रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System) 

रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System) के अनुसार प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी माना गया था ।और राज्य सरकार को भूमि कर देने के लिए उत्तरदायी थाउसे अपनी भूमि को किराये पर देना, गिरवी रखने तथा बेचने को अनुमति थी भूमि स्वामी को  उस समय तक भूमि से वंचित नहीं किया जा सकता था जब तक वह भूमि कर समय से  देता रहे । 

रैयतवाड़ी पद्धति 

और पढ़े :-छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)

मद्रास की व्यवस्था –

मद्रास प्रेजीडेन्सी में प्रथम भूमि व्यवस्था बारामहल जिला प्राप्त करने के पश्चात 1792 में की गईकैप्टिन रीने टॉमस मुनरो की सहायता से खेत की अनुमानित आय का लगभग आधा भाग भूमि कर के रूप में निश्चित कियायह कर भूमि को किराये पर लेने में जो कर देना पड़ता उससे  भी अधिक थायही व्यवस्थ अन्य भागों में भी लागू कर दी गई। 

टॉमस मुनरो तथा मद्रास भूव्यवस्था –

टॉमस मुनरो जो मद्रास के 1820 से 1827 तक गवर्नर रहा ,इसने  पुरानी कर व्यवस्था को अनुचित बताया।इसने कुल उपज का तीसरा भाग भूमि कर का आधार मान कर रैयतवाड़ी पद्धति को, स्थाई भूमि व्यवस्था के प्रदेशों को छोड़ कर, बाकी सभी  प्रान्त में लागू कर दिया। कर की देनदारी से देखा जाय तो यह भी किराये पर लेने में जो कर देना पड़ता उससे  भी अधिक ही थादूसरे, भूमि कर क्योंकि धन के रूप में देना पड़ता था तथा इसका वास्तविक उपज अथवा मंडी में प्रचलित भावों से कोई सम्बन्ध नहीं था, इसलिए किसानो पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया। 

मुनरो की भूमि कर व्यवस्था लगभग 30 वर्ष तक चलती रही तथा इसी से उत्पीड़न बड़ा तथा कृषकों की कठिनाइयो में वृद्धि हुई कृषक लोग भूमि कर देने के लिए साहूकारों के जाल  में फंस गएभूमि कर संग्रहण करने के प्रबंध बहुत कड़े थे और इसके लिए प्रायः यातनाएं दी जाती थीं

अंग्रेजी संसद में इन यातनाओं के विषय में प्रश्न पूछे गएइन यातनाओं में भूखों मारना, शौच आदि के लिए जाने देना, मनुष्यों को कुबड़े बना कर बांध देना, घुटनों के पीछे ईंट रख कर बैठा देना, अस्थियों तथा अन्य अपमानजनक वस्तुओं के हार डाल इत्यादि सम्मिलित थे

1855 में कुल उपज का 30 प्रतिशत के आधार पर विस्तृत सर्वेक्षण तथा भूव्यवस्था को योजना लागू की गईवास्तविक कार्य 1861 में आरम्भ हुआ1864 के नियमों के अनुसार राज्य सरकार का भाग भू भाटक का 50 प्रतिशत निश्चित किया गया परन्तु यह नियम केवल कागजी काभूर्यवाही ही रहा तथा प्रशासन का अंग नहीं बना1877-78 के भीषण अकाल में ही मद्रासी कृषकों की वास्तविक स्थिति सामने आई। 

बम्बई में भूमि कर व्यवस्था –

यहां रैयतवाड़ी पद्धति लागू की गई जिससे ज़मींदार अथवा ग्राम सभाएं उनके लाभ को स्वयं हड़प कर जाएं। 

एल्फिन्सटन तथा चैप्लिन की रिपोर्ट –

एल्फिन्सटन 1819-27 तक बम्बई के गवर्नर थेउन्होंने 1819 में पेशवा से विजय किए प्रदेशों पर एक विस्तार रिपोर्ट प्रस्तुत कीउन्होंने मराठा प्रशासन की दो मुख्य बातों की ओर ध्यान दिलाया।                                         (1) ग्राम सभाओं का स्थानीय प्रशासन की इकाई के रूप में अस्तित्व‘       (2) मिरास भूधृति पद्धति का अस्तित्व (मिरासदार वंशानुगत भूमिदार कृषक होते थे जो स्वयं अपनी भूमि जोतते थे तथा राज्य सरकार को निश्चित भूमि कर देते थे)

चैप्लिन जो उस समय आयुक्त था, ने 1821 तथा 1822 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उसने भूमि कर की पुरानी पद्धति का वर्णन किया तथा कुछ मूल्यवान सुझाव दिए । 

प्रिंगल ने 1824-28 तक भूमि का भली भांति सर्वेक्षण किया तथा राज्य का भाग शुद्ध (net) उपज का 55 प्रतिशत निश्चित कियादुर्भाग्यवश अधिकतर सर्वेक्षण दोषपूर्ण थे तथा उपज के अनुमान ठीक नहीं थेफलस्वरूप भूमि कर अधिक निश्चित किया गया तथा कृषकों को बहुत दुःख हुआबहुत से कृषकों ने भूमि जोतनी बंद कर दी तथा बहुत सा क्षेत्र बंजर हो गया। 

