Haldighati Ka Yuddh|हल्दी घाटी का युद्ध कब हुआ|18 जून 1576

हल्दी घाटी का युद्ध (Haldighati Ka Yuddh) 18 जून 1576 ई० को महाराणा प्रताप व मुगल शासक अकबर द्वारा मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व मे भेजी गई सेना के मध्य हुआ। मेवाड़ की सेना का नेतृत्व सरदार राणा पुंजा कर रहे थे।

Haldighati Ka Yuddh|

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युद्ध का कारण :-

मेवाड़ के सिसोदिया – वंश ने मुगल सत्ता का हमेशा विरोध किया तथा यह लोग आमेर के कछवाह राजवंश को हेय दृष्टि से देखते थे।क्योंकि इन्होंने अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध बनाये थे।

मेवाड गुजरात और उत्तर भारत के मार्ग मे स्थित था। इसलिए गुजरात को जीतने के लिए मेवाड़ पर विजय आवश्यक थी।

मेवाड़ के शासक राणा उदयसिहं के समय 1567 में अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण किया । इसमें सरदारों के परामर्श से राणा उदयसिंह, जयमल को किले की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपकर जंगलों में चला गया।

जयमल ने मुगल सेना को किले मे लगभग 5 माह घुसने नही दिया। लेकिन किले की दीवार की मरम्मत कराते समय अकबर ने बंदूक से गोली मारकर उसे घायल कर दिया अंततः जयमल की मृत्यु हो गई ।

जयमल की मृत्यु के बाद रात को महिलाओ, ‘जौहर’ किया गया तथा प्रात: फतहसिंह (फत्ता) और उसकी माँ और पत्नी के नेतृत्व में मुगल सेना पर आक्रमण किया गया। सभी वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन युद्ध में यह सभी मारे गए।

अकबर ने चित्तौड़ के किले में घुसकर राजपूतो को मारने का आदेश दिया |जिससे हजारो राजपूतो का कत्ल कर दिया गया। जो कि अकबर के शासन पर एक काला धब्बा साबित हुआ।

अकबर द्वारा आगरा के किले के द्वार पर जयमल और फतहसिंह की बहादुरी को देखते हुए, इनकी हाथी पर बैठी मूर्तियो बनवाई। अकबर द्वारा ऑसफ खाँ को चित्तौड़ किले का किलेदार बनाकर स्वयं आगरा चला आया ।

मुगलों द्वारा 1568 तक मेवाड़ की राजधानी तथा चित्तौड़ के किले पर अधिकार कर लिया गया। लेकिन फिर भी राणा उदयसिंह ने मेवाड़ के अधिकांश भू-भाग पर अधिकार बनाये रखने में सफलता प्राप्त की।

चित्तौड़ में स्थित महामाता मंदिर से विशाल झाड़‌फानूस अकबर द्वारा चित्तौड़ विजय के प्रतीक के रूप आगरा लाया गया। और इसी विजय के फलस्वरूप अकबर द्वारा फतहनामा जारी किया गया।

1572 ई. में राणा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र राणा प्रताप गद्दी पर बैठा । राणा प्रताप द्वारा सिंहासन पर बैठते ही शपथ ली गई कि वह जब तक राजधानी को स्वतन्त्र नही करा लेगा तब तक वह थाली में खाना नही खायेगा और न तो विस्तर पर लेटेगा। प्रताप ने जीवन पर्यन्त अपनी शपथ का पालन किया ।

अकबर द्वारा मानसिंह की मध्यस्ता में प्रताप से समझौते के कई प्रयास किये गए। लेकिन सभी असफल रहे। समझौते हेतु एक बार राजा मानसिंह महाराणा प्रताप से उदय सागर झील के किनारे मिलना चाहता था। इस अवसर पर प्रताप द्वारा  विशाल भोज का आयोजन कराया गया लेकिन स्वयं अनुपस्थित
रहा।

राजा मानसिंह ने प्रताप के न आने के उपलक्ष्य में कहा कि यदि राणा मेरे साथ भोजन नही करेगा तो कौन करेगा । इस पर राणा द्वारा यह कहकर असमर्थता व्यक्त की गई कि जिस व्यक्ति ने अपनी बहन का विवाह मुसलमान से किया हो उसके साथ वह भोजन नही कर सकता।

राजा मानसिंह इस अपमान के विरोध में थाली छोड़कर चल दिया और कहा कि आपके सम्मान हेतु हमने अपनी बहन बेटियो का विवाह तुर्को के साथ किया लेकिन मैं अब तुम्हारा घमण्ड़ चूर- चूर कर के ही मानूंगा । प्रतिउत्तर में राणा द्वारा कहा गया कि मुझे हर समय आपसे लड़ने में बड़ी प्रसन्नता होगी।

महाराणा प्रताप द्वारा अपने वंश परम्परा की पवित्रता बनाये रखने के लिए उसने अपनी किसी भी कन्या का विवाह मुगलो से नही किया। भले ही उसका सर्वस्व दांव पर लग गया।
अकबर को महाराणा प्रताप द्वारा किये गए वर्ताव से क्रोध आया और उसने प्रताप का घमण्ड़ तोड़ने हेतु आक्रमण का आदेश दिया।

अकबर द्वारा राजा मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी गई। 18 जून 1576 ई. में महाराणा प्रताप और मुगल सेना का युद्ध हल्दीघाटी के स्थान पर हुआ। इस युद्ध में महाराणा की थोड़ी सेना ने मुगलो की विशाल सेना में उथल-पुथल मचा दी । राणा की सेना वीरता से लड़ी लेकिन घायल राणा प्रताप मुगल सेना से घिर गया।

राणा को घिरा देखकर सरदार झाला ने राणा प्रताप का मुकुट स्वयं उतार कर पहन लिया। अवसर पाकर राणा पहाडियों में भाग गया। हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार हुई। मुगल सेना’ थकान के कारण राणा का पीछा न कर सकी। युद्ध के अगले दिन मुगल सेना गोलकुंडा पहुंची। इस तरह मुगलों को पूर्ण विजय प्राप्त हुई ।
इस विजय के बाद अकबर ने मानसिंह को वापस बुला लिया। लेकिन अकबर द्वारा समय-समय पर सरदारों को भेजकर मेवाड़ से युद्ध करता रहा। महाराणा प्रताप परिवार के साथ भूखे जंगलों में छिपकर रहता रहा, लेकिन मुगलों की अधीनता नहीं स्वीकार की और अंत तक संघर्ष करता रहा।

1597 में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई। इस समय राणा द्वारा मेवाड़ के अधिकांश भूभाग पर अधिकार कर लिया गया था।

Sanyasi Vidroh| सन्यासी विद्रोह (1770-1820)

 ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 की महान क्रांति से पहले भी शासन के विरुद्ध, अनेक नागरिक विद्रोह  हुए।

Sanyasi Vidroh

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सन्यासी विद्रोह (Sanyasi Vidroh) जो सामान्यतः नवीन करो का भारी बोझ, जनजातियों की भूमि का अधिग्रहण, किसानों की भूमि हड़पना, ऋणदाताओं का अत्याधिक शोषण, ब्रिटिश वस्तुओं की भरमार, अत्यधिक करों में वृद्धि |

