बौद्ध धर्म के संस्थापक सिद्धार्थ थे, जिन्हें गौतम के नाम से भी जाना जाता है। यह वह समय था जब लोगों के जीवन में तेजी से परिवर्तन हो रहे थे। महाजनपदों के कुछ राजा इस समय बहुत शक्तिशाली हो गए थे। हजारों सालों के बाद फिर से नगर उभर रहे थे। गांवों के जीवन में भी बदलाव आ रहा था। बहुत से विचारक इन परिवर्तनों को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जीवन के सच्चे अर्थ को भी जानना चाह रहे थे।

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सिद्धार्थ का जन्म 566 ई.पू. में शाक्य कुल में हुआ था।
प्रो. रामशरण शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत’ कक्षा-11 में महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. बताया है।
वे कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी वन (नेपाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा के पास) में पैदा हुए थे।
उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के राजा थे। उनकी माता का नाम मायादेवी था, जो कोशल राजवंश की कन्या थीं। वह गौतम के जन्म के सात दिन बाद ही चल बसी थीं। एक जनश्रुति के अनुसार यह कहा जाता है कि एक ज्योतिषी ने यह भविष्यवाणी की थी कि गौतम या तो एक महान चक्रवर्ती सम्राट होंगे या फिर एक महान संन्यासी।
गौतम का छोटी आयु में विवाह यशोधरा नामक एक सुंदर कन्या से कर दिया। यशोधरा से गौतम को एक पुत्र राहुल, प्राप्त हुआ। किंतु गौतम, एक बार एक बूढ़े आदमी की दुर्दशा और फिर एक रोगी के कष्टों को देखकर द्रवित हो गए तथा उन्होंने एक मरे हुए आदमी को देखा तब तो वे घबरा गए। सांसारिक दुखों से दुखी होकर वे संन्यास की ओर आकर्षित हुए, फिर 29 वर्ष की आयु में एक रात को उन्होंने अपना घर-बार, पत्नी, बच्चे तथा संपूर्ण सांसारिक जीवन को छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया।
ज्ञान प्राप्ति के लिए उन्होंने बोधगया (बिहार) में एक पीपल वृक्ष के नीचे कई दिनों तक तपस्या की। अंततः 35 वर्ष की आयु में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद से वे बुद्ध के रूप में जाने गए। प्रज्ञा प्राप्त होने के बाद बुद्ध ने काशी के पास मृगवन अथवा मृगदाव (आधुनिक सारनाथ) में पदार्पण किया और वहां अपना पहला उपदेश दिया, जिसे “धर्म चक्रप्रवर्तन” (धर्म प्रचार का प्रारंभ) कहा जाता है। कुशीनारा में मृत्यु से पहले का शेष जीवन उन्होंने पैदल ही एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने और लोगों को शिक्षा देने में व्यतीत किया।
जीवन के सिद्धांत एवं दर्शन :-
जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्वाण यानी शांति और परमानंद की स्थिति प्राप्त करना है। जिसका अर्थ है- जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।
कुछ स्थलों पर बुद्ध ने इस संपूर्ण प्रक्रिया को इन तीन शब्दों में सीमित कर दिया है-
शील (सदाचार)
समाधि (सम्यक् ध्यान)
प्रज्ञा (सम्यक् ज्ञान)
- बुद्ध के निर्वाण के दो सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
- बुद्ध के उपदेशों में प्रचारित नैतिक सिद्धांत बहुत सरल थे, जैसे- मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्णायक है, कोई देवी देवता या ईश्वर नहीं।
- सामान्य नैतिक नियमों जैसे सच बोलना, दान देना, तन-मन को शुद्ध रखना और काम क्रोधादि मनोवेगों पर नियंत्रण रखने के अतिरिक्त – बौद्ध धर्म ने प्रेम, दया, धृति (धैर्य) और सभी प्राणियों के प्रति वैचारिक, शाब्दिक और कार्मिक अहिंसा, पर बल दिया।
