- 1945 की वेवल योजना (The Wavell Plan), क्रिप्स शिष्टमण्डल (Cripps Mission) की असफलता से सभी को निराशा हुई। कांग्रेस ने संविधान सभा की माँग के सिवाय ऐसी कोई मांग नहीं की जिससे अंग्रेजों को परेशानी होती।

- द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम स्वरूप जापान लगभग भारत द्वार पर खड़ा था। इस कठिन परिस्थिति से बचने के लिए कांग्रेस चुप नही रह सकती थी।
- और पढ़े :-चौरी चौरा कांड Chauri Chaura Kand (5 फरवरी 1922)
- गांधी जी ने अप्रैल 1942 में अंग्रेजों से “सुव्यवस्थित ढंग से भारत से चले जाने की बात कहीं।”
- इसी समय भारत छोडो का नारा प्रसिह हुआ ।
- अंग्रेजों द्वारा भारत न छोड़ने की स्थिति में महात्मा गांधी के नेतृत्व मे सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाये जाने का प्रस्ताव रखा गया।
- गांधी जी और कार्यकारिणी के सदस्यों को बंदी बना लिया गया। इसी कारण जगह–जगह विद्रोह होने लगा जिससे सैकड़ो व्यक्ति मारे गए और हजारों को जेल में बंद कर दिया गया।
- विद्रोह को समाप्त करने हेतु अक्टूबर 1943 में लार्ड लिन निथगो के स्थान पर लाई बेवल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया।
- मार्च 1945 को लाई वेवल विचार विमर्श के लिए इंग्लैण्ड गए |
- 14 जून 945 को बेवल द्वारा विचार विमर्श के परिणाम के बारे मे रेडियो के माध्यम से जनता को अवगत कराया गया ।
- जब तक नया संविधान न बने तब तक वायसराय की कार्यकारिणी के पुनर्गठन का प्रस्ताव रखा गया। इस कार्यकारिणी में गवर्नर जनरल व मुख्य सेनापति के अतिरिक्त सभी सदस्य भारतीय नेताओं में से चुने जाएंगे |
- परिषद में मुसलमान और सवर्ण हिन्दूओं की संख्या बराबर–बराबर होगी |
- गवर्नर जनरल का निषेधाधिकार (Veto) समाप्त नही किया जाएगा लेकिन उसका प्रयोग करना आवश्यक नही होगा।
- विदेशी मामले भारतियों को सौंप दिए जाएंगे लेकिन जनजातीय एवं सीमाई मामले छोडकर क्योंकि यह रक्षा विभाग के का भाग माने जाएंगे |
- कार्यकारिणी की नियुक्ति के लिए एक सभा बुलाई जाएगी जिसमे सर्वसम्मति से सूची प्रस्तुत की जा सके ।
- जिन प्रांतो में मंत्रि परिषद भंग हो गई तथा गवर्नर अपने पार्षदों की सहायता से कार्य कर रहे थे। वहो भी मिली मुली सरकारें बनाई जाऐगी।
- द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन को, निर्णायक जीत हासिल होती है, तो भारत के लिए नये संविधान निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी।
- कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों को जेल से रिहा कर दिया गया तथा शिमला सम्मेलन मे शामिल होने का निमंत्रण दिया गया इससे जनता में एक आशा की किरण जाग्रत हुई।
- शिमला सम्मेलन 25 जून 1945 को प्रारंभ हुआ और तीन दिन की कार्यवाही के बाद स्थगित कर दिया गया ।
- 11 जुलाई 1945 को जिन्ना, लार्ड वेवल से मिलें जिसमें उन्होंने मुस्लिम लीग को ही समस्त मुसलमानों का प्रतिनिधि माना जाए और वायसराय की सूची में मुस्लिम लीग के बाहर के किसी भी मुसलमान को शामिल न किया जाए।
- जिन्ना की इस शर्त को वेबल ने अस्वीकार कर दिया। और शिमला सम्मेलन को असफल घोषित कर समाप्त करने की घोषणा की।
इतिहास
रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System)
रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System) के अनुसार प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी माना गया था ।और राज्य सरकार को भूमि कर देने के लिए उत्तरदायी था। उसे अपनी भूमि को किराये पर देना, गिरवी रखने तथा बेचने को अनुमति थी। भूमि स्वामी को उस समय तक भूमि से वंचित नहीं किया जा सकता था जब तक वह भूमि कर समय से देता रहे ।
और पढ़े :-छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)
मद्रास की व्यवस्था –
मद्रास प्रेजीडेन्सी में प्रथम भूमि व्यवस्था बारामहल जिला प्राप्त करने के पश्चात 1792 में की गई। कैप्टिन रीड ने टॉमस मुनरो की सहायता से खेत की अनुमानित आय का लगभग आधा भाग भूमि कर के रूप में निश्चित किया। यह कर भूमि को किराये पर लेने में जो कर देना पड़ता उससे भी अधिक था। यही व्यवस्थ अन्य भागों में भी लागू कर दी गई।
टॉमस मुनरो तथा मद्रास भूव्यवस्था –
टॉमस मुनरो जो मद्रास के 1820 से 1827 तक गवर्नर रहा ,इसने पुरानी कर व्यवस्था को अनुचित बताया।इसने कुल उपज का तीसरा भाग भूमि कर का आधार मान कर रैयतवाड़ी पद्धति को, स्थाई भूमि व्यवस्था के प्रदेशों को छोड़ कर, बाकी सभी प्रान्त में लागू कर दिया। कर की देनदारी से देखा जाय तो यह भी किराये पर लेने में जो कर देना पड़ता उससे भी अधिक ही था। दूसरे, भूमि कर क्योंकि धन के रूप में देना पड़ता था तथा इसका वास्तविक उपज अथवा मंडी में प्रचलित भावों से कोई सम्बन्ध नहीं था, इसलिए किसानो पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया।
मुनरो की भूमि कर व्यवस्था लगभग 30 वर्ष तक चलती रही तथा इसी से उत्पीड़न बड़ा तथा कृषकों की कठिनाइयो में वृद्धि हुई । कृषक लोग भूमि कर देने के लिए साहूकारों के जाल में फंस गए। भूमि कर संग्रहण करने के प्रबंध बहुत कड़े थे और इसके लिए प्रायः यातनाएं दी जाती थीं।
अंग्रेजी संसद में इन यातनाओं के विषय में प्रश्न पूछे गए। इन यातनाओं में भूखों मारना, शौच आदि के लिए न जाने देना, मनुष्यों को कुबड़े बना कर बांध देना, घुटनों के पीछे ईंट रख कर बैठा देना, अस्थियों तथा अन्य अपमानजनक वस्तुओं के हार डाल इत्यादि सम्मिलित थे।
1855 में कुल उपज का 30 प्रतिशत के आधार पर विस्तृत सर्वेक्षण तथा भू–व्यवस्था को योजना लागू की गई। वास्तविक कार्य 1861 में आरम्भ हुआ। 1864 के नियमों के अनुसार राज्य सरकार का भाग भू –भाटक का 50 प्रतिशत निश्चित किया गया परन्तु यह नियम केवल कागजी काभूर्यवाही ही रहा तथा प्रशासन का अंग नहीं बना। 1877-78 के भीषण अकाल में ही मद्रासी कृषकों की वास्तविक स्थिति सामने आई।
बम्बई में भूमि कर व्यवस्था –
यहां रैयतवाड़ी पद्धति लागू की गई जिससे ज़मींदार अथवा ग्राम सभाएं उनके लाभ को स्वयं न हड़प कर जाएं।
एल्फिन्सटन तथा चैप्लिन की रिपोर्ट –
एल्फिन्सटन 1819-27 तक बम्बई के गवर्नर थे। उन्होंने 1819 में पेशवा से विजय किए प्रदेशों पर एक विस्तार रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने मराठा प्रशासन की दो मुख्य बातों की ओर ध्यान दिलाया। (1) ग्राम सभाओं का स्थानीय प्रशासन की इकाई के रूप में अस्तित्व‘ (2) मिरास भू–धृति पद्धति का अस्तित्व (मिरासदार वंशानुगत भूमिदार कृषक होते थे जो स्वयं अपनी भूमि जोतते थे तथा राज्य सरकार को निश्चित भूमि कर देते थे)।
चैप्लिन जो उस समय आयुक्त था, ने 1821 तथा 1822 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उसने भूमि कर की पुरानी पद्धति का वर्णन किया तथा कुछ मूल्यवान सुझाव दिए ।
प्रिंगल ने 1824-28 तक भूमि का भली भांति सर्वेक्षण किया तथा राज्य का भाग शुद्ध (net) उपज का 55 प्रतिशत निश्चित किया। दुर्भाग्यवश अधिकतर सर्वेक्षण दोषपूर्ण थे तथा उपज के अनुमान ठीक नहीं थे। फलस्वरूप भूमि कर अधिक निश्चित किया गया तथा कृषकों को बहुत दुःख हुआ। बहुत से कृषकों ने भूमि जोतनी बंद कर दी तथा बहुत सा क्षेत्र बंजर हो गया।
विगनेट का सर्वेक्षण तथा बम्बई में रैयतवाड़ी भूव्यवस्था –
1835 में लैफ्टिनेन्ट विनगेट जो इंजिनियरिंग कोर के पदाधिकारी थे, उन्हें भूमि सर्वेक्षण का अधीक्षक नियुक्त किया गया। उन्होंने 1847 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस पर ई गो.ल्डस्मिट, कैप्टिन डेविडसन तथा कैप्टिन विगनेट के हस्ताक्षर थे।
मुख्य रूप से ज़िले के भूमि कर की मांग उस जिले के इतिहास तथा उस जिले के लोगों की अवस्था अर्थात जनता की देने की शक्ति पर निर्भर थी। तत्पश्चात समस्त जिले की मांग को व्यक्तिगत खेतों पर बांटा गया।
प्राचीन समानता पर आधारित पद्धति के स्थान पर मांग भूमि की भूगर्भ (geological) अवस्था पर निर्धारित की गई। इसके अतिरिक्त कर भूखण्डों पर निश्चित किया गया न कि उस कृषक की समस्त भूमि पर जिससे कोई भी कृषक जिस खेत को चाहे छोड़ सकता था और जिस खेत को चाहे जोत सकता था । यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई । परन्तु यह भी अधिकतर अनुमानों पर आधारित थी और यह कठोरता की ओर ही झुकी थी ।