हथकरघा और दस्तकारी उद्योगो का विनाश, भारतीयों के साथ अपमान जनक व्यवहार, पुजारियों, पादरियों, पंडितो तथा धार्मिक कर्मकाण्डो में दखल देना।

इन्ही कारणों से भारतीय नागरिको में विद्रोह की भावना पनपी अंतत: जनविद्रोह के रूप में सन्यासी विद्रोह (1770-1820) की घटना घटित हुई  :-

– यह विद्रोह 1770 में प्रारंभ हुआ और 1820 तक चलता रहा।

– तीर्थ यात्रियों के तीर्थ स्थानों की यात्रा पर प्रतिबंध लगाना विद्रोह का प्रमुख कारण रहा।

– 1770 में बंगाल में भयंकर अकाल के कारण नागरिको में असंतोष तथा सशस्त्र विद्रोह के मार्ग पर चल पडे ।

– सन्यासी विद्रोह का वर्णन “वन्देमातरम” के रचयिता “बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय” ने अपने उपन्यास “आनन्द मठ” में किया।

– सन्यासी विद्रोह को फकीर विद्रोह भी कहा जाता है क्योंकि हिंदू और
मुसलमानो की समान भूमिका रही ।

– इस विद्रोह के प्रमुख नेता :- मजनूम शाह, चिराग अली, मूसा शाह, भवानी पाठक तथा देवी चौधरानी आदि थे।

जैन धर्म| Jain Dharm| 24 तीर्थंकर| संस्थापक| सिद्धांत| मान्यताये

जैन धर्म :-

जैन धर्म के अन्य नाम- कुरूचक, यापनीय, श्वेतपट, निर्ग्रन्थ

संस्थापक – महावीर स्वामी

जैन धर्म

जैन धर्म में जैन शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है विजेता (जितेन्द्रिय) । जैन महात्माओं को निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) तथा जैन संस्थापकों को तीर्थंकर कहा गया । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। ऋषभदेव और अरिष्टनेम का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए जिनमें प्रथम 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। जैन धर्म में शलाका पुरूष (महान पुरूष) की कल्पना की गई है।

ऋषभनाथ (आदिनाथ) :-

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं और उन्हें जैन धर्म का संस्थापक भी माना जाता है। वे इस युग (अवसर्पिणी काल) के पहले तीर्थंकर हैं, जिन्होंने मानवता को धर्म, नैतिकता, और सामाजिक व्यवस्था का मार्ग दिखाया।

– ऋषभनाथ (आदिनाथ के रूप में भी जाना जाता है, अर्थात् “प्रथम स्वामी”)
– प्रतीक- (लांछन) बैल
जन्म स्थान-अयोध्या (विनिता नगरी)
– माता-पिता– राजा नाभिराय और रानी मरुदेवी
– निर्वाण स्थान– कैलाश पर्वत (आज का अस्टापद)
– जीवनकाल-बहुत प्राचीन, लाखों वर्ष पहले (जैन कालगणना के अनुसार)

– ऋषभनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनके पिता नाभिराय और माता मरुदेवी थीं।
– जैन ग्रंथों के अनुसार, उस समय मानव समाज प्रारंभिक अवस्था में था, और लोग प्रकृति पर निर्भर थे।

– ऋषभनाथ ने एक राजा के रूप में शासन किया और समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

– उन्होंने कृषि, शिल्प, व्यापार, और लेखन जैसी कलाओं की शुरुआत की, जिसके कारण उन्हें “आदिनाथ” कहा गया।

– उन्होंने 72 कलाओं (जैसे खेती, शस्त्र विद्या, और कला) और 64 स्त्री कलाओं की शिक्षा दी।
– उन्होंने समाज को वर्ण व्यवस्था (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में संगठित किया, जो उस समय सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक थी।

– राजपाट और सांसारिक जीवन त्यागकर ऋषभनाथ ने कठोर तपस्या की।
– उन्होंने केवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त किया और तीर्थंकर बने।
– जैन परंपरा के अनुसार, उन्होंने एक वर्ष तक मौन तप किया और भोजन-जल ग्रहण नहीं किया। अंततः राजा श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस (इक्षुरस) अर्पित किया, जिससे उनका पारणा (उपवास तोड़ना) हुआ। यह घटना आखुर मिहिरा उत्सव के रूप में जैन धर्म में मनाई जाती है।

– ऋषभनाथ ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह जैसे जैन सिद्धांतों का प्रचार किया।
– उन्होंने लोगों को आत्म-शुद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

– उनके दो पुत्र थे: भरत (जिनके नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा) और बाहुबली (जिन्हें जैन धर्म में पहला सिद्ध माना जाता है)।
– उनकी दो पुत्रियाँ थीं: ब्रह्मी (जिन्होंने लिपि की रचना की) और सुंदरी (जिन्होंने गणित की शिक्षा दी)।

– ऋषभनाथ ने कैलाश पर्वत (अष्टापद) पर निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ उनकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में पहुँची।

– ऋषभनाथ को जैन धर्म में केवल एक तीर्थंकर ही नहीं, बल्कि सभ्यता के निर्माता के रूप में भी देखा जाता है।
– उनके जीवन और शिक्षाओं का उल्लेख जैन ग्रंथों जैसे आदिपुराण और भागवत पुराण (हिंदू ग्रंथ) में भी मिलता है।
– उनके प्रतीक “बैल” को शक्ति, स्थिरता, और धर्म का प्रतीक माना जाता है।
– जैन मंदिरों में उनकी मूर्तियाँ आमतौर पर ध्यानमुद्रा में होती हैं, जो शांति और आत्मसंयम को दर्शाती हैं।

पालीताना (गुजरात) यहाँ शत्रुंजय पर्वत पर ऋषभनाथ का प्रमुख मंदिर है।
आदिनाथ मंदिर, अयोध्या उनके जन्मस्थान से जुड़ा तीर्थ।
कैलाश पर्वत पर उनका निर्वाण स्थल।

– जैन परंपरा के अनुसार, ऋषभनाथ का जीवन लाखों वर्ष पहले हुआ था, जब मानव जीवन बहुत लंबा और प्रकृति-आधारित था।

– उनके पुत्र भरत और बाहुबली की कहानी (विशेष रूप से बाहुबली का तप और मोक्ष प्राप्ति) जैन धर्म में बहुत प्रसिद्ध है।

श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में बाहुबली की विशाल मूर्ति ऋषभनाथ के पुत्र से प्रेरित है।