- बौद्ध धर्म ने मोक्ष-प्राप्ति के लिए वैदिक कर्मकांड और अनुष्ठान विधियों की प्रभावकारिता को अस्वीकार किया और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को भी नहीं माना।
बुद्ध के अनुयायी (Followers of Buddha)
बुद्ध के अनुयायी दो श्रेणियों में विभाजित हैं :
उपासक :- यानी साधारण अनुयायी जो गृहस्थ जीवन में रहते हैं,
भिक्षु (बौद्ध संन्यासी):-, जो संसार को त्याग कर संन्यासी का जीवन बिताते हैं।
भिक्षु, संघों में रहते हैं, जिनकी स्थापना प्रारंभ में स्वयं बुद्ध ने की थी।
- स्त्रियों को भी संघ में प्रवेश दिया जाता था और उन्हें भिक्षुणी कहा जाता था।
- बौद्ध धर्म में सभी अनुयायियों को समान अधिकार प्राप्त होते थे, चाहे वे किसी भी वर्ण या जाति के हों।
- ई.पू. 483 में कुशीनगर में बुद्ध का निर्वाण (निधन) हो गया। उस समय उनकी आयु 80 वर्ष की थी।
- प्रो. मक्खन लाल ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत में’ बताया है कि “ई.पू. 486 में कुशीनगर में बुद्ध का निर्वाण (निधन) हो गया उस समय उनकी आयु 80 वर्ष थी।”
(i) स्तूप (Stupa)
स्तूप:- ऐसे स्थल जहां पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियां या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।
स्तूप की संरचना:- स्तूप का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना ज़्यादा जटिल हो गई जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढांचा देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे जिस पर अक्सर एक छतरी लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।
सामाजिक एवं धार्मिक सुधार :-
- बुद्ध ने धार्मिक यज्ञ अनुष्ठानों में पशुओं की हत्या को अमानवीय बताया।
- पशुओं के प्रति इस दृष्टिकोण से शाकाहारी खान-पान को बढ़ावा मिला।
- सदाचारी जीवन बिताने का उद्देश्य मन को शुद्ध करना और निर्वाण प्राप्त करना।
- वर्ण-व्यवस्था को दिए जाने वाले महत्त्व का उन्होंने विरोध किया, क्योंकि उच्च वर्ण वाले निम्न वर्ण वालों, शूद्रों तथा दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करते थे।
विहार :- वे स्थान होते थे, जहां बौद्ध भिक्षु रहते थे और आराधना तथा धर्मोपदेश देते हुए जीवन व्यतीत करते थे। ये विहार पाठशालाओं के रूप में भी काम करते थे।
- भिक्षु जगह-जगह नए विचारों का प्रचार करते रहते थे, इसीलिए बौद्ध धर्म जल्दी ही भारत के अनेक भागों में फैल गया।
- इसने भारतीय जीवन के प्रायः सभी पक्षों को प्रभावित किया।
बौद्ध विहार, शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र बन गए। - धनी व्यापारी बौद्धों को धन दान में देते थे और सुंदर स्मारक बनवाते थे। इन्हें सर्वोत्तम शिल्पों से सजाया गया था।
- बाद में बौद्ध भिक्षु भारतीय संस्कृति को एशिया के दूसरे देशों में भी ले गए; जैसे- मध्य एशिया, चीन, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश।
- बौद्धों और जैनों ने अहिंसा के सिद्धांत को लोकप्रिय बना दिया।
बुद्ध की शिक्षाएं (Buddha’s Teachings)
बुद्ध की शिक्षाओं के आधारभूत सिद्धांत में चार आर्य-सत्य (उदात्त सच्चाइयां) समाहित हैं, अर्थात्:
1. दुःख, यानी संसार दुःखमय है;
2. दुःख समुदाय, यानी दुःख उत्पन्न करने वाले कई कारण होते हैं;
3. दुःख निरोध, यानी दुःख को रोका जा सकता है; और
4. दुःख निरोधगामिनी-प्रतिपदा, यानी दुःख को रोकने का एक मार्ग होता है।