पुनः भू–व्यवस्था (re–settlement) का कार्य 30 वर्ष के पश्चात 1868 में किया गया। अमेरिका के गृहयुद्ध (18 61-65)के कारण कपास के मूल्य बहुत बढ़ गए। इस अस्थाई अभिवृद्धि के कारण सर्वेक्षण अधिकारियों को भूमि कर 66 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक बढ़ाने का अवसर मिल गया। कृषकों को न्यायालय में अपील करने का अधिकार नहीं था ।
इस कठोरता के कारण दक्कन में 1875 में कृषि उपद्रव हुए जिससे प्रेरित होकर सरकार ने 1879 में दक्कन राहत अधिनियम (Deccan Agriculturists Relief Act 1879) पारित किया जिससे कृषकों को साहूकारों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया गया परन्तु सब कष्टों के मूल अर्थात सरकार की अधिक भूमि कर की मांग के विषय कुछ नहीं किया गया ।
बम्बई में रैयतवाड़ी पद्धति के दो प्रमुख दोष थे – अत्यधिक भूमि कर तथा उसकी अनिश्चितता। इसमें अधिक भूमि कर के लिए न्यायालय में अपील करने की अनुमति नहीं थी। कलक्टर को अधिकार था कि वह कृषक को भविष्य के लिए भूमि कर की दर बता दे और यह भी कह दे कि यदि उसे यह नई दर स्वीकार नहीं तो वह भूमि छोड़ दे।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का छिन्न–भिन्न होना (Disintegration of Village Economy)—
– ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भूमि कर पद्धतियों का, विशेषकर अत्यधिक कर तथा नवीन प्रशासनिक तथा न्यायिक प्रणाली का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था अस्त–व्यस्त हो गई।
ग्राम पंचायतों के मुख्य कार्य, भूमि व्यवस्था, तथा न्यायिक कार्य समाप्त हो चुके थे तथा पाटिल अब केवल सरकार की ओर से भूमि कर संग्रहकर्ता ही रह गया था। इस प्रकार ग्रामों की प्राचीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी। भारतीय कुटीर उद्योग लगभग समाप्त हो चुके थे तथा ग्रामों में भूमि का महत्व बढ़ गया।
इस नई भू-व्यवस्था से भूमि तथा कृषक दोनों ही चलनशील (mobile) हो गए, जिसके फलस्वरूप ग्रामों में साहूकार तथा अन्यत्रवासी भूमिपति landlords) उत्पन्न हो गए।
उन्नीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवादी विचारकों का बार–बार यही कहना था कि सरकार की भू–राजस्व की मांग रैयतवाड़ी तथा ज़मींदारी व्यवस्था, दोनों में अत्यधिक है। भू–राजस्व समय पर न देने की अवस्था में सरकार ज़मींदारों तथा रैयतवाड़ों की भूमि ज़ब्त कर लेती थी और इसे पुनः नगरवासी व्यापारियों तथा सट्टेबाज़ों को बेच देती थी।
ये नए लोग जो प्राय: खेतिहर नहीं होते थे, केवल अधिकाधिक किराए की ही चिन्ता करते थे और स्वयं भी प्रायः
किराया–सट्टेबाजों (rent speculators) को ही भूमि किराया संग्रह करने का कार्य – भार सौंप देते थे ।
समाज में ज़मींदार तथा साहूकार जिनकी ग्राम निवासियों को अब अधिक आवश्यकता होने लगी थी, बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए। अब ग्रामीण श्रमिक वर्ग (proletariate) जिसमें छोटे–छोटे किसान, मुज़ारे तथा भूमिहीन किसान सम्मिलित थे, उनकी संख्या बढ़ गई।
सहकारिता के स्थान पर आपसी प्रतिद्वन्द्विता तथा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा पूंजीवाद के पूर्वाकांक्षित तत्व उत्पन्न हो गए। अब उत्पादन के नए साधन जिनमें धन की आवश्यकता होती थी, मुद्रा अर्थव्यवस्था (money economy) कृषि का वाणिज्यीकरण,
संचार व्यवस्था में सुधार तथा विश्व की मण्डियों के साथ सम्पर्क, इन सभी तत्वों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तथा भारतीय कृषि को एक नया रूप दे दिया।
गांधी-इरविन समझौता
गांधी-इरविन समझौता, 25 जनवरी 1931 को गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य सभी प्रमुख नेता बिना शर्त कारावास से रिहा कर दिये गये । कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने गांधीजी को वायसराय से चर्चा करने के लिये अधिकृत किया। तत्पश्चात 19 फरवरी 1931 को गांधीजी ने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन से भेंट की और उनकी बातचीत पंद्रह दिनों तक चली।
इसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे ‘गांधी-इरविन समझौता’ कहा जाता है। इस समझौते ने कांग्रेस की स्थिति को सरकार के बराबर कर दिया । इस समझौते में सरकार की ओर से लार्ड इरविन इस बात पर सहमत हुए कि-

- हिंसात्मक अपराधियों के अतिरिक्त सभी राजनैतिक कैदी छोड़ दिये जायेंगे । अपहरण की सम्पत्ति वापस कर दी जायेगी ।
- विभिन्न प्रकार के जुर्मानों की वसूली को स्थगित कर दिया जायेगा ।
- सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र दे चुके भारतीयों के मसले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार–विमर्श किया जायेगा ।
- समुद्र तट की एक निश्चित सीमा के भीतर नमक तैयार करने की अनुमति दी जायेगी ।
- मदिरा, अफीम और विदेशी वस्तओं की दुकानों के सम्मुख शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की आज्ञा दी जायेगी ।
- आपातकालीन अध्यादेशों को वापस ले लिया जायेगा ।
किन्तु वायसराय ने गांधीजी की निम्न दो मांगे अस्वीकार कर दीं –
(i) पुलिस ज्यादतियों की जांच करायी जाये, तथा
(ii) भगत सिंह तथा उनके साथियों की फांसी की सजा माफ कर दी जाये ।
कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने आश्वासन दिया कि- (i) सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया जायेगा, तथा
(ii) कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में इस शर्त पर भाग लेगी कि सम्मेलन में संवैधानिक प्रश्नों के मुद्दे पर विचार करते समय परिसंघ, भारतीय उत्तरदायित्व तथा भारतीय हितों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिये अपरिहार्य मुद्दों पर विचार किया जायेगा । (इसके अंतर्गत रक्षा, विदेशी मामले, अल्पसख्यकों की स्थिति तथा भारत की वित्तीय साख जैसे मुद्दे शामिल होंगे) ।
कामागाटा मारू प्रकरण (1914)
कामागाटा मारू प्रकरण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस घटना ने पंजाब विद्रोह को विस्फोटक स्थिति मे पहुचाने का कार्य किया था।

और पढ़े :-भूदान आंदोलन| Bhoodan Aandolan (18 अप्रैल 1951)
पंजाब के एक क्रांतिकारी बाबा गुरदत्त सिंह ने कामागारा मारु जलपान जापान से किराए पर लिया। इसमे 35। पंजाबी सिक्खो और 21 मुसलमानो को सिंगापुर से बैकूबर (कनाडा) ले जाने का प्रयत्न किया गया।
इन लोगो का मानना था कि वह कनाडा मे रहकर सुखमय जीवन व्यतीत करेगे तथा बाद मे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे अपना योगदान देगें ।
कनाड़ा सरकार सरकार ने आंतरिक सुरक्षा कारणो से जहाज पर सवार यात्रियो को बंदरगाह पर उतरने की अनुमति नही दी।
कामागाटा मारु जलयान को मजबूरन लौटना पड़ा और 27 सितम्बर 1914 को पुन: कलकत्ता बंदरगाह पर लौट आया।
जहाज के यात्रियों को पूर्ण विश्वास था कनाडा सरकार ने ब्रिटिश सरकार के दबाव मे जहाज को वापस कर दिया गया ।
कलकत्ता पहुंचते ही गुरदत्त सिंह को गिरफ्तार करने का प्रयास किया गया लेकिन वह भागने मे सफल करने रहे।
गुरुदत्त सिंह के अलावा अन्य यात्रियों को पंजाब भेजने के लिए जबरन ट्रेन पर की बैठाने का प्रयास किया गया। लेकिन थाकियों ने बैठने से मना कर दिया।
यात्रियों के विरोध करने से पुलिस और यात्रियों के बीच संघर्ष हुआ जिसमें 22 लोग मारे गए। शेष बचे यात्रियों को विशेष ट्रेन से पंजाब भेज दिया गया|
पंजाब पहुचकर इन लोगों द्वारा अनेक डकैतियों को अंजाम दिया गया ।
कामागाटा मारु घटना और प्रथम विश्व युद्ध शुरुआत होने से गदर दल के नेता अत्याधिक उत्तेजित हो गए जिसके फलस्वरूप इनके द्वारा अग्रेजो पर हिंसक आक्रमण करने की योजनाएं बनायी गई |
भारतीय गदर दल के नेताओं ने विदेशों में रह रहे भारतीय कांतिकारियों से आग्रह किया कि वह भारत में जाकर ब्रिटिश सरकार से संघर्ष करें।
छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680 ई.)
छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म उस समय हुआ जब भारत में मुगल सत्ता अपने चरम पर थी। मुगल बादशाह औरंगजेब हिन्दू धर्म को अपनी तलवार की दम पर समाप्त करना चाहता था। इस समय अधिकांश राजे-महाराजे दिल्ली दरबार मे सिजदा कर रहे थे। या अपनी रियासतों की रक्षा के लिए मुगल बादशाह की गुलामी स्वीकार कर चुके थे। इसी समय मात्र 12 वर्ष की उम्र में पिता से प्राप्त पूना की जागीर से छत्रपति शिवाजी महाराज ने माँ जीजाबाई और अपने गुरु एवं संरक्षक दादाजी कोणदेव की देखरेख/संरक्षण में मुगलों से हिन्दू धर्म की रक्षा करना एक मुख्य उद्देश्य बना लिया था।
और पढ़े :-महात्मा गाँधी (1869-1948) |पुस्तकें|संस्थाये|आन्दोलन |राजनितिक गुरु
छत्रपति शिवाजी का प्रारंभिक जीवन :-
20 अप्रैल 1627 ई0 में शिवाजी का जन्म महाराष्ट्र के पूना के उत्तर दिशा
मे स्थित जुन्नाव नगर के निकट शिवनेर के दुर्ग में हुआ था ।
शिवाजी जो कि बाद मे छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनके पिता का नाम शाह जी भोसले और माता जीजा बाई थी।
जीजाबाई देवगिरि के यादवराज परिवार के महान जागीर दार यादव राय की पुत्री थी ।
शाह जी भोसले अहमदनगर और बीजापुर के राजनैतिक संघर्ष में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। जिससे यह शक्तिशाली और सम्मानित सामन्त थे ।
शाहजी भोसले द्वारा तुकाबाई मोहिते नामक स्त्री से दूसरी शादी की परिणाम स्वरूप जीजाबाई अपने पुत्रा शिवाजी को लेकर पति से अलग रहने लगी ।
शिवाजी बचपन में ही पिता से अलग हो गए लेकिन पिता भोसले र्ने इनकी देखभाल व शिक्षा के लिए बफादार सेवक दादाजी कोंणदेव को नियुक्त कर दिया था।
शिवाजी को पिता शाह जी भोसलें से 12 वर्ष की उम्र में पूजा की जागीर प्राप्त हुई।
12 वर्ष की अल्पायु में शिवाजी का विवाह साईबाई निम्बालकर सें कर दिया गया।
शिवाजी पर उनकी माता जीजाबाई का प्रभाव अधिक था वह स्वभाव से बड़ी धार्मिक थी। इसलिए शिवाजी के चरित्र निर्माण मे धार्मिक रुचि पैदा करने हेतु रामायण, महाभारत तथा अन्य प्राचीन काल के हिन्दू वीरो की कहानियां सुनाया करती थी।
माता जीजाबाई द्वारा शिवाजी से हिन्दुओं की तीन परम पवित्र वस्तुओं ब्राह्मण, गौ, और जाति की रक्षा के लिए प्रेरित किया गया।
शिवाजी के जीवन संघर्ष का एक मुख्य उद्देश्य एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना करना था। क्योंकि यह किसी मुसलमान शासक के जागीरदार बनकर जीवन व्यतीत करना नही चाहते थे। इस कट्टरता के कारण शिवाजी का मतभेद अपने संरक्षक दादाजी कोणदेव से था।
शिवाजी का मुगल सत्ता को समाप्त करने का उद्देश्य न होकर एक स्वतंक राज्य की स्थापना’ करना था। इसलिए वह मराठी की बिखरी शक्ति को संगठित करके महाराष्ट्र में एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहते थे।
छत्रपति शिवाजी के विजय अभियान (conquests):-
1647 ई में शिवाजी के संरक्षक कोंणदेव की मृत्यु के पहले इनके संरक्षण में पूना के आस पास के किलो को जीत लिया गया। हांलाकि इस कार्य से कोंणदेव सहमत नहीं थे।
20 वर्ष की उम्र में छत्रपति शिवाजी ने अनेक साहसी और योग्य मराठा सरदारों को एकत्रित कर लिया था। जिसमे तुकोजी और नरायन पन्त थे । तथा इनके पिता शाहजी भोसले द्वारा 1639 ई में श्यामजी, नीलकण्ठ, सोनाजी पन्त, बालकृष्ण दीक्षित और रघुनाथ राव बल्लाल जैसे योग्य व्यक्तियों को भेजा गया ।
1643 ई0 में बीजापुर के सिंहगढ़ किले को शिवाजी द्वारा जीत लिया गया। तथा कुछ समय बाद चाकन, पुरन्दर, बारामती तोर्ना , खूपा, तिकोना, लोहगढ़, रायरी आदि किलो पर अधिकार कर लिया गया |
शिवाजी द्वारा 1648 में नीलोजी नीलकण्ठ से पुरन्दर का किला छल द्वारा विजित किया गया।
छत्रपति शिवाजी की जावली विजय:-
25 जनवरी 1656 ई. में शिवाजी और मराठा सरदार चन्द्रराव के मध्य जावली का युद्ध हुआ । इस युद्ध मे चन्द्रराव की शिवाजी द्वारा हत्या कर दी गई।
छत्रपति शिवाजी द्वारा अप्रैल 1656 ई. मे रायगढ़ को अपनी राजधानी
बनाया गया।
छत्रपति शिवाजी का पहली बार मुगलो से सामना:-
1657 ई. में मुगल शाहजादा औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण किया। बीजापुर के शासक आदिलशाह ने शिवाजी से सहायता मांगी।
दक्षिण में मुगलो की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए शिवाजी
ने बीजापुर की सहायता की। तथा मुगल सेना पर आक्रमण कर
परेशान किया था और जुन्नार को लूट लिया।
कालांतर में बीजापुर द्वारा मुगलों से संधि कर ली गई तब शिवाजी ने भी आक्रमण करना बंद कर दिया।
छत्रपति शिवाजी और अफजल खाँ :-
बीजापुर के शासक आदिल शाह द्वारा मुगलों से संधि करके उनके आक्रमण के भय से मुक्त हो गया । तथा छत्रपति शिवाजी की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए तत्पर हो गया।
1659 ई. में बीजापुर राज्य ने शिवाजी को कैद करने या मार डालने के लिए सरदार अफजल खाँ को 10,000 घुडसवार तथा तोप खाने के साथ भेजा। शिवाजी को भयभीत करने के लिए अफजल खाँ गाँव- गांव उजाड़ दिये तथा मन्दिरों को तोपो से तोड़ दिया गया।
अफजल खां द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में युद्ध करना कठिन देखकर कूटनीति से विजय करने के उद्देश्य से अपने दूत कृष्णा जी भास्कर को शिवाजी के पास भेजा और मिलने की इच्छा प्रकट की |
कृष्णाजी भास्कर ने शिवाजी को यह संदेश दिया कि वह बीजापुर का अधिपत्य स्वीकार कर ले तो आदिलशाह क्षमा के साथ साथ उसका राज्य भी बना रहेगा।
कृष्णा जी भास्कर एक हिन्दू था । शिवाजी द्वारा उसे धर्म की दुहाई देकर उसके मन की बात जानने का प्रयास किया। जिसके फलस्वरूप अफजल खा की नियत कुछ ठीक नहीं का अनुमान शिवाजी को हो गया था।
प्रतापगढ़ के निकट अफजल खाँ और शिवाजी की मुलाकात होना निश्चित हुआ। दोनो केवल दो – दो अंगरक्षकों के साथ आयेगें। तथा शिवाजी को बिना अस्त्र शस्त्र आना था। लेकिन शिवाजी द्वारा बघनख, लोहे की टोपी,कटार आदि छुपाकर धारण की गई।
अफजल खाँ के साथ प्रख्यात तलवार बाज सैयद बाँदा था। शिवाजी का दूत गोपीनाथ था ।
2 नवम्बर 1659 ई. प्रतापगढ़ के वार नामक स्थान पर अफजल खाँ द्वारा शिवाजी पर तलवार से प्रहार किया लेकिन बड़ी चालाकी से शिवाजी द्वारा अफजल खाँ की हत्या कर दी गई।
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अफजल खाँ की हत्या के बाद उसके रक्षक सैयद बाँदा ने प्रहार किया लेकिन जीवमहल शिवाजी के रक्षक द्वारा उसका हाथ काट दिया गया।
मराठा सेना द्वारा बीजापुर की सेना पर भयंकर आक्रमण किया और उसे परास्त किया।
छत्रपति शिवाजी और शाइस्ता खाँ :-