क्रम संख्या तीर्थंकर का नाम प्रतीक चिन्ह जन्म स्थान
1ऋषभनाथ (आदिनाथ) वृषभ
2अजित नाथ गज अयोध्या
3संभव नाथघोड़ा (अश्व )श्रावस्ती
4अभिन्दन नाथबंदर (कपि )
5सुमित नाथबगुला या चकवा (क्रौच )
6पद्मनाभ प्रभुकमल (पदम् )
7सुपार्श्वनाथ साथिया (स्वास्तिक )
8चन्द्र प्रभुचन्द्रमाचन्द्र पुरी
9पुष्प दन्तमगरमच्छ (मकर )
10शीतल नाथकल्प वृक्ष (श्रीवत्स )
11श्रेयांस नाथगैंडा
12वाशुपुज्य (पूज्यनाथ )भैसा (महिष )
13विमल नाथसूअर (वाराह )
14अनत नाथ श्येन
15धर्म नाथवज्र
16शांति नाथहिरण (मृग )हस्तिनापुर
17कुंथुनाथबकरी (अज )
18अरनाथमछली (मीन )
19मल्लिनाथकलश
20मुनिसुव्रतकछुआ (कुर्म )राजगृह
21नमिनाथनीला कमल ( नीलोत्पल )
22नेमिनाथ (अरिष्टनेमि )शंखसौरिपुर
23पार्श्व नाथसर्प काशी (वाराणासी )
24महावीरसिंहकुंडग्राम (बिहार )

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अजितनाथ :-

जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर हैं। वे आध्यात्मिक मार्गदर्शक और जैन धर्म के सिद्धांतों के प्रचारक माने जाते हैं। इनका जीवन और शिक्षाएँ जैन धर्म में शांति, संयम, और अहिंसा के महत्व को दर्शाती हैं।

नाम- अजितनाथ (अजित अर्थात् “अजेय” या “विजेता”)
प्रतीक (लांछन)- हाथी
जन्म स्थान- अयोध्या (विनिता नगरी)
– पिता- राजा जितशत्रु
– माता- रानी विजया देवी
– निर्वाण स्थान- सम्मेद शिखर (झारखंड)

– अजितनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में अयोध्या में हुआ था। उनके पिता राजा जितशत्रु और माता विजया देवी थीं।

– जैन ग्रंथों के अनुसार, उनके जन्म के समय शुभ संकेतों और आध्यात्मिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जो उनके तीर्थंकर होने का संकेत देता है।

– अजितनाथ ने प्रारंभ में राजा के रूप में शासन किया और अपने राज्य में धर्म, न्याय, और शांति की स्थापना की।

– सांसारिक सुखों को त्यागकर उन्होंने वैराग्य का मार्ग अपनाया और कठोर तपस्या की।

– लंबी तपस्या के बाद अजितनाथ ने कैवल्य (ज्ञान) प्राप्त किया।

– इनके द्वारा जैन धर्म के पंच महाव्रत- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का प्रचार किया।
– इनके उपदेशों ने लोगों को आत्म-शुद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।

– अजितनाथ ने सम्मेत पर्वत (वर्तमान झारखंड) पर निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ उनकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में पहुँची।

– हाथी शक्ति, स्थिरता, और अजेयता का प्रतीक है, जो अजितनाथ के नाम और उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है।

– वे जैन धर्म में शांति और विजय के प्रतीक माने जाते हैं।

– अजितनाथ का जीवन लोगों को यह सिखाता है कि सच्ची विजय सांसारिक इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्म-संयम से प्राप्त होती है।

– जैन ग्रंथ- जैन पुराण और त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र मे इनकी शिक्षा और उपदेशों का वर्णन किया गया है।

दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदाय अजितनाथ को समान रूप से पूजते हैं, और उनके जीवन या प्रतीक को लेकर कोई प्रमुख मतभेद नहीं है।
– इनकी मूर्तियाँ आमतौर पर ध्यानमुद्रा में होती हैं, जो शांति और आत्म-चिंतन को दर्शाती हैं।

सैयद वंश (1414-1450 ई.)|Saiyed Vansh| संस्थापक |शासक

सैयद वंश के शासको द्वारा प्रजा को प्रभावित करने वाला कोई कार्य नहीं किया गया। उस समय के शासको की भांति साम्राज्य विस्तार की कोशिश नहीं की गई और न ही प्रशासनिक सुधारो का प्रयत्न  किया गया। इसलिए सैयद शासको द्वारा ऐसा कोई कार्य नहीं किया गया जिसे प्रजा आदर्श मानती फलस्वरुप विभाजन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला। सैयद वंश का शासन काल केवल 37 वर्ष तक रहा, जो की राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के 200 मील के घेरे तक सिमट कर रह गया।

सैयद वंश के शासक :-

खिज्र खां (1414-1421 ई.):-

* खिज्र खां सैयद वंश का संस्थापक था। इसके पिता का नाम मलिक सुलेमान था। जिसे मुल्तान का सूबेदार मलिक मर्दान दौलत अपना पुत्र मानता था।
•खिज्र खां को सुल्तान फिरोज ने मुल्तान का सूबेदार नियुक्त किया था। लेकिन सारंग खां द्वारा उसे 1395 में मुल्तान से भगाने के लिए मजबूर कर दिया। फलस्वरुप खिज्र खां मेवात चला गया।
•कालांतर में खिज्र खां द्वारा तैमूर का साथ दिया गया। जब तैमूर भारत से गया उसने खिज्र खां को मुल्तान, लाहौर और दीपालपुर की सूबेदारी प्रदान की।
•सन 1414 ई. में खिज्र खां द्वारा दौलत ख़ां लोधी को पराजित कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया गया। इस प्रकार खिज्र खां दिल्ली का पहला सैयद सुल्तान बना।

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•खिज्र खां दिल्ली का सुल्तान बना, लेकिन उसने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की इसके स्थान पर उसने ” रैयत-ए-आला” की उपाधि धारण की।
•खिज्र खां एक स्वतंत्र शासक था, लेकिन वह तैमूर के पुत्र शाहरुख को निरंतर भेंटे और राजस्व पहुंचाता था। इस कारण वह अपने को शाहरुख के अधीन मानता था उसने शाहरुख के नाम से ही खुत्बा भी पढ़ाया हालांकि व्यावहारिक दृष्टि से अधीनता ऐसी कोई बात नहीं थी।
•खिज्र खां द्वारा दिल्ली पर अधिकार होने से पंजाब, मुल्तान और सिंध दिल्ली सल्तनत का हिस्सा हो गए थे।
* खिज्र खां द्वारा सीमा विस्तार पर कोई प्रयास नहीं किया गया, बल्कि उसने अपने साम्राज्य को इक्ताओं (सुबो) तथा शिको (जिलों की भांति) बांट दिया। इससे वह स्थानीय लोगों की वफादारी हासिल करने में सफल रहा।
* खिज्र खां द्वारा दिल्ली के आसपास के उपजाऊ क्षेत्र को हासिल करना तथा वहां के जागीरदारों से राजस्व वसूलने के लिए सैनिक बल का प्रयोग करना पड़ा। हालांकि इसने तुर्की अमीरों को संतुष्ट करने के लिए उनको अपनी जगीरो से वंचित नहीं किया फिर भी इनके द्वारा समय-समय पर विद्रोह किया जाता था।

 *विद्रोह को दबाने हेतु सैनिक अभियान किया जाता, कुछ जमीदार स्वेच्छा से राजस्व देते लेकिन कुछ अपने किलो में बंद हो जाते जो कि पराजित होने पर ही राजस्व देते थे। इस प्रकार खिज्र खां का उद्देश्य बन गया था, कि सैनिक अभियान कर राजस्व वसूलना इतने सैनिक अभियान करने के बाद भी यह विद्रोही जागीरदारों को स्थाई रूप से समाप्त करने में असफल रहा।