- बुद्ध के अनुसार, लोग केवल काम (इच्छा या लालसा) के कारण दुःख पाते हैं और काम पर विजय पाना ही दुःखों से बचने का सुनिश्चित मार्ग है।
- भगवान बुद्ध के अनुसार मृत्यु भी इन दुःखों से छुटकारा नहीं दिला सकती, क्योंकि मृत्यु के बाद पुनर्जन्म के साथ ही दुःखों का अंतहीन सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।
- किंतु मनुष्य, अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करके इन दुःखों एवं कष्टों की श्रृंखला से मुक्त हो सकता है और निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर सकता है।
अष्टांगिक मार्ग (The Eightfold Path)
- सम्यक् दृष्टि
- सम्यक् संकल्प
- सम्यक् वाक्
- सम्यक् कर्मान्त
- सम्यक् आजीव
- सम्यक् व्यायाम
- सम्यक् स्मृति
- सम्यक् समाधि
बौद्ध धर्म की विशेषताएँ (Characteristics of Buddhism)
- बुद्ध ने अपनी शिक्षा सामान्य लोगों की प्राकृत भाषा में दी।
- बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता है।
- बौद्ध धर्म विशेष रूप से निम्न वर्णों का समर्थन पा सका, क्योंकि इसमें वर्ण व्यवस्था की निंदा की गई है।
- बौद्ध संघ का दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो।
- संघ में प्रवेश का अधिकार स्त्रियों को भी था, जिससे उन्हें पुरुषों की बराबरी प्राप्त होती थी। ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और अधिक जनतांत्रिक था।
- अभी भी उत्तर बिहार के लोग गंगा के दक्षिण मगध में मरना पसंद नहीं करते हैं।
- बुद्ध का व्यक्तित्व और धर्मोपदेश की प्रणाली दोनों ही बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक हुए।
कठिन स्थितियों में भी वे धीर और शांत बने रहते थे - कहा जाता है कि एक बार एक अज्ञानी व्यक्ति ने उन्हें गालियां दीं। वे चुपचाप सुनते रहे। जब उस व्यक्ति का गाली देना बंद हुआ तो उन्होंने पूछा, “वत्स, यदि कोई दान को स्वीकार नहीं करे तो उस दान का क्या होगा?” विरोधी ने उत्तर दिया, “वह देने वाले के पास ही रह जाएगा।” तब बुद्ध ने कहा, “वत्स, मैं तुम्हारी गालियां स्वीकार नहीं करता।”
बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण (Reasons for the Expansion of Buddhism)
- जनसाधारण की भाषा पालि को अपनाने से भी बौद्ध धर्म के प्रचार को बल मिला।
इससे आम जनता बौद्ध धर्म को सुगमता से समझ पाई। - गौतम बुद्ध ने संघ की स्थापना की, जिसमें हर व्यक्ति जाति या लिंग के भेद के बिना प्रवेश कर सकता था।
- भिक्षुओं के लिए एक ही शर्त थी कि उन्हें संघ के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना होगा।
बौद्ध संघ में शामिल होने के बाद इसके सदस्यों को तीन संकल्प लेने पड़ते थे-
- इंद्रियनिग्रह
- अपरिग्रह एवं
- श्रद्धा का
बौद्ध धर्म के त्रिरत्न: बुद्ध, धम्म, संघ)
संघ के तत्त्वावधान में सुगठित प्रचार की व्यवस्था होने से बुद्ध के जीवनकाल में ही बौद्ध धर्म ने तेजी से प्रगति की। मगध, कोसल और कौशाम्बी के राजाओं, अनेक गणराज्यों और वहां की जनता ने बौद्ध धर्म को अपना लिया।
बुद्ध के निर्वाण के दो सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
अशोक ने अपने धर्मदूतों के द्वारा इस धर्म को मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया और श्रीलंका में फैलाया और इसे विश्व धर्म का रूप दिया।
आज भी श्रीलंका, बर्मा और तिब्बत तथा चीन और जापान के कुछ भागों में बौद्ध धर्म प्रचलित है।
बौद्ध धर्म की चुनौतियाँ, ह्रास और परिवर्तन
