वायुमंडल की संरचना (Structure of Atmosphere): पृथ्वी की विभिन्न परतें, विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण तथ्य

 

वायुमंडल की संरचना (Structure of Atmosphere): पृथ्वी की विभिन्न परतें, विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण तथ्य :-

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व वायुमंडल के कारण ही संभव है। वायुमंडल हमें साँस लेने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करता है, सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से रक्षा करता है तथा पृथ्वी के तापमान को संतुलित बनाए रखता है। भूगोल तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से वायुमंडल की संरचना एवं उसकी विभिन्न परतें एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इस लेख में हम वायुमंडल की संरचना, उसकी पाँच प्रमुख परतों, उनकी विशेषताओं तथा उनसे जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को सरल भाषा में समझेंगे।

वायुमंडल क्या है?

“वायुमंडल (Atmosphere) पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए गैसों का विशाल आवरण है।” इसका विस्तार लगभग 10,000 किलोमीटर तक माना जाता है, लेकिन इसका लगभग 99 प्रतिशत भार केवल 32 किलोमीटर की ऊँचाई तक ही सीमित रहता है। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वायुमंडल पृथ्वी से जुड़ा रहता है। ऊँचाई बढ़ने पर वायु का घनत्व और वायुदाब लगातार कम होते जाते हैं।

वायुमंडल की संरचना

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वायुमंडल की प्रमुख परतें :-

वैज्ञानिकों ने वायुमंडल को मुख्य रूप से पाँच परतों में विभाजित किया है—

  • 1. क्षोभमंडल (Troposphere)
  • 2. समतापमंडल (Stratosphere)
  • 3. मध्यमंडल (Mesosphere)
  • 4. आयनमंडल (Ionosphere)
  • 5. बाह्यमंडल (Exosphere)

अब प्रत्येक परत को विस्तार से समझते हैं।

1. क्षोभमंडल (Troposphere) :-

क्षोभमंडल वायुमंडल की सबसे निचली तथा सबसे महत्वपूर्ण परत है। पृथ्वी पर होने वाली लगभग सभी मौसमी गतिविधियाँ इसी परत में होती हैं।

ऊँचाई :-                                                                                                       

  •  ध्रुवों पर लगभग 8 किलोमीटर
  • विषुवत रेखा पर लगभग 18 किलोमीटर

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • वायुमंडल का अधिकांश भार इसी परत में पाया जाता है।
  • बादल, वर्षा, आँधी, तूफान, कोहरा तथा हिमपात जैसी सभी मौसमी घटनाएँ इसी परत में होती हैं।
  • ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता जाता है।
  • औसतन प्रत्येक 1 किलोमीटर की ऊँचाई पर तापमान लगभग 6.5°C कम हो जाता है। इसे सामान्य ताप पतन दर (Normal Lapse Rate) कहा जाता है।
  • लगभग प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान में 1°C की कमी आती है।

क्षोभसीमा (Tropopause) :-

क्षोभमंडल और समतापमंडल के बीच की सीमा को क्षोभसीमा कहते हैं। इसी क्षेत्र के निकट अत्यधिक तीव्र गति से बहने वाली पवनों को जेट पवन (Jet Streams) कहा जाता है। ये पवनें मौसम तथा विमानन दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।

2. समतापमंडल (Stratosphere) :-

क्षोभमंडल के ऊपर स्थित परत को समतापमंडल कहा जाता है। यह अपेक्षाकृत शांत एवं स्थिर परत है।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • प्रारम्भिक भाग में तापमान लगभग स्थिर रहता है।
  • लगभग 20 किलोमीटर की ऊँचाई के बाद तापमान बढ़ने लगता है।
  • तापमान बढ़ने का मुख्य कारण ओजोन परत है।
  • ओजोन सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet) किरणों को अवशोषित कर लेती है, जिससे तापमान बढ़ जाता है।
  • इस परत में मौसम संबंधी हलचल बहुत कम होती है।
  • विमान उड़ाने के लिए उपयुक्त
  • समतापमंडल में वायु अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। इसलिए लंबी दूरी के कई वाणिज्यिक विमान इसी परत में उड़ान भरना पसंद करते हैं।