* खिज्र खां के द्वारा राजस्व वसूलने के लिए कटेहर, इटावा, खोर, जलेसर, ग्वालियर, बयाना, मेवात, बदायूं आदि पर सैनिक अभियान करने पड़े।
* सैनिक अभियानों में खिज्र खां के मंत्री ताज-उल-मुल्क ने इसकी बहुत सहायता की।
* खिज्र खां का अंतिम सैनिक अभियान था। मेवात पर आक्रमण जिसमें कोटा के किले को नष्ट कर दिया गया। बाद में ग्वालियर के कुछ क्षेत्रों को लूटने तथा इटावा के राजा द्वारा आधिपत्य स्वीकार करना। तत्पश्चात दिल्ली वापस आते समय रास्ते में बीमार हो गया। जिसके कारण 20 मई 1421 को दिल्ली में खिज्र खां की मौत हो गई।
* खिज्र खां बुद्धिमान, उदार एवं न्यायप्रिय शासक होने के साथ-साथ उसका व्यक्तिगत चरित्र भी अच्छा रहा। प्रजा उससे प्रेम करती थी, इसी कारण उसकी मृत्यु पर प्रजा द्वारा काले कपड़े पहनकर शोक प्रकट किया गया।

मुबारक शाह (1421-1434 ई.) :-

•सैयद वंश के संस्थापक खिज्र खां अपने पुत्र मुबारक खां को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जो मुबारक शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा।

* यह स्वतंत्र शासक की तरह रहा, इसने खुत्बा पढ़वाया, सिक्के चलवाए, शाह की उपाधि धारण की इससे स्पष्ट होता है, कि इसने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की।
•मुबारक शाह के तीन मुख्य शत्रु थे। उत्तर पश्चिम में खोक्खर नेता जसरथ, दक्षिण में मालवा का शासक, पूर्व में जौनपुर का शासक।
* मुबारक शाह ने “मुइज्जुद्दीन मुबारक शाह” के नाम से सिक्के चलवाए।
* इसके द्वारा अपने वंश पर तैमूर वंशीय प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया गया।
* मुबारक शाह द्वारा अपने प्रशासनिक पदों पर हिंदू अमीरों को नियुक्त किया जाना ऐतिहासिक कार्य था ।
* मुबारक शाह द्वारा यमुना नदी के किनारे मुबारकाबाद नामक एक नगर की स्थापना की गई जो वर्तमान में हरियाणा राज्य में अवस्थित है।
* मुबारक शाह के शासनकाल में “याहिया सर हिंदी” द्वारा तारीख के मुबारक शाही ग्रंथ लिखा गया, जिसके द्वारा सैयद वंश के इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।
19 फरवरी 1434 को उसके वजीर “सरवर-उल-मुल्क” ने धोखे से मुबारक शाह की हत्या कर दी।
* वजीर सरवर-उल-मुल्क पहले मलिक स्वरूप नामक हिंदू था। परंतु बाद में धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गया।
•खिज्र खां के समय सरवर-उल-मुल्क दिल्ली का कोतवाल नियुक्त हुआ। सन् 1422 में वजीर बना।
• मुबारक शाह सरवर-उल-मुल्क को पसंद नहीं करता था, इसी कारण उसने राजस्व के अधिकार छीनकर नायाब सेनापति कमाल-उल-मुल्क को प्रदान किये ।इसी बात से असंतुष्ट होकर इसने नवीन नगर मुबारकबाद का निरीक्षण करते समय मुबारक शाह की धोखे से हत्या कर दी।
* मुबारक शाह के कार्यकाल को देखा जाए तो यह सैयद वंश के सभी शासको में योग्यतम् शासक सिद्ध हुआ।

मुहम्मद शाह (मुहम्मद-बिन- फरीद खां) :-

* मुहम्मद-बिन-फरीद खां जो कि मुबारक शाह के भाई का पुत्र (भतीजा) था। मुहम्मद शाह के नाम से गद्दी पर बैठा।
* मुहम्मद शाह एक विलासी तथा अयोग्य शासक सिद्ध हुआ, जिससे सैयद वंश के पतन की नींव पड़ी।

* वजीर सरवर-उल-मुल्क का मुहम्मद शाह के प्रारंभिक शासनकाल में पूर्ण प्रभाव रहा। इसके द्वारा मुबारक शाह की हत्या में शामिल होने वाले हिंदू सामंतों को उच्च पद प्रदान किये गए। कमाल-उल-मुल्क मुहम्मद शाह का नायब सेनापति था। यह हमेशा सैयद वंश का वफादार रहा।
* कमाल-उल-मुल्क ने एक षड्यंत्र के द्वारा वजीर सरवर-उल-मुल्क की हत्या करवा दी। इस षड्यंत्र में मुहम्मद शाह भी शामिल था।
तलपट का युद्ध (दिल्ली से 10 मील दूर )मालवा के शासक महमूद और मुहम्मद शाह के मध्य हुआ। इस युद्ध में मुल्तान के सूबेदार बहलोल ने मुहम्मद शाह का सहयोग किया। युद्ध अनिर्णित रहा।
* मुहम्मद शाह ने बहलोल को अपना पुत्र कहा तथा सम्मान में “खान एक खाना” की उपाधि प्रदान की।
* बहलोल ने पंजाब के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया, जिसे सुल्तान द्वारा स्वीकृत प्रदान की गई। जिससे बहलोल का मनोबल बढ़ा और उसने 1443 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण कर दिया, लेकिन यह असफल रहा।
मुहम्मद शाह एक असफल शासक सिद्ध हुआ। क्योंकि राज्य की सीमाओं की सुरक्षा न कर सका तथा आंतरिक विद्रोह दबा न सका। इसी के समय से सैयद वंश का पतन प्रारंभ हो गया। सुल्तान की मृत्यु 1445 में हो गई।

अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) :-

मुहम्मद शाह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अलाउद्दीन “अलाउद्दीन आलम शाह” के नाम से गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन आलम शाह एक विलासी शासक था, वह अपने वजीर हमीद खां से झगड़ा कर बदायूं भाग गया, और वही बस गया। सैयद वंश के शासको में यह सबसे अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।

* 1447 ईस्वी में बहलोल लोदी ने पुनः दिल्ली पर आक्रमण किया, परंतु वह असफल रहा।

• 1450 तक संपूर्ण शासन बहलोल ने अपने हाथों में ले लिया, लेकिन इसने बदायूं में रह रहे अलाउद्दीन को अपदस्थ करने की कोशिश नहीं की।
1476 में अलाउद्दीन के पश्चात उसके दामाद जौनपुर के शासक हुसैन शाह शर्की ने बदायूं को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया।
* इसी प्रकार सैयद वंश अपने 37 साल के अल्प शासनकाल में समाप्त हो गया।

सैयद वंश का अंतिम शासक ?

-सैयद वंश का अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई. तक) था।

सैयद वंश का संस्थापक कौन था ?

सैयद वंश का संस्थापक खिज्र खां था।

सैयद वंश का शासन काल ?

सैयद वंश का शासन काल 1414-1450 ई. तक रहा ।

सैयद वंश के शासको के नाम ?

खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)

सैयद वंश के शासको का क्रम ?

खिज्र खां (1414-1421 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुहम्मद शाह “मोहम्मद बिन फरीद खान” (1434-1445 ई.)
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1450 ई.)

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भूदान आंदोलन| Bhoodan Aandolan (18 अप्रैल 1951)

भूदान आंदोलन भूमि वितरण को समान बनाने तथा देश में असमान भूमि जोत गरीबी, बेकारी को मिटाने के लिए प्रसिद्ध गांधीवादी नेता आचार्य विनोबा भावे द्वारा भारत में 18 अप्रैल 1951 में शुरू किया गया, भूदान आंदोलन जिसे भूमि दान आंदोलन भी कहा जाता है।

भूदान आंदोलन

 

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यह एक सामाजिक सुधार आंदोलन था। इसका मुख्य उद्देश्य भूमिहीन किसानों को भूमि प्रदान करना और सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करना था। यह आंदोलन अपने में एक बृहद रचनात्मक कार्य था, जो महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रेरित था और अहिंसा, स्वैच्छिक दान, और सामुदायिक सहयोग पर आधारित था।

उत्पत्ति :-
आंदोलन की शुरुआत 18 अप्रैल 1951 को तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में हुई, जब विनोबा भावे ने वहां के जमींदारों से भूमिहीन किसानों के लिए जमीन दान करने की अपील की। मार्च 1956 तक इस कार्यक्रम में दान के रूप में 40 लाख एकड़ जमीन मिल गई थी यह करीब दो लाख परिवारों में बांटी गई एक जमींदार, वेदिरे रामचंद्र रेड्डी, ने 100 एकड़ जमीन दान की, जिससे आंदोलन को गति मिली।

उद्देश्य :-
इस आंदोलन के द्वारा अहिंसात्मक तरीके से भूमि वितरण की समानता तथा इसके माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना था।
* भूमिहीन किसानों और हरिजनों को जमीन प्रदान करना।
* सामाजिक समानता को बढ़ावा देना और जमींदारी व्यवस्था के प्रभाव को कम करना।
* विनोबा भावे ने सर्वोदय समाज (सभी का उत्थान) की स्थापना की।

कार्यप्रणाली :-
* विनोबा भावे ने देश भर में अपने अनुयायियों के साथ गांव-गांव पैदल यात्रा की तथा जमींदारों, धनी लोगों से स्वेच्छा से अपनी जमीन का 1/6 वाॅं हिस्सा दान करने को कहते और यह जमीन इस गांव के भूमिहीन किसानों, विशेषकर समाज के वंचित वर्गों में वितरित कर दी जाती थी।
* यह आंदोलन अहिंसक और स्वैच्छिक था। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता तथा रचनात्मकता को देखकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख जयप्रकाश नारायण और कई कांग्रेसी नेता सक्रिय राजनीति छोड़कर इस आंदोलन में जुड़ गए। इस आंदोलन की विशेषता यह रही कि, इसमें किसी पर जोर जबरदस्ती या बल का प्रयोग नहीं किया गया।

प्रभाव :-
* भूदान आंदोलन के तहत देश भर में लगभग 40 लाख एकड़ जमीन दान की गई, इस आंदोलन में बंजर तथा विवादित भूमिका का भी वितरण कर दिया गया था। जिससे किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ा।
* इस आंदोलन ने सामाजिक जागरूकता उत्पन्न की और ग्रामीण भारत में भूमि सुधार के लिए प्रोत्साहित किया।
भूदान आंदोलन की रचनात्मकता के चलते तथा जनता का उत्साह देखते हुए 1955 में उड़ीसा में एक अन्य आंदोलन ग्रामदान आंदोलन (गांवों का दान) और संपत्तिदान आंदोलन प्रारंभ किया गया।

चुनौतियां :-
* दान की गई जमीन का वितरण और प्रबंधन कुछ समय बाद निष्प्रभावी हो चुका था।
* कुछ चालक जमीदारों ने ऐसी भूमि का वितरण किया जो पहले से ही बंजर या अनुपजाऊ थी। इससे जिन भूमिहीनों को लाभ होना था उन्हें उस प्रकार का वास्तविक लाभ नहीं मिल सका।
उस समय भूमि के हस्तांतरण में अनेक प्रकार की प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं थी। जिसके कारण इस आंदोलन की गतिशीलता प्रभावित हुई ।

वर्तमान स्थिति :-
* वर्तमान समय में भूदान आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रभाव कम हो गया है, लेकिन भूदान आंदोलन ने भूमि सुधार और सामाजिक समानता के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत किया।
* यह आंदोलन वर्तमान समय में भी सामाजिक कार्यकर्ताओं और सुधारकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

निष्कर्ष :-
भूदान आंदोलन एक अनूठा प्रयोग था, जिसने भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने की कोशिश की। विनोबा भावे की अहिंसक और स्वैच्छिक दृष्टिकोण ने इसे एक ऐतिहासिक पहल बनाया, हालांकि इस आंदोलन की कुछ सीमाओं के कारण यह पूर्ण रूप से अपनी क्षमता तक नहीं पहुंच सका।

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चौरी चौरा कांड Chauri Chaura Kand (5 फरवरी 1922)

चौरी चौरा कांड,असहयोग आंदोलन के दौरान सी.आर. दास और उनकी पत्नी बसंती देवी के साथ-साथ लगभग 30,000 लोगों की गिरफ्तारी के विरोध में गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर लोगों ने शांत पूर्वक जुलूस निकालकर अपना विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चलाई। जिससे प्रदर्शनकारी उग्र हो गए ।उग्र हुए किसान आंदोलनकारियों ने थाने के थानेदार सहित 22 पुलिस कर्मियों को थाने में बंद कर आग लगा दी। जिससे सभी 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसक भीड़ का नेतृत्व किसान “भगवान दास अहीर” कर रहा था। जो की एक रिटायर्ड सैनिक था।

चौरी चौरा कांड

इस घटना से महात्मा गांधी अत्यंत दुखी हुए। गांधी जी हिंसा के घोर विरोधी थे, उनके विचार से यदि यह आंदोलन हिंसक हो गया तो उनका उद्देश्य असफल हो जाएगा। इसी कारण उन्होंने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा की |

गांधी जी के इस निर्णय से आंदोलन से जुड़े नेता आश्चर्यचकित थे, कुछ नेताओं ने इस निर्णय पर विरोध जताया और कहा कि “देश के एक गांव के कुछ लोगों की गलती का खामियाजा समूचा देश क्यों भुगते।” कुछ इतिहासकारों का मानना है, कि गांधी जी एक दूरदर्शी व्यक्ति थे, वह इस आंदोलन को वापस लेने के पीछे उनकी दूरगामी परिणामों की सोची समझी रणनीति हो सकती थी। जिसे निम्न बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:-

•गांधी जी के विचार से “कैदी नागरिक दृष्टि से मृत होते हैं” और इस आंदोलन के तहत प्रथम पंक्ति के लगभग सभी नेताओं को जेल में बंद किया जा चुका था।