 विगनेट का सर्वेक्षण तथा बम्बई में रैयतवाड़ी भूव्यवस्था –

1835 में लैफ्टिनेन्ट विनगेट जो इंजिनियरिंग कोर के पदाधिकारी थे, उन्हें भूमि सर्वेक्षण का अधीक्षक नियुक्त किया गया। उन्होंने 1847 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस पर  गो.ल्डस्मिट, कैप्टिन डेविडसन तथा कैप्टिन विगनेट के हस्ताक्षर थे। 

मुख्य रूप से ज़िले के भूमि कर की मांग उस जिले के इतिहास तथा उस जिले के लोगों की अवस्था अर्थात जनता की देने की शक्ति पर निर्भर थीतत्पश्चात समस्त जिले की मांग को व्यक्तिगत खेतों पर बांटा गया

प्राचीन समानता पर आधारित पद्धति के स्थान पर मांग भूमि की भूगर्भ (geological) अवस्था पर निर्धारित की गईइसके अतिरिक्त कर भूखण्डों पर निश्चित किया गया न कि उस कृषक की समस्त भूमि पर जिससे कोई भी कृषक जिस खेत को चाहे छोड़ सकता था और जिस खेत को चाहे जोत सकता था यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई परन्तु यह भी अधिकतर अनुमानों पर आधारित थी और यह कठोरता की ओर ही झुकी थी । 

पुनः भूव्यवस्था (resettlement) का कार्य 30 वर्ष के पश्चात 1868 में किया गया। अमेरिका के गृहयुद्ध (18 61-65)के कारण कपास के मूल्य बहुत बढ़ गएइस अस्थाई अभिवृद्धि के कारण सर्वेक्षण अधिकारियों को भूमि कर 66 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक बढ़ाने का अवसर मिल गयाकृषकों को न्यायालय में अपील करने का अधिकार नहीं था । 

इस कठोरता के कारण दक्कन में 1875 में कृषि उपद्रव हुए जिससे प्रेरित होकर सरकार ने 1879 में दक्कन राहत अधिनियम (Deccan Agriculturists Relief Act 1879) पारित किया जिससे कृषकों को साहूकारों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया गया परन्तु सब कष्टों के मूल अर्थात सरकार की अधिक भूमि कर की मांग के विषय कुछ नहीं किया गया । 

बम्बई में रैयतवाड़ी पद्धति के दो प्रमुख दोष थे अत्यधिक भूमि कर तथा उसकी अनिश्चितताइसमें अधिक भूमि कर के लिए न्यायालय में अपील करने की अनुमति नहीं थीकलक्टर को अधिकार था कि वह कृषक को भविष्य के लिए भूमि कर की दर बता दे और यह भी कह दे कि यदि उसे यह नई दर स्वीकार नहीं तो वह भूमि छोड़ दे। 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का छिन्नभिन्न होना (Disintegration of Village Economy)

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भूमि कर पद्धतियों का, विशेषकर अत्यधिक कर तथा नवीन प्रशासनिक तथा न्यायिक प्रणाली का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था अस्तव्यस्त हो गई

ग्राम पंचायतों के मुख्य कार्य, भूमि व्यवस्था, तथा न्यायिक कार्य समाप्त हो चुके थे तथा पाटिल अब केवल सरकार की ओर से भूमि कर संग्रहकर्ता ही रह गया थाइस प्रकार ग्रामों की प्राचीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थीभारतीय कुटीर उद्योग लगभग समाप्त हो चुके थे तथा ग्रामों में भूमि का महत्व बढ़ गया

इस नई भू-व्यवस्था से भूमि तथा कृषक दोनों ही चलनशील (mobile) हो गए, जिसके फलस्वरूप ग्रामों में साहूकार तथा अन्यत्रवासी भूमिपति landlords) उत्पन्न हो गए। 

उन्नीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवादी विचारकों का बारबार यही कहना था कि सरकार की भूराजस्व की मांग रैयतवाड़ी तथा ज़मींदारी व्यवस्था, दोनों में अत्यधिक हैभूराजस्व समय पर देने की अवस्था में सरकार ज़मींदारों तथा रैयतवाड़ों की भूमि ज़ब्त कर लेती थी और इसे पुनः नगरवासी व्यापारियों तथा सट्टेबाज़ों को बेच देती थी। 

ये नए लोग जो प्राय: खेतिहर नहीं होते थे, केवल अधिकाधिक किराए की ही चिन्ता करते थे और स्वयं भी प्रायः 

किरायासट्टेबाजों (rent speculators) को ही भूमि किराया संग्रह करने का कार्य भार सौंप देते थे । 

समाज में ज़मींदार तथा साहूकार जिनकी ग्राम निवासियों को अब अधिक आवश्यकता होने लगी थी, बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गएअब ग्रामीण श्रमिक वर्ग (proletariate) जिसमें छोटेछोटे किसान, मुज़ारे तथा भूमिहीन किसान सम्मिलित थे, उनकी संख्या बढ़ गई

सहकारिता के स्थान पर आपसी प्रतिद्वन्द्विता तथा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा पूंजीवाद के पूर्वाकांक्षित तत्व उत्पन्न हो गएअब उत्पादन के नए साधन जिनमें धन की आवश्यकता होती थी, मुद्रा अर्थव्यवस्था (money economy) कृषि का वाणिज्यीकरण

संचार व्यवस्था में सुधार तथा विश्व की मण्डियों के साथ सम्पर्क, इन सभी तत्वों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तथा भारतीय कृषि को एक नया रूप दे दिया। 

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