सैयद वंश (1414-1450 ई.)|Saiyed Vansh| संस्थापक |शासक

सैयद वंश के शासको द्वारा प्रजा को प्रभावित करने वाला कोई कार्य नहीं किया गया। उस समय के शासको की भांति साम्राज्य विस्तार की कोशिश नहीं की गई और न ही प्रशासनिक सुधारो का प्रयत्न  किया गया। इसलिए सैयद शासको द्वारा ऐसा कोई कार्य नहीं किया गया जिसे प्रजा आदर्श मानती फलस्वरुप विभाजन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला। सैयद वंश का शासन काल केवल 37 वर्ष तक रहा, जो की राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के 200 मील के घेरे तक सिमट कर रह गया।

सैयद वंश के शासक :-

खिज्र खां (1414-1421 ई.):-

* खिज्र खां सैयद वंश का संस्थापक था। इसके पिता का नाम मलिक सुलेमान था। जिसे मुल्तान का सूबेदार मलिक मर्दान दौलत अपना पुत्र मानता था।
•खिज्र खां को सुल्तान फिरोज ने मुल्तान का सूबेदार नियुक्त किया था। लेकिन सारंग खां द्वारा उसे 1395 में मुल्तान से भगाने के लिए मजबूर कर दिया। फलस्वरुप खिज्र खां मेवात चला गया।
•कालांतर में खिज्र खां द्वारा तैमूर का साथ दिया गया। जब तैमूर भारत से गया उसने खिज्र खां को मुल्तान, लाहौर और दीपालपुर की सूबेदारी प्रदान की।
•सन 1414 ई. में खिज्र खां द्वारा दौलत ख़ां लोधी को पराजित कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया गया। इस प्रकार खिज्र खां दिल्ली का पहला सैयद सुल्तान बना।

और पढ़े :-कुतुब मीनार(1199)|उद्देश्य|निर्माणकर्ता|स्थान|सीढ़िया

•खिज्र खां दिल्ली का सुल्तान बना, लेकिन उसने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की इसके स्थान पर उसने ” रैयत-ए-आला” की उपाधि धारण की।
•खिज्र खां एक स्वतंत्र शासक था, लेकिन वह तैमूर के पुत्र शाहरुख को निरंतर भेंटे और राजस्व पहुंचाता था। इस कारण वह अपने को शाहरुख के अधीन मानता था उसने शाहरुख के नाम से ही खुत्बा भी पढ़ाया हालांकि व्यावहारिक दृष्टि से अधीनता ऐसी कोई बात नहीं थी।
•खिज्र खां द्वारा दिल्ली पर अधिकार होने से पंजाब, मुल्तान और सिंध दिल्ली सल्तनत का हिस्सा हो गए थे।
* खिज्र खां द्वारा सीमा विस्तार पर कोई प्रयास नहीं किया गया, बल्कि उसने अपने साम्राज्य को इक्ताओं (सुबो) तथा शिको (जिलों की भांति) बांट दिया। इससे वह स्थानीय लोगों की वफादारी हासिल करने में सफल रहा।
* खिज्र खां द्वारा दिल्ली के आसपास के उपजाऊ क्षेत्र को हासिल करना तथा वहां के जागीरदारों से राजस्व वसूलने के लिए सैनिक बल का प्रयोग करना पड़ा। हालांकि इसने तुर्की अमीरों को संतुष्ट करने के लिए उनको अपनी जगीरो से वंचित नहीं किया फिर भी इनके द्वारा समय-समय पर विद्रोह किया जाता था।

 *विद्रोह को दबाने हेतु सैनिक अभियान किया जाता, कुछ जमीदार स्वेच्छा से राजस्व देते लेकिन कुछ अपने किलो में बंद हो जाते जो कि पराजित होने पर ही राजस्व देते थे। इस प्रकार खिज्र खां का उद्देश्य बन गया था, कि सैनिक अभियान कर राजस्व वसूलना इतने सैनिक अभियान करने के बाद भी यह विद्रोही जागीरदारों को स्थाई रूप से समाप्त करने में असफल रहा।

* खिज्र खां के द्वारा राजस्व वसूलने के लिए कटेहर, इटावा, खोर, जलेसर, ग्वालियर, बयाना, मेवात, बदायूं आदि पर सैनिक अभियान करने पड़े।
* सैनिक अभियानों में खिज्र खां के मंत्री ताज-उल-मुल्क ने इसकी बहुत सहायता की।
* खिज्र खां का अंतिम सैनिक अभियान था। मेवात पर आक्रमण जिसमें कोटा के किले को नष्ट कर दिया गया। बाद में ग्वालियर के कुछ क्षेत्रों को लूटने तथा इटावा के राजा द्वारा आधिपत्य स्वीकार करना। तत्पश्चात दिल्ली वापस आते समय रास्ते में बीमार हो गया। जिसके कारण 20 मई 1421 को दिल्ली में खिज्र खां की मौत हो गई।
* खिज्र खां बुद्धिमान, उदार एवं न्यायप्रिय शासक होने के साथ-साथ उसका व्यक्तिगत चरित्र भी अच्छा रहा। प्रजा उससे प्रेम करती थी, इसी कारण उसकी मृत्यु पर प्रजा द्वारा काले कपड़े पहनकर शोक प्रकट किया गया।

मुबारक शाह (1421-1434 ई.) :-

•सैयद वंश के संस्थापक खिज्र खां अपने पुत्र मुबारक खां को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जो मुबारक शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा।

* यह स्वतंत्र शासक की तरह रहा, इसने खुत्बा पढ़वाया, सिक्के चलवाए, शाह की उपाधि धारण की इससे स्पष्ट होता है, कि इसने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की।
•मुबारक शाह के तीन मुख्य शत्रु थे। उत्तर पश्चिम में खोक्खर नेता जसरथ, दक्षिण में मालवा का शासक, पूर्व में जौनपुर का शासक।
* मुबारक शाह ने “मुइज्जुद्दीन मुबारक शाह” के नाम से सिक्के चलवाए।
* इसके द्वारा अपने वंश पर तैमूर वंशीय प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया गया।
* मुबारक शाह द्वारा अपने प्रशासनिक पदों पर हिंदू अमीरों को नियुक्त किया जाना ऐतिहासिक कार्य था ।
* मुबारक शाह द्वारा यमुना नदी के किनारे मुबारकाबाद नामक एक नगर की स्थापना की गई जो वर्तमान में हरियाणा राज्य में अवस्थित है।
* मुबारक शाह के शासनकाल में “याहिया सर हिंदी” द्वारा तारीख के मुबारक शाही ग्रंथ लिखा गया, जिसके द्वारा सैयद वंश के इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।
19 फरवरी 1434 को उसके वजीर “सरवर-उल-मुल्क” ने धोखे से मुबारक शाह की हत्या कर दी।
* वजीर सरवर-उल-मुल्क पहले मलिक स्वरूप नामक हिंदू था। परंतु बाद में धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गया।
•खिज्र खां के समय सरवर-उल-मुल्क दिल्ली का कोतवाल नियुक्त हुआ। सन् 1422 में वजीर बना।
• मुबारक शाह सरवर-उल-मुल्क को पसंद नहीं करता था, इसी कारण उसने राजस्व के अधिकार छीनकर नायाब सेनापति कमाल-उल-मुल्क को प्रदान किये ।इसी बात से असंतुष्ट होकर इसने नवीन नगर मुबारकबाद का निरीक्षण करते समय मुबारक शाह की धोखे से हत्या कर दी।
* मुबारक शाह के कार्यकाल को देखा जाए तो यह सैयद वंश के सभी शासको में योग्यतम् शासक सिद्ध हुआ।

मुहम्मद शाह (मुहम्मद-बिन- फरीद खां) :-

* मुहम्मद-बिन-फरीद खां जो कि मुबारक शाह के भाई का पुत्र (भतीजा) था। मुहम्मद शाह के नाम से गद्दी पर बैठा।
* मुहम्मद शाह एक विलासी तथा अयोग्य शासक सिद्ध हुआ, जिससे सैयद वंश के पतन की नींव पड़ी।