1660 ई मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा शाइस्ता खाँ को दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसने बीजापुर से मिलकर शिवाजी को समाप्त करने की योजना बनाई । वह कुछ हद तक सफल रहे क्योंकि शिवाजी को पूना, चाकन और कल्याण से हाथ धोना पड़ा।
15 अप्रैल 1663 ई. शिवाजी 400 सैनिको के साथ बारात के रूप में पूना मे घुस गए तथा अचानक आक्रमण कर दिया इस आक्रमण से भयभीत होकर शाइस्ताखां भाग खड़ा हुआ। लेकिन शिवाजी द्वारा इसका एक अंगूठा काटने में सफलता मिली।
छत्रपति शिवाजी और राजा जयसिंह :-
1665 ई में औरंगजेब ने राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । राजा जयसिंह एक योग्यतम् सेनापति और कूटनीतिज्ञ था। वह फारसी, उर्दू, तुर्की, राजस्थानी भाषा का ज्ञाता था।
शाहजहाँ के शासन काल में राजा जयसिंह द्वारा सैकड़ो युद्ध में भाग लिया गया। तथा उनमें जीत हासिल की।
शिवाजी के विरुद्ध अभियान के समय राजा जयसिंह की उम्र 60 वर्ष होते हुए भी उसे इस अभियान की बागड़ोर सौपी गई।
जयसिंह द्वारा कूटनीति के द्वारा , बीजापुर, मराठा सरदार (जो सरदार शिवाजी से नफरत रखते थे) यूरोपीय शक्तियों को शिवाजी के पक्ष मे जाने से रोकने में सफलता प्राप्त की।
जयसिंह द्वारा कूटनीतिक मजबूती के साथ आक्रमण किया गया। वज्रगढ़ पर विजय के बाद शिवाजी को पुरन्दर के किले में घेर लिया। मजबूरन शिवाजी को आत्मसमर्पण करना पड़ा ।
छत्रपति शिवाजी और राजा जयसिंह के मध्य पुरन्दर की संधि :-
शिवाजी बिना किसी शर्त के राजा जयसिंह से मिलने गए। और दोनों के मध्य 22 जून 1665 ई. मे पुरंदर की संधि की गई |
इस संधि मे 23 किले और 4 लाख हूण की वार्षिक आय की भूमि शिवाजी द्वारा मुगलो को देना स्वीकार किया गया।
शिवाजी के पास अब 12 किले और एक लाख हूण की वार्षिक आय की जमीन रह गयी 1
इस संधि में शिवाजी ने स्वयं न जाकर अपने पुत्र शम्भाजी को लगभग 5000 घुडसवारों के साथ मुगलो की सेवा मे भेजना स्वीकार किया।
शिवाजी द्वारा मुगलो का अधिपत्य स्वीकार कर लिया और बीजापुर के विरुद्ध मुगलो को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया।
कुछ समय पश्चात शिवाजी द्वारा एक शर्त के अनुसार, कोंकण और बालाघाट की भूमि के बदले मुगलो को 13 वर्षो मे 40 लाख
हूण देना स्वीकार किया।
1666 में शिवाजी मुगल प्रदेश की सुबेदारी और सीढ़ियों से जंजीरा
का टापू प्राप्त हो जाने के लालच में औरंगजेब से मिलने आगरा जाना स्वीकार किया।
शिवाजी और औरंगजेब की मुलाकात कराने हेतु जयसिंह ने अपने पुत्र रामसिंह को नियुक्त किया।
9 मई 1666 ई० को शिवाजी अपने पुत्र शम्भाजी और 4000
मराठा सैनिकों के साथ आगरा पहुंचें।
औरंगजेब द्वारा शिवाजी के साथ उचित व्यवहार नही किया गया। जिससे शिवाजी ने अपना अपमान समझा और बीमारी का बहाना करके बादशाह से मिलने से इनकार कर दिया।
शिवाजी को रामसिंह की देख रेख मे जयपुर भवन में नजरबन्द कर लिया गया।
छत्रपति शिवाजी द्वारा अपने सौतेले भाई हीरो जी को अपना कड़ा पहनाकर अपने विस्तर पर लिटाकर स्वयं व पुत्र शम्भाजी मिठाई के खाली टोकरों में बैठकर भागने में सफल हुए ।
1670 ई. में शिवाजी ने मुगलों से पुनः युद्ध करना आरम्भ कर दिया। कुछ ही वर्षो में मुगलों और बीजापुर से अनेक किले तथा भू-भाग जीतने मे सफलता प्राप्त की।
नानाजी द्वारा कोंगना के किले को जीत लिया गया जिसे शिवाजी द्वारा सिंहगढ़ का नाम दिया।
13 अक्टूबर 1670 को दिलेर खाँ और शाहजादा मुअज्जम के झगड़े का लाभ उठाकर शिवाजी ने सूरत का बन्दरगाह दोबारा लूट लिया।
शिवाजी द्वारा अब तक पुरंदर , कल्याण, माहुली, सलहेर, मुल्हेर, पन्हाला, पार्ली और सतारा आदि किलो को जीत के साथ-साथ जवाहरनगर और रामनगर को जीत लिया गया।
16 जून 1674 ई. में काशी के प्रसिद्ध विद्वान श्री गंगा भट्ट के द्वारा शिवाजी का राज्याभिषेक कराया गया। छत्रपति की उपाधि धारण की और रायगढ़ को राजधानी बनाया।
राज्याभिषेक के 12 दिन पश्चात शिवाजी की माता जीजाबाई की मृत्यु हो गई।
शिवाजी के भाई व्यंकोजी ने शिवाजी का अधिपत्य स्वीकार कर शासन करते रहें।
वर्षो युद्ध करके शिवाजी द्वारा कोंकण प्रदेश पर अधिकार कर लिया गया लेकिन जंजीरा के टापू और सीदियों को अपने अधिकार मे लेने में असफल रहे।
14 अप्रैल 1680 ई. को 53 वर्ष की आयु में छत्रपति शिवाजी की बीमारी के
कारण मृत्यु हो गई |
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महालवाड़ी पद्धति (Mahalwari System) क्या थी |
महालवाड़ी पद्धति (The Mahalwari System) में भूमि कर की इकाई ग्राम अथवा महल (जागीर का एक भाग) होता था।
महालवाड़ी पद्धति में कृषक के खेत से कोई सरोकार नही होता था |

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भूमि समस्त ग्राम सभा की सम्मिलित रूप से होती थी, जिसको भागीदारों का समूह (body of co-sharers) कहते थे।
सभी किसान सम्मिलित रूप से भूमि कर देने के लिए जिम्मेदार होते थे, यद्यपि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी होता था ।
किसान जब किसी कारण से अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था। यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।
उत्तर-पश्चिमी प्रान्त तथा अवध (यू. पी.) में भूमि कर व्यवस्था –
समय-समय पर अंग्रेज़ों के अधीन रहा उत्तर–पश्चिमी प्रान्त तथा अवध जिसे आजकल उत्तर प्रदेश कहते हैं | 1801 में अवध के नवाब ने इलाहाबाद तथा उसके आसपास के प्रदेश कम्पनी को सौप दिए ,जिन्हें अभ्यर्पित जिले (ceded districts) कहते थे।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात कम्पनी ने यमुना तथा गंगा के मध्य का प्रदेश विजय कर लिया। इन जिलों को विजित (conquered) प्रान्त कहते थे।
अन्तिम आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) के पश्चात लार्ड हेस्टिंग्ज़ ने उत्तरी भारत में और अधिक क्षेत्र प्राप्त कर लिए।
अभ्यर्पित प्रदेश के प्रथम लेफ्टिनेन्ट गवर्नर हेनरी वैल्ज़ली ने ज़मींदारों तथा कृषकों से ही सीधे भूमि कर लेना प्रारम्भ किया तथा यह मांग नवाबों की मांग से प्रथम वर्ष में ही 20 लाख रुपया अधिक थी।
तीन वर्ष के अन्तराल में दस लाख रुपया वार्षिक और बढ़ा दिया गया। इस बसूली को इतनी कढाई से लागू किया गया जो भारतीय इतिहास में पहले कभी नही हुआ था |
नवाब के अनुसार जिस वर्ष उपज अच्छी नही होती थी, करो की मांग में शिथिलता बरती जाती थी |
1822 के रेग्यूलेशन (Regulations of 1822 ) –
आयुक्तों के बोर्ड (Board of Commissioners) के सचिव होल्ट मैकेन्ज़ी ने 1819 के पत्र में उत्तरी भारत में ग्राम समाजों की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा यह सुझाव दिया था कि भूमि का सर्वेक्षण किया जाए, भूमि में लोगों के अधिकारों का लेखा तैयार किया जाए, प्रत्येक ग्राम अथवा महल से कितना भूमि कर लेना है, यह निश्चित किया जाए तथा प्रत्येक ग्राम से भूमि कर प्रधान अथवा लम्बरदार द्वारा संग्रह करने की व्यवस्था की जाए ।