3. मध्यमंडल (Mesosphere) :-

समतापमंडल के ऊपर स्थित परत को मध्यमंडल कहा जाता है।

ऊँचाई- लगभग 50 से 80 किलोमीटर तक।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • इस परत में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान तेजी से घटता है।
  • इसकी ऊपरी सीमा पर तापमान लगभग –100°C तक पहुँच जाता है।
  • यह वायुमंडल का सबसे ठंडा भाग माना जाता है।
  • पृथ्वी की ओर आने वाले अधिकांश छोटे उल्कापिंड इसी परत में घर्षण के कारण जलकर नष्ट हो जाते हैं।

4. आयनमंडल (Ionosphere) :-

मध्यमंडल के ऊपर स्थित आयनमंडल लगभग 80 से 640 किलोमीटर तक फैला होता है।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • इस परत में विद्युत आवेशित कणों (आयन) की अधिकता होती है।
  • ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बढ़ता जाता है।
  • रेडियो संचार के लिए यह परत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • विभिन्न आवृत्तियों की रेडियो तरंगें इसी परत से परावर्तित होकर दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचती हैं।

आयनमंडल को कई उप-परतों में बाँटा गया है :-

D परत (D Layer) :-

  • निम्न आवृत्ति तथा दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाली रेडियो तरंगों के परावर्तन में सहायक होती है।

E परत (E Layer) :-

  • इसे केनेली-हीविसाइड (Kennelly-Heaviside) परत भी कहा जाता है।
  • मध्यम तथा उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों के परावर्तन में सहायता करती है।
  • ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाले ध्रुवीय प्रकाश (Aurora) से इसका संबंध माना जाता है।

ध्रुवीय प्रकाश दो प्रकार के होते हैं—

  • Aurora Borealis (उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश)
  • Aurora Australis (दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश)

F परत (F Layer) :-

  • इसे एपलटन (Appleton) परत भी कहा जाता है।
  • मध्यम एवं उच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों के परावर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • लंबी दूरी के रेडियो संचार में इसका विशेष महत्व है।

G परत (G Layer):-

  • यह निम्न, मध्यम तथा उच्च सभी प्रकार की रेडियो तरंगों के परावर्तन में सहायक मानी जाती है।

5. बाह्यमंडल (Exosphere):-

  • यह वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है।
  • ऊँचाई लगभग 640 से 1,000 किलोमीटर तक।

प्रमुख विशेषताएँ :-

  • यहाँ वायु अत्यंत विरल होती है।
  • विद्युत आवेशित कणों की प्रधानता बनी रहती है।
  • इस परत में क्रमशः नाइट्रोजन (N₂), ऑक्सीजन (O₂), हीलियम (He) तथा हाइड्रोजन (H₂) की अलग-अलग परतें पाई जाती हैं।
  • लगभग 1,000 किलोमीटर के बाद वायुमंडल अत्यंत विरल हो जाता है।
  • लगभग 10,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर वायुमंडल धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन हो जाता है।

वायुमंडल का महत्व :-

  • वायुमंडल पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
  • जीवों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराना।
  • सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से रक्षा करना।
  • पृथ्वी का तापमान संतुलित रखना।
  • जल चक्र को संचालित करना।
  • मौसम और जलवायु का निर्माण करना।
  • रेडियो संचार को संभव बनाना।
  • छोटे उल्कापिंडों को पृथ्वी तक पहुँचने से पहले जलाकर नष्ट करना।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य :-

  1. वायुमंडल का लगभग 99% भार 32 किलोमीटर तक सीमित है।
  2. क्षोभमंडल में सभी मौसमी घटनाएँ होती हैं।
  3. सामान्य ताप पतन दर 6.5°C प्रति किलोमीटर होती है।
  4. ओजोन परत समतापमंडल में स्थित होती है।
  5. वायुमंडल का सबसे कम तापमान मध्यमंडल में पाया जाता है।
  6. रेडियो तरंगों का परावर्तन मुख्य रूप से आयनमंडल से होता है।
  7. बाह्यमंडल वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है।
  8. जेट पवनें क्षोभसीमा के निकट बहती हैं।
  9. ध्रुवीय प्रकाश आयनमंडल से संबंधित महत्वपूर्ण घटना है।

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निष्कर्ष :-

वायुमंडल पृथ्वी की सुरक्षा कवच के समान कार्य करता है। इसकी प्रत्येक परत की अपनी अलग विशेषता और उपयोगिता है। क्षोभमंडल हमें मौसम प्रदान करता है, समतापमंडल की ओजोन परत हानिकारक किरणों से रक्षा करती है, मध्यमंडल उल्कापिंडों को नष्ट करता है, आयनमंडल रेडियो संचार को संभव बनाता है और बाह्यमंडल अंतरिक्ष की ओर संक्रमण क्षेत्र का कार्य करता है।