* वजीर सरवर-उल-मुल्क का मुहम्मद शाह के प्रारंभिक शासनकाल में पूर्ण प्रभाव रहा। इसके द्वारा मुबारक शाह की हत्या में शामिल होने वाले हिंदू सामंतों को उच्च पद प्रदान किये गए। कमाल-उल-मुल्क मुहम्मद शाह का नायब सेनापति था। यह हमेशा सैयद वंश का वफादार रहा।
* कमाल-उल-मुल्क ने एक षड्यंत्र के द्वारा वजीर सरवर-उल-मुल्क की हत्या करवा दी। इस षड्यंत्र में मुहम्मद शाह भी शामिल था।
तलपट का युद्ध (दिल्ली से 10 मील दूर )मालवा के शासक महमूद और मुहम्मद शाह के मध्य हुआ। इस युद्ध में मुल्तान के सूबेदार बहलोल ने मुहम्मद शाह का सहयोग किया। युद्ध अनिर्णित रहा।
* मुहम्मद शाह ने बहलोल को अपना पुत्र कहा तथा सम्मान में “खान एक खाना” की उपाधि प्रदान की।
* बहलोल ने पंजाब के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया, जिसे सुल्तान द्वारा स्वीकृत प्रदान की गई। जिससे बहलोल का मनोबल बढ़ा और उसने 1443 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण कर दिया, लेकिन यह असफल रहा।
मुहम्मद शाह एक असफल शासक सिद्ध हुआ। क्योंकि राज्य की सीमाओं की सुरक्षा न कर सका तथा आंतरिक विद्रोह दबा न सका। इसी के समय से सैयद वंश का पतन प्रारंभ हो गया। सुल्तान की मृत्यु 1445 में हो गई।

अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) :-

मुहम्मद शाह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अलाउद्दीन “अलाउद्दीन आलम शाह” के नाम से गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन आलम शाह एक विलासी शासक था, वह अपने वजीर हमीद खां से झगड़ा कर बदायूं भाग गया, और वही बस गया। सैयद वंश के शासको में यह सबसे अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।

* 1447 ईस्वी में बहलोल लोदी ने पुनः दिल्ली पर आक्रमण किया, परंतु वह असफल रहा।

• 1450 तक संपूर्ण शासन बहलोल ने अपने हाथों में ले लिया, लेकिन इसने बदायूं में रह रहे अलाउद्दीन को अपदस्थ करने की कोशिश नहीं की।
1476 में अलाउद्दीन के पश्चात उसके दामाद जौनपुर के शासक हुसैन शाह शर्की ने बदायूं को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया।
* इसी प्रकार सैयद वंश अपने 37 साल के अल्प शासनकाल में समाप्त हो गया।

सैयद वंश का अंतिम शासक ?

-सैयद वंश का अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) था।

सैयद वंश का संस्थापक कौन था ?

सैयद वंश का संस्थापक खिज्र खां था।

सैयद वंश का शासन काल ?

सैयद वंश का शासन काल 1414-1450 ई. तक रहा ।

सैयद वंश के शासको के नाम ?

खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)

सैयद वंश के शासको का क्रम ?

खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)

इन्हे भी जाने :-विश्व की जनजातियां|बुशमैन|पिग्मी|मसाई|बोरो|सकाई|सेमांग|बद्दू|

भूदान आंदोलन| Bhoodan Aandolan (18 अप्रैल 1951)

भूदान आंदोलन भूमि वितरण को समान बनाने तथा देश में असमान भूमि जोत गरीबी, बेकारी को मिटाने के लिए प्रसिद्ध गांधीवादी नेता आचार्य विनोबा भावे द्वारा भारत में 18 अप्रैल 1951 में शुरू किया गया, भूदान आंदोलन जिसे भूमि दान आंदोलन भी कहा जाता है।

भूदान आंदोलन

 

और पढ़े :-भारत में पर्यावरण आंदोलन|चिपको(1974)|विश्नोई(1730)|अप्पिको(1983)

यह एक सामाजिक सुधार आंदोलन था। इसका मुख्य उद्देश्य भूमिहीन किसानों को भूमि प्रदान करना और सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करना था। यह आंदोलन अपने में एक बृहद रचनात्मक कार्य था, जो महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रेरित था और अहिंसा, स्वैच्छिक दान, और सामुदायिक सहयोग पर आधारित था।

उत्पत्ति :-
आंदोलन की शुरुआत 18 अप्रैल 1951 को तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में हुई, जब विनोबा भावे ने वहां के जमींदारों से भूमिहीन किसानों के लिए जमीन दान करने की अपील की। मार्च 1956 तक इस कार्यक्रम में दान के रूप में 40 लाख एकड़ जमीन मिल गई थी यह करीब दो लाख परिवारों में बांटी गई एक जमींदार, वेदिरे रामचंद्र रेड्डी, ने 100 एकड़ जमीन दान की, जिससे आंदोलन को गति मिली।

उद्देश्य :-
इस आंदोलन के द्वारा अहिंसात्मक तरीके से भूमि वितरण की समानता तथा इसके माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना था।
* भूमिहीन किसानों और हरिजनों को जमीन प्रदान करना।
* सामाजिक समानता को बढ़ावा देना और जमींदारी व्यवस्था के प्रभाव को कम करना।
* विनोबा भावे ने सर्वोदय समाज (सभी का उत्थान) की स्थापना की।

कार्यप्रणाली :-
* विनोबा भावे ने देश भर में अपने अनुयायियों के साथ गांव-गांव पैदल यात्रा की तथा जमींदारों, धनी लोगों से स्वेच्छा से अपनी जमीन का 1/6 वाॅं हिस्सा दान करने को कहते और यह जमीन इस गांव के भूमिहीन किसानों, विशेषकर समाज के वंचित वर्गों में वितरित कर दी जाती थी।
* यह आंदोलन अहिंसक और स्वैच्छिक था। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता तथा रचनात्मकता को देखकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख जयप्रकाश नारायण और कई कांग्रेसी नेता सक्रिय राजनीति छोड़कर इस आंदोलन में जुड़ गए। इस आंदोलन की विशेषता यह रही कि, इसमें किसी पर जोर जबरदस्ती या बल का प्रयोग नहीं किया गया।

प्रभाव :-
* भूदान आंदोलन के तहत देश भर में लगभग 40 लाख एकड़ जमीन दान की गई, इस आंदोलन में बंजर तथा विवादित भूमिका का भी वितरण कर दिया गया था। जिससे किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ा।
* इस आंदोलन ने सामाजिक जागरूकता उत्पन्न की और ग्रामीण भारत में भूमि सुधार के लिए प्रोत्साहित किया।
भूदान आंदोलन की रचनात्मकता के चलते तथा जनता का उत्साह देखते हुए 1955 में उड़ीसा में एक अन्य आंदोलन ग्रामदान आंदोलन (गांवों का दान) और संपत्तिदान आंदोलन प्रारंभ किया गया।

चुनौतियां :-
* दान की गई जमीन का वितरण और प्रबंधन कुछ समय बाद निष्प्रभावी हो चुका था।
* कुछ चालक जमीदारों ने ऐसी भूमि का वितरण किया जो पहले से ही बंजर या अनुपजाऊ थी। इससे जिन भूमिहीनों को लाभ होना था उन्हें उस प्रकार का वास्तविक लाभ नहीं मिल सका।
उस समय भूमि के हस्तांतरण में अनेक प्रकार की प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं थी। जिसके कारण इस आंदोलन की गतिशीलता प्रभावित हुई ।

वर्तमान स्थिति :-
* वर्तमान समय में भूदान आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रभाव कम हो गया है, लेकिन भूदान आंदोलन ने भूमि सुधार और सामाजिक समानता के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत किया।
* यह आंदोलन वर्तमान समय में भी सामाजिक कार्यकर्ताओं और सुधारकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

निष्कर्ष :-
भूदान आंदोलन एक अनूठा प्रयोग था, जिसने भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने की कोशिश की। विनोबा भावे की अहिंसक और स्वैच्छिक दृष्टिकोण ने इसे एक ऐतिहासिक पहल बनाया, हालांकि इस आंदोलन की कुछ सीमाओं के कारण यह पूर्ण रूप से अपनी क्षमता तक नहीं पहुंच सका।

इन्हे भी जाने :-भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन(20वीं सदी )

चौरी चौरा कांड Chauri Chaura Kand (5 फरवरी 1922)