1822 के रेग्यूलेशन – 7 (Regulation-VII) द्वारा इस सुझाव को कानूनी रूप दे दिया गया। भूमि कर भूभाटक (Land Rent) (अर्थात जमीदार को भूमि के उपयोग के बदले दिया जाने वाला नियमित किराया ) का 30 प्रतिशत निश्चित किया गया जो ज़मींदारों को देना पड़ता था ।
वे प्रदेश जहां ज़मींदार नहीं होते थे तथा भूमि ग्राम समाज की सम्मिलित रूप से होती थी, भूमि कर भूभाटक का 95 प्रतिशत निश्चित किया गया। सरकार की मांग अत्यधिक होने के कारण तथा संग्रहण में अत्यधिक दृढ़ता होने के कारण यह व्यवस्था छिन्न–भिन्न हो गई।
1833 का रेग्यूलेशन नौ तथा मार्टिन बर्ड की भूमि कर व्यवस्था –
विलियम बैंटिंक की सरकार ने 1822 की योजना की पूर्ण रूपेण समीक्षा की तथा इस परिणाम पर पहुंची कि इस योजना से लोगों को बहुत कठिनाई हुई है तथा यह अपनी कठोरता के कारण ही टूट गई है। बहुत सोच–विचार के पश्चात् 1833 के रेग्यूलेशन पारित किए गए जिसके द्वारा भूमि की उपज तथा भूभाटक का अनुमान लगाने की पद्धति सरल बना दी गई। भिन्न–भिन्न प्रकार की भूमि के लिए भिन्न–भिन्न औसत भाटक निश्चित किया गया। प्रथम बार खेतों के मानचित्रों तथा पंजियों (registers) का प्रयोग किया गया।
यह नई योजना मार्टिन बर्ड की देखरेख में लागू की गई। उन्हें उत्तरी भारत में भूमि कर व्यवस्था का प्रवर्तक (Father of Land Settlements in Northern India) के नाम से स्मरण किया जाता है। इसके अनुसार एक भाग की भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था जिसमें खेतों की परिधियां निश्चित की जाती थीं और बंजर तथा उपजाऊ भूमि स्पष्ट की जाती थी। इसके पश्चात समस्त भाग का और फिर समस्त ग्राम का भूमि कर निश्चित किया जाता था। प्रत्येक ग्राम अथवा महल के अधिकारियों को स्थानीय आवश्यकता के अनुसार समायोजन (adjustment) करने का अधिकार होता था। भाटक का 66 प्रतिशत भाग राज्य सरकार का भाग निश्चित किया गया और यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई ।
इस योजना के अन्तर्गत भूमि व्यवस्था का कार्य 1833 में आरम्भ किया गया ।तथा लेफ्टिनेन्ट – गवर्नर जेम्ज़ टॉमसन (1843- 1853) के कार्यकाल में समाप्त किया गया।
परन्तु भाटक 66 प्रतिशत भूमि कर के रूप में प्राप्त करना भी बहुत अधिक था तथा चल नहीं सका । इसलिए लार्ड डलहौज़ी ने इसका पुनरीक्षण कर 1855 में सहारनपुर नियम के अनुसार 50 प्रतिशत भाग का सुझाव दिया। दुर्भाग्यवश भूव्यवस्था अधिकारियों ने इस नियम को स्थगित करने का प्रयत्न किया । उन्होंने इस 50 प्रतिशत के अर्थ प्रदेश के भाटक के ‘वास्तविक भाटक’ (actual rental) के स्थान पर ‘सम्भावित तथा शक्य’ (prospective and potential) भाटक लिया जिसके फलस्वरूप कृषक की अवस्था और भी बुरी हो गई जिस कारण इन में से बहुत से लोग 1857 के विद्रोह में सम्मिलित हो गए।
Haldighati Ka Yuddh|हल्दी घाटी का युद्ध कब हुआ|18 जून 1576
हल्दी घाटी का युद्ध (Haldighati Ka Yuddh) 18 जून 1576 ई० को महाराणा प्रताप व मुगल शासक अकबर द्वारा मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व मे भेजी गई सेना के मध्य हुआ। मेवाड़ की सेना का नेतृत्व सरदार राणा पुंजा कर रहे थे।
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युद्ध का कारण :-
मेवाड़ के सिसोदिया – वंश ने मुगल सत्ता का हमेशा विरोध किया तथा यह लोग आमेर के कछवाह राजवंश को हेय दृष्टि से देखते थे।क्योंकि इन्होंने अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध बनाये थे।
मेवाड गुजरात और उत्तर भारत के मार्ग मे स्थित था। इसलिए गुजरात को जीतने के लिए मेवाड़ पर विजय आवश्यक थी।
मेवाड़ के शासक राणा उदयसिहं के समय 1567 में अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण किया । इसमें सरदारों के परामर्श से राणा उदयसिंह, जयमल को किले की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपकर जंगलों में चला गया।
जयमल ने मुगल सेना को किले मे लगभग 5 माह घुसने नही दिया। लेकिन किले की दीवार की मरम्मत कराते समय अकबर ने बंदूक से गोली मारकर उसे घायल कर दिया अंततः जयमल की मृत्यु हो गई ।
जयमल की मृत्यु के बाद रात को महिलाओ, ‘जौहर’ किया गया तथा प्रात: फतहसिंह (फत्ता) और उसकी माँ और पत्नी के नेतृत्व में मुगल सेना पर आक्रमण किया गया। सभी वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन युद्ध में यह सभी मारे गए।
अकबर ने चित्तौड़ के किले में घुसकर राजपूतो को मारने का आदेश दिया |जिससे हजारो राजपूतो का कत्ल कर दिया गया। जो कि अकबर के शासन पर एक काला धब्बा साबित हुआ।
अकबर द्वारा आगरा के किले के द्वार पर जयमल और फतहसिंह की बहादुरी को देखते हुए, इनकी हाथी पर बैठी मूर्तियो बनवाई। अकबर द्वारा ऑसफ खाँ को चित्तौड़ किले का किलेदार बनाकर स्वयं आगरा चला आया ।
मुगलों द्वारा 1568 तक मेवाड़ की राजधानी तथा चित्तौड़ के किले पर अधिकार कर लिया गया। लेकिन फिर भी राणा उदयसिंह ने मेवाड़ के अधिकांश भू-भाग पर अधिकार बनाये रखने में सफलता प्राप्त की।
चित्तौड़ में स्थित महामाता मंदिर से विशाल झाड़फानूस अकबर द्वारा चित्तौड़ विजय के प्रतीक के रूप आगरा लाया गया। और इसी विजय के फलस्वरूप अकबर द्वारा फतहनामा जारी किया गया।
1572 ई. में राणा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र राणा प्रताप गद्दी पर बैठा । राणा प्रताप द्वारा सिंहासन पर बैठते ही शपथ ली गई कि वह जब तक राजधानी को स्वतन्त्र नही करा लेगा तब तक वह थाली में खाना नही खायेगा और न तो विस्तर पर लेटेगा। प्रताप ने जीवन पर्यन्त अपनी शपथ का पालन किया ।
अकबर द्वारा मानसिंह की मध्यस्ता में प्रताप से समझौते के कई प्रयास किये गए। लेकिन सभी असफल रहे। समझौते हेतु एक बार राजा मानसिंह महाराणा प्रताप से उदय सागर झील के किनारे मिलना चाहता था। इस अवसर पर प्रताप द्वारा विशाल भोज का आयोजन कराया गया लेकिन स्वयं अनुपस्थित
रहा।
राजा मानसिंह ने प्रताप के न आने के उपलक्ष्य में कहा कि यदि राणा मेरे साथ भोजन नही करेगा तो कौन करेगा । इस पर राणा द्वारा यह कहकर असमर्थता व्यक्त की गई कि जिस व्यक्ति ने अपनी बहन का विवाह मुसलमान से किया हो उसके साथ वह भोजन नही कर सकता।
राजा मानसिंह इस अपमान के विरोध में थाली छोड़कर चल दिया और कहा कि आपके सम्मान हेतु हमने अपनी बहन बेटियो का विवाह तुर्को के साथ किया लेकिन मैं अब तुम्हारा घमण्ड़ चूर- चूर कर के ही मानूंगा । प्रतिउत्तर में राणा द्वारा कहा गया कि मुझे हर समय आपसे लड़ने में बड़ी प्रसन्नता होगी।
महाराणा प्रताप द्वारा अपने वंश परम्परा की पवित्रता बनाये रखने के लिए उसने अपनी किसी भी कन्या का विवाह मुगलो से नही किया। भले ही उसका सर्वस्व दांव पर लग गया।