यदि आप भूगोल, UPSC, SSC, PCS, रेलवे, NDA, CDS, CTET, UPTET या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो वायुमंडल की संरचना एवं उसकी विभिन्न परतों का अध्ययन अवश्य करें। यह विषय परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण को समझने में भी सहायता करता है।

 

 

 

भारत की प्रमुख झीलें: भारत की मीठे, खारे और लैगून झीलों की सम्पूर्ण जानकारी

इस लेख में भारत की प्रमुख झीलें/झीलों का विस्तृत परिचय दिया गया है। भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है। यहाँ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर विशाल तटीय क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार की झीलें पाई जाती हैं। भारत की झीलें न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक हैं, बल्कि सिंचाई, मत्स्य पालन, पर्यटन, जलविद्युत उत्पादन, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, SSC, राज्य लोक सेवा आयोग, रेलवे, बैंकिंग तथा अन्य सरकारी परीक्षाओं में भारत की प्रमुख झीलों से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।

भारत की प्रमुख झीलें

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भारत की प्रमुख झीलें :-

1. वूलर झील (Wular Lake):-

वूलर झील जम्मू एवं कश्मीर में स्थित भारत की सबसे बड़ी मीठे (ताजे) जल की झील है। यह झेलम नदी पर निर्मित गोखुर (Oxbow) झील का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। यह झील कश्मीर घाटी की जल व्यवस्था तथा मत्स्य पालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. डल झील (Dal Lake):-

डल झील श्रीनगर (जम्मू एवं कश्मीर) में स्थित प्रसिद्ध हिमानी निर्मित मीठे जल की झील है। इसकी लंबाई लगभग 8 किलोमीटर तथा चौड़ाई लगभग 3 किलोमीटर है। कई स्थानों पर दलदल होने के कारण इसकी गहराई अपेक्षाकृत कम है। शिकारे और हाउसबोट इस झील की प्रमुख पहचान हैं।

3. सांभर झील (Sambhar Lake) :-

राजस्थान के जयपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित सांभर झील भारत की सबसे बड़ी अंतःस्थलीय खारे जल की झील है। यह देश में नमक उत्पादन का प्रमुख केंद्र है तथा भारत की नमक आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

4. देबर झील (Jaisamand Lake) :-

राजस्थान के उदयपुर में स्थित देबर झील मीठे जल की प्रसिद्ध झील है। इसे भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील माना जाता है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में उदयपुर के राजा द्वारा कराया गया था। यह अपने विशाल जलाशय और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है।

5. लोकटक झील (Loktak Lake) :-

मणिपुर में स्थित लोकटक झील उत्तर-पूर्व भारत की सबसे प्रसिद्ध मीठे पानी की झील है। यह विश्वभर में तैरती द्वीपीय झील के रूप में जानी जाती है। इस झील में स्थित केबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान विश्व का एकमात्र तैरता राष्ट्रीय उद्यान है। यहाँ तैरते हुए घास-पौधों के द्वीपों को फुमदी (Phumdi) कहा जाता है। इसी झील पर जलविद्युत परियोजना भी संचालित है।

6. चिल्का झील (Chilika Lake) :-

ओडिशा में स्थित चिल्का झील भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है। यह झींगा उत्पादन, मत्स्य पालन तथा प्रवासी पक्षियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है और देश का महत्वपूर्ण आर्द्र क्षेत्र भी है।

7. कोलेरू झील (Kolleru Lake) :-

आंध्र प्रदेश में कृष्णा और गोदावरी डेल्टा के बीच स्थित कोलेरू झील ताजे जल की प्रमुख झील है। यह अनेक प्रवासी पक्षियों का निवास स्थान है और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

8. पुलिकट झील (Pulicat Lake) :-

आंध्र प्रदेश के तट पर स्थित पुलिकट झील खारे जल की लैगून झील है। यह समुद्र से बालू की भित्ति द्वारा अलग होकर बनी है। यह भारत की महत्वपूर्ण तटीय झीलों में से एक है।

9. वेंबनाद झील (Vembanad Lake) :-

केरल तट पर स्थित वेंबनाद झील खारे जल की प्रसिद्ध लैगून झील है। इसी झील में वेलिंगटन द्वीप स्थित है, जहाँ राष्ट्रीय नौकायन प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं। भारत का सबसे छोटा राष्ट्रीय राजमार्ग NH-47A भी इसी द्वीप पर स्थित है।