चौरी चौरा कांड,असहयोग आंदोलन के दौरान सी.आर. दास और उनकी पत्नी बसंती देवी के साथ-साथ लगभग 30,000 लोगों की गिरफ्तारी के विरोध में गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर लोगों ने शांत पूर्वक जुलूस निकालकर अपना विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चलाई। जिससे प्रदर्शनकारी उग्र हो गए ।उग्र हुए किसान आंदोलनकारियों ने थाने के थानेदार सहित 22 पुलिस कर्मियों को थाने में बंद कर आग लगा दी। जिससे सभी 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसक भीड़ का नेतृत्व किसान “भगवान दास अहीर” कर रहा था। जो की एक रिटायर्ड सैनिक था।

चौरी चौरा कांड

इस घटना से महात्मा गांधी अत्यंत दुखी हुए। गांधी जी हिंसा के घोर विरोधी थे, उनके विचार से यदि यह आंदोलन हिंसक हो गया तो उनका उद्देश्य असफल हो जाएगा। इसी कारण उन्होंने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा की |

गांधी जी के इस निर्णय से आंदोलन से जुड़े नेता आश्चर्यचकित थे, कुछ नेताओं ने इस निर्णय पर विरोध जताया और कहा कि “देश के एक गांव के कुछ लोगों की गलती का खामियाजा समूचा देश क्यों भुगते।” कुछ इतिहासकारों का मानना है, कि गांधी जी एक दूरदर्शी व्यक्ति थे, वह इस आंदोलन को वापस लेने के पीछे उनकी दूरगामी परिणामों की सोची समझी रणनीति हो सकती थी। जिसे निम्न बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:-

•गांधी जी के विचार से “कैदी नागरिक दृष्टि से मृत होते हैं” और इस आंदोलन के तहत प्रथम पंक्ति के लगभग सभी नेताओं को जेल में बंद किया जा चुका था।

•आंदोलन बिना नेताओं के नेतृत्व विहीन, उदासीन हो गया था।

•जनता में उदासीनता झलकने लगी थी, क्योंकि यह आंदोलन काफी लंबा हो गया था।

•यह आंदोलन अपने वास्तविक उद्देश्य से अलग निजी स्वार्थ की ओर अग्रसर हो रहा था।

•आंदोलन का दमन करने के लिए चौरी चौरा कांड सरकार के लिए एक बहाना मिल गया था। जिसके सहारे आंदोलन और आंदोलनकारी दोनों को नष्ट कर दिया जाता।
परिणाम स्वरुप नेताओं के विरोध/ प्रतिक्रियाओं के बाद अंततः सभी ने गांधी जी के फैसले को स्वीकार किया और असहयोग आंदोलन स्थगित हो गया। इसी समय जेल में सी.आर.दास ने कहा “समूचा देश (भारत) एक विशाल बंदी ग्रह है।”

चौरी-चौरा घटना के होने का मुख्य कारण अनाज की बढ़ती कीमतें, शराब की बिक्री का विरोध आदि। इन्हीं समस्याओं के विरोध में एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा धरना प्रदर्शन किया जा रहा था।
चौरी-चौरा घटना के बाद 225 अभियुक्त पकड़े गए। इनमें से 19 व्यक्तियों को फांसी की सजा दी गई तथा शेष अभियुक्तों को देश से निष्कासन की सजा दी गई।

गांधी जी के आंदोलन वापस लेने पर पंडित मोतीलाल नेहरू और लाला लाजपत राय द्वारा गांधी जी को पत्र लिखकर विरोध दर्ज कराया गया और कहा कि “किसी एक स्थान पर दंगे होने की सजा समस्त देशवासियों को नहीं दी जा सकती।”

सुभाष चंद्र बोस ने अपनी “पुस्तक द इंडियन स्ट्रगल (The Indian Struggle)”में लिखा कि “ऐसे अवसर पर जब जनता का उत्साह चरम पर था, पीछे लौटने का आदेश देना किसी राष्ट्रीय संकट से कम नहीं था।”

आंदोलन वापस लेने की घटना से नाराज होकर डा. मुंजे और जे.एम.सेन गुप्ता ने 1922 में दिल्ली की विजय समिति की बैठक में गांधी जी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया। आंदोलन के स्थगन के बाद गांधीजी को गिरफ्तार किया गया तथा 6 वर्ष की सजा दी गई।

प्रश्न:- चौरी चौरा कांड कब और कहां हुआ था?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के चौरी चौरा नामक स्थान पर हुआ था।
प्रश्न:- चौरी चौरा कांड का नया नाम?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड का नया नाम चौरी चौरा क्रांति कर दिया गया है।
प्रश्न:- चौरीचौरा कांड के समय भारत का वायसराय कौन था?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड के समय भारत का वायसराय अर्ल ऑफ रीडिंग (Earl Of Reading) था ।
प्रश्न:- चौरी चौरा कांड किस वर्ष हुआ?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड 5 फरवरी 1922 को हुआ।

और पढ़े :-असहयोग आंदोलन (1920) कब | कहाँ | क्यों | किसके द्वारा | उद्देश्य |समापन

 

 

 Ilbert Bill | इल्बर्ट बिल (2 फरवरी 1883) | विवाद क्या था

इल्बर्ट बिल ( Ilbert Bill ) भारतीय जजों के साथ होने वाले भेदभाव/अन्याय को दूर करने की भावना से एक विधेयक सर पी.सी. इलबर्ट द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसे “इल्बर्ट बिल” की संज्ञा दी जाती है।

इल्बर्ट बिल

और पढ़े :- लॉर्ड कर्ज़न (1899-1905) जीवन परिचय|नीतियां|सुधार|मृत्यु|बंगाल विभाजन

भारत में 1861 से समस्त क्षेत्र में एक समान फौजदारी कानून लागू कर दिया गया था। इसी तहत सभी प्रान्तों में उच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी।

सन 1861 से पूर्व देश में दो प्रकार के कानून थे। एक प्रेसीडेंसी नगरों के लिए अंग्रेजी कानून तथा दूसरा ग्रामीण क्षेत्रों में मुगल कानून लागू था। उस समय के नीति निर्धारकों का विचार रहा कि यूरोपीय लोगों को मुगल कानून के अंतर्गत लाना उचित नहीं। कालांतर में इसने एक प्रथा का रूप धारण किया। जिसमें प्रेसीडेंसी नगरों के भारतीय दंड नायक (मजिस्ट्रेट) तथा सेशन जज भारतीय तथा यूरोपीय दोनों व्यक्तियों के मुकदमों की सुनवाई कर सकते थे।

कहने का आशय है, कि उस समय प्रेसीडेंसी नगरों के न्यायालय में कोई भी भारतीय जज नहीं होते थे। दूसरी तरफ ग्रामीण प्रदेशों के न्यायालयों में भारतीय तथा यूरोपीय दोनों प्रकार के जज होते थे। परंतु यूरोपीय अभियुक्तों का मुकदमा केवल यूरोपीय जज ही सुनता था। यह नियम केवल फौजदारी मामलों पर लागू था। परंतु दीवानी मामलों पर ऐसा भेदभाव नहीं था।

विवाद का मुख्य कारण :-

1972 में तीन भारतीय न्यायिक सेवा में चयनित हुए तथा 1882 में उनकी पदोन्नति की गई तब वह प्रेसीडेंसी नगर कोलकाता से बाहर भेज दिए गए, जहां यूरोपीय अभियुक्तों के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था।

इसी कारण पदोन्नति हुई भारतीय जज श्री बिहारी लाल गुप्ता ने बंगाल के उप गवर्नर सर इशले ईंडन को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने अपने पदोन्नति होने पर अधिकारों में कमी होने को न्याय संगत नहीं होना बताया तथा भारतीय और यूरोपीय पदाधिकारी में तो इस भेदभाव से न्यायाधीशों की शक्तियां नष्ट होती है।
सर पी.सी. इल्बर्ट एक न्याय में विश्वास करने वाले व्यक्ति थे। अतः वह भारतीयों को न्याय दिलाने के पक्षधर थे। इस समय वायसराय की परिषद में एक विधि सदस्य थे।

इसलिए उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से 2फरवरी 1883 को विधान परिषद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। इसी विधेयक को उनके नाम पर “इल्बर्ट बिल”(Ilbert Bill) कहा गया।