अकबर को महाराणा प्रताप द्वारा किये गए वर्ताव से क्रोध आया और उसने प्रताप का घमण्ड़ तोड़ने हेतु आक्रमण का आदेश दिया।
अकबर द्वारा राजा मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी गई। 18 जून 1576 ई. में महाराणा प्रताप और मुगल सेना का युद्ध हल्दीघाटी के स्थान पर हुआ। इस युद्ध में महाराणा की थोड़ी सेना ने मुगलो की विशाल सेना में उथल-पुथल मचा दी । राणा की सेना वीरता से लड़ी लेकिन घायल राणा प्रताप मुगल सेना से घिर गया।
राणा को घिरा देखकर सरदार झाला ने राणा प्रताप का मुकुट स्वयं उतार कर पहन लिया। अवसर पाकर राणा पहाडियों में भाग गया। हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार हुई। मुगल सेना’ थकान के कारण राणा का पीछा न कर सकी। युद्ध के अगले दिन मुगल सेना गोलकुंडा पहुंची। इस तरह मुगलों को पूर्ण विजय प्राप्त हुई ।
इस विजय के बाद अकबर ने मानसिंह को वापस बुला लिया। लेकिन अकबर द्वारा समय-समय पर सरदारों को भेजकर मेवाड़ से युद्ध करता रहा। महाराणा प्रताप परिवार के साथ भूखे जंगलों में छिपकर रहता रहा, लेकिन मुगलों की अधीनता नहीं स्वीकार की और अंत तक संघर्ष करता रहा।
1597 में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई। इस समय राणा द्वारा मेवाड़ के अधिकांश भूभाग पर अधिकार कर लिया गया था।
Sanyasi Vidroh| सन्यासी विद्रोह (1770-1820)
ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 की महान क्रांति से पहले भी शासन के विरुद्ध, अनेक नागरिक विद्रोह हुए।

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सन्यासी विद्रोह (Sanyasi Vidroh) जो सामान्यतः नवीन करो का भारी बोझ, जनजातियों की भूमि का अधिग्रहण, किसानों की भूमि हड़पना, ऋणदाताओं का अत्याधिक शोषण, ब्रिटिश वस्तुओं की भरमार, अत्यधिक करों में वृद्धि |
हथकरघा और दस्तकारी उद्योगो का विनाश, भारतीयों के साथ अपमान जनक व्यवहार, पुजारियों, पादरियों, पंडितो तथा धार्मिक कर्मकाण्डो में दखल देना।
इन्ही कारणों से भारतीय नागरिको में विद्रोह की भावना पनपी अंतत: जनविद्रोह के रूप में सन्यासी विद्रोह (1770-1820) की घटना घटित हुई :-
– यह विद्रोह 1770 में प्रारंभ हुआ और 1820 तक चलता रहा।
– तीर्थ यात्रियों के तीर्थ स्थानों की यात्रा पर प्रतिबंध लगाना विद्रोह का प्रमुख कारण रहा।
– 1770 में बंगाल में भयंकर अकाल के कारण नागरिको में असंतोष तथा सशस्त्र विद्रोह के मार्ग पर चल पडे ।
– सन्यासी विद्रोह का वर्णन “वन्देमातरम” के रचयिता “बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय” ने अपने उपन्यास “आनन्द मठ” में किया।
– सन्यासी विद्रोह को फकीर विद्रोह भी कहा जाता है क्योंकि हिंदू और
मुसलमानो की समान भूमिका रही ।
– इस विद्रोह के प्रमुख नेता :- मजनूम शाह, चिराग अली, मूसा शाह, भवानी पाठक तथा देवी चौधरानी आदि थे।
जैन धर्म| Jain Dharm| 24 तीर्थंकर| संस्थापक| सिद्धांत| मान्यताये
जैन धर्म :-
जैन धर्म के अन्य नाम- कुरूचक, यापनीय, श्वेतपट, निर्ग्रन्थ
संस्थापक – महावीर स्वामी

जैन धर्म में जैन शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है विजेता (जितेन्द्रिय) । जैन महात्माओं को निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) तथा जैन संस्थापकों को तीर्थंकर कहा गया । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। ऋषभदेव और अरिष्टनेम का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए जिनमें प्रथम 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। जैन धर्म में शलाका पुरूष (महान पुरूष) की कल्पना की गई है।
ऋषभनाथ (आदिनाथ) :-
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं और उन्हें जैन धर्म का संस्थापक भी माना जाता है। वे इस युग (अवसर्पिणी काल) के पहले तीर्थंकर हैं, जिन्होंने मानवता को धर्म, नैतिकता, और सामाजिक व्यवस्था का मार्ग दिखाया।
– ऋषभनाथ (आदिनाथ के रूप में भी जाना जाता है, अर्थात् “प्रथम स्वामी”)
– प्रतीक- (लांछन) बैल
– जन्म स्थान-अयोध्या (विनिता नगरी)
– माता-पिता– राजा नाभिराय और रानी मरुदेवी
– निर्वाण स्थान– कैलाश पर्वत (आज का अस्टापद)
– जीवनकाल-बहुत प्राचीन, लाखों वर्ष पहले (जैन कालगणना के अनुसार)
– ऋषभनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनके पिता नाभिराय और माता मरुदेवी थीं।
– जैन ग्रंथों के अनुसार, उस समय मानव समाज प्रारंभिक अवस्था में था, और लोग प्रकृति पर निर्भर थे।
– ऋषभनाथ ने एक राजा के रूप में शासन किया और समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
– उन्होंने कृषि, शिल्प, व्यापार, और लेखन जैसी कलाओं की शुरुआत की, जिसके कारण उन्हें “आदिनाथ” कहा गया।
– उन्होंने 72 कलाओं (जैसे खेती, शस्त्र विद्या, और कला) और 64 स्त्री कलाओं की शिक्षा दी।
– उन्होंने समाज को वर्ण व्यवस्था (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में संगठित किया, जो उस समय सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक थी।
– राजपाट और सांसारिक जीवन त्यागकर ऋषभनाथ ने कठोर तपस्या की।
– उन्होंने केवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त किया और तीर्थंकर बने।
– जैन परंपरा के अनुसार, उन्होंने एक वर्ष तक मौन तप किया और भोजन-जल ग्रहण नहीं किया। अंततः राजा श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस (इक्षुरस) अर्पित किया, जिससे उनका पारणा (उपवास तोड़ना) हुआ। यह घटना आखुर मिहिरा उत्सव के रूप में जैन धर्म में मनाई जाती है।
– ऋषभनाथ ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह जैसे जैन सिद्धांतों का प्रचार किया।
– उन्होंने लोगों को आत्म-शुद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
– उनके दो पुत्र थे: भरत (जिनके नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा) और बाहुबली (जिन्हें जैन धर्म में पहला सिद्ध माना जाता है)।
– उनकी दो पुत्रियाँ थीं: ब्रह्मी (जिन्होंने लिपि की रचना की) और सुंदरी (जिन्होंने गणित की शिक्षा दी)।
– ऋषभनाथ ने कैलाश पर्वत (अष्टापद) पर निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ उनकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में पहुँची।
– ऋषभनाथ को जैन धर्म में केवल एक तीर्थंकर ही नहीं, बल्कि सभ्यता के निर्माता के रूप में भी देखा जाता है।
– उनके जीवन और शिक्षाओं का उल्लेख जैन ग्रंथों जैसे आदिपुराण और भागवत पुराण (हिंदू ग्रंथ) में भी मिलता है।
– उनके प्रतीक “बैल” को शक्ति, स्थिरता, और धर्म का प्रतीक माना जाता है।
