गांधी-इरविन समझौता 

गांधी-इरविन समझौता, 25 जनवरी 1931 को गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य सभी प्रमुख नेता बिना शर्त कारावास से रिहा कर दिये गये कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने गांधीजी को वायसराय से चर्चा करने के लिये अधिकृत कियातत्पश्चात 19 फरवरी 1931 को गांधीजी ने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन से भेंट की और उनकी बातचीत पंद्रह दिनों तक चली

इसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे ‘गांधी-इरविन समझौता’ कहा जाता हैइस समझौते ने कांग्रेस की स्थिति को सरकार के बराबर कर दिया इस समझौते में सरकार की ओर से लार्ड इरविन इस बात पर सहमत हुए कि- 

गांधी-इरविन समझौता 

  1. हिंसात्मक अपराधियों के अतिरिक्त सभी राजनैतिक कैदी छोड़ दिये जायेंगे अपहरण की सम्पत्ति वापस कर दी जायेगी । 
  2. विभिन्न प्रकार के जुर्मानों की वसूली को स्थगित कर दिया जायेगा । 
  3. सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र दे चुके भारतीयों के मसले पर सहानुभूतिपूर्वक विचारविमर्श किया जायेगा । 
  4. समुद्र तट की एक निश्चित सीमा के भीतर नमक तैयार करने की अनुमति दी जायेगी । 
  5. मदिरा, अफीम और विदेशी वस्तओं की दुकानों के सम्मुख शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की आज्ञा दी जायेगी । 
  6. आपातकालीन अध्यादेशों को वापस ले लिया जायेगा । 

किन्तु वायसराय ने गांधीजी की निम्न दो मांगे अस्वीकार कर दीं  

(i) पुलिस ज्यादतियों की जांच करायी जाये, तथा 

(ii) भगत सिंह तथा उनके साथियों की फांसी की सजा माफ कर दी जाये

कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने आश्वासन दिया कि-                                                                                                                            (i) सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया जायेगा, तथा               

(ii) कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में इस शर्त पर भाग लेगी कि सम्मेलन में संवैधानिक प्रश्नों के मुद्दे पर विचार करते समय परिसंघ, भारतीय उत्तरदायित्व तथा भारतीय हितों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिये अपरिहार्य मुद्दों पर विचार किया जायेगा (इसके अंतर्गत रक्षा, विदेशी मामले, अल्पसख्यकों की स्थिति तथा भारत की वित्तीय साख जैसे मुद्दे शामिल होंगे) । 

और पढ़े :- चौरी चौरा कांड Chauri Chaura Kand (5 फरवरी 1922)

Leave a Comment