और पढ़े :लॉर्ड डलहौजी की विलय नीति (1848-1856) Doctrine of Lapse in Hindi / हड़प नीति/व्यपगत का सिद्धान्त

इल्बर्ट बिल का प्रमुख उद्देश्य भारतीय न्यायधीशों को यूरोपीय न्यायाधीशों के समान शक्तियां प्रदान करना था। और काले- गोरे जाति भेद पर आधारित सभी न्यायिक अयोग्यताएं समाप्त करके यूरोपीय न्यायधीशों की भांति भारतीय न्यायाधीशों को सामान शक्तियां प्रदान की जाए।

इल्बर्ट बिल का विरोध :-

इस बिल का विरोध बड़े-बड़े उद्यानों वाले यूरोपीय मालिकों द्वारा प्रमुखता से किया गया। क्योंकि इन मालिकों द्वारा भारतीय मजदूर पर बर्बरता का व्यवहार किया जाता था ।और उनसे कठोर परिश्रम कराया जाता था। यदि मजदूर कार्य करने में असमर्थता व्यक्त करता तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। कभी-कभी तो पीटते-पीटते उनकी मृत्यु तक हो जाती थी।

इस प्रकार की हत्या का मामला न्यायालय में जाता था। तो वहां यूरोपीय न्यायाधीश ही मामले की सुनवाई करते थे और उन्हें थोड़ा दंड देकर या कभी-कभी बिना दंड के ही छोड़ देते थे लेकिन जब भारतीय न्यायाधीशों के समक्ष ऐसा मामला पहुंचा तो शायद उन्हें कठोर सजा सुनाई जा सकती थी। इसलिए इन मालिकों ने इस बिल का विरोध किया।

यूरोपीय मालिकों ने इल्बर्ट बिल के विरोध हेतु एक प्रतिरक्षण संघ (Defence association) बनाया जिसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये चंदे के रूप में एकत्रित हुए। इस प्रकार उन्होंने प्रचार किया “कि क्यों हमारा निर्णय काले लोग करेंगे। क्या वे हमें जेल भेजेंगे क्या वह हम पर आज्ञा चलाएंगे यह मालिकों द्वारा मानना असंभव है” उन्होंने यहां तक कहा कि भारत में अंग्रेजी शासन समाप्त हो जाए लेकिन वह इस घृणित कानून को नहीं मानेंगे।

विरोध इतना प्रचंड था। कि कुछ यूरोपीय ने वायसराय को बंदी बनाकर इंग्लैंड भेजने की साजिश रची। गालियां दी गई तथा कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही वायसराय को वापस बुला लिया जाए इसकी मांग कर दी।

विरोध का असर इंग्लैंड में भी दिखने लगा क्योंकि लंदन के प्रसिद्ध समाचार पत्र द टाइम्स ने भी वायसराय रिपन की नीतियों की आलोचना की। महारानी विक्टोरिया ने वायसराय के इस बिल के प्रति व्यवहार पर संदेह व्यक्त किया।

अंततः रिपन को झुकना पड़ा और 26 जनवरी 1884 को नया विधेयक पारित किया गया। जिसमें नियम बनाया गया कि यदि यूरोपीय व्यक्तियों का मुकदमा सेशन जजों के समक्ष आए तो वे लोग 12 सदस्यों की पीठ की मांग कर सकते हैं। जिसमें कम से कम सात यूरोपीय//अमेरिकी जज होना अनिवार्य होगा ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार जजों की पीठ गठित करना संभव नहीं था। इसलिए यह मुकदमे हस्तांतरित करना होता था।

कुतुब मीनार(1199)|उद्देश्य|निर्माणकर्ता|स्थान|सीढ़िया

कुतुब मीनार:-

कुतुब मीनार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा कुतुब मीनार का निर्माण कराने का मकसद मुसलमानों को प्रार्थना हेतु इकट्ठा किया जा सके। लेकिन कालांतर में इसे चित्तौड़ और मांडू में बनी मीनारों के परिपेक्ष में देखा जाने लगा तथा इसे विजय की मीनार माना जाने लगा। कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ईस्वी में कुव्वत-उल- इस्लाम मस्जिद के प्रांगण में इसका निर्माण कार्य प्रारंभ कराया। प्रारंभ में इसके निर्माण हेतु जो खाका तैयार किया गया था उसमें इसकी ऊंचाई 225 फीट तथा चार मंजिल होना तय किया गया था।

कुतुब मीनार

और पढ़े :-असहयोग आंदोलन (1920) कब | कहाँ | क्यों | किसके द्वारा | उद्देश्य |समापन

कुतुबुद्दीन कुतुबमीनार की केवल एक मंजिल का निर्माण कर सका शेष कार्य इल्तुतमिश द्वारा किया गया। कुतुबमीनार का निर्माण सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में कराया गया था। फिरोज तुगलक के समय में कुतुब मीनार पर आकाशीय बिजली गिरने के कारण इसकी चौथी मंजिल क्षतिग्रस्त हो गयी |जिससे इस चौथी मंजिल को तोड़कर इसके स्थान पर दो मंजिलो का निर्माण कराया गया | जिससे कुतुबमीनार की उचाई 234 फिट हो गयी थी | समय समय पर कुतुबमीनार की मरम्मत का कार्य फिरोजशाह तुगलक ,सिकंदर लोदी व् मेजर आर. स्मिथ द्वारा कराया गया |   

कुतुब मीनार के आंतरिक भाग में कुछ छोटे-छोटे देवनागरी अभिलेख खुदे हैं। इन्हीं अभिलेखों के आधार पर इसे शुरू में हिंदू मीनार होने से जोड़ा जाने का प्रयास किया गया और कहा गया कि मुसलमानों ने इसकी बाहरी दीवारों पर कटाई करके मीनार का स्वरूप प्रदान किया।

उक्त विचारधारा का सिरे से खण्डन जान मार्शल जैसे इतिहासकारों ने किया है। और कुतुब मीनार को इस्लामी मीनार ही माना जाना सर्व उचित है। इस मीनार के निकले छज्जों को छत्तेदार डिजाइन से अलंकृत पत्थरों के ब्रैकेट द्वारा सहारा दिया गया है।

प्रश्न:- कुतुब मीनार कहां है।
उत्तर:- कुतुब मीनार दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के परिसर में स्थित है।

प्रश्न :- कुतुब मीनार क्यों बनाया गया था।
उत्तर:- कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा मुसलमानों को एक जगह एकत्रित करके प्रार्थना सभाओं का आयोजन करना था।

प्रश्न:- कुतुबमीनार का निर्माण कब हुआ।
उत्तर:- कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ईस्वी में दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के परिसर में कराया गया।

प्रश्न:- कुतुब मीनार में कितनी सीढ़ियां हैं।
उत्तर:- कुतुब मीनार में 379 सीढ़ियां हैं।

अलीगढ़ आंदोलन (1876)|सर सैयद अहमद खां|अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय|तहजीब-उल-अखलाक

सर सैयद अहमद ख़ां:-

अलीगढ़ आंदोलन (1876), सर सैयद अहमद खां, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, तहजीब-उल-अखलाक

सर सैयद अहमद के नेतृत्व में अलीगढ़ आंदोलन 1876 में प्रारंभ हुआ। सर सैयद अहमद का जन्म 1817 ईस्वी में दिल्ली में हुआ। यह अंग्रेजी शिक्षा एवं ब्रिटिश सत्ता के सहयोग के पक्षधर थे। क्योंकि सर सैयद अहमद ख़ां का मानना था कि मुसलमानों में शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है इसलिए वह शिक्षा का प्रचार-प्रसार करके उनके बौद्धिक स्तर में वृद्धि तथा रोजगार प्राप्त करने में सक्षम हो सके। जिससे मुस्लिम समाज की दशा में सुधार हो सके।

अलीगढ़ आंदोलन

और पढ़े :-भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन(20वीं सदी )BEST FOR ALL EXAMS

