिद्ध था। उनके पूर्वज जंजीरा राज्य के श्रीवर्धन में वंशानुगत कर संग्रहकर्ता (Revenue Collectors) थे।

​हालाँकि, जंजीरा के सिद्दियों के साथ उनके संबंध खराब हो गए, जिसके कारण उन्हें अपना पैतृक स्थान छोड़कर सासवड़ में बसना पड़ा। कर और वित्त संबंधी उनके गहरे ज्ञान ने उन्हें मराठा प्रशासन में जगह दिलाई।

सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ना :-

  • बालाजी विश्वनाथ का राजनीतिक सफर काफी प्रभावशाली रहा |
  • ​1696- वे पुणे के सभासद बने।
  • ​1699-1702: पुणे के सर सूबेदार के रूप में कार्य किया।
  • ​1704-1707: दौलताबाद के सर सूबेदार रहे।

​कहा जाता है कि औरंगजेब के अंतिम समय में जब मुगल सेना दक्षिण में थी, तब बालाजी ने गुप्त रूप से रसद आपूर्ति और मराठा हितों की रक्षा के बीच एक महीन संतुलन बनाए रखा था।

साहू जी का समर्थन और गृहयुद्ध की स्थिति :-

औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी बहादुरशाह ने शाहू जी (शिवाजी महाराज के पौत्र) को कैद से मुक्त कर दिया। मुगलों का उद्देश्य मराठों के बीच गृहयुद्ध भड़काना था, और वे सफल भी रहे। शाहू जी के सामने उनकी चाची ताराबाई खड़ी थीं, जिन्होंने शाहू को एक ‘ढोंगी’ (Impostor) घोषित कर दिया था।

इस कठिन समय में बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) ने शाहू जी का साथ दिया। अक्टूबर 1707 में खेड़ के युद्ध में बालाजी की कूटनीति के कारण ताराबाई के सेनापति धन्नाजी जाधव शाहू जी की ओर आ गए, जिससे शाहू जी की जीत सुनिश्चित हुई।

​’सेनाकर्ते’ पद का सृजन :-

जब धन्नाजी जाधव के पुत्र चंद्रसेन ने ताराबाई से हाथ मिला लिया, तब शाहू जी ने सेना को संगठित करने के लिए एक नया पद ‘सेनाकर्ते’ बनाया और बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) को इस पर नियुक्त किया। यह उनकी बढ़ती शक्ति का पहला बड़ा संकेत था।

​कूटनीति की पराकाष्ठा: कान्होजी आंग्रे के साथ संधि :-

​मराठा साम्राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती पश्चिमी तट के रक्षक कान्होजी आंग्रे थे, जो ताराबाई का समर्थन कर रहे थे। बालाजी विश्वनाथ ने यहाँ युद्ध के बजाय कूटनीति का रास्ता चुना। उन्होंने कान्होजी को समझाया कि मराठा राज्य की एकता ही सर्वोपरि है। परिणामस्वरूप, कान्होजी शाहू जी के पक्ष में आ गए, जिससे शाहू की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई।

दिल्ली की संधि (1719): मराठा साम्राज्य का ‘मैग्नाकार्टा’ :-

​बालाजी विश्वनाथ की सबसे बड़ी उपलब्धि मुगल सम्राट और सैयद बंधुओं (हुसैन अली और अब्दुल्ला खान) के साथ की गई संधि थी। 1719 में हुई इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं:
​स्वराज्य की मान्यता: मुगलों ने शिवाजी महाराज के ‘स्वराज्य’ पर शाहू जी के अधिकार को मान्यता दी।

चौथ और सरदेशमुखी:-

मराठों को दक्कन के छह मुगल प्रांतों से ‘चौथ’ (कुल राजस्व का 1/4) और ‘सरदेशमुखी’ (1/10) वसूलने का कानूनी अधिकार मिल गया।

सैन्य सहायता: इसके बदले में मराठों ने मुगलों को 15,000 सैनिक देने और दक्कन में शांति बनाए रखने का वादा किया।

​स्वजनों की मुक्ति: शाहू जी की माता और अन्य परिजनों को मुगल कैद से रिहा किया गया।
​इतिहासकार सर रिचर्ड टेम्पल ने इस संधि को “मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा” (Magna Carta) कहा है, क्योंकि इसने मराठों को कानूनी रूप से दक्षिण भारत का स्वामी बना दिया।

​बालाजी विश्वनाथ का मूल्यांकन :-

2 अप्रैल, 1720 को बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) का निधन हो गया, लेकिन मात्र सात वर्षों के पेशवाई कार्यकाल में उन्होंने जो नींव रखी, उस पर उनके पुत्र बाजीराव प्रथम ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया।

सफलता के मुख्य बिंदु:-

  • ​स्वनिर्मित व्यक्तित्व: वे शून्य से उठकर पेशवा के पद तक पहुँचे।
  • वित्तीय सुधार: उन्होंने महादजी कृष्ण जोशी जैसे साहूकारों की मदद से राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारी।
  • राजनीतिक दूरदर्शिता: उन्होंने गृहयुद्ध को समाप्त कर मराठा सरदारों को एक ध्वज के नीचे लाने का सफल प्रयास किया।
  • ​राजस्व प्रणाली: उनके समय में ही मराठों को नियमित रूप से 35% वार्षिक कर और चौथ मिलने लगी, जिससे राज्य कोष समृद्ध हुआ।

निष्कर्ष :-

​बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक महान राजनीतिज्ञ और ‘राजमर्मज्ञ’ (Statesman) थे। उन्होंने तलवार से ज्यादा अपनी बुद्धि और कूटनीति का प्रयोग कर मराठा साम्राज्य को विघटन से बचाया। उनकी मृत्यु के समय तक, मराठा साम्राज्य एक क्षेत्रीय शक्ति से ऊपर उठकर अखिल भारतीय शक्ति बनने की ओर अग्रसर हो चुका था।

​भारतीय इतिहास में उन्हें हमेशा एक ऐसे वास्तुकार के रूप में याद किया जाएगा, जिसने मराठा पेशवाई की गरिमा और शक्ति को चरम पर पहुँचाने का आधार तैयार किया।

​FAQ – बालाजी विश्वनाथ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न :-

​प्रश्न: बालाजी विश्वनाथ पेशवा कब बने?
​उत्तर: वे 1713 ईस्वी में पेशवा बने।

​प्रश्न: ‘सेनाकर्ते’ का क्या अर्थ है?
​उत्तर: सेनाकर्ते का अर्थ है ‘सेना को संगठित करने वाला’।

प्रश्न: दिल्ली की संधि किसके बीच हुई थी?
​उत्तर: यह संधि पेशवा बालाजी विश्वनाथ (मराठों की ओर से) और सैयद बंधुओं (मुगलों की ओर से) के बीच हुई थी।

आशा है कि आपको मराठा इतिहास का यह स्वर्णिम अध्याय पसंद आया होगा। इतिहास से जुड़ी ऐसी ही अन्य जानकारियों के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करें!

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