– जैन मंदिरों में उनकी मूर्तियाँ आमतौर पर ध्यानमुद्रा में होती हैं, जो शांति और आत्मसंयम को दर्शाती हैं।
– पालीताना (गुजरात) यहाँ शत्रुंजय पर्वत पर ऋषभनाथ का प्रमुख मंदिर है।
– आदिनाथ मंदिर, अयोध्या उनके जन्मस्थान से जुड़ा तीर्थ।
– कैलाश पर्वत पर उनका निर्वाण स्थल।
–
– जैन परंपरा के अनुसार, ऋषभनाथ का जीवन लाखों वर्ष पहले हुआ था, जब मानव जीवन बहुत लंबा और प्रकृति-आधारित था।
– उनके पुत्र भरत और बाहुबली की कहानी (विशेष रूप से बाहुबली का तप और मोक्ष प्राप्ति) जैन धर्म में बहुत प्रसिद्ध है।
– श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में बाहुबली की विशाल मूर्ति ऋषभनाथ के पुत्र से प्रेरित है।
| क्रम संख्या | तीर्थंकर का नाम | प्रतीक चिन्ह | जन्म स्थान |
|---|---|---|---|
| 1 | ऋषभनाथ (आदिनाथ) | वृषभ | |
| 2 | अजित नाथ | गज | अयोध्या |
| 3 | संभव नाथ | घोड़ा (अश्व ) | श्रावस्ती |
| 4 | अभिन्दन नाथ | बंदर (कपि ) | |
| 5 | सुमित नाथ | बगुला या चकवा (क्रौच ) | |
| 6 | पद्मनाभ प्रभु | कमल (पदम् ) | |
| 7 | सुपार्श्वनाथ | साथिया (स्वास्तिक ) | |
| 8 | चन्द्र प्रभु | चन्द्रमा | चन्द्र पुरी |
| 9 | पुष्प दन्त | मगरमच्छ (मकर ) | |
| 10 | शीतल नाथ | कल्प वृक्ष (श्रीवत्स ) | |
| 11 | श्रेयांस नाथ | गैंडा | |
| 12 | वाशुपुज्य (पूज्यनाथ ) | भैसा (महिष ) | |
| 13 | विमल नाथ | सूअर (वाराह ) | |
| 14 | अनत नाथ | श्येन | |
| 15 | धर्म नाथ | वज्र | |
| 16 | शांति नाथ | हिरण (मृग ) | हस्तिनापुर |
| 17 | कुंथुनाथ | बकरी (अज ) | |
| 18 | अरनाथ | मछली (मीन ) | |
| 19 | मल्लिनाथ | कलश | |
| 20 | मुनिसुव्रत | कछुआ (कुर्म ) | राजगृह |
| 21 | नमिनाथ | नीला कमल ( नीलोत्पल ) | |
| 22 | नेमिनाथ (अरिष्टनेमि ) | शंख | सौरिपुर |
| 23 | पार्श्व नाथ | सर्प | काशी (वाराणासी ) |
| 24 | महावीर | सिंह | कुंडग्राम (बिहार ) |
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अजितनाथ :-
जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर हैं। वे आध्यात्मिक मार्गदर्शक और जैन धर्म के सिद्धांतों के प्रचारक माने जाते हैं। इनका जीवन और शिक्षाएँ जैन धर्म में शांति, संयम, और अहिंसा के महत्व को दर्शाती हैं।
– नाम- अजितनाथ (अजित अर्थात् “अजेय” या “विजेता”)
– प्रतीक (लांछन)- हाथी
– जन्म स्थान- अयोध्या (विनिता नगरी)
– पिता- राजा जितशत्रु
– माता- रानी विजया देवी
– निर्वाण स्थान- सम्मेद शिखर (झारखंड)
– अजितनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में अयोध्या में हुआ था। उनके पिता राजा जितशत्रु और माता विजया देवी थीं।
– जैन ग्रंथों के अनुसार, उनके जन्म के समय शुभ संकेतों और आध्यात्मिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जो उनके तीर्थंकर होने का संकेत देता है।
– अजितनाथ ने प्रारंभ में राजा के रूप में शासन किया और अपने राज्य में धर्म, न्याय, और शांति की स्थापना की।
– सांसारिक सुखों को त्यागकर उन्होंने वैराग्य का मार्ग अपनाया और कठोर तपस्या की।
– लंबी तपस्या के बाद अजितनाथ ने कैवल्य (ज्ञान) प्राप्त किया।
– इनके द्वारा जैन धर्म के पंच महाव्रत- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का प्रचार किया।
– इनके उपदेशों ने लोगों को आत्म-शुद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
– अजितनाथ ने सम्मेत पर्वत (वर्तमान झारखंड) पर निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ उनकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में पहुँची।
– हाथी शक्ति, स्थिरता, और अजेयता का प्रतीक है, जो अजितनाथ के नाम और उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है।
– वे जैन धर्म में शांति और विजय के प्रतीक माने जाते हैं।
– अजितनाथ का जीवन लोगों को यह सिखाता है कि सच्ची विजय सांसारिक इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्म-संयम से प्राप्त होती है।
– जैन ग्रंथ- जैन पुराण और त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र मे इनकी शिक्षा और उपदेशों का वर्णन किया गया है।
– दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदाय अजितनाथ को समान रूप से पूजते हैं, और उनके जीवन या प्रतीक को लेकर कोई प्रमुख मतभेद नहीं है।
– इनकी मूर्तियाँ आमतौर पर ध्यानमुद्रा में होती हैं, जो शांति और आत्म-चिंतन को दर्शाती हैं।
सैयद वंश (1414-1450 ई.)|Saiyed Vansh| संस्थापक |शासक
सैयद वंश के शासको द्वारा प्रजा को प्रभावित करने वाला कोई कार्य नहीं किया गया। उस समय के शासको की भांति साम्राज्य विस्तार की कोशिश नहीं की गई और न ही प्रशासनिक सुधारो का प्रयत्न किया गया। इसलिए सैयद शासको द्वारा ऐसा कोई कार्य नहीं किया गया जिसे प्रजा आदर्श मानती फलस्वरुप विभाजन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला। सैयद वंश का शासन काल केवल 37 वर्ष तक रहा, जो की राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के 200 मील के घेरे तक सिमट कर रह गया।
सैयद वंश के शासक :-
खिज्र खां (1414-1421 ई.):-
* खिज्र खां सैयद वंश का संस्थापक था। इसके पिता का नाम मलिक सुलेमान था। जिसे मुल्तान का सूबेदार मलिक मर्दान दौलत अपना पुत्र मानता था।
•खिज्र खां को सुल्तान फिरोज ने मुल्तान का सूबेदार नियुक्त किया था। लेकिन सारंग खां द्वारा उसे 1395 में मुल्तान से भगाने के लिए मजबूर कर दिया। फलस्वरुप खिज्र खां मेवात चला गया।
•कालांतर में खिज्र खां द्वारा तैमूर का साथ दिया गया। जब तैमूर भारत से गया उसने खिज्र खां को मुल्तान, लाहौर और दीपालपुर की सूबेदारी प्रदान की।
•सन 1414 ई. में खिज्र खां द्वारा दौलत ख़ां लोधी को पराजित कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया गया। इस प्रकार खिज्र खां दिल्ली का पहला सैयद सुल्तान बना।

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•खिज्र खां दिल्ली का सुल्तान बना, लेकिन उसने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की इसके स्थान पर उसने ” रैयत-ए-आला” की उपाधि धारण की।
•खिज्र खां एक स्वतंत्र शासक था, लेकिन वह तैमूर के पुत्र शाहरुख को निरंतर भेंटे और राजस्व पहुंचाता था। इस कारण वह अपने को शाहरुख के अधीन मानता था उसने शाहरुख के नाम से ही खुत्बा भी पढ़ाया हालांकि व्यावहारिक दृष्टि से अधीनता ऐसी कोई बात नहीं थी।
•खिज्र खां द्वारा दिल्ली पर अधिकार होने से पंजाब, मुल्तान और सिंध दिल्ली सल्तनत का हिस्सा हो गए थे।
* खिज्र खां द्वारा सीमा विस्तार पर कोई प्रयास नहीं किया गया, बल्कि उसने अपने साम्राज्य को इक्ताओं (सुबो) तथा शिको (जिलों की भांति) बांट दिया। इससे वह स्थानीय लोगों की वफादारी हासिल करने में सफल रहा।