अलीगढ़ आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था, कि मुस्लिम समुदाय का उत्थान कैसे किया जाए भारत में ज्यो-ज्यो पुनर्जागरण बड़ा और शिक्षा का विकास हुआ तो मुस्लिम समाज का एक प्रबुद्ध वर्ग शिक्षा की महत्ता को समझने लगा। इसी वर्ग का नेतृत्व सर सैयद अहमद ने अपने हाथों में संभाला और मुसलमानों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना तथा मुस्लिम समाज का उत्थान सुनिश्चित करना। लेकिन उनके इस कार्य का उलेमाओं तथा कट्टरपंथी मुसलमानों ने खुला विरोध किया। लेकिन सर सैयद अहमद अपने इस कार्य में निडरता से करने में डटे रहे।

1857 की महान क्रांति के पश्चात अंग्रेजी सत्ता को लगने लगा कि इस क्रांति में मुख्य षड्यंत्र करता मुसलमान थे। इसकी पुष्टि कुछ समय पश्चात हुए बहावी आंदोलन ने कर दी। अंग्रेजी सरकार को यह एहसास हो गया था कि बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण हिंदू मुस्लिम एकता के कारण कालांतर में और अधिक विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए अंग्रेजी सरकार ने बड़ी चालाकी से मुसलमानों को अपने सहयोगी के रूप में इस्तेमाल करने का निश्चय किया।

अलीगढ़ आंदोलन के प्रणेता सर सैयद अहमद का मत था। कि मुस्लिम समुदाय अभी पिछड़ा है और यदि हिंदू मुस्लिम एकता बनी रहे तो इसमें मुसलमानों कोई लाभ न होकर नुकसान ही होगा। किसी समय सर सैयद अहमद हिंदू मुस्लिम एकता के समर्थक थे। कालांतर में हिंदू तथा कांग्रेस विरोधी होते गए। फल स्वरुप अलीगढ़ आंदोलन विरोधी होता चला गया। इसी का अवसर पाकर अंग्रेजी सरकार ने मुसलमानों को अपने को अपने पक्ष में करने में सफलता प्राप्त की। और अलीगढ़ आंदोलन अंग्रेजों की विश्वसनीयता हासिल करने में सफल रहा।

सर सैयद अहमद ने अपने जीवन के दो मुख्य लक्ष्य बनाए। पहला अंग्रेजी सरकार और मुसलमानों के संबंधों को ठीक करना तथा दूसरा मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना। सर सैयद अहमद खान मुस्लिम मदरसो में पढ़ाई जाने वाली पुरानी पद्धति की शिक्षा से खुश नहीं थे। और इन्होंने यह तर्क दिया कि कुरान में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो मुस्लिम समाज को पश्चिमी संस्कृति के संपर्क में आने वाला अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने से रोकता है। इनके द्वारा सन 1864 में साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना तथा गाजीपुर में इसी वर्ष एक अंग्रेजी शिक्षा का स्कूल खोला गया। 1870 में फारसी भाषा में एक पत्रिका तहजीब-उल-अखलाक निकाली। यह सदैव अंग्रेजी सरकार के प्रति राजभक्त बने रहे। इसी क्रम में उनके द्वारा 1875 में अलीगढ़ में मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल की स्थापना की गई। जो 1878 में कॉलेज बना तथा 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया।
अलीगढ़ आंदोलन में सर सैयद अहमद खान के समर्थकों में चिराग अली, नजीर अहमद, अल्ताफ हुसैन अली, मौलाना शिबली नोमाली आदि प्रमुख थे। 1887 कांग्रेस के अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयब जी बने तो इन्होंने इसका विरोध किया।

धरासना|बेबमिलर|दांडी|नौजवान सभा| विलियम हॉकिंस, राल्फ फिच, सर थॉमस रो,

उस विदेशी पत्रकार का नाम बताइए जिसने धरासना साल्ट वर्क्स पर सत्याग्रह के बारे में समाचार दिए।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत गांधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ा गया इसी परिपेक्ष में मुंबई में इस आंदोलन का केंद्र बिंदु धरासना था जहां सरोजिनी नायडू, इमाम साहब, गांधी जी के पुत्र मणिलाल लगभग 2000 कार्यकर्ताओं के साथ धरासना नमक कारखाने की ओर बढ़े मुंबई के पास वडाला के नमक कारखाने पर लोगों ने धावा बोला और नमक लूट लिया 1930 में मुंबई के समुद्र पर अमेरिकी पत्रकार बेबमिलर ने सत्याग्रहियो पर अत्याचार का सजीव वर्णन किया।

धरासना

दांडी मार्च 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 ईस्वी तक

महात्मा गांधी 12 मार्च 1930 को 78 चुने अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम अहमदाबाद से दांडी नौसारी जिला गुजरात के लिए यात्रा प्रारंभ की।

गांधीजी 5 अप्रैल 1930 ईस्वी को 241 मील लंबी पैदल यात्रा के बाद दांडी पहुंचे उसके अगले दिन 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ा।

सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी की दांडी मार्च की तुलना नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की।

पश्चिमोत्तर प्रांत पेशावर में नमक आंदोलन का नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खान ने किया इनका यह आंदोलन लाल कुर्ती आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अब्दुल गफ्फार खान को सीमांत गांधी फख्र-ए- अफगान, बादशाह खान आदि नामों से जाना जाता है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र मणिपुर में सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व यदुनाथ के जिया रंग आंदोलन के नाम से जाना गया।

यदुनाथ पर हत्या का अभियोग लगाकर फांसी की सजा दी गई इसके बाद इनकी बहन गैडिनल्यू ने विद्रोह का संचालन किया इन्हें बाद में आजीवन कारावास की सजा हुई नेहरू जी ने इन्हें रानी की उपाधि प्रदान की।

मुंबई में इस आंदोलन का केंद्र बिंदु धारासना रहा 31 मार्च 1930 को सरोजनी नायडू इमाम साहब तथा गांधी जी के पुत्र मणिलाल लगभग 2000 कार्यकर्ताओं के साथ धारासना कारखाने की ओर बढ़े वहां पर लाठी चार्ज हुआ इस नृशंस अत्याचार का सजीव वर्णन अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने किया।

दक्षिण भारत में इस आंदोलन का नेतृत्व राजगोपालाचारी ने त्रिचनापल्ली से बदओख्यम तक की यात्रा की। सैनिक कट्टा नामक कारखाने पर धावा बोला।

1926 में गठित नौजवान सभा के प्रारंभिक सदस्य कौन कौन थे।

1926 ईस्वी में पंजाब में गठित नौजवान सभा के प्रारंभिक/संस्थापक सदस्य भगत सिंह, छबीलदास और यशपाल थे।

साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 ईस्वी को जब लाहौर स्टेशन पर पहुंचा तो नौजवान सभा के सदस्यों ने इस कमीशन का बहिष्कार करने के लिए जुलूस का गठन किया जिसमें लाला लाजपत राय पर लाठियों की बौछार की गई कुछ दिनों बाद लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और जयपाल ने स्कॉट को मारने का दृढ़ निश्चय किया मगर गलती से दिसंबर 1928 ईस्वी को सांडर्स और उनके रीडर चरण सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

 विलियम हॉकिंस, राल्फ फिच, सर थॉमस रो, निकोलस डाउंटन विदेशी यात्रियों को उनके भारत आने के कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।

राल्फ फिच भारत आने वाला पहला इंग्लिश यात्री था जो 1583 ई. में आगरा पहुंचा।

विलियम हॉकिंस इंग्लैंड का यात्री जो अगस्त 1608 में सूरत पहुंचता और अप्रैल 1609 में मुगल शासक जहांगीर के दरबार आगरा पहुंचा।

सर थॉमस रो एक ब्रिटिश यात्री था जो सितंबर 1615 ई. में जहांगीर के दरबार में पहुंचा।

निकोलस डाउंटन 1615 ई. में भारत आया।

तहकीक-ए-हिंद(Tahqiq-I-Hind)|ताज उल मासिर(Taj Ul Maasir)

 

तहकीक-ए-हिंद अलबरूनी द्वारा रचित यह अरबी भाषा का ग्रंथ, जिसका सबसे पहले 1888 में एडवर्ड सांची ने अंग्रेजी अनुवाद किया। बाद में इस अंग्रेजी भाषा के अनुवाद को हिंदी में रजनीकांत शर्मा द्वारा परिवर्तित किया गया और इस पुस्तक को “आदर्श हिंदी पुस्तकालय” इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया।

