भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी उन महापुरुषों का नाम लिया जाता है जिन्होंने देश की आजादी की नींव रखी, तो दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्हें श्रद्धा से ‘भारत के वयोवृद्ध नेता’ (Grand Old Man of India) कहा जाता है।
नौरोजी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक प्रखर अर्थशास्त्री, समाज सुधारक और शिक्षाविद् भी थे। आइए, इस ब्लॉग में उनके जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों को विस्तार से समझते हैं।

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दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा :-
दादा भाई नौरोजी का जन्म आधुनिक महाराष्ट्र के खड़क नामक एक छोटे से गांव में एक निर्धन पारसी पुरोहित परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद उनकी मेधा अद्वितीय थी।
शिक्षा: उन्होंने बम्बई के प्रसिद्ध एलफिन्स्टन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।
भारत की आशा: उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनके एक अंग्रेज प्रोफेसर ने उन्हें ‘भारत की आशा’ (The Promise of India) की संज्ञा दी थी।
शिक्षण करियर: अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इसी कॉलेज में गणित और प्राकृतिक दर्शन के सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।
ब्रिटेन का सफर और राजनीतिक करियर की शुरुआत :-
1855 में दादा भाई ने अध्यापन का पेशा छोड़ दिया और एक व्यापारिक संस्था के साझेदार के रूप में लंदन चले गए। यहीं से उनके वैश्विक राजनीतिक जीवन का आरम्भ हुआ।
1. ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य :-
1892 में दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने इतिहास रचा जब वे उदारवादी दल (Liberal Party) की ओर से फिन्सबरी (Finsbury) निर्वाचन क्षेत्र से ब्रिटिश संसद (House of Commons) के सदस्य चुने गए। वे संसद पहुँचने वाले पहले भारतीय थे।
2. रियासत और नगर निगम में सेवा :-
बड़ौदा के दीवान: 1873 में उन्होंने बड़ौदा रियासत के दीवान का पद संभाला, लेकिन प्रशासनिक मतभेदों के कारण जल्द ही इस्तीफा दे दिया।
बम्बई नगर निगम: वे बम्बई नगर निगम और नगर परिषद के निर्वाचित सदस्य भी रहे।
प्रमुख संस्थाओं की स्थापना और सामाजिक कार्य :-
दादा भाई नौरोजी का मानना था कि जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, स्वराज संभव नहीं है। इसके लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की:
ज्ञान प्रसारक मंडली: बम्बई में शिक्षा और सामाजिक चेतना के लिए इसकी स्थापना की।
महिला शिक्षा: उन्होंने महिलाओं के लिए एक हाई स्कूल स्थापित कर स्त्री शिक्षा की नींव रखी।
बम्बई एसोसिएशन (1852): यह बम्बई की पहली राजनीतिक संस्था थी, जिसका श्रेय दादा भाई को ही जाता है।
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (लंदन): अंग्रेजों को भारतीय समस्याओं और सच्चाई से अवगत कराने के लिए उन्होंने लंदन में ‘लंदन इंडियन एसोसिएशन’ और ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ जैसी संस्थाएं बनाईं।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ‘स्वराज’ की मांग :-
दादा भाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने कांग्रेस के विकास में तीन अलग-अलग चरणों में नेतृत्व किया।
कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल:-
1886: कलकत्ता अधिवेशन
1893: लाहौर अधिवेशन
1906: कलकत्ता अधिवेशन
स्वराज की पहली आधिकारिक घोषणा :-
अक्सर ‘स्वराज’ का नारा बाल गंगाधर तिलक के नाम से जोड़ा जाता है, लेकिन कांग्रेस के मंच से पहली बार 1906 में स्वराज की मांग दादा भाई नौरोजी ने ही की थी। हालांकि, उस समय उनके स्वराज का अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन (Self-government) प्राप्त करना था।
धन का निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth Theory):-
दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” में यह उजागर किया कि किस तरह ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति को लूटकर इंग्लैंड ले जा रहा है।
शोषक नीतियां: उन्होंने आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा किया जा रहा आर्थिक शोषण है।
गरीबी का अनावरण: उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन भारत को दिन-प्रतिदिन खोखला कर रहा है, जिससे एक समृद्ध देश ‘निर्धन’ बनता जा रहा है।
दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) के विचार:-
राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति अपने जीवन के शुरुआती और मध्य काल में नौरोजी ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे। उनके विचारों के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
ब्रिटिश साहचर्य: वे शुरू में मानते थे कि अंग्रेजी राज से भारत को लाभ हुए हैं और वे इस संबंध को बनाए रखना चाहते थे।
न्याय की मांग: उनकी राजनीतिक मांगें ‘न्याय’ और ‘अधिकारों’ पर आधारित थीं।
विकासात्मक परिवर्तन: पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार, नौरोजी ने कांग्रेस को एक छोटी प्रशासनिक संस्था से उठाकर एक शक्तिशाली राष्ट्रीय सभा में बदल दिया।
महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts):-
पूरा नाम …………… दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji)
उपाधि …………….. भारत के वयोवृद्ध नेता (Grand Old Man of India)
प्रसिद्ध पुस्तक ………..Poverty and Un-British Rule in India
ब्रिटिश संसद सदस्य …..1892 (फिन्सबरी से)
कांग्रेस अध्यक्ष ……… 1886, 1893, 1906
प्रमुख सिद्धांत ………..धन का निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth Theory)
निष्कर्ष :-
दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का जीवन सेवा, त्याग और बौद्धिक संघर्ष की एक मिसाल है। एक निर्धन परिवार से निकलकर ब्रिटिश संसद की दहलीज तक पहुँचना और फिर अपनी पूरी शक्ति भारत की आजादी के लिए लगा देना, उन्हें युगों-युगों तक प्रेरणादायक बनाता है। उन्होंने भारतीयों को न केवल राजनीतिक रूप से संगठित किया, बल्कि आर्थिक रूप से जागरूक भी बनाया।
आज का स्वतंत्र भारत दादा भाई नौरोजी जैसे दूरदर्शी नेताओं के संघर्षों का ही परिणाम है।