•आंदोलन बिना नेताओं के नेतृत्व विहीन, उदासीन हो गया था।

•जनता में उदासीनता झलकने लगी थी, क्योंकि यह आंदोलन काफी लंबा हो गया था।

•यह आंदोलन अपने वास्तविक उद्देश्य से अलग निजी स्वार्थ की ओर अग्रसर हो रहा था।

•आंदोलन का दमन करने के लिए चौरी चौरा कांड सरकार के लिए एक बहाना मिल गया था। जिसके सहारे आंदोलन और आंदोलनकारी दोनों को नष्ट कर दिया जाता।
परिणाम स्वरुप नेताओं के विरोध/ प्रतिक्रियाओं के बाद अंततः सभी ने गांधी जी के फैसले को स्वीकार किया और असहयोग आंदोलन स्थगित हो गया। इसी समय जेल में सी.आर.दास ने कहा “समूचा देश (भारत) एक विशाल बंदी ग्रह है।”

चौरी-चौरा घटना के होने का मुख्य कारण अनाज की बढ़ती कीमतें, शराब की बिक्री का विरोध आदि। इन्हीं समस्याओं के विरोध में एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा धरना प्रदर्शन किया जा रहा था।
चौरी-चौरा घटना के बाद 225 अभियुक्त पकड़े गए। इनमें से 19 व्यक्तियों को फांसी की सजा दी गई तथा शेष अभियुक्तों को देश से निष्कासन की सजा दी गई।

गांधी जी के आंदोलन वापस लेने पर पंडित मोतीलाल नेहरू और लाला लाजपत राय द्वारा गांधी जी को पत्र लिखकर विरोध दर्ज कराया गया और कहा कि “किसी एक स्थान पर दंगे होने की सजा समस्त देशवासियों को नहीं दी जा सकती।”

सुभाष चंद्र बोस ने अपनी “पुस्तक द इंडियन स्ट्रगल (The Indian Struggle)”में लिखा कि “ऐसे अवसर पर जब जनता का उत्साह चरम पर था, पीछे लौटने का आदेश देना किसी राष्ट्रीय संकट से कम नहीं था।”

आंदोलन वापस लेने की घटना से नाराज होकर डा. मुंजे और जे.एम.सेन गुप्ता ने 1922 में दिल्ली की विजय समिति की बैठक में गांधी जी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया। आंदोलन के स्थगन के बाद गांधीजी को गिरफ्तार किया गया तथा 6 वर्ष की सजा दी गई।

प्रश्न:- चौरी चौरा कांड कब और कहां हुआ था?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के चौरी चौरा नामक स्थान पर हुआ था।
प्रश्न:- चौरी चौरा कांड का नया नाम?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड का नया नाम चौरी चौरा क्रांति कर दिया गया है।
प्रश्न:- चौरीचौरा कांड के समय भारत का वायसराय कौन था?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड के समय भारत का वायसराय अर्ल ऑफ रीडिंग (Earl Of Reading) था ।
प्रश्न:- चौरी चौरा कांड किस वर्ष हुआ?
उत्तर:- चौरी चौरा कांड 5 फरवरी 1922 को हुआ।

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 Ilbert Bill | इल्बर्ट बिल (2 फरवरी 1883) | विवाद क्या था

इल्बर्ट बिल ( Ilbert Bill ) भारतीय जजों के साथ होने वाले भेदभाव/अन्याय को दूर करने की भावना से एक विधेयक सर पी.सी. इलबर्ट द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसे “इल्बर्ट बिल” की संज्ञा दी जाती है।

इल्बर्ट बिल

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भारत में 1861 से समस्त क्षेत्र में एक समान फौजदारी कानून लागू कर दिया गया था। इसी तहत सभी प्रान्तों में उच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी।

सन 1861 से पूर्व देश में दो प्रकार के कानून थे। एक प्रेसीडेंसी नगरों के लिए अंग्रेजी कानून तथा दूसरा ग्रामीण क्षेत्रों में मुगल कानून लागू था। उस समय के नीति निर्धारकों का विचार रहा कि यूरोपीय लोगों को मुगल कानून के अंतर्गत लाना उचित नहीं। कालांतर में इसने एक प्रथा का रूप धारण किया। जिसमें प्रेसीडेंसी नगरों के भारतीय दंड नायक (मजिस्ट्रेट) तथा सेशन जज भारतीय तथा यूरोपीय दोनों व्यक्तियों के मुकदमों की सुनवाई कर सकते थे।

कहने का आशय है, कि उस समय प्रेसीडेंसी नगरों के न्यायालय में कोई भी भारतीय जज नहीं होते थे। दूसरी तरफ ग्रामीण प्रदेशों के न्यायालयों में भारतीय तथा यूरोपीय दोनों प्रकार के जज होते थे। परंतु यूरोपीय अभियुक्तों का मुकदमा केवल यूरोपीय जज ही सुनता था। यह नियम केवल फौजदारी मामलों पर लागू था। परंतु दीवानी मामलों पर ऐसा भेदभाव नहीं था।

विवाद का मुख्य कारण :-

1972 में तीन भारतीय न्यायिक सेवा में चयनित हुए तथा 1882 में उनकी पदोन्नति की गई तब वह प्रेसीडेंसी नगर कोलकाता से बाहर भेज दिए गए, जहां यूरोपीय अभियुक्तों के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था।

इसी कारण पदोन्नति हुई भारतीय जज श्री बिहारी लाल गुप्ता ने बंगाल के उप गवर्नर सर इशले ईंडन को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने अपने पदोन्नति होने पर अधिकारों में कमी होने को न्याय संगत नहीं होना बताया तथा भारतीय और यूरोपीय पदाधिकारी में तो इस भेदभाव से न्यायाधीशों की शक्तियां नष्ट होती है।
सर पी.सी. इल्बर्ट एक न्याय में विश्वास करने वाले व्यक्ति थे। अतः वह भारतीयों को न्याय दिलाने के पक्षधर थे। इस समय वायसराय की परिषद में एक विधि सदस्य थे।

इसलिए उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से 2फरवरी 1883 को विधान परिषद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। इसी विधेयक को उनके नाम पर “इल्बर्ट बिल”(Ilbert Bill) कहा गया।

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इल्बर्ट बिल का प्रमुख उद्देश्य भारतीय न्यायधीशों को यूरोपीय न्यायाधीशों के समान शक्तियां प्रदान करना था। और काले- गोरे जाति भेद पर आधारित सभी न्यायिक अयोग्यताएं समाप्त करके यूरोपीय न्यायधीशों की भांति भारतीय न्यायाधीशों को सामान शक्तियां प्रदान की जाए।

इल्बर्ट बिल का विरोध :-

इस बिल का विरोध बड़े-बड़े उद्यानों वाले यूरोपीय मालिकों द्वारा प्रमुखता से किया गया। क्योंकि इन मालिकों द्वारा भारतीय मजदूर पर बर्बरता का व्यवहार किया जाता था ।और उनसे कठोर परिश्रम कराया जाता था। यदि मजदूर कार्य करने में असमर्थता व्यक्त करता तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। कभी-कभी तो पीटते-पीटते उनकी मृत्यु तक हो जाती थी।