तहकीक-ए-हिंद

और पढ़े :-विजयनगर साम्राज्य(1336-1652)|संगम वंश|स्थापना|यात्री|मंदिर|अमर नायक प्रणाली

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोतों की जानकारी के लिए यह पुस्तक बहुत ही प्रमाणित मानी गई है अलबरूनी ने महमूद गजनवी के समय के भारत की आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक स्थिति, सामाजिक स्थिति के बारे में विस्तृत रूप से लिखा है। यह ग्रंथ जिसमें 80 अध्याय हैं जो की एक बहुत ही विस्तृत ग्रंथ माना जाता है।
अलबरूनी ने अपने इस ग्रंथ में भारत की प्राकृतिक दशाएं, जलवायु, रीति रिवाज, धार्मिक परंपराएं, कर्म सिद्धांत, जीव के आवागमन के सिद्धांत, मोक्ष प्राप्त करने का सिद्धांत, भोजन, वेशभूषा, मनोरंजन, धार्मिक उत्सवों आदि के बारे में विस्तृत वर्णन किया है। उसने अपने इस ग्रंथ में भगवद् गीता, वेद, उपनिषदों, पतंजलि के योग शास्त्र आदि के बारे में भी लिखा है।

राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो अलबरूनी ने इस ग्रंथ में उत्तरी भारत, गुजरात, मालवा, पाटलिपुत्र, कन्नौज, मुंगेर आदि के बारे में वर्णन किया है। लेकिन इस ग्रंथ में दक्षिण भारत के किसी भी राज्य के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है, और इसने भारतीय शासको के आपसी एकता के अभाव को दर्शाया है। जिसके कारण विदेशी आक्रमण कर्ताओं के द्वारा भारत को समय-समय पर क्षति पहुंचाई गई, यहां की जातिगत व्यवस्था की कठोरता और उसके दुष्परिणाम और निम्न जाति के लोगों अर्थात अछूतों की स्थिति के बारे में लिखा है। वह यह स्पष्ट करते हैं कि यहां जाति प्रथा इतनी कठोर थी कि अगर किसी व्यक्ति को जाति ने वहिष्कृत कर दिया तो वह पुनः सम्मिलित नहीं हो पता था। सामाजिक कुरीतियां भी व्याप्त थी जिसमें मुख्यत अलबरूनी ने सती प्रथा के बारे में लिखा है 1 यहां के लोग अपनी भाषा संस्कृत देश आदि को सर्वश्रेष्ठ मानते थे इसके अलावा अलबरूनी ने हिंदू मंदिरों  मूर्तियां और बिहारों का विवरण किया है1 यहां का वैष्णो संप्रदाय सबसे लोकप्रिय संप्रदाय माना जाता था 1 भारतीय लोग प्राय मूर्ति पूजा फ्रेम यह देश आर्थिक दृश्य संपन्न देश था 1 मुद्रा व्यवस्था नापतोल आज के बारे में भी वर्णन किया गया है 1 अलबरूनी ने भारतीय राजाओं द्वारा अपनी प्रजा से कर लेने के अधिकार रूप में कृषकों के उत्पादन का 1/6 भाग लगान के रूप में लिया जाता था 1 उसके अनुसार भारत एक धनवान देश था 1 यह दीप यहां महमूद ने इसकी समृद्धि को लूटकर नष्ट किया

ताज उल मासिर :-

सदरूद्दीन मुहम्मद हसन निजामी द्वारा फारसी भाषा में लिखित यह ग्रंथ दिल्ली सल्तनत का प्रथम राजकीय इतिहास का वर्णन करता है। इस ग्रंथ में मुख्यतः कुतुबुद्दीन ऐबक के शासनकाल की घटनाओं और कहीं-कहीं पर मुहम्मद गौरी, सुल्तान इल्तुतमिश के समय में हुई घटनाओं को भी दर्शाया गया है।

ताज उल मासिर

इस ग्रंथ में हसन निजामी द्वारा युद्धों तथा उनके कारणों, परिणामों पर प्रकाश डाला है, तथा भारतीय शासन प्रणाली और सामाजिक स्थिति का भी विवरण दिया है। यहां होने वाले मेलो, उत्सवों और भारतीयों के मनोरंजन के साधनों को भी इस ग्रंथ में समाहित किया गया।यह एक छोटा ग्रंथ है। कुछ तत्वों के आधार पर इस ग्रंथ की प्रामाणिकता को प्रश्न चिन्ह लगता है। जैसे इसके अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिरहम और दीनार नामक सिक्के चलवाए लेकिन अन्य इतिहासकारों के आधार पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने कोई सिक्का नहीं चलाया। लेकिन फिर भी इस ग्रंथ का ऐतिहासिक स्रोत होना उपयोगी माना गया है।

असहयोग आंदोलन (1920) कब | कहाँ | क्यों | किसके द्वारा | उद्देश्य |समापन

असहयोग आंदोलन

असहयोग आंदोलन का प्रारंभ कोई एक दिन की घटना का परिणाम न होकर, अंग्रेजी शासन द्वारा भारतीयों के प्रति उठाए गए कदमों का परिणाम था। असहयोग आंदोलन की मुख्यतः नींव वर्ष 1919 में पड़ी। क्योंकि इस वर्ष अंग्रेजी सत्ता द्वारा बनाई गई सरकारी नीतियां एवं गतिविधियों के कारण भारत के लगभग सभी सामाजिक वर्ग असंतुष्ट हो गए थे।

असहयोग आंदोलन

और पढ़े :-लॉर्ड डलहौजी की विलय नीति (1848-1856) Doctrine of Lapse in Hindi / हड़प नीति/व्यपगत का सिद्धान्त

असहयोग आंदोलन का मुख्य कारण :-

असहयोग आंदोलन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:-

 

प्रथम विश्व युद्ध के कारण जनता आर्थिक रूप से त्रस्त हो गई थी। महंगाई अपने चरम पर जिससे कस्बो, नगरों में रहने वाले मध्यम वर्गीय एवं निम्न वर्गीय लोग परेशान थे। खाद्यान्न की कमी, मुद्रास्फीति बढ़ने लगी औद्योगिक इकाइयों का उत्पादन कम हो गया। लोगों पर कर्ज बड़ा इसके साथ-साथ सुखे महामारी और फ्लैग जैसी आपदाओं ने तो आम जनमानस की कमर तोड़ के रख दी।

असहयोग आंदोलन के प्रारंभ होने का सबसे बड़ा कारण रोलेट एक्ट (संदेश मात्र से ही लोगों पर मुकदमा चला कर वर्षों की सजा सुनाया जाना) पंजाब में मार्शल लॉ लागू करना, जलियांवाला बाग हत्याकांड आदि घटनाओं ने अंग्रेजी सरकार के क्रूर और असभ्य रवैए को उजागर किया। हंटर कमीशन की सिफारिश से हाउस आफ लॉर्ड्स में जनरल डायर के कृत्यों को उचित ठहराया गया तथा मॉर्निंग पोस्ट ने डायर के लिए 30000 पौंड की धनराशि एकत्रित करना।
1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार जिसका मुख्य उद्देश्य द्वैध शासन प्रणाली लागू करना था।

असहयोग आंदोलन कहां से शुरू हुआ:-

गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन 1 अगस्त 1920 से प्रारंभ किया गया। इसे पश्चिमी भारत, बंगाल, उत्तरी भारत में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। इस दौरान मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू तथा राजेंद्र प्रसाद ने वकालत छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। गांधी जी ने एक वर्ष के भीतर स्वराज का नारा दिया।

सितंबर 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकाता के विशेष अधिवेशन में असहयोग आंदोलन को स्वीकारा गया। इसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय द्वारा की गई। इसका सी.आर. दास द्वारा विरोध किया गया। दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन प्रस्ताव को सी.आर. दास ने ही प्रस्तावित किया। जो की अंतिम रूप से पारित होने में सफल रहा।
असहयोग आंदोलन का विरोध सी.आर. दास, जिन्ना, एनीबेंसेंट और विपिन चंद्र पाल ने किया था।

असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम (प्रस्तावित प्रावधान):-

असहयोग आंदोलन के प्रस्तावित प्रावधान संबंधी प्रमुख बातें निम्नलिखित थी :-
– सरकारी उपाधि एवं अवैतनिक सरकारी पदों एवं अन्य पहलुओं का बहिष्कार।
-मद्य निषेध (ताड़ी, शराब जैसी अन्य नशीली चीज)|
-सरकार द्वारा आयोजित सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी उत्सवों का बहिष्कार किया जाए। सरकारी शिक्षण संस्थानों तथा अस्पतालों, अदालतों का बहिष्कार।
-विदेशी सामानों, विदेशी नौकरियों का त्याग किया जाए।
-विभिन्न करो को देना बंद किया जाए।
-स्थानीय स्वशासन हेतु पंचायत का गठन किया जाए।
-हिंदू मुस्लिम एकता तथा छुआछूत को मिटाकर भाईचारे की भावना का विकास करना।
-राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना तथा कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।

असहयोग आंदोलन के समर्थन में किए गए कार्य:-

ब्रिटिश सरकार द्वारा महात्मा गांधी को प्रदान की गई, कैसर-ए-हिंद की उपाधि गांधी जी द्वारा वापस साथ ही साथ जुलू-युद्ध- पदक बोअर युद्ध पदक भी लौटा दिए गए।

-सीआर दास, जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल,सी राज गोपालाचारी आदि नेताओं ने उपाधियों और नौकरियों को छोड़ दिया।

लोगों द्वारा स्कूल नौकरियों से बायकाट तथा विभिन्न स्थानों पर जनसभाओं को संबोधित किया गया।

1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स भारत भ्रमण पर आए उन्हें यहां की जनता ने काले झंडे दिखाकर उनका स्वागत किया।

इस आंदोलन में सर्वप्रथम गिरफ्तार होने वाले नेता मोहम्मद अली थे |इसी क्रम में सरकार की दमनकारी नीतियों के द्वारा सी. आर. दास तथा उनकी पत्नी बासंती देवी को गिरफ्तार कर लिया गया।

असहयोग आंदोलन में लगभग 30000 लोगों की गिरफ्तारी हुई लेकिन गांधी जी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।

असहयोग आंदोलन चलाने के लिए 1921 ईस्वी में तिलक स्वराज फंड की स्थापना की गई इसमें 6 माह के अंदर एक करोड रुपए एकत्रित हो गया।

पंजाब में अकाली आंदोलन जो कि अहिंसक आंदोलन था प्रारंभ हुआ।
असम के चाय बागानों के मजदूरों द्वारा हड़ताल करना।

-मिदनापुर के किसानों द्वारा यूनियन बोर्ड को कर देने से मना कर दिया गया।
उपरोक्त सभी कार्यक्रमों के साथ-साथ गांधी जी ने अंग्रेजी सरकार को चेतावनी दी। कि अगर 7 दिनों के अंदर राजनीतिक बंदी रिहा नहीं हुए और प्रेस पर सरकार का नियंत्रण समाप्त नहीं किया गया। तो वह करो की अदायगी समेत सामूहिक रूप से बारदोली में एक सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करेंगे लेकिन इसी दौरान गोरखपुर में चौरी-चोरा कांड हो जाता है। जिससे क्षुब्ध होकर गांधी जी असहयोग आंदोलन वापस ले लेते हैं।

 

प्रश्न :-असहयोग आंदोलन कब हुआ ?

असहयोग आंदोलन 1 अगस्त 1920 को गांधी जी द्वारा प्रारंभ किया गया।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन कहां से शुरू हुआ ?

असहयोग आंदोलन सितंबर 1920 में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कोलकाता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी के सहयोग से या प्रस्ताव पारित किया गया।

प्रश्न:- सहयोग आंदोलन का मुख्य कारण था।

असहयोग आंदोलन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे रॉलेट एक्ट प्रथम विश्व युद्ध के कारण महंगाई, मुद्रा स्फीति ,औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, लोगों पर कर्ज, सूखा, महामारी, फ्लैग पंजाब में मार्शल लॉ आदि।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन कब समाप्त हुआ।

4 फरवरी 1922 को गोरखपुर में चौरी- चोरा कांड के कारण क्षुब्ध होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया है। तथा 12 फरवरी 1922 को बारदोली में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन क्या है।

अंग्रेजी सरकार द्वारा मानवीय कृत्यों एवं नए-नए समाज विरोधी नियमों को पारित करने पर भारतीय नेताओं एवं जनता द्वारा अंग्रेजी सरकार के सभी कार्यों में सहयोग न करके असहयोग करने का निर्णय लिया गया।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन कब और क्यों वापस लिया गया।

12 फरवरी 1922 को महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की। क्योंकि गांधीजी 4 फरवरी 1922 को हुए चौरी- चौरा (गोरखपुर) कांड से बहुत आहत हुए थे।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव कांग्रेस के किस अधिवेशन में पारित हुआ।

सितंबर 1920 के कोलकाता अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ।

प्रश्न:- असहयोग आंदोलन के उद्देश्य।

जिन कार्यों से खिलाफत आंदोलन प्रारंभ किया गया। उनका उचित समाधान तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रतिकार एवं स्वराज स्थापित।

 लॉर्ड कर्ज़न (1899-1905) जीवन परिचय|नीतियां|सुधार|मृत्यु|बंगाल विभाजन

 

भारतीय इतिहास में लॉर्ड कर्ज़न सबसे अलोकप्रिय वायसराय माना गया है। इसे इसके कार्यों के कारण दूसरा औरंगजेब गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा कहना उचित समझा गया है। हालांकि लॉर्ड कर्जन एक परिश्रमी, जिम्मेदार योग्य गवर्नर था। जिसने अनेक सुधार भी किये जैसे शिक्षा में सुधार, आर्थिक सुधार, पुलिस सुधार, कृषि सुधार आदि। इसका सबसे घृणित कार्य बंगाल विभाजन था।

लॉर्ड कर्ज़न

और पढ़े :-लॉर्ड डलहौजी की विलय नीति (1848-1856)

लॉर्ड कर्जन का जीवन परिचय

लॉर्ड कर्ज़न का पूरा नाम जार्ज नैथूनियल कर्जन था। यह केडलस्टन डर्बीशायर के रेक्टर व चौथे बैरन स्कार्सडेल के सबसे बड़े पुत्र थे। यह अपने समकालीन लोगों में भारत के विषय में सबसे अधिक जानकारी रखते थे। यह परिश्रमी, जिम्मेदार तथा योग्यतम् गवर्नर था। विद्यालयी शिक्षा के प्रारंभिक स्कूल मास्टर जो शारीरिक दंड में विश्वास रखते थे, उनसे यह काफी प्रभावित था। 1874 में एक दुर्घटना के कारण इसकी पीठ में भयानक दर्द हुआ था। डॉक्टरों ने इसे आराम करने की सलाह दी लेकिन इसने सलाह न मानकर चमड़े का हार्नेस जीवन पर्यंत पहना जिसके कारण इसे नींद नहीं आती थी और यह ड्रग्स लेने लगा जिससे यह और क्रूर प्रवृत्ति का हो गया।

कर्जन जब ईटन में स्नातक कर रहा था। तभी इसने भारत का गवर्नर जनरल बनने की इच्छा प्रकट की थी। इसकी यह इच्छा 1899 में पूर्ण हुई। यह भारतीयों से हमेशा द्वेष भावना रखता था। यह अपने को एक श्रेष्ठ शासन की दृष्टि से देखता। कर्जन की मृत्यु मार्च 1925 में एक आंतरिक ऑपरेशन कराने के कारण हुई।

लॉर्ड कर्जन की नीतियां/ लाॅर्ड कर्जन के सुधार

लॉर्ड कर्ज़न के शिक्षा में सुधार

लॉर्ड कर्ज़न भारतीय विश्वविद्यालय और शिक्षा निकायों को उग्रवादियों और विद्रोहियों का अड्डा मानता। जिसे रोकने के लिए उसने 1901 में शिमला में शिक्षाविदों का सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया। सम्मेलन के बाद एक विश्वविद्यालय आयोग टाॅमस रैले की अध्यक्षता 1902 में गठित किया गया। इस आयोग में दो भारतीय सदस्य सैयद हुसैन बिलग्रामी तथा गुरूदास बैनर्जी को सम्मिलित किया गया। इसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 1904 में भारतीय विश्वविद्यालय कानून बनाया गया। इस कानून के द्वारा विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ गया। जिससे सरकार विश्वविद्यालयों के लिए नियम बना सकती तथा इनका निरीक्षण भी कर सकती थी। इस नियंत्रण को आगे और कठोरता पूर्वक लागू किया गया। इसलिए इस कानून का जोरदार विरोध किया गया। इस कानून के परिपेक्ष में कर्जन की छवि भारतीय शिक्षाविदों में एक खलनायक के रूप में बनी। कर्जन का भारतीय शिक्षा के बारे में मानना था। कि” पूर्व एक ऐसा विद्यालय है, जहां विद्यार्थियों को कभी प्रमाण पत्र नहीं मिलता।”