10. लोनार झील (Lonar Lake) :-

महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार झील उल्कापात/ज्वालामुखीय गतिविधि से निर्मित अद्वितीय झील है। यह विश्व की दुर्लभ भू-वैज्ञानिक धरोहरों में गिनी जाती है।

11. रेणुका झील :-

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित रेणुका झील मीठे जल की झील है। यहाँ चिड़ियाघर तथा लायन सफारी भी स्थित है, जिससे यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन गई है।

12. रूपकुंड झील :-

उत्तराखण्ड के मध्य हिमालय में स्थित रूपकुंड झील प्राकृतिक मीठे जल की झील है। यह ऊँचाई पर स्थित होने के कारण पर्वतारोहियों और ट्रेकिंग प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

13. सास्थमकोट्टा झील :-

केरल के कोल्लम जिले में स्थित सास्थमकोट्टा झील राज्य की सबसे बड़ी मीठे जल की झील मानी जाती है और पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत है।

14. सातताल (सत्ता झील) :-

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित सातताल कई झीलों का समूह है। यह प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग माना जाता है तथा प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

15. सूरजताल :-

हिमाचल प्रदेश में बारालाचा दर्रे के निकट स्थित सूरजताल ताजे जल की ऊँचाई वाली झील है। यह हिमालय की प्रमुख झीलों में शामिल है।

16. तवा जलाशय (तवावोहिर झील) :-

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में नर्मदा नदी पर बाँध बनाकर इस विशाल जलाशय का निर्माण किया गया है। यह सिंचाई, मत्स्य पालन तथा जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

17. सोंगमो (छांगू) झील :-

सिक्किम के गंगटोक जिले में स्थित सोंगमो झील मीठे जल की अत्यंत सुंदर हिमालयी झील है। वर्षभर पर्यटकों का यहाँ आगमन होता है।

18. अष्टमुडी झील :-

केरल के कोल्लम जिले में स्थित अष्टमुडी झील एक लैगून (कयाल) झील है जिसकी आठ शाखाएँ हैं। इसे रामसर समझौते के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्र भूमि घोषित किया गया है।

19. भीमताल झील :-

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित भीमताल झील मीठे जल की सुंदर झील है। इसके मध्य में एक छोटा द्वीप स्थित है। यह राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का प्रमुख आकर्षण है।

20. चेम्बरमबक्कम झील :-

तमिलनाडु के चिंगलपट्टू जिले में चेन्नई से लगभग 40 किलोमीटर दक्षिण स्थित चेम्बरमबक्कम झील से अड़्यार नदी का उद्गम होता है। यह चेन्नई के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत भी है।

21. पंचभद्रा झील :-

राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित पंचभद्रा झील खारे जल की झील है। यहाँ नमक उत्पादन किया जाता है, लेकिन वर्षा की कमी तथा प्रदूषण के कारण झील का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है।

22. चो-ल्हामु झील :-

सिक्किम के उत्तरी भाग में लगभग 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित चो-ल्हामु झील भारत की सबसे ऊँचाई पर स्थित झील मानी जाती है। तीस्ता नदी का उद्गम भी इसी झील से होता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य :-

– भारत की सबसे बड़ी मीठे जल की झील — वूलर झील
– भारत की सबसे बड़ी अंतःस्थलीय खारे जल की झील — सांभर झील
– भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील — चिल्का झील
– भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील — देबर (जयसमंद) झील
– भारत की सबसे ऊँची झील — चो-ल्हामु झील
– विश्व का एकमात्र तैरता राष्ट्रीय उद्यान — केबुल लामजाओ (लोकटक झील)
– उल्कापात से निर्मित झील — लोनार झील
– आठ शाखाओं वाली झील — अष्टमुडी झील

निष्कर्ष :-

भारत की झीलें प्राकृतिक धरोहर होने के साथ-साथ देश की जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, पर्यटन, मत्स्य पालन तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। वूलर, डल, सांभर, चिल्का, लोकटक, वेंबनाद, लोनार, चो-ल्हामु और अन्य प्रमुख झीलें अपने-अपने विशिष्ट भौगोलिक एवं पारिस्थितिक महत्व के कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हैं। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो भारत की इन प्रमुख झीलों के स्थान, प्रकार तथा विशेषताओं का अध्ययन अवश्य करें।