इस प्रकार की हत्या का मामला न्यायालय में जाता था। तो वहां यूरोपीय न्यायाधीश ही मामले की सुनवाई करते थे और उन्हें थोड़ा दंड देकर या कभी-कभी बिना दंड के ही छोड़ देते थे लेकिन जब भारतीय न्यायाधीशों के समक्ष ऐसा मामला पहुंचा तो शायद उन्हें कठोर सजा सुनाई जा सकती थी। इसलिए इन मालिकों ने इस बिल का विरोध किया।

यूरोपीय मालिकों ने इल्बर्ट बिल के विरोध हेतु एक प्रतिरक्षण संघ (Defence association) बनाया जिसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये चंदे के रूप में एकत्रित हुए। इस प्रकार उन्होंने प्रचार किया “कि क्यों हमारा निर्णय काले लोग करेंगे। क्या वे हमें जेल भेजेंगे क्या वह हम पर आज्ञा चलाएंगे यह मालिकों द्वारा मानना असंभव है” उन्होंने यहां तक कहा कि भारत में अंग्रेजी शासन समाप्त हो जाए लेकिन वह इस घृणित कानून को नहीं मानेंगे।

विरोध इतना प्रचंड था। कि कुछ यूरोपीय ने वायसराय को बंदी बनाकर इंग्लैंड भेजने की साजिश रची। गालियां दी गई तथा कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही वायसराय को वापस बुला लिया जाए इसकी मांग कर दी।

विरोध का असर इंग्लैंड में भी दिखने लगा क्योंकि लंदन के प्रसिद्ध समाचार पत्र द टाइम्स ने भी वायसराय रिपन की नीतियों की आलोचना की। महारानी विक्टोरिया ने वायसराय के इस बिल के प्रति व्यवहार पर संदेह व्यक्त किया।

अंततः रिपन को झुकना पड़ा और 26 जनवरी 1884 को नया विधेयक पारित किया गया। जिसमें नियम बनाया गया कि यदि यूरोपीय व्यक्तियों का मुकदमा सेशन जजों के समक्ष आए तो वे लोग 12 सदस्यों की पीठ की मांग कर सकते हैं। जिसमें कम से कम सात यूरोपीय//अमेरिकी जज होना अनिवार्य होगा ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार जजों की पीठ गठित करना संभव नहीं था। इसलिए यह मुकदमे हस्तांतरित करना होता था।

कुतुब मीनार(1199)|उद्देश्य|निर्माणकर्ता|स्थान|सीढ़िया

कुतुब मीनार:-

कुतुब मीनार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा कुतुब मीनार का निर्माण कराने का मकसद मुसलमानों को प्रार्थना हेतु इकट्ठा किया जा सके। लेकिन कालांतर में इसे चित्तौड़ और मांडू में बनी मीनारों के परिपेक्ष में देखा जाने लगा तथा इसे विजय की मीनार माना जाने लगा। कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ईस्वी में कुव्वत-उल- इस्लाम मस्जिद के प्रांगण में इसका निर्माण कार्य प्रारंभ कराया। प्रारंभ में इसके निर्माण हेतु जो खाका तैयार किया गया था उसमें इसकी ऊंचाई 225 फीट तथा चार मंजिल होना तय किया गया था।

कुतुब मीनार

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कुतुबुद्दीन कुतुबमीनार की केवल एक मंजिल का निर्माण कर सका शेष कार्य इल्तुतमिश द्वारा किया गया। कुतुबमीनार का निर्माण सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में कराया गया था। फिरोज तुगलक के समय में कुतुब मीनार पर आकाशीय बिजली गिरने के कारण इसकी चौथी मंजिल क्षतिग्रस्त हो गयी |जिससे इस चौथी मंजिल को तोड़कर इसके स्थान पर दो मंजिलो का निर्माण कराया गया | जिससे कुतुबमीनार की उचाई 234 फिट हो गयी थी | समय समय पर कुतुबमीनार की मरम्मत का कार्य फिरोजशाह तुगलक ,सिकंदर लोदी व् मेजर आर. स्मिथ द्वारा कराया गया |   

कुतुब मीनार के आंतरिक भाग में कुछ छोटे-छोटे देवनागरी अभिलेख खुदे हैं। इन्हीं अभिलेखों के आधार पर इसे शुरू में हिंदू मीनार होने से जोड़ा जाने का प्रयास किया गया और कहा गया कि मुसलमानों ने इसकी बाहरी दीवारों पर कटाई करके मीनार का स्वरूप प्रदान किया।

उक्त विचारधारा का सिरे से खण्डन जान मार्शल जैसे इतिहासकारों ने किया है। और कुतुब मीनार को इस्लामी मीनार ही माना जाना सर्व उचित है। इस मीनार के निकले छज्जों को छत्तेदार डिजाइन से अलंकृत पत्थरों के ब्रैकेट द्वारा सहारा दिया गया है।

प्रश्न:- कुतुब मीनार कहां है।
उत्तर:- कुतुब मीनार दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के परिसर में स्थित है।

प्रश्न :- कुतुब मीनार क्यों बनाया गया था।
उत्तर:- कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा मुसलमानों को एक जगह एकत्रित करके प्रार्थना सभाओं का आयोजन करना था।

प्रश्न:- कुतुबमीनार का निर्माण कब हुआ।
उत्तर:- कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ईस्वी में दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के परिसर में कराया गया।

प्रश्न:- कुतुब मीनार में कितनी सीढ़ियां हैं।
उत्तर:- कुतुब मीनार में 379 सीढ़ियां हैं।

अलीगढ़ आंदोलन (1876)|सर सैयद अहमद खां|अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय|तहजीब-उल-अखलाक

सर सैयद अहमद ख़ां:-

अलीगढ़ आंदोलन (1876), सर सैयद अहमद खां, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, तहजीब-उल-अखलाक

सर सैयद अहमद के नेतृत्व में अलीगढ़ आंदोलन 1876 में प्रारंभ हुआ। सर सैयद अहमद का जन्म 1817 ईस्वी में दिल्ली में हुआ। यह अंग्रेजी शिक्षा एवं ब्रिटिश सत्ता के सहयोग के पक्षधर थे। क्योंकि सर सैयद अहमद ख़ां का मानना था कि मुसलमानों में शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है इसलिए वह शिक्षा का प्रचार-प्रसार करके उनके बौद्धिक स्तर में वृद्धि तथा रोजगार प्राप्त करने में सक्षम हो सके। जिससे मुस्लिम समाज की दशा में सुधार हो सके।

अलीगढ़ आंदोलन

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अलीगढ़ आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था, कि मुस्लिम समुदाय का उत्थान कैसे किया जाए भारत में ज्यो-ज्यो पुनर्जागरण बड़ा और शिक्षा का विकास हुआ तो मुस्लिम समाज का एक प्रबुद्ध वर्ग शिक्षा की महत्ता को समझने लगा। इसी वर्ग का नेतृत्व सर सैयद अहमद ने अपने हाथों में संभाला और मुसलमानों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना तथा मुस्लिम समाज का उत्थान सुनिश्चित करना। लेकिन उनके इस कार्य का उलेमाओं तथा कट्टरपंथी मुसलमानों ने खुला विरोध किया। लेकिन सर सैयद अहमद अपने इस कार्य में निडरता से करने में डटे रहे।