* खिज्र खां द्वारा दिल्ली के आसपास के उपजाऊ क्षेत्र को हासिल करना तथा वहां के जागीरदारों से राजस्व वसूलने के लिए सैनिक बल का प्रयोग करना पड़ा। हालांकि इसने तुर्की अमीरों को संतुष्ट करने के लिए उनको अपनी जगीरो से वंचित नहीं किया फिर भी इनके द्वारा समय-समय पर विद्रोह किया जाता था।
*विद्रोह को दबाने हेतु सैनिक अभियान किया जाता, कुछ जमीदार स्वेच्छा से राजस्व देते लेकिन कुछ अपने किलो में बंद हो जाते जो कि पराजित होने पर ही राजस्व देते थे। इस प्रकार खिज्र खां का उद्देश्य बन गया था, कि सैनिक अभियान कर राजस्व वसूलना इतने सैनिक अभियान करने के बाद भी यह विद्रोही जागीरदारों को स्थाई रूप से समाप्त करने में असफल रहा।
* खिज्र खां के द्वारा राजस्व वसूलने के लिए कटेहर, इटावा, खोर, जलेसर, ग्वालियर, बयाना, मेवात, बदायूं आदि पर सैनिक अभियान करने पड़े।
* सैनिक अभियानों में खिज्र खां के मंत्री ताज-उल-मुल्क ने इसकी बहुत सहायता की।
* खिज्र खां का अंतिम सैनिक अभियान था। मेवात पर आक्रमण जिसमें कोटा के किले को नष्ट कर दिया गया। बाद में ग्वालियर के कुछ क्षेत्रों को लूटने तथा इटावा के राजा द्वारा आधिपत्य स्वीकार करना। तत्पश्चात दिल्ली वापस आते समय रास्ते में बीमार हो गया। जिसके कारण 20 मई 1421 को दिल्ली में खिज्र खां की मौत हो गई।
* खिज्र खां बुद्धिमान, उदार एवं न्यायप्रिय शासक होने के साथ-साथ उसका व्यक्तिगत चरित्र भी अच्छा रहा। प्रजा उससे प्रेम करती थी, इसी कारण उसकी मृत्यु पर प्रजा द्वारा काले कपड़े पहनकर शोक प्रकट किया गया।
मुबारक शाह (1421-1434 ई.) :-
•सैयद वंश के संस्थापक खिज्र खां अपने पुत्र मुबारक खां को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जो मुबारक शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा।

* यह स्वतंत्र शासक की तरह रहा, इसने खुत्बा पढ़वाया, सिक्के चलवाए, शाह की उपाधि धारण की इससे स्पष्ट होता है, कि इसने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की।
•मुबारक शाह के तीन मुख्य शत्रु थे। उत्तर पश्चिम में खोक्खर नेता जसरथ, दक्षिण में मालवा का शासक, पूर्व में जौनपुर का शासक।
* मुबारक शाह ने “मुइज्जुद्दीन मुबारक शाह” के नाम से सिक्के चलवाए।
* इसके द्वारा अपने वंश पर तैमूर वंशीय प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया गया।
* मुबारक शाह द्वारा अपने प्रशासनिक पदों पर हिंदू अमीरों को नियुक्त किया जाना ऐतिहासिक कार्य था ।
* मुबारक शाह द्वारा यमुना नदी के किनारे मुबारकाबाद नामक एक नगर की स्थापना की गई जो वर्तमान में हरियाणा राज्य में अवस्थित है।
* मुबारक शाह के शासनकाल में “याहिया सर हिंदी” द्वारा तारीख के मुबारक शाही ग्रंथ लिखा गया, जिसके द्वारा सैयद वंश के इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।
• 19 फरवरी 1434 को उसके वजीर “सरवर-उल-मुल्क” ने धोखे से मुबारक शाह की हत्या कर दी।
* वजीर सरवर-उल-मुल्क पहले मलिक स्वरूप नामक हिंदू था। परंतु बाद में धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गया।
•खिज्र खां के समय सरवर-उल-मुल्क दिल्ली का कोतवाल नियुक्त हुआ। सन् 1422 में वजीर बना।
• मुबारक शाह सरवर-उल-मुल्क को पसंद नहीं करता था, इसी कारण उसने राजस्व के अधिकार छीनकर नायाब सेनापति कमाल-उल-मुल्क को प्रदान किये ।इसी बात से असंतुष्ट होकर इसने नवीन नगर मुबारकबाद का निरीक्षण करते समय मुबारक शाह की धोखे से हत्या कर दी।
* मुबारक शाह के कार्यकाल को देखा जाए तो यह सैयद वंश के सभी शासको में योग्यतम् शासक सिद्ध हुआ।
मुहम्मद शाह (मुहम्मद-बिन- फरीद खां) :-
* मुहम्मद-बिन-फरीद खां जो कि मुबारक शाह के भाई का पुत्र (भतीजा) था। मुहम्मद शाह के नाम से गद्दी पर बैठा।
* मुहम्मद शाह एक विलासी तथा अयोग्य शासक सिद्ध हुआ, जिससे सैयद वंश के पतन की नींव पड़ी।

* वजीर सरवर-उल-मुल्क का मुहम्मद शाह के प्रारंभिक शासनकाल में पूर्ण प्रभाव रहा। इसके द्वारा मुबारक शाह की हत्या में शामिल होने वाले हिंदू सामंतों को उच्च पद प्रदान किये गए। कमाल-उल-मुल्क मुहम्मद शाह का नायब सेनापति था। यह हमेशा सैयद वंश का वफादार रहा।
* कमाल-उल-मुल्क ने एक षड्यंत्र के द्वारा वजीर सरवर-उल-मुल्क की हत्या करवा दी। इस षड्यंत्र में मुहम्मद शाह भी शामिल था।
•तलपट का युद्ध (दिल्ली से 10 मील दूर )मालवा के शासक महमूद और मुहम्मद शाह के मध्य हुआ। इस युद्ध में मुल्तान के सूबेदार बहलोल ने मुहम्मद शाह का सहयोग किया। युद्ध अनिर्णित रहा।
* मुहम्मद शाह ने बहलोल को अपना पुत्र कहा तथा सम्मान में “खान एक खाना” की उपाधि प्रदान की।
* बहलोल ने पंजाब के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया, जिसे सुल्तान द्वारा स्वीकृत प्रदान की गई। जिससे बहलोल का मनोबल बढ़ा और उसने 1443 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण कर दिया, लेकिन यह असफल रहा।
•मुहम्मद शाह एक असफल शासक सिद्ध हुआ। क्योंकि राज्य की सीमाओं की सुरक्षा न कर सका तथा आंतरिक विद्रोह दबा न सका। इसी के समय से सैयद वंश का पतन प्रारंभ हो गया। सुल्तान की मृत्यु 1445 में हो गई।
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) :-
मुहम्मद शाह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अलाउद्दीन “अलाउद्दीन आलम शाह” के नाम से गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन आलम शाह एक विलासी शासक था, वह अपने वजीर हमीद खां से झगड़ा कर बदायूं भाग गया, और वही बस गया। सैयद वंश के शासको में यह सबसे अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।

* 1447 ईस्वी में बहलोल लोदी ने पुनः दिल्ली पर आक्रमण किया, परंतु वह असफल रहा।
• 1450 तक संपूर्ण शासन बहलोल ने अपने हाथों में ले लिया, लेकिन इसने बदायूं में रह रहे अलाउद्दीन को अपदस्थ करने की कोशिश नहीं की।
1476 में अलाउद्दीन के पश्चात उसके दामाद जौनपुर के शासक हुसैन शाह शर्की ने बदायूं को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया।
* इसी प्रकार सैयद वंश अपने 37 साल के अल्प शासनकाल में समाप्त हो गया।
सैयद वंश का अंतिम शासक ?
-सैयद वंश का अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) था।
सैयद वंश का संस्थापक कौन था ?
सैयद वंश का संस्थापक खिज्र खां था।
सैयद वंश का शासन काल ?
सैयद वंश का शासन काल 1414-1450 ई. तक रहा ।
सैयद वंश के शासको के नाम ?
खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)
सैयद वंश के शासको का क्रम ?
खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)
इन्हे भी जाने :-विश्व की जनजातियां|बुशमैन|पिग्मी|मसाई|बोरो|सकाई|सेमांग|बद्दू|