हम देखते हैं कि आरंभ में प्रत्येक धर्म, सुधार की भावना से प्रेरित होता है, परंतु कालक्रमणे वह उन्हीं कर्मकांडों और अनुष्ठानों के जाल में फंस जाता है जिनकी वह आरंभ में निंदा करता है| इसमें भी ब्राह्मण धर्म की वे बुराइयां घुस गईं जिनके विरुद्ध इसने आरंभ में लड़ाई छेड़ी थी।
- बौद्ध धर्म की चुनौतियों का सामना करने के लिए ब्राह्मणों ने —
- अपने धर्म में सुधार किए,
- गोधन की रक्षा पर बल दिया,
- स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया।
- दूसरी ओर बौद्ध धर्म में विकृतियां आती गईं।
- धीरे-धीरे बौद्ध भिक्षु जनजीवन की मुख्य धारा से कटते गए।
- उन्होंने जनसामान्य की भाषा पालि को छोड़ दिया और संस्कृत को ग्रहण कर लिया जो केवल विद्वानों की भाषा थी।
- ईसा की पहली सदी से वे प्रतिमा पूजन करने लगे और बड़ी मात्रा में उपासकों से चढ़ावा भी लेने लगे।
- इस चढ़ावे के अतिरिक्त बौद्ध विहारों को राजाओं से भी प्रचुर मात्रा में दान मिलने लगे।
- इन सभी से बौद्ध भिक्षुओं का जीवन सुख का जीवन बन गया।
- नालंदा जैसे बौद्ध विहार तो दो-दो सौ गांवों से कर वसूलते थे।
- सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध विहार विलासी लोगों के प्रभुत्व में आ गए और कुकर्मों के केंद्र बन गए जिनका गौतम बुद्ध ने कड़ाई से निषेध किया था।
- बौद्ध धर्म का यह नया रूप वज्रयान नाम से प्रसिद्ध हुआ। विहारों में अपार संपत्ति और स्त्रियों का प्रवेश होने से उनकी स्थिति और भी बिगड़ी।
- बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे।
- कहा गया है कि एक समय बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा था, “यदि विहारों में स्त्रियों का प्रवेश न हुआ होता तो यह धर्म हजार वर्ष टिकता लेकिन जब स्त्रियों को प्रवेशाधिकार दे दिया गया है, तो अब यह धर्म केवल पांच सौ वर्ष टिकेगा।”
- कहा जाता है कि ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को सताया। सताए जाने के कई उदाहरण ईसा की छठी-सातवीं सदियों में मिलते हैं।
- शैव संप्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतारा।
- गौड़ देश के शिवभक्त शशांक ने बोध गया में उस बोधि वृक्ष को काट डाला जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
- विहारों में अपार संपत्ति को देखकर तुर्की हमलावरों की ललचाई नजर उन पर पड़ी।
- तुर्कों ने विहारों में अनेक बौद्धों का संहार किया यद्यपि कुछ भिक्षु जान बचाकर नेपाल और तिब्बत भाग गए।
बौद्ध धर्म के महत्त्व और प्रभाव (Importance and Influence of Buddhism)
- ब्राह्मण धर्म में गाय की पूजनीयता और अहिंसा पर जोर देने का कारण, स्पष्टतः बौद्ध धर्म के उपदेशों का प्रभाव था।
- बौद्ध धर्म ने बौद्धिक और साहित्यिक जगत में भी चेतना जगाई।
- इसने लोगों को यह सुझाया कि किसी वस्तु को यों ही नहीं, बल्कि भली-भांति गुण-दोष का विवेचन करके ग्रहण करें।
- बहुत हद तक अंधविश्वास का स्थान तर्क ने ले लिया। इससे लोगों में बुद्धिवाद पनपा।
अपने नए धर्म के सिद्धांतों का प्रतिपादन करने के लिए बौद्धों ने नए प्रकार से साहित्य सर्जना की। - उन्होंने अपने लेखन से पालि भाषा को समृद्ध किया। आरंभिक पालि साहित्य तीन कोटियों में बांटा जा सकता है:
प्रथम कोटि – बुद्ध के वचन एवं उपदेश
द्वितीय कोटि – संघ के सदस्यों द्वारा पालनीय नियम
तृतीय कोटि – धम्म का दार्शनिक विवेचन
बौद्ध ग्रंथ किस प्रकार तैयार और संरक्षित किए जाते थे?
बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया। उनकी मृत्यु के बाद (पांचवीं-चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने ‘ज्येष्ठों’ या ज्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली (बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप) में बुलाई। वहां पर ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया। इन संग्रहों को त्रिपिटक कहा जाता है। ये हैं-
1. विनय पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था। 2.सुत्त पिटक में बुद्ध की शिक्षाओं का संग्रह था।
3.अभिधम्म पिटक में दर्शन संबंधी विषयों का संग्रह था।
जब बौद्ध धर्म श्रीलंका जैसे नए इलाकों में फैला पवंशदी और महावंश जैसे क्षेत्र-विशेष के बौद्ध इतिहास को लिखा गया।
इनमें से कई रचनाओं में बुद्ध की जीवनी लिखी गयी है।
थेरीगाथा:- यह अनूठा बौद्ध ग्रंथ सुत्त पिटक का हिस्सा है। इसमें भिक्षुणियों द्वारा रचित छंदों का संकलन किया गया है। इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर-दृष्टि मिलती है।
- ईसा की प्रथम तीन सदियों में पालि और संस्कृत को मिलाकर बौद्धों ने एक नई भाषा विकसित की जिसे मिश्रित संस्कृत कहते हैं।
- बौद्धों की साहित्यिक गतिविधियां मध्ययुग में भी चलती रहीं। पूर्वी भारत की कुछ प्रख्यात अपभ्रंश कृतियां बौद्धों की देन हैं।
- बौद्ध विहार महान विद्या के केंद्र हो गए, जिन्हें आवासीय विश्वविद्यालय की संज्ञा दी जा सकती है।
- इनमें, बिहार में नालंदा और विक्रमशिला तथा गुजरात में वल्लभी उल्लेखनीय हैं।
बौद्ध कला (Buddhist Art)
भारत में पूजित पहली मानव-प्रतिमाएं शायद बुद्ध की हैं।
श्रद्धालु उपासकों ने बुद्ध के जीवन की अनेक घटनाओं को पत्थरों में उकेरा। बिहार के गया तथा मध्य प्रदेश के सांची और भरहुत में जो चित्रफलक (पैनल) मिले हैं, वे बौद्ध कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
ईसा की पहली सदी से गौतम बुद्ध की फलक-प्रतिमाएं बनने लगीं।
भिक्षुओं के निवास के लिए चट्टानों को काटकर कमरे बनाए जाने लगे और इस प्रकार, गया की बराबर पहाड़ियों में और पश्चिम भारत में नासिक के आसपास की पहाड़ियों में गुहा स्थापत्य की शुरुआत हुई।
बौद्ध कला दक्षिण में कृष्णा डेल्टा में और उत्तर में मथुरा में फूली-फली।
सांची, अमरावती, अजंता, नागार्जुन-कोण्डा तथा कार्ल में उत्कृष्ट बौद्ध कला के दर्शन होते हैं।
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