1857 की महान क्रांति के पश्चात अंग्रेजी सत्ता को लगने लगा कि इस क्रांति में मुख्य षड्यंत्र करता मुसलमान थे। इसकी पुष्टि कुछ समय पश्चात हुए बहावी आंदोलन ने कर दी। अंग्रेजी सरकार को यह एहसास हो गया था कि बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण हिंदू मुस्लिम एकता के कारण कालांतर में और अधिक विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए अंग्रेजी सरकार ने बड़ी चालाकी से मुसलमानों को अपने सहयोगी के रूप में इस्तेमाल करने का निश्चय किया।

अलीगढ़ आंदोलन के प्रणेता सर सैयद अहमद का मत था। कि मुस्लिम समुदाय अभी पिछड़ा है और यदि हिंदू मुस्लिम एकता बनी रहे तो इसमें मुसलमानों कोई लाभ न होकर नुकसान ही होगा। किसी समय सर सैयद अहमद हिंदू मुस्लिम एकता के समर्थक थे। कालांतर में हिंदू तथा कांग्रेस विरोधी होते गए। फल स्वरुप अलीगढ़ आंदोलन विरोधी होता चला गया। इसी का अवसर पाकर अंग्रेजी सरकार ने मुसलमानों को अपने को अपने पक्ष में करने में सफलता प्राप्त की। और अलीगढ़ आंदोलन अंग्रेजों की विश्वसनीयता हासिल करने में सफल रहा।

सर सैयद अहमद ने अपने जीवन के दो मुख्य लक्ष्य बनाए। पहला अंग्रेजी सरकार और मुसलमानों के संबंधों को ठीक करना तथा दूसरा मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना। सर सैयद अहमद खान मुस्लिम मदरसो में पढ़ाई जाने वाली पुरानी पद्धति की शिक्षा से खुश नहीं थे। और इन्होंने यह तर्क दिया कि कुरान में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो मुस्लिम समाज को पश्चिमी संस्कृति के संपर्क में आने वाला अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने से रोकता है। इनके द्वारा सन 1864 में साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना तथा गाजीपुर में इसी वर्ष एक अंग्रेजी शिक्षा का स्कूल खोला गया। 1870 में फारसी भाषा में एक पत्रिका तहजीब-उल-अखलाक निकाली। यह सदैव अंग्रेजी सरकार के प्रति राजभक्त बने रहे। इसी क्रम में उनके द्वारा 1875 में अलीगढ़ में मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल की स्थापना की गई। जो 1878 में कॉलेज बना तथा 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया।
अलीगढ़ आंदोलन में सर सैयद अहमद खान के समर्थकों में चिराग अली, नजीर अहमद, अल्ताफ हुसैन अली, मौलाना शिबली नोमाली आदि प्रमुख थे। 1887 कांग्रेस के अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयब जी बने तो इन्होंने इसका विरोध किया।

धरासना|बेबमिलर|दांडी|नौजवान सभा| विलियम हॉकिंस, राल्फ फिच, सर थॉमस रो,

उस विदेशी पत्रकार का नाम बताइए जिसने धरासना साल्ट वर्क्स पर सत्याग्रह के बारे में समाचार दिए।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत गांधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ा गया इसी परिपेक्ष में मुंबई में इस आंदोलन का केंद्र बिंदु धरासना था जहां सरोजिनी नायडू, इमाम साहब, गांधी जी के पुत्र मणिलाल लगभग 2000 कार्यकर्ताओं के साथ धरासना नमक कारखाने की ओर बढ़े मुंबई के पास वडाला के नमक कारखाने पर लोगों ने धावा बोला और नमक लूट लिया 1930 में मुंबई के समुद्र पर अमेरिकी पत्रकार बेबमिलर ने सत्याग्रहियो पर अत्याचार का सजीव वर्णन किया।

धरासना

दांडी मार्च 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 ईस्वी तक

महात्मा गांधी 12 मार्च 1930 को 78 चुने अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम अहमदाबाद से दांडी नौसारी जिला गुजरात के लिए यात्रा प्रारंभ की।

गांधीजी 5 अप्रैल 1930 ईस्वी को 241 मील लंबी पैदल यात्रा के बाद दांडी पहुंचे उसके अगले दिन 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ा।

सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी की दांडी मार्च की तुलना नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की।

पश्चिमोत्तर प्रांत पेशावर में नमक आंदोलन का नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खान ने किया इनका यह आंदोलन लाल कुर्ती आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अब्दुल गफ्फार खान को सीमांत गांधी फख्र-ए- अफगान, बादशाह खान आदि नामों से जाना जाता है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र मणिपुर में सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व यदुनाथ के जिया रंग आंदोलन के नाम से जाना गया।

यदुनाथ पर हत्या का अभियोग लगाकर फांसी की सजा दी गई इसके बाद इनकी बहन गैडिनल्यू ने विद्रोह का संचालन किया इन्हें बाद में आजीवन कारावास की सजा हुई नेहरू जी ने इन्हें रानी की उपाधि प्रदान की।

मुंबई में इस आंदोलन का केंद्र बिंदु धारासना रहा 31 मार्च 1930 को सरोजनी नायडू इमाम साहब तथा गांधी जी के पुत्र मणिलाल लगभग 2000 कार्यकर्ताओं के साथ धारासना कारखाने की ओर बढ़े वहां पर लाठी चार्ज हुआ इस नृशंस अत्याचार का सजीव वर्णन अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने किया।

दक्षिण भारत में इस आंदोलन का नेतृत्व राजगोपालाचारी ने त्रिचनापल्ली से बदओख्यम तक की यात्रा की। सैनिक कट्टा नामक कारखाने पर धावा बोला।

1926 में गठित नौजवान सभा के प्रारंभिक सदस्य कौन कौन थे।

1926 ईस्वी में पंजाब में गठित नौजवान सभा के प्रारंभिक/संस्थापक सदस्य भगत सिंह, छबीलदास और यशपाल थे।

साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 ईस्वी को जब लाहौर स्टेशन पर पहुंचा तो नौजवान सभा के सदस्यों ने इस कमीशन का बहिष्कार करने के लिए जुलूस का गठन किया जिसमें लाला लाजपत राय पर लाठियों की बौछार की गई कुछ दिनों बाद लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और जयपाल ने स्कॉट को मारने का दृढ़ निश्चय किया मगर गलती से दिसंबर 1928 ईस्वी को सांडर्स और उनके रीडर चरण सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

 विलियम हॉकिंस, राल्फ फिच, सर थॉमस रो, निकोलस डाउंटन विदेशी यात्रियों को उनके भारत आने के कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।

राल्फ फिच भारत आने वाला पहला इंग्लिश यात्री था जो 1583 ई. में आगरा पहुंचा।

विलियम हॉकिंस इंग्लैंड का यात्री जो अगस्त 1608 में सूरत पहुंचता और अप्रैल 1609 में मुगल शासक जहांगीर के दरबार आगरा पहुंचा।

सर थॉमस रो एक ब्रिटिश यात्री था जो सितंबर 1615 ई. में जहांगीर के दरबार में पहुंचा।

निकोलस डाउंटन 1615 ई. में भारत आया।