लॉर्ड कर्ज़न के आर्थिक सुधार

1899 में भारतीय टंकण तथा मुद्रण अधिनियम के आधार पर भारतीय मुद्रा को परिवर्तीय मुद्रा बना दिया तथा अंग्रेजी पाउंड भारत में विधिग्रह् बन गया तथा यह 1 पाउंड 15 रुपए के बराबर था। इस व्यवस्था के लागू होने पर जिन व्यक्तियों की वार्षिक आय ₹ 1000 थी उन्हें कर देना नहीं पड़ता था तथा नमक कर को भी घटकर 2.5 रुपए प्रतिमन से 1.5 रुपए प्रतिमन कर दिया गया।

कृषि सुधार

लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल में एक कृषि अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जिससे वैज्ञानिक ढंग से कृषि की जा सके। पंजाब के कृषकों की स्थिति को मजबूत करने के लिए 1900 में दि पंजाब लैंड एलिनेशन एक्ट लाया गया जो कि किसी भी साहूकार द्वारा बिना सरकार की अनुमति के किसानों की भूमि पर अधिकार नहीं कर सकता था। इसी क्रम में कर्जन द्वारा 1904 में दि कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट लाया गया। जिसके द्वारा किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई तथा फसल नष्ट होने या खराब होने की दशा में लगान माफ करने का आदेश जारी किया।

सिंचाई आयोग का गठन

कर्जन द्वारा 1901 में कालिन स्काट के नेतृत्व में सिंचाई आयोग का गठन किया। इस आयोग ने सिंचाई के महत्व को समझा और अगले 20 वर्षों में इस पर 44 करोड रुपए खर्च करने की सिफारिश की जिसे सरकार द्वारा मान लिया गया।

लॉर्ड कर्ज़न के पुलिस सुधार

लॉर्ड कर्ज़न को पुलिस के क्रियाकलापों मे सुधार की आवश्कता महसूस हुई।इसलिए इसके द्वारा 1902 में पुलिस सुधार हेतु र्फेजर आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि पुलिस विभाग पूरी तरीके से भ्रष्ट हो चुका है। और आयोग सुझाव दिया कि सिपाहियों और अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण स्कूल खोले जाएं तथा उच्च अधिकारियों की भर्ती प्रत्यक्ष की जाएं इनके वेतन में वृद्धि तथा गुप्तचर विभाग बनाया जाए। आयोग ने स्पष्ट किया कि जनता को संदेह मात्र पर गिरफ्तार न किया जाए। आयोग के उपर्युक्त सभी सुझावों को सरकार ने मान लिया तथा प्रांतीय स्तर पर एक गुप्तचर विभाग (CBI) की स्थापना की गई।

मैक्डोनाल्ड आयोग (1900)

भारत में लार्ड एल्गिन द्वितीय के समय से ही कुछ प्रांतों को छोड़कर लगभग संपूर्ण भारत में अकाल की स्थिति का सामना करना पड़ता था। अतः इस स्थिति से निपटने के लिए लॉर्ड कर्ज़न ने मैक्डोनाल्ड की अध्यक्षता में एक अकाल आयोग का गठन किया। इस आयोग ने एक अकाल आयुक्त बनाने की सिफारिश की और कहा की सरकार को अकाल की स्थिति उत्पन्न होते ही तुरंत सहायता देना प्रारंभ कर देना चाहिए तथा यह भी सुझाव दिया कि इस विषम परिस्थिति में सरकार को गैर सरकारी संगठन से भी सहायता लेनी चाहिए।

रेलवे सुधार (1901)

भारतीय इतिहास में रेलवे के निर्माण को एक नए युग की तरह देखा गया। रेलवे के निर्माण की प्रगति लॉर्ड कर्ज़न के पूर्व ही प्रारंभ हो गई थी। लेकिन अंग्रेजी भारत के इतिहास में सबसे अधिक रेलवे लाइन का विस्तार कर्जन के कार्यकाल में ही संपन्न हुआ। कर्जन ने 1901 में रॉबर्टसन की अध्यक्षता में रेल व्यवस्था के सुधार के लिए एक रेलवे आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग ने सुझाव दिया कि रेलवे का प्रबंधन व्यावहारिक आधार पर होना चाहिए। अतः कर्जन ने रेलवे विभाग खत्म करके रेलवे बोर्ड की स्थापना की।

लॉर्ड कर्ज़न एक पुरातत्वविद् था। उसने 1904 में प्राचीन स्मारक सुरक्षा कानून बनाया। जिसके द्वारा पुरातत्व विभाग की स्थापना की गई। और इसके रखरखाव एवं सुरक्षा के लिए 50000 पाउंड की धनराशि इस विभाग को उपलब्ध कराई गई।

कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन (1905)

लॉर्ड कर्ज़न द्वारा भारत में सबसे घृणित कार्य बंगाल विभाजन था। कर्जन द्वारा यह तत्व प्रस्तुत किया गया। कि बंगाल प्रांत बड़ा होने के कारण प्रशासनिक असुविधा होती है। लेकिन इस विभाजन से देश की जनता में आक्रोश व्याप्त हो गया। कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियों की भारतीय युवाओं में प्रतिक्रिया हुई। नए बंगाल प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंण्ड्रयू फ्रेजर ने सांप्रदायिक आधार पर कहा था।” मेरी दो पत्नियां है जिसमें मुसलमान पत्नी मुझे अधिक प्रिय है।” लॉर्ड कर्ज़न द्वारा किए गए कुछ प्रतिक्रियावादी कार्य जैसे कोलकाता कॉरपोरेशन अधिनियम एवं विश्वविद्यालय अधिनियम आदि भारत ने उग्रवादी कार्यों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कर्जन के 7 वर्षों के शासनकाल को शिष्टमंडलों भूलों तथा आयोगों का काल कहा जाता है। हालांकि 1911 में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया गया। परंतु लॉर्ड कर्जन अंतत अपने सांप्रदायिक उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा।

 प्रश्न01-बंगाल विभाजन कब हुआ?

बंगाल विभाजन की घोषणा लॉर्ड कर्जन ने 20 जुलाई 1905 को की तथा इसके बाद बंगाल विभाजन लागू 16 अक्टूबर 1905 को कर दिया गया।

प्रश्न02- बंगाल का एकीकरण कब किया गया?

बंगाल विभाजन लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय के समय में 1911 में समाप्त किया गया। जिसमें जॉर्ज पंचम, क्वीन मेरी, भारत सचिव जार्ज मार्ले के संयुक्त हस्ताक्षर के द्वारा इसकी समाप्ति की घोषणा की गई

 प्रश्न03- बंगाल विभाजन का कारण क्या था?

बंगाल विभाजन का मुख्य कारण बंगाल की एकजुट शक्ति को तोड़ना था। जिसमें हिंदू तथा मुसलमान सभी शामिल थे। ब्रिटिश भारतीय राष्ट्रीय चेतना को फूट डालो राज करो के सिद्धांत के द्वारा नष्ट करना चाहती थी। उसने धार्मिक आधार पर बंगाल विभाजन करना उचित समझा।

 प्रश्न04- बंगाल विभाजन रद्द कब हुआ?

बंगाल विभाजन 1911 में दिल्ली दरबार के अवसर पर जॉर्ज पंचम तथा क्वीन मेरी के द्वारा रद्द करने की घोषणा की गई।

 प्रश्न05- लार्ड कर्जन की मृत्यु कैसे हुई?

लॉर्ड कर्जन की मृत्यु उसके मूत्राशय में गंभीर रक्तस्राव होने के कारण ऑपरेशन किया गया। जिसके फलस्वरूप 1925 में इसकी मृत्यु